परिन्दे - निर्मल वर्मा Parinde - Hindi book by - Nirmal Verma
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परिन्दे

निर्मल वर्मा

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2013
आईएसबीएन : 9788126319022 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :140 पुस्तक क्रमांक : 8933

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निर्मल वर्मा की कहानियों के प्रभाव के पीछे जीवन की गहरी समझ और कला का कठोर अनुशासन है। बारीकियाँ दिखाई नहीं पड़ती हैं तो प्रभाव की तीव्रता के कारण...

Parinde - A Hindi Book by Nirmal Verma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निर्मल वर्मा की कहानियों के प्रभाव के पीछे जीवन की गहरी समझ और कला का कठोर अनुशासन है। बारीकियाँ दिखाई नहीं पड़ती हैं तो प्रभाव की तीव्रता के कारण अथवा कला के सघन रचाव के कारण। एक बार दिशा-संकेत मिल जाने पर निरर्थक प्रतीत होने वाली छोटी-छोटी बातें भी सार्थक हो उठती हैं, चाहे कहानी हो चाहे जीवन। कठिनाई यह है कि यह दिशा-संकेत निर्मल की कहानी में बड़ी सहजता से आता है और प्रायः ऐसी अप्रत्याशित जगह जहाँ देखने के हम अभ्यस्त नहीं। क्या जीवन में भी सत्य इसी प्रकार अप्रत्याशित रूप से यहीं कहीं साधारण से स्थल में निहित नहीं होता ?

निर्मल ने स्थूल यथार्थ की सीमा पार करने की कोशिश की है। उन्होंने तात्कालिक वर्तमान का अतिक्रमण करना चाहा है, उन्होंने प्रचलित कहानी-कला के दायरे से भी बाहर निकलने की कोशिश की है, यहाँ तक कि शब्द की अभेद्य दीवार को लाँघकर शब्द के पहले के ’मौन जगत्’ में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है और वहाँ जाकर प्रत्यक्ष इन्द्रिय-बोध के द्वारा वस्तुओं के मूल रूप को पकड़ने का साहस दिखलाया है।

- नामवर सिंह

डायरी का खेल

उन्हीं दिनों बिट्टो आई थीं। हमें ऐसा लगा था मानो वर्षों से वह हमारे संग रहती आई हों। जब वह आई थीं, जिन्दगी कुछ अधिक समझ में नहीं आती थी। आज जब थोड़ी-बहुत समझ आई है, तो वह नहीं हैं। किन्तु बिट्टो की स्मृति सेंटीमेंटल नहीं बनाती, वह अतीत का भाग नहीं है, जो कि याद करके भुलाया जा सके। हममें ऐसा कुछ होता है, जो न होकर भी संग-संग चलता है, जिसे याद नहीं किया जाता क्योंकि वह कभी भूलता नहीं।

अतीत समय के संग जुड़ा है, इसलिए चेतना नहीं देता, केवल कुछ क्षणों के लिए सेंटीमेंटल बनाता है। जो चेतना देता है वह कालातीत है...

सबसे पहले बिट्टो को फोटो में देखा था। चाची ने मुझसे तार पढ़वाया था। छुट्टियों में वह कुछ दिनों के लिए दिल्ली आ रही थीं। चाची ने मुझसे स्टेशन जाने के लिए कहा, तो मैं हँसने लगा था। मैंने बिट्टो को कभी देखा नहीं था, स्टेशन पर हजारों की भीड़ में उन्हें पहचानूँगा कैसे-और वह मुझे कैसे पहचानेंगी। तब चाची आलमारी में बहुत-सी चीजों को उलट-पलटकर कहीं किसी कोने से बिट्टो का फोटो खोजकर निकाल लाई थीं। चाची ने कुछ झेंपकर कहा, ’’फोटो तो कुछ पुरानी पड़ गई है, लेकिन हमारी बिट्टो ज्यादा नहीं बदली है...जैसी पहले थी वैसी ही अब है। उसे ढूँढने में ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ेगी।’’

चाची ठीक कहती थीं। उनको पहचानने में झंझट नहीं पड़ी। वही चेहरा-मुहरा, फ्रेम के चश्मे के पीछे से वही निरीह, गहरी आँखें, छोटा सा माथा, साँवला रंग जो आँखों के नीचे कुछ स्याह-सा पीला पड़ गया था। किन्तु यह सब तो मैं आज कुरेद-कुरेदकर याद करता हूँ...जो भूलता नहीं हूँ, वह था उनके चेहरे पर एक अजीब-सा विस्मय का भाव, जो आज भी वैसे ही दीखता है, जैसा उस दिन स्टेशन पर देखा था...वही विस्मय का भाव जो उससे भी पहले वर्षों पुरानी फोटो तक में बरबस खिंच आया था।

कुछ क्षणों तक मैं असमंजस में खड़ा रहा। एकदम निश्चय नहीं कर पाया कि कैसे एक अजनबी की हैसियत से उनसे मिलूँ। उन्होंने एक-दो बार प्लेटफॉर्म पर खोजती-सी दृष्टि डाली और फिर बिना किसी संकोच या चिन्ता के कुली से सामान निकलवाने लगीं। मुझे कुछ बुरा-सा लगा। उन्हें मेरी कोई विशेष आवश्यकता नहीं जान पड़ती-न आता, तो भी वह अकेले ही आसानी से घर पहुँच जातीं। अनमने भाव से मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। क्षण-भर के लिए उनका चेहरा संकुचित, सलज्ज-सा हो आया। ’’आपने फिजूल इतना कष्ट किया, पता तो चाची ने लिख दिया था-देखो, अपने संग लाई हूँ।’’ पर्स खोला, और उसकी जेबों में हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी पता टटोलने लगीं। कुछ बटन, दो-चार क्लिप, एक मुसा हुआ रूमाल, सब कुछ पर्स से बाहर निकल आए...किन्तु पता नहीं मिला। ’’शायद पीछे भूल आई...वैसे रखा तो था, मालूम नहीं कहाँ गया। अच्छा ही हुआ; जो आप आ गए, मुझे तो सड़को के नाम भी याद नहीं रहते।’’ इस दफा जब उन्हें अपनी गलती पर लजाना चाहिए था, तो वह बेपरवाही से सिर्फ हँसती जा रही थीं।

