लोगों की राय

गीता प्रेस, गोरखपुर >> मार्कण्डेय पुराण

मार्कण्डेय पुराण

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :294
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1196
आईएसबीएन :81-293-0153-9

Like this Hindi book 3 पाठकों को प्रिय

317 पाठक हैं

अठारह पुराणों की गणना में सातवाँ स्थान है मार्कण्डेयपुराण का...

रुचिने कहा- पितरो! अब तो मैं बूढ़ा हो गया; भला, मुझको कौन स्त्री देगा। इसके सिवा मुझ-जैसे दरिद्रके लिये स्त्रीको रखना बहुत कठिन कार्य है।

पितर बोले- वत्स! यदि हमारी बात नहीं मानोगे तो हमलोगोंका पतन हो जायगा और तुम्हारी भी अधोगति होगी।

मार्कण्डेयजी कहते हैं- मुनिश्रेष्ठ! यों कहकर पितर उनके देखते-देखते वायुके बुझाये हुए दीपककी भाँति सहसा अदृश्य हो गये। पितरोंकी बातसे रुचिका मन बहुत उद्विग्न हुआ। वे अपने विवाहके लिये कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथ्वीपर विचरने लगे। वे पितरोंके वचनरूप अग्निसे दग्ध हो रहे थे। कोई कन्या न मिलनेसे उन्हें बड़ी भारी चिन्ता हुई। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इसी अवस्थामें उन्हें यह बुद्धि सूझी कि 'मैं तपस्याके द्वारा श्रीब्रह्माजीकी आराधना करूँ।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने कठोर नियमका आश्रय ले श्रीब्रह्माजीकी आराधनाके निमित्त सौ वर्षोंतक भारी तपस्या की। तदनन्तर लोकपितामह ब्रह्माजीने उन्हें दर्शन दिया और कहा-'मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो, माँग लो।' तब रुचिने जगत् के आधारभूत ब्रह्माजीको प्रणाम करके पितरोंके कथनानुसार अपना अभीष्ट निवेदन किया। रुचिकी अभिलाषा सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा- 'विप्रवर! तुम प्रजापति होओगे। तुमसे प्रजाकी सृष्टि होगी। प्रजाकी सृष्टि तथा पुत्रोंकी उत्पत्ति करनेके साथ ही शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके जब तुम अपने अधिकारका त्याग कर दोगे, तब तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। अब तुम स्त्री-प्राप्तिकी अभिलाषा लेकर पितरोंका पूजन करो। वे ही प्रसन्न होनेपर तुम्हें मनोवाञ्छित पत्नी और पुत्र प्रदान करेंगे। भला, पितर सन्तुष्ट हो जायँ तो वे क्या नहीं दे सकते।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं- मुने! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रुचिने नदीके एकान्त तटपर पितरोंका तर्पण किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर एकाग्र एवं संयत-चित्त हो नीचे लिखे स्त्रोत्रद्वारा आदरपूर्वक उनकी स्तुति की-

