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गीता प्रेस, गोरखपुर >> प्रेम योग

प्रेम योग

वियोगी हरि

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :287
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 951
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत पुस्तक में प्रेम एक टेढ़ी मेढ़ी तसवीर है।

Premyog A Hindi Book by Viyogi Hari -प्रेम योग- वियोगी हरि

प्रस्तुत हैं इसी पुस्तक के कुछ अंश


प्रेम-प्रस्तावना


मेरे प्यारे राम ! तेरी यह भी एक मरजी थी। तूने मुझे राजी करा ही लिया। जैसा जो कुछ बना, तेरी आज्ञा का पालन किया और करूँगा। यन्त्र के सारे पुर्जे यन्त्री के हाथ में हैं ही, फिर यह कैसे हो सकता था कि मैं तेरी रज़ा में राज़ी न होता ? पर कृपा निधान ! अब कभी ऐसी आज्ञा न देना, अनधिकार कार्य इन हाथों से न कराना। भला, प्रेम का तत्व मैं क्या समझूँ ? तेरे इश्क़ के कूचे में जिसने कभी भूलकर भी पैर नहीं रखा, जिसके हृदय में आजतक तेरी चुभीली लगन की हूक नहीं उठी, उसे तू आज्ञा देता है कि ला, प्रेमकी पीरकी एक तस्वीर खींचकर दिखा ! तेरी  आज्ञा,  प्यारे ! कैसे टालता ? लो, खींच दी है इश्क़ की कसक-कहानी की एक टेढ़ी-मेढ़ी तसवीर ! इधर-उधर से कच्चे-पक्के रंग जुटाकर एक अंट-संट लकीरें-सी खींच दी हैं। मेरे हृदयरमण राम ! तू भले ही मेरी इस भोंडी चित्रकारी पर रीझ जाय पर कोई और चित्ररसिक मुझे इस पर कभी दाद न देगा।
किसी भी बहाने सही, तेरी प्यारी याद तो आ गयी। इतना समय तो सफल हो गया क्योंकि मैं समझता हूँ कि

शब वही शब है, दिन वही दिन है;
जो तेरी याद में गुज़र जाये।।

मुश्किल है, प्यारे ! तेरी अनोखी याद में ज़िन्दगी का गुज़र जाना। और भी कठिन है तेरे प्रेमकी पीर में तड़प-तड़पकर अपने को कैदेहस्ती से छुड़ा लेना। दुर्लभ है, प्रेम दुर्लभ है। लेन-देन  के बाज़ार में प्रेम मिलेगा कहाँ नाथ ! ये लोभी सौदागर प्रेम के नाम पर न जाने आज क्या बेच  रहे हैं। यह क्या कमीना रोज़गार फैला रखा है इन लोगों ने ! यह सब देखा नहीं जाता। जी रह-रहकर घबरा उठता है। कहाँ जाऊँ, कहाँ रहूँ, क्या करूँ ? हा !

 मैं कहाँ रहूँ मैं कहाँ बसूं,
न यह मुझसे खुश, न वो मुझसे खुश।
मैं ज़मींकी पीठ का बोझ हूँ,
मैं फ़लक के दिलका गुबार हूँ।।


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