रूम ऑन द रूफ़ (सजिल्द) - रस्किन बॉण्ड The Room On The Roof (Hard) - Hindi book by - Ruskin Bond
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रूम ऑन द रूफ़ (सजिल्द)

रस्किन बॉण्ड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
आईएसबीएन : 9789350641941 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :144 पुस्तक क्रमांक : 9895

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एक महत्वपूर्ण उपन्यास...

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हवा पर सवार हलकी बसंती फुहार सड़क के दोनों ओर खड़े पेड़ों के बीच से होते हुए सड़क तक पहुंच रही थी। इस बारीक फुहार की वजह से हवा में एक खुशनुमा ताज़गी, मिट्टी का सोंधापन, और फूलों की महक आ गयी थी। इसी फुहार की बदौलत ही सड़क पर चले जा रहे लड़के की आंखों में मुस्कुराहट छा गयी थी।

पहाड़ियों पर लिपट-लिपट कर चलता वह लंबा रास्ता कभी ऊपर को जाता तो कभी नीचे को और बल खाता हुआ देहरा (देहरादून) तक जा पहुंचता। ऊंचे पहाड़ों से आता रास्ता जंगलों और वादियों से ग़ुजरता देहरा से होता हुआ बाज़ार में कहीं जाकर खत्म होता था। लेकिन कहां खत्म होता था ये किसी को नहीं पता था, क्योंकि बाजार अपने आप में ऐसा भूलभुलैया-सा था कि वहां सड़कें भी चुटकियों में रास्ता भूल जाएं !

लड़का देहरा से तीन मील आगे निकल चुका था। वह देहरा से जितना दूर होता जाता, उतनी ही खुशी महसूस करता। फिलहाल तो वह बस देहरा से तीन मील आगे पहुंचा था, इसलिए इतना भी ज़्यादा खुश नहीं था। ऊपर से, दिक्कत ये कि वह घर की तरफ़ जा रहा था।

उजली-सी रंगत वाले इस लड़के की आंखें नीली और कंजी और बालों का रंग भी हल्का भूरा था। उसका चेहरा खुरदरा और निशानों से भरा था, और नीचे का होंठ भारी और लटका सा था। उसने अपने हाथ जेब में डाल रखे थे और वह सिर झुकाए चला जा रहा था। उसके चलने का ढंग कुछ ऐसा था जिससे वह थका-थका सा लगता था। वह आलसी तो था, लेकिन थका हुआ इंसान नहीं था।

चेहरे पर गिरती बारिश की बूँदें उसे अच्छी लग रही थीं; सोंधेपन और ताज़गी के एहसास की वजह से। न तो वह इधर-उधर देख रहा था, और न ही आसपास किसी चीज़ पर उसका ध्यान जा रहा था। उसका मन हमेशा की तरह कहीं बहुत दूर निकल गया था। लेकिन जैसे ही उसने बदले हुए माहौल और खुशनुमा मौसम की ताज़गी को महसूस किया, मुस्कराहट उसके चेहरे पर छा गयी।

उसका दिमाग कहीं इतनी दूर जा पहुंचा था कि कई मिनट बाद उसे अपने साथ-साथ चल रही साइकिल के पहियों की आवाज़ का एहसास हुआ। लड़के को पीछे छोड़, सड़क पर आगे बढ़ने के बजाए साइकिल सवार उसके साथ-साथ साइकिल चलाते हुए, उसे गौर से देखता जा रहा था। नज़र आने वाली उसकी एक-एक खूबी वह बारीकी से देखता रहा। खुला हुआ सिर, शर्ट का खुला गला, फलालेन की पतलून, पांव में सैंडल और कमर पर कसी कच्चे चमड़े की बेल्ट। देहरा में अब अंग्रेज लड़के दिखना आम बात नहीं रह गयी थी शायद इसीलिए सोमी, जो साइकिल पर था, उसमें दिलचस्पी ले रहा था।

‘हलो !’ - कहते हुए सोमी ने अपनी साइकिल की घंटी भी टनटना दी। लड़के ने सिर उठाकर देखा तो पाया कि साइकिल पर एक लड़का है जिसके सिर पर टेढ़ी-मेढ़ी पगड़ी और चेहरे पर अपनेपन के भाव हैं।

सोमी ने फिर कहा-‘हलो, मैं तुम्हें अपनी साइकिल से शहर तक छोड़ दूं ? अगर तुम उस तरफ जा रहे हो ?’

अपनी चाल में ज़रा भी ढिलाई लाये बिना लड़के ने जवाब दिया-‘ऐसे ही ठीक है। मुझे पैदल चलना अच्छा लगता है।’

‘वह तो मुझे भी अच्छा लगता है, लेकिन अभी तो बारिश हो रही है न।’ सोमी का इतना कहना था कि बारिश और तेज़ हो गयी; जैसे सोमी की दलील को सही ठहरा रही हो।

‘बारिश में पैदल चलना मुझे अच्छा लगता है,’ लड़के ने जवाब दिया,’ और फिर मैं शहर में रहता भी नहीं, शहर के बाहर रहता हूं।’

वैसे भी भले लोग शहर के अंदर नहीं रहते...

‘कोई बात नहीं, मैं तुम्हारे रास्ते से होकर निकल जाऊंगा,’ सोमी ने कहा। जैसे इस अजनबी की मदद करने की उसने ठान ही ली थी।

लड़के ने सोमी की तरफ ध्यान दिया तो पाया कि उसने भी उसकी ही तरह के कपड़े पहन रखे थे, बस पतलून के बजाय हाफ़ पैंट और सिर पर पगड़ी थी।

सोमी की टांगें वैसी थीं जैसे खिलाड़ियों की होती हैं-लंबी-लंबी। और रंग ऐसा गहरा गेहुआं जैसा कि आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। उसके नैन-नक़्श भी अच्छे थे और उसके मुंह से अपनापन टपकता था। कुल मिलाकर उसकी फ़ितरत में ऐसा अपनापन था जिसे नकारा नहीं जा सकता था।

लड़का झट से सोमी के आगे साइकिल के डंडे पर बैठ गया और वे आगे बढ़ चले।

छोटी पहाड़ियों की घुमावदार सड़क के दोनों तरफ़ खड़े जंगल पीछे छोड़ते हुए वे दूर तक फैले खेतों, चाय और फल बागान से होते हुए बिना पैडल मारे बिलकुल आराम से आगे बढ़ते जा रहे थे। कहीं-कहीं बस इक्का-दुक्का मकान थे।

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