संस्मरण >> आलोचक का आकाश आलोचक का आकाशमधुरेश
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सिर्फ आत्मकथा नहीं, एक समय, समाज और आलोचक की दुनिया की पुनर्रचना।
लेखन की शुरुआत कहानी से करने वाले मधुरेश की आलोचना में एक विशिष्ट पहचान है। ‘आलोचक का आकाश’ उनकी ऐसी संस्मरणात्मक कृति है जिसमें वह आत्ममुग्धता से तो बचे ही हैं, उस परिवेश को भी उन्होंने बखूबी पकड़ा है, जिसमें वे जिए–बढ़े।
उनका यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि जिया गया परिवेश कभी पूरी तरह से नहीं मिट पाता। वह उस परिवेश को जीने वाले व्यक्ति के अंदर जीवित रहता है। यह भी सच है कि इन स्मृतियों में उतरना और उन्हें कागज पर उतारना किसी बीहड़ यात्रा से कम नहीं है। इस अपनी जी हुई दुनिया में मधुरेशजी पूरे मन से उतरे हैं और खोज–खोजकर पुरानी चीजें निकाल कर ले आए हैं।
यह एक ऐसी सम्मोहक यात्रा है जिसमें उनके साथ पाठकों को भी अद्भुत आनंद का अनुभव होगा। यह एक अनूठी संस्मरण–यात्रा इसलिए भी है कि यहां व्यक्ति राम प्रकाश शंखधर ही नहीं, उसका वह पूरा समय, समाज और आत्मीयजन भी पूरी आत्मीयता के साथ कथा का हिस्सा बन चुके हैं।
मधुरेशजी के शब्दों में यह उस समय व समाज का पुनराविष्कार है, इसे पढ़ते हुए रसवान पाठकों को रचनात्मक गद्य का आस्वाद तो मिलेगा ही, वे आलोचक के आकाश से भी प्रामाणिक रूप में जुड़ सकेंगे।
हिन्दी गद्य को समृद्ध करने वाली इस कृति को सुधी पाठक सहेज कर रखना चाहेंगे।
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