जलती झाड़ी - निर्मल वर्मा Jalti Jhadi - Hindi book by - Nirmal Verma
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जलती झाड़ी

निर्मल वर्मा

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2012
आईएसबीएन : 9788126319763 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :167 पुस्तक क्रमांक : 8930

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निर्मल वर्मा की कहानियाँ हमारे भीतर खुलती हैं। ये कैसे खुलती हैं भीतर ? शायद इस तरह कि वे हमें भीतर जाने को कहती हैं

Jalti Jhadi - A Hindi Book by Nirmal Verma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निर्मल वर्मा की कहानियाँ हमारे भीतर खुलती हैं। ये कैसे खुलती हैं भीतर ? शायद इस तरह कि वे हमें भीतर जाने को कहती हैं। हम बहुत पीतर, अपने जिस मन को जानते हैं, वह दुख का मन है। सुख को सपने की तरह जानता हुआ-दुख का मन। निर्मल वर्मा की कहानियों में यह दुख है। एक वयस्क आदमी का दुख और उसका अकेलापन। ऐसा बीहड़ अकेलापन, जिसमें लोगों के साथ होने, उनका बने रहने तक की, व्याकुल इच्छाएँ हैं, लेकिन उन इच्छाओं को लीलता हुआ अकेलापन है, एक व्यक्ति का अकेलापन। बेशक इस व्यक्ति का वर्ग भी है लेकिन अनुभव एक विशेष व्यक्ति का है, वर्ग को धारण करनेवाले किसी साहित्यिक सूत्र का नहीं। यह सच्चा और खरा दुख ही है, जो निर्मल वर्मा की कहानियों के संसार का मानवीकरण करता है। उन्हें हमसे जोड़ता है। और हम उन कहानियों को पढ़कर जानते-भर नहीं हैं। उनके साथ होते हैं। निर्मल वर्मा से जुड़ते हैं।

- प्रभात त्रिपाठी

लवर्स

"एल्प्स" के सामने कारीडोर में अंग्रेज़ी-अमरीकी पत्रिकाओं की दुकान है। सीढ़ियों के नीचे जो बित्ते-भर की जगह खाली रहती है, वहीं पर आमने-सामने दो बेंचें बिछी हैं। इन बेंचों पर सेकन्ड हैंड किताबें, पॉकेट-बुक, उपन्यास और क्रिसमस कार्ड पड़े हैं। दिसम्बर...पुराने साल के चन्द आखिरी दिन।

नीला आकाश...कँपकँपाती, करारी हवा। कत्थई रंग का सूट पहने एक अधेड़ किन्तु भारी डील-डौल के व्यक्ति आते हैं। दुकान के सामने खड़े होकर ऊबी निगाहों से इधर-उधर देखते हैं। उन्होंने पत्रिकाओं के ढेर के नीचे से एक ज़र्द, पुरानी-फटी मैगज़ीन उठाई है। मैगज़ीन के कवर पर लेटी एक श्रर्द्ध-नग्न गौर युवती का चित्र है। वह यह चित्र दुकान पर बैठे लड़के को दिखाते हैं और आँख मारकर हँसते हैं। लड़के को उस नंगी स्त्री में कोई दिलचस्पी नहीं है, किन्तु गाहक गाहक है, और उसे खुश करने के लिए वह भी मुस्कराता है।

कत्थई सूटवाले सज्जन मेरी ओर देखते हैं। सोचते हैं, शायद मैं भी हँसूँगा। किन्तु इस दौरान में लड़का सीटी बजाने लगता है, धीरे-धीरे। लगता है, सीटी की आवाज़ उसके होंठों से नहीं, उसकी छाती के भीतर से आ रही है। मैं दूसरी ओर देखने लगता हूँ।

मैं पिछली रात नहीं सोया और सुबह भी, जब अक्सर मुझे नींद आ जाती है, मुझे नींद नहीं आई। मुझे यहाँ आना था और मैं रात-भर यही सोचता रहा कि मैं यहाँ आऊँगा, कारीडोर में खड़ा रहूँगा। मैं उस सड़क की ओर देख रहा हूँ, जहाँ से उसे आना है, जहाँ से वह हमेशा आती है। उस सड़क के दोनों ओर लैम्प-पोस्टों पर लाल फैस्टून लगे हैं...बाँसों पर झण्डे लगाए गए हैं। आए-दिन विदेशी नेता इस सड़क से गुज़रते हैं।

जब हवा चलती है, फैस्टून गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं, आकाश झण्डों के बीच सिमट आता है...नीले लिफाफे-सा। मुझे बहुत-सी चीज़ें अच्छी लगती हैं। जब रात को मुझे नींद नहीं आती, तो मैं अक्सर एक-एक करके इन चीज़ों को गिनता हूँ, जो मुझे अच्छी लगती हैं, जैसे हवा में रंग-बिरंगे झण्डों का फरफराना, जैसे चुपचाप प्रतीक्षा करना...

अब ये दोनों बातें हैं। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ। उसे देर नहीं हुई है। मैं खुद जानबूझकर समय से पहले आ गया हूँ। उसे ठीक समय पर आना अच्छा लगता है, न कुछ पहले, न कुछ बाद में, इसीलिए मैं अक्सर ठीक समय से पहले आ जाता हूँ। मुझे प्रतीक्षा करना, देर तक प्रतीक्षा करते रहना अच्छा लगता है।

धीरे-धीरे समय पास सरक रहा है। एक ही जगह पर खड़े रहना, एक ही दिशा में ताकते रहना, यह शायद ठीक नहीं है। लोगों का कौतूहल जाग उठता है। मैं कारीडोर में टहलता हुआ एक बार फिर किताबों की दुकान के सामने खड़ा हो जाता हूँ। कत्थई रंग के सूटवाले सज्जन जा चुके हैं । इस बार दुकान पर कोई गाहक नहीं है । लड़का एक बार मेरी ओर ध्यान से देखता है और फिर मैली झाड़न से पत्रिकाओं पर जमी धूल पोंछने लगता है ।

कवर पर धूल का एक टुकड़ा आ सिमटा है । बीच में लेटी युवती की नंगी जाँघों पर धूल के कण उड़ते हैं।...लगता है, वह सो रही है।

फुटपाथ पर पत्तों का शोर है। यह शोर मैंने पिछली रात को भी सुना था। पिछली रात हमारे शहर में तेज हवा चली थी। आज सुबह जब मैं घर की सीढ़ियों से नीचे उतरा था, तो मैंने इन पत्तों को देखा था। कल रात ये पत्ते फुटपाथ से उड़कर सीढ़ियों पर आ ठहरे होंगे। मुझे यह सोचना अच्छा लगता है कि हम दोनों एक ही शहर में रहते हैं, एक ही शहर के पत्ते अलग-अलग घरों की सीढ़ियों पर बिखर जाते हैं और जब हवा चलती है, तो उनका शोर उसके और मेरे घर के दरवाजों को एक संग खटखटाता है।

यह दिल्ली है ओर दिसम्बर के दिन हैं और साल के आखिरी पत्ते कारीडोर में उड़ रहे हैं। मैं कनॉट प्लेस के एक कारीडोर में खड़ा हूँ, खड़ा हूँ और प्रतीक्षा कर रहा हूँ। वह आती होगी।

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