अब के बिछुड़े - सुदर्शन प्रियदर्शिनी Ab Ke Bichhude - Hindi book by - Sudarshan Priyadarshini
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अब के बिछुड़े

सुदर्शन प्रियदर्शिनी

प्रकाशक : नमन प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
आईएसबीएन : 9788181295408 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :164 पुस्तक क्रमांक : 9428

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह उपन्यास उन जिज्ञासाओं का पिटारा है जो आज तक इस उजबजक में झूल रही है कि यह प्रेम नाम की शै (वस्तु) क्या है, क्यों है, कहीं है भी या नहीं। सारा विश्व इस के तिलिस्म में पागल है और होता है - कभी न कभी। किसी न किसी मोड़ पर किसी को कोई चंचल तरेर, कोई चितवन, कोई छुअन, कोई कोमल-किसलय गात, कोई स्वर, कोई छवि अपनी अंगुली में बरबस लपेट लेती है। तब उस की सारी संज्ञाएँ, सारी परिमिता, सारी चेतनता, सारी बुद्धि एक बार इस प्रेम नामक विषरस में काल कवलित हो जाती है। वह अंधों से भी अँधा, बहरों से भी बहरा, पगलों से भी पगला और जीवित से परे एक अर्ध-मूर्छितावस्था में न जाने कब तक पड़ा रहता है। संसार उस के लिए शून्य हो जाता है और अपने सब अदृश्य। वह सारी कर्मठता, सारा सौजन्य कहीं किसी ताक पर रख कर-स्वयं को ही भूल जाता है। आज तक इसका उत्तर नहीं मिला कि यह क्या बीमारी है। यही जिज्ञासाएँ हैं मेरे उपन्यास में। इस का कारण आप को मिल जाये तो कृप्या मुझे अवश्य बताएं। मेरे अंधेरों में उजाले का काम करेंगे आप।

पत्र संख्या- 1

मेरे राज, जब से तुम्हें देखा, लगता है सौन्दर्य की इतिश्री नहीं हुई। उस एक क्षण में मैंने भरपूर बहार जी ली है। जिस तरह ग्रीष्म या शरद की छिटपुट बहारें मन नहीं बहला सकती, उसी तरह पुरुष का आकर्षण मुझे कभी बाँध नहीं सका। सच पूछो तो मुझे पुरुष कभी सुंदर दिखा ही नहीं। ओ मेरे सौन्दर्य देवता ! यह तुमने क्या जादू कर दिया कि सारा ब्राह्मण्ड फीका लगने लगा है। जी चाहता है, तुम्हें सामने बिठाकर देखा करूँ...। यों भी तुम्हारा अपरूप-सौंदर्य स्पर्श से परे केवल नेत्रों से पूज्यनीय है।

उस क्षण मुझ में, तुम्हें लेकर कोई अन्यत्र भाव नहीं आया, केवल देवता की मूर्ति के समक्ष अवाक हो जाने का सा भाव उभरा... और मूर्ति का वह अभिराम रूप केवल पावन अश्रु जलकण से अभिचिंत ही तो किया जा सकता है न।

तुम मंदिर की सीढ़िया उतर रहे थे और मेरे हाथ में पूजा की थाली में रखा हुआ दीपक था... एक दम आमने-सामने क्यो ठिठक गये थे हम...। और उस प्रकाश में तुम्हारा सांध्य-आकाश-सा चेहरा देदेव्यमान क्यो हो उठा था प्राण।

कैसे कहूँ...मुझे अपने देह के वसन्त लौटते दिखने लगे - क्यों लगने लगा कि मैं अपने बीते वर्षों को पुकार रही हूँ...।

अपनी उम्र के प्रति एक वितृष्णा का भाव उभर आया। बालों में कहीं-कहीं चमकती चाँदनी चुभने लगी। तुम ने तो न जाने मुझे कैसे देखा - लेकिन जब मैंने देखा तो देखती ही रह गई। नयनाभिराम - तुम्हारा सौंदर्य कहीं मेरे अंदर बाहर को आंदोलित कर गया। मैं तुम्हारें लिये-इस क्षण सोच कर विभोर हो रही हूँ और अश्रुप्लावित भी। जब भी कल्पना में तुम्हारा चित्र बनाती हूँ - मालूम नहीं, कहीं अश्रुयौ से सरोबार क्यों हो जाती हूँ...। एक उदासी-सी घेर लेती है मुझे। स्वयं को बाँध-बाँध कर रखना चाहती हूँ - फिर भी मन के घोड़े तुम तक दौड़कर पहुँच ही जाते हैं। तुम्हें कैसे समझाऊँ। मन को बाँध कर तुम्हें समझाना चाहूँगी तो मेरी भाषा की प्रेषणीयता तुम तक पहुँच नहीं पायेगी और मेरी बात वहीं की वहीं रह जायेगी...।

मेरे लिये तुम मंदिर की सीढ़ी पर खड़े बुत बन गये हो। जब भी मंदिर की कल्पना करूँगी उस सीढ़ी पर माथा अपने आप झुक जायेगा और उन प्रदीप्त किरणों से मेरा अंर्तलोक प्रकाशित हो उठेगा। क्या हो गया है मुझे - यह कल्पनातीत है। इसे ही कहते होगें - जादू-टोना शायद या वशीभूत हो जाना। मर्यादा से निकल कर स्वछन्द हो जाना। निर्द्वद्व हवा का झोंका हो जाना।

ओह ! क्या कह रही हूँ और क्या कर रही हूँ। मैं कभी इतनी असंयमित तो नहीं हुई थी। इस से पहले। बस ! मेरे अभिराम चित्र तुम यही जड़वत रहना... मेरे मानस में।

कैसा संयोग है - कैसी विचित्रता है। तुम और वह भी मन्दिर की सीढ़ियों पर...। उस समय तो मैं केवल तुम्हारा रंग-देख कर भौंच्चक हुई थी। लेकिन आज तो मूक और अवाक हूँ...। इसे मैं पिछले जन्मों के साथ जोड़ने का लोभ नहीं संवरण कर सकती। उस पर इतनी गहन-गंभीर मेरी आसक्ति...। जैसे दो बिछुड़े-हुऔ का पुर्नमिलन। जैसे क्षितिज पर आकाश और धरती का मिलन - तुम्हीं बताओं इसे क्या नाम दूँ।

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