स्टेशन की उस मुलाकात के बाद उन्होंने फिर मुझे कभी ’आप’ कहा हो, याद नहीं आता...वह तो शायद ताँगे में ही बातें करते-करते छूट गया था। ’’रेल में अच्छी जगह मिल गई थी ?’’ मैं कोचवान के संग ताँगे की अगली सीट पर बैठा था, और पीछे मुड़-मुड़कर उनसे बातें करता जाता था। ’’बिल्कुल नहीं...मैं तो रात-भर अपने होल्डाल पर खिड़की से सिर बाहर निकाले बैठी रही। अन्दर भीड़ इतनी थी कि साँस लेना भी दूभर था...’’ ’’फिर तो क्या नींद आई होगी?’’ मैंने चिन्तित होकर पूछा। ऐसे मौकों को मैं हाथ से नहीं जाने देता, और परेशान होने का अभिनय अक्सर सफलतापूर्वक कर लेता हूँ। ’’उससे कोई खास अन्तर नहीं पड़ता, मैं तो ट्रेन में वैसे भी कभी नहीं सो पाती।’’

’’क्यों,’’ मैंने पीछे मुड़कर उनकी ओर देखा...देखा, एक महीन-सी मुस्कान उनके होंठों पर उड़ गई। ’’सुनोगे तो हँसकर मेरा मजाक बनाओगे, क्यों है न ?’’ और यह कहकर वह स्वयं खिलखिलाकर हँस पड़ीं। ’’मुझे ट्रेन में बैठकर हमेशा यह लगता है कि किसी समय भी पहिए लाइन से उतर जाएँगे और ट्रेन उलट जाएगी। आखिर छोटे-छोटे पहिए ही तो हैं, कब घूमते हुए फिसल जाएँ, कौन जाने ? मरने से पहले सोते रहना कैसा अजीब होगा, इसी डर से नींद नहीं आती।’’

रास्ते-भर एक चतुर ’गाइड’ की हैसियत से मैं अपने शहर की विशेषताओं का लम्बा-चौड़ा ब्यौरा उनके सामने खोलने लगा-मानो वह कोई विदेशी टूरिस्ट हों, जिन्हें अपनी बातों के जाल में फँसाना ही मेरा लक्ष्य हो। कश्मीरी गेट के बाहर ’कुदसिया गार्डन’ के साथ जानेवाली सड़क को देखकर उन्होंने कहा कि यह तो बिल्कुल कानपुर शहर की नवाबगंज जानेवाली सड़क से मिलती-जुलती है-सीधी, निपट अकेली और पेड़ों की लम्बी घनी छायाएँ। ’’कोई आँखें मूँदकर यहाँ अचानक आ जाए तो मालूम न पड़े कि यह दिल्ली है या कानपुर...सच, किसी नए अजनबी शहर में कभी-कभी यह अजीब-सा भ्रम हो जाता है कि कोई मुहल्ला पहले कहीं देखा है, कोई गली पहचानी-सी है...क्यों तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता ?’’ मैं चुप बैठा रहा। मुझे कभी ऐसा नहीं लगता।

’’वैसे देखो तो सब शहर एक जैसे ही लगते हैं’’-इस बार स्वर इतना धीमा था, मानो यह बात होंठों के नीचे ही पिचपिचाकर रह गई हो-जैसे अपने से ही कही गई हो। जिस विचित्र ढंग से यह छोटी बात कही गई थी, उसे सुनकर मैं एकबारगी चौंक-सा गया। पीछे मुड़कर देखा, वह चुपचाप, खोई-सी अपनी ढीली चोटी को धीरे-धीरे बाँधती जा रही हैं और खोलती जा रही हैं।

उनकी यह बात आज भी मन के किसी कोने में अटकी रह गई है। ध्यान से देखो, तो यह बात कुछ खास मायने नहीं रखती...याद रहने का कोई कारण भी नहीं है। लेकिन उनकी जो बातें भी आज याद रह गई हैं, उनके कुछ खास मायने रहे हों, ऐसा याद नहीं पड़ता।

शाम की चाय के लिए हम सबको चाची ने अपने घर बुलाया था।

चाची का घर हमारे मकान से अलग रहा हो, ऐसी बात नहीं थी। अन्दर की छत के एक कमरे को बाबा ने चाची को दे रखा था। उसके संग सटे हुए छोटे से खाली छत के टुकड़े पर टिन डलवाकर चाची ने रसोई बनवा ली थी। छत की दूसरी तरफ ईंटों की छोटी-सी टूटी-फूटी दीवार के परे गोदाम था, जिसे झाड़-बुहारकर और खिड़कियों-दरवाजों पर लाल-नीले परदे लगवाकर मैंने अपना ’स्टडी’ रूम बना लिया था। बहाना यह था कि ऊपर अकेले में बिना किसी विघ्न-बाधा के एकाग्रचित्त होकर पढ़ाई होती है। सब यही समझते थे, और मैंने उनकी इस गलतफहमी को कभी दूर करने का कष्ट नहीं किया था।

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