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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिवपुराण

शिवपुराण

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1190
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...


कथा-प्रारम्भ के दिन से एक दिन पहले व्रत ग्रहण करने के लिये वक्ता को क्षौर करा लेना चाहिये। जिन दिनों कथा हो रही हो, उन दिनों प्रयत्नपूर्वक प्रातःकाल का सारा नित्यकर्म संक्षेप से ही कर लेना चाहिये। वक्ता के पास उसकी सहायता के लिये एक दूसरा वैसा ही विद्वान् स्थापित करना चाहिये। वह भी सब प्रकार के संशयों को निवृत्त करने र्मे समर्थ और लोगों को समझाने में कुशल हो। कथा में आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिये गणेशजी का पूजन करे। कथा के स्वामी भगवान् शिव की तथा विशेषत: शिवपुराण की पुस्तक की भक्तिभाव से पूजा करे। तत्पश्चात् उत्तम बुद्धिवाला श्रोता तन-मन से शुद्ध एवं प्रसन्नचित्त हो आदरपूर्वक शिवपुराण की कथा सुने। जो वक्ता और श्रोता अनेक प्रकार के कर्मों में भटक रहे हों, काम आदि छ: विकारों से युक्त हों, स्त्री में आसक्ति रखते हों और पाखण्डपूर्ण बातें कहते हों, वे पुण्य के भागी नहीं होते। जो लौकिक चिन्ता तथा धन, गृह एवं पुत्र आदि की चिन्ता को छोड़कर कथा में मन लगाये रहते हैं, उन शुद्धबुद्धि पुरुषों को उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो श्रोता श्रद्धा और भक्ति से युक्त होते हैं, दूसरे कर्मों में मन नहीं लगाते और मौन, पवित्र एवं उद्वेग शून्य होते हैं, वे ही पुण्य के भागी होते हैं।

सूतजी बोले- शौनक! अब शिवपुराण सुनने का व्रत लेनेवाले पुरुषों के लिये जो नियम हैं, उन्हें भक्तिपूर्वक सुनो। नियमपूर्वक इस श्रेष्ठ कथा को सुनने से बिना किसी विघ्न-बाधा के उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो लोग दीक्षा से रहित हैं, उनका कथा-श्रवण में अधिकार नहीं है। अत: मुने! कथा सुनने की इच्छावाले सब लोगों को पहले वक्ता से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये। जो लोग नियम से कथा सुनें, उनको ब्रह्मचर्य से रहना, भूमि पर सोना, पत्तल में खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर ही अन्न ग्रहण करना चाहिये। जिसमें शक्ति हो, वह पुराण की समाप्ति तक उपवास करके शुद्धतापूर्वक भक्तिभाव से उत्तम शिवपुराण को सुने। इस कथा का व्रत लेनेवाले पुरुष को प्रतिदिन एक ही बार हविष्यान्न भोजन करना चाहिये। जिस प्रकार से कथा- श्रवण का नियम सुखपूर्वक सध सके, वैसे ही करना चाहिये। गरिष्ठ अन्न, दाल, जला अन्न, सेम, मसूर, भावदूषित तथा बासी अन्न को खाकर कथाव्रती पुरुष कभी कथा को न सुने। जिसने कथा का व्रत ले रखा हो, वह पुरुष प्याज, लहसुन, हींग, गाजर, मादक वस्तु तथा आमिष कही जानेवाली वस्तुओं को त्याग दे। कथा का व्रत लेनेवाला पुरुष काम, क्रोध आदि छ: विकारों को, ब्राह्मणों की निन्दा को तथा पतिव्रता और साधु-संतों की निन्दा को भी त्याग दे। कथाव्रती पुरुष प्रतिदिन सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता, विनय तथा हार्दिक उदारता - इन सद्‌गुणों को सदा अपनाये रहे। श्रोता निष्काम हो या सकाम, वह नियमपूर्वक कथा सुने। सकाम पुरुष अपनी अभीष्ट कामना को प्राप्त करता है और निष्काम पुरुष मोक्ष पा लेता है। दरिद्र, क्षय का रोगी, पापी, भाग्यहीन तथा संतान रहित पुरुष भी इस उत्तम कथा को सुने। काक-बन्ध्या आदि जो सात प्रकार की दुष्टा स्त्रियाँ हैं वे तथा जिसका गर्भ गिर जाता हो, वह - इन सभी को शिवपुराण की उत्तम कथा सुननी चाहिये। मुने! स्त्री हो या पुरुष-सबको यत्नपूर्वक विधि-विधान से शिवपुराण की यह उत्तम कथा सुननी चाहिये।

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