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गीता प्रेस, गोरखपुर >> भगवत्प्राप्ति सहज है

भगवत्प्राप्ति सहज है

स्वामी रामसुखदास

2.95

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-293-0550-x पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 934
 

प्रस्तुत है भगत्प्राप्ति सहज है...

Bhagawatprapti Sahaj Hai a hindi book by Swami Ramsukhadas- भगवत्प्राप्ति सहज है - स्वामी रामसुखदास

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नम्र निवेदन

परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज अत्यन्त सरल बोल-चाल की भाषा-शैली में प्रवचन दिया करते हैं। उनमें से कुछ प्रवचन लिपिबद्ध करके पुस्तक रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं। भगवत्प्राप्तिका उदेश्य रखनेवाले साधकों से नम्र निवेदन है कि भगवत्-तत्त्व को भलीभाँति हृदयङ्गम करने के लिये पुस्तक का गहराई से अध्ययन करें। इससे उन्हें अपने साधन-पथ में अद्भुत लाभ हुए बिना नहीं रह सकता।


प्रकाशक


मुक्ति सहज है



16-3-83

भीमासर धोरा

देखो, वस्तु, व्यक्ति और क्रिया-ये तीन चीजें दीखने में आती हैं। इनमें वस्तु और क्रिया-ये दोनों प्रकृति हैं और व्यक्त रूप में जो दीखता है, यह शरीर भी प्रकृति ही है; परन्तु इसके भीतर में जो न बदलने वाला है, यह परमात्मा अंश है। अब अगर ‘यह’ वस्तु, क्रिया और व्यक्ति में नहीं उलझे, तो यह स्वाभाविक ही  मुक्त है; क्योंकि ‘यह’ परमात्मा का साक्षात् अंश है। इसके लिये कहा है ‘चेतन अमल सहज सुख रासी’- यह चेतन है, शुद्ध है, मलरहित है और सहज सुखराशि है, महान् आनन्दराशि है। यह महान आनन्दराशि अपने स्वरूप की तरफ ध्यान न दे करके संसार के सम्बन्ध के सुख चाहने लग गया। इससे यही भूल हुई है। यह संयोगजन्य सुखमें फँस गया। जैसे, धन मिले तो सुख हो, भोजन मिले तो सुख हो, भोग मिले तो सुख हो, कपड़ा, वस्तु, आदर, मान-सत्कार मिले तो सुख हो। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि स्वयं नित्य-निरन्तर रहने वाला है। ‘सहज सुख रासी’ स्वाभाविक ही सुखराशि है; परन्तु इसमें यह वहम पड़ गया  है कि संसार के पदार्थ मिलनेसे सुख होगा। यह बिछुड़ेगा जरूर ही ‘संयोगा विप्रयोगान्ताः’ जितने संयोग होते हैं उनका अन्त में वियोग होता है तो सम्बन्ध से होनेवाला सुख रहेगा कैसे ? मनुष्य यह विचार नहीं करता है कि आज दिनतक संयोग से जितने सुख लिये थे वे आज नहीं रहे। संयोग से होनेवाले सुखका नमूना तो देख ही लिया; लेकिन अब भी चेत नहीं करते फिर और चाहते हैं कि संयोगसे सुख ले लें।

जबतक बाहर के संयोग के सम्बन्ध से सुख लेगा, तबतक इसकों वास्तविक सुख नहीं मिलेगा ‘बाह्यस्पर्शेव्षसक्तात्मा’ बाह्य सुख (संयोगजन्म सुख)  में आसक्त नहीं होगा तो ‘विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्’ उस विलक्षण सुखको आप-से-आप प्राप्त हो जायगा। संसार के सम्बन्ध से सुख लेने से इसका वास्तविक सुख गुम हो गया। वह सुख नहीं हैं; परन्तु यह उस सुख से वियुक्त हो गया। जिनको वह सुख मिल गया वे आनन्दित हो गये। उनके कभी सांसारिक सुखकी इच्छा ही नहीं रहती। क्योंकि उनको जो वास्तविक सुख मिला, आनन्द मिला उसके समान कोई दूसरा सुख है नहीं। यह स्वयं सुखराशि होकर संयोगजन्य सुख चाहता है, सांसारिक सुखमें राजी होता है- यह बड़े भारी आश्चर्य की बात है। मिलने वाले व बिछुड़नेवाले सुखमें राजी होता है। आप ‘स्वयम्’ रहनेवाले हैं और यह सुख आने-जानेवाला है तो इस सुखसे कैसे काम चलेगा ?
आप रहनेवाले और आपके भीतर परमात्मा रहनेवाले .हैं। रहनेवाले परमात्मा के साथ रह जाओ तो सदाके  लिये सुख मिल जाय। वह सुख कभी मिटेगा नहीं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाले शरीर के साथ तथा संयोग और वियोग होनेवाले पदार्थों से सुख लेगा तो वह सुख कितना दिन रहेगा ? संतोंने कहा कि ‘ऐसी मूढ़ता या मनकी’ ऐसी मूढ़ता है इस मनकी।
 