रुचि बोले- जो श्राद्धमें अधिष्ठाता देवताके रूपमें निवास करते हैं तथा देवता भी श्राद्धमें 'स्वधान्त' वचनोंद्वारा जिनका तर्पण करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। भक्ति और मुक्तिकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षिगण स्वर्गमें भी मानसिक श्राद्धोंके द्वारा भक्तिपूर्वक जिन्हें तृप्त करते हैं, सिद्धगण दिव्य उपहारोंद्वारा श्राद्धमें जिनको सन्तुष्ट करते हैं, आत्यन्तिक समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले गुह्यक भी तन्मय होकर भक्तिभावसे जिनकी पूजा करते हैं, भूलोकमें मनुष्यगण जिनकी सदा आराधना करते हैं, जो श्राद्धोंमें श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर मनोवाञ्छित लोक प्रदान करते हैं, पृथ्वीपर ब्राह्मणलोग अभिलषित वस्तुकी प्राप्तिके लिये जिनकी अर्चना करते हैं तथा जो आराधना करनेपर प्राजापत्य लोक प्रदान करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। तपस्या करनेसे जिनके पाप धुल गये हैं तथा जो संयमपूर्वक आहार करनेवाले हैं, ऐसे वनवासी महात्मा वनके फल-मूलों द्वारा श्राद्ध करके जिन्हें तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं मस्तक झुकाता हूँ। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले संयतात्मा ब्राह्मण समाधिके द्वारा जिन्हें सदा तृप्त करते हैं, क्षत्रिय सब प्रकार के श्राद्धोपयोगी पदार्थों के द्वारा विधिवत् श्राद्ध करके जिनको सन्तुष्ट करते हैं, जो तीनों लोकोंको अभीष्ट फल देनेवाले हैं, स्वकर्मपरायण वैश्य पुष्प, धूप, अन्न और जल आदिके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं तथा शूद्र भी श्राद्धोंद्वारा भक्तिपूर्वक जिनकी तृप्ति करते हैं और जो संसारमें सुकालीके नामसे विख्यात हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। पातालमें बड़े-बड़े दैत्य भी दम्भ और मद त्यागकर श्राद्धोंद्वारा जिन स्वधाभोजी पितरोंको सदा तृप्त करते हैं, मनोवाञ्छित भोगोंको पानेकी इच्छा रखनेवाले नागगण रसातलमें सम्पूर्ण भोगों एवं श्राद्धोंसे जिनकी पूजा करते हैं तथा मन्त्र, भोग और सम्पत्तियोंसे युक्त सर्पगण भी रसातलमें ही विधिपूर्वक श्राद्ध करके जिन्हें सर्वदा तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साक्षात् देवलोकमें, अन्तरिक्षमें और भूतलपर निवास करते हैं, देवता आदि समस्त देहधारी जिनकी पूजा करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। वे पितर मेरे द्वारा अर्पित किये हुए इस जलको ग्रहण करें। जो परमात्मस्वरूप पितर मूर्तिमान् होकर विमानोंमें निवास करते हैं, जो समस्त क्लेशोंसे छुटकारा दिलानेमें हेतु हैं तथा योगीश्वरगण निर्मल हृदयसे जिनका यजन करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वधाभोजी पितर दिव्यलोक में मूर्तिमान् होकर रहते हैं, काम्यफल की इच्छा रखनेवाले पुरुष की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। वे समस्त पितर इस जलसे तृप्त हों, जो चाहनेवाले पुरुषोंको इच्छानुसार भोग प्रदान करते हैं, देवत्व, इन्द्रत्व तथा उससे ऊँचे पदकी प्राप्ति कराते हैं। इतना ही नहीं, जो पुत्र, पशु, धन, बल और गृह भी देते हैं। जो पितर चन्द्रमाकी किरणोंमें, सूर्यके मण्डलमें तथा श्वेत विमानोंमें सदा निवास करते हैं, वे मेरे दिये हुए अन्न, जल और गन्ध आदिसे तृप्त एवं पुष्ट हों। अग्निमें हविष्यका हवन करनेसे जिनको तृप्ति होती है, जो ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर भोजन करते हैं तथा पिण्डदान करनेसे जिन्हें प्रसन्नता प्राप्त होती है, वे पितर यहाँ मेरे दिये हुए अन्न और जलसे तृप्त हों। जो देवताओंसे भी पूजित हैं तथा सब प्रकारसे श्राद्धोपयोगी पदार्थ जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, वे पितर यहाँ पधारें। मेरे निवेदन किये हुए पुष्प, गन्ध, अन्न एवं भोज्य पदार्थोंके निकट उनकी उपस्थिति हो। जो प्रतिदिन पूजा ग्रहण करते हैं, प्रत्येक मासके अन्त में जिनकी पूजा करनी उचित है, जो अष्टकाओंमें, वर्षके अन्तमें तथा अभ्युदयकालमें भी पूजनीय हैं, वे मेरे पितर वहाँ तृप्ति लाभ करें। जो ब्राह्मणोंके यहाँ कुमुद और चन्द्रमाके समान शान्ति धारण करके आते हैं, क्षत्रियोंके लिये जिनका वर्ण नवोदित सूर्यके समान है, जो वैश्योंके यहाँ सुवर्णके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं तथा शूद्रोंके लिये जो श्याम वर्णके हो जाते हैं, वे समस्त पितर मेरे दिये हुए पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न और जल आदिसे तथा अग्निहोत्रसे सदा तृप्ति लाभ करें। मैं उन सबको प्रणाम करता हूँ। जो वैश्वदेवपूर्वक समर्पित किये हुए श्राद्धको पूर्ण तृप्तिके लिये भोजन करते हैं और तृप्त हो जानेपर ऐश्वर्यकी सृष्टि करते हैं, वे पितर यहाँ तृप्त हों। मैं उन सबको नमस्कार करता हूँ। जो राक्षसों, भूतों तथा भयानक असुरोंका नाश करते हैं, प्रजाजनोंका अमङ्गल दूर करते हैं, जो देवताओंके भी पूर्ववर्ती तथा देवराज इन्द्रके भी पूज्य हैं, वे यहाँ तृप्त हों। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। अग्निष्वात्त पितृगण मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें, बर्हिषद् पितृगण दक्षिण दिशाकी रक्षा करें। आज्यप नामवाले पितर पश्चिम दिशाकी तथा सोमप संज्ञक पितर उत्तर दिशाकी रक्षा करें। उन सबके स्वामी यमराज राक्षसों, भूतों, पिशाचों तथा असुरोंके दोषसे सब ओरसे मेरी रक्षा करें। विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति-ये पितरोंके नौ गण हैं। कल्याण, कल्यताकर्ता, कल्य, कल्यतराश्रय, कल्यता-हेतु तथा अनद्य-ये पितरोंके छ: गण माने गये हैं। वर, वरेण्य, वरद, पुष्टिद, तुष्टिद, विश्वपाता तथा धाता-ये पितरोंके सात गण हैं। महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल- ये पितरोंके पापनाशक पाँच गण हैं। सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद-ये पितरोंके चार गण कहे जाते हैं। इस प्रकार कुल इकतीस पितृगण हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है। वे सब पूर्ण तृप्त होकर मुझपर सन्तुष्ट हों और सदा मेरा हित करें।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

