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गीता प्रेस, गोरखपुर >> संत वाणी

संत वाणी

हनुमानप्रसाद पोद्दार

4.95

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-293-0028-1 पृष्ठ :288
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 913
 

प्रस्तुत है ढाई हजार अनमोल बोल जो इस संत वाणी में संकलित है।

Sant Vani A Hindi Book by Hanuman Prasas Poddar - संत वाणी - हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संत-वन्दना

हे पवित्रकीर्ति संतगण ! आकाशमणि सूर्य पृथ्वी को ऊपर से आलोक प्रदान करता है, किंतु आपलोग पृथ्वी पर रहकर उस पर ईश्वरीय प्रकाश को प्रसारित करते हैं; अतः हम आपकी वन्दना करते हैं।

भगवान् सविता पृथ्वी को ताप प्रदान करते हैं और आपलोग अपने भीतरी खजानों में से ज्ञानरूपी अमृत देकर जीवनात्मा को सुखरूप उष्णता प्रदान करते हैं। हम जिधर आंख उठाकर देखते हैं, जिस किसी देश में जाते हैं, हम आपके पावनपाद-पद्मों के आनन्दरूप मकरन्द को निरन्तर झरता हुआ पाते हैं। आपके चरणों में हमारे कोटिशः प्रणाम हैं।


तापसंतप्त संसार को मुक्तिरूप नरतिशय आनन्द का संदेश सुनानेवालो ! यह पृथ्वी आपकी पावन चरणधूलि के सम्पर्क से ही हमारे रहने योग्य बनी हुई है। मेसोपोटेमिया और अरब के सूखे रेगिस्तानों में से यदि मूसा, ईसा और रसूल-जैसे अमृतनिर्झर पैदा न होते तो वहाँ की तप्त बालुका में झुलसने कौन जाता ? योरप के रणक्षेत्र में यदि हमें सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और संत फ्रांसिस-जैसे महान् आत्माओं के दर्शन न होते तो वहाँ के लोगों को शान्ति का पाठ कौन पढ़ाता ?

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