‘परिहरि राम-भगति सुर-सरिता’ भगवान् की भक्ति गंगाजी है उसको छोड़ करके ‘आस करत ओस कनकी’ रात्रिमें ओस पड़ती है, घासकी पत्तीपर जलकी बूँदें चमकती हैं उस ओस-कण से तृप्ति करना चाहता है। तात्पर्य हुआ भगवान् की भक्तिरूपी गंगाजी बह रही है उसको छोड़ करके ओस-कण के समान-धनसे सुख मिल जाय, स्त्री से सुख मिल जाय, पुत्र से सुख मिल जाय, मानसे सुख मिल जाय, बड़ाई से सुख मिल जाय, नीरोगतासे सुख मिल जाय आदि संयोगों से सुखको चाहता है। इन पदार्थों में सुख ढूँढ़ता है, इनके पीछे भटकता है- ये तो ओसकी बूँदें है भाई ! तरह-तरह की चमकती हैं। थोड़ा-सा सूर्य चढ़ा कि खत्म हो जायँगी, सूख जाएँगी तो इनसे तृप्ति कैसे हो जायगी ? ओस के कणों से प्यास कैसे बुझेगी ? ‘ऐसी मूढ़ता या मनकी’ तो भाई ! सच्चा सुख चाहते हो उन परमात्माकी तरफ चलो, उनके साथ सम्बन्ध मानो।
 
जैसे कोयला काला होता है तो वह काला कब हुआ ? अग्रिसे अलग हुआ तब काला हुआ। अग्रि में रहते हुए तो वह चमकता था। परन्तु अलग हुआ तो काला हो गया। अब इसे कोई धोवे, साफ करे तो इसका कालापन, साफ नहीं होता। इसके लिये आता है- ‘कोयला हो नहीं उजला सौ मन साबुन लगाय।’ सौ मन साबुन लगानेपर भी उजला नहीं होता तो कैसे हो ! कि यह जिसका अंश है, जिससे यह अलग हुआ है, उसी आग में रख दिया जाय तो चमक उठेगा। पर आगका अंगार लेकर लाईन खींची जाय तो वह भी काली खींची जाय तो वह भी काली खीची जायगी। क्योंकि वह भी आगसे अलग हो गया। ऐसे यह जीव परमात्मासे अलग हुआ तब काला हुआ। अब उस कालेपन को धोने-के लिये साबुन लगाता है कि धन हो जाय, मान हो जाय, बड़ाई हो जाय, आदर हो जाय तो हम सुखी हो जायेंगे। इससे सुख नहीं होगा तो किससे सुख होगा ? यह अपने अंशी परमात्मा को अपना मान लेगा तो सुखी हो जायगा, चमक उठेगा।

आप थोड़ा -सा विचार करो तो पता चले कि लाखों-अरबों मनुष्यों में से दो-चार मनुष्य भी सुखी हो गये क्या ? धनसे, मानसे, बड़ाई से बड़े-बड़े मिनिस्टरी जिनके पास हैं, वे सुखी हो गये हैं क्या ? बड़े-बड़े धनियों से, बड़े-बड़े विद्वानों से आप एकान्त में मिलो कि आप सुखी हो गये हैं क्या ? आपको कोई दुःख तो नहीं है। जो सच्चे हृदय से परमात्मा लगे हैं उनको भी पूछो। तब आपको वास्तविकता का पता लग जायगा। जो ‘बाह्यस्पर्श’ है वे तो दुःखों के कारण हैं। असली सुखकी प्राप्ति के लिये क्या करें ? भगवान् को पुकारो ‘हे नाथ ! हे नाथ ! हम तो भूल गये महाराज !’ भगवान को याद दिला दो तो भगवान् कृपा कर देंगे फिर मौज हो जायगी।


‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ।।’


 (गीता 5। 29)


प्राणिमात्र के सुहृद् परमात्मा के रहते हुए हम दुःख पावें बड़े आश्चर्य की बात है। महान् आनन्दस्वरूप वे परमात्मा हमारे खुद के हैं कैसी मौजकी बात है। पर यह अपने परमात्माको छोड़कर परायों से प्रेम करता है। बच्चे आपसे में खेलते हुए जब कोई किसी को मारपीट करता है, तब दौड़ करके मां के पास आता है तो माँकी गोद में ही रहो ना ! मौजसे, आनन्दसे ! क्यों बाहर जावे ? ऐसे ही यह जीव भगवान् से विमुख होकर दुःख पाता है। इस वास्ते नाशवान् से विमुख हो जाय, क्योंकि भाई ! यह तो ठहरने वाला है नहीं। सन्तों ने कहा है।

चाख चाख सब छाड़िया माया रस खारा हो।
नाम सुधा रस पीजिये छिन बारम्बारा हो।।


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