    अनुक्रम

  1. वपु को दुर्वासा का श्राप
  2. सुकृष मुनि के पुत्रों के पक्षी की योनि में जन्म लेने का कारण
  3. धर्मपक्षी द्वारा जैमिनि के प्रश्नों का उत्तर
  4. राजा हरिश्चन्द्र का चरित्र
  5. पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गति का वर्णन
  6. जीवके जन्म का वृत्तान्त तथा महारौरव आदि नरकों का वर्णन
  7. जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापों से विभिन्न नरकों की प्राप्ति का वर्णन
  8. पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित् के पुण्यदान से पापियों का उद्धार
  9. दत्तात्रेयजी के जन्म-प्रसङ्ग में एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूया जी का चरित्र
  10. दत्तात्रेयजी के जन्म और प्रभाव की कथा
  11. अलर्कोपाख्यान का आरम्भ - नागकुमारों के द्वारा ऋतध्वज के पूर्ववृत्तान्त का वर्णन
  12. पातालकेतु का वध और मदालसा के साथ ऋतध्वज का विवाह
  13. तालकेतु के कपट से मरी हुई मदालसा की नागराज के फण से उत्पत्ति और ऋतध्वज का पाताललोक गमन
  14. ऋतध्वज को मदालसा की प्राप्ति, बाल्यकाल में अपने पुत्रों को मदालसा का उपदेश
  15. मदालसा का अलर्क को राजनीति का उपदेश
  16. मदालसा के द्वारा वर्णाश्रमधर्म एवं गृहस्थ के कर्तव्य का वर्णन
  17. श्राद्ध-कर्म का वर्णन
  18. श्राद्ध में विहित और निषिद्ध वस्तु का वर्णन तथा गृहस्थोचित सदाचार का निरूपण
  19. त्याज्य-ग्राह्य, द्रव्यशुद्धि, अशौच-निर्णय तथा कर्तव्याकर्तव्य का वर्णन
  20. सुबाहु की प्रेरणासे काशिराज का अलर्क पर आक्रमण, अलर्क का दत्तात्रेयजी की शरण में जाना और उनसे योग का उपदेश लेना
  21. योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति
  22. योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना
  23. अलर्क की मुक्ति एवं पिता-पुत्र के संवाद का उपसंहार
  24. मार्कण्डेय-क्रौष्टुकि-संवाद का आरम्भ, प्राकृत सर्ग का वर्णन
  25. एक ही परमात्माके त्रिविध रूप, ब्रह्माजीकी आयु आदिका मान तथा सृष्टिका संक्षिप्त वर्णन
  26. प्रजा की सृष्टि, निवास-स्थान, जीविका के उपाय और वर्णाश्रम-धर्म के पालन का माहात्म्य
  27. स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसह के स्थान आदि का वर्णन
  28. दुःसह की सन्तानों द्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्ति के उपाय
  29. जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन
  30. श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग, नदी, पर्वत और जनपदोंका वर्णन
  31. भारतवर्ष में भगवान् कूर्म की स्थिति का वर्णन
  32. भद्राश्व आदि वर्षोंका संक्षिप्त वर्णन
  33. स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन
  34. पद्मिनी विद्याके अधीन रहनेवाली आठ निधियोंका वर्णन
  35. राजा उत्तम का चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तर का वर्णन
  36. तामस मनुकी उत्पत्ति तथा मन्वन्तरका वर्णन
  37. रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन
  38. चाक्षुष मनु की उत्पत्ति और उनके मन्वन्तर का वर्णन
  39. वैवस्वत मन्वन्तर की कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तर का संक्षिप्त परिचय
  40. सावर्णि मनुकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें देवी-माहात्म्य
  41. मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वधका प्रसङ्ग सुनाना
  42. देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध
  43. सेनापतियों सहित महिषासुर का वध
  44. इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति
  45. देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति, चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिका के रूप की प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना
  46. धूम्रलोचन-वध
  47. चण्ड और मुण्ड का वध
  48. रक्तबीज-वध
  49. निशुम्भ-वध
  50. शुम्भ-वध
  51. देवताओं द्वारा देवी की स्तुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान
  52. देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य
  53. सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान
  54. नवें से लेकर तेरहवें मन्वन्तर तक का संक्षिप्त वर्णन
  55. रौच्य मनु की उत्पत्ति-कथा
  56. भौत्य मन्वन्तर की कथा तथा चौदह मन्वन्तरों के श्रवण का फल
  57. सूर्यका तत्त्व, वेदोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सृष्टि-रचनाका आरम्भ
  58. अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार
  59. सूर्यकी महिमाके प्रसङ्गमें राजा राज्यवर्धनकी कथा
  60. दिष्टपुत्र नाभागका चरित्र
  61. वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह
  62. राजा खनित्रकी कथा
  63. क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र
  64. राजा नरिष्यन्त और दम का चरित्र
  65. श्रीमार्कण्डेयपुराणका उपसंहार और माहात्म्य

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book