दरिंदे - हमीदुल्ला Darinde - Hindi book by - hamidhullah
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दरिंदे

हमीदुल्ला

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
आईएसबीएन : 0 मुखपृष्ठ :
पृष्ठ :124 पुस्तक क्रमांक : 8424

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दरिंदे पुस्तक का आई पैड संस्करण

Darinde

आई पैड संस्करण

आधुनिक ज़िन्दगी की भागदौड़ में आज का आम आदमी ज़िन्दा रहने की कोशिश में कुचली हुई उम्मीदों के साथ जिस तरह बूँद-बूँद पिघल रहा है उस संघर्ष-यात्रा का जीवन्त दस्तावेज़ है यह नाटक-जिसे 9 दिसम्बर, 1973 को मावलंकर ऑडिटोरियम नयी दिल्ली में अ. भा. सर्वभाषा नाटक प्रतियोगिता में प्रदर्शित किया गया और विभिन्न भारतीय भाषाओं के नाटकों में यह केवल सर्वश्रेष्ठ ठहराया गया, बल्कि इसके निर्देशक तथा प्रमुख पुरुष एवं नारी पात्रों को उनके कृतित्व के लिए प्रथम पुरस्कार भी भेंट किये गये।


सामने चौकी पर स्वामीजी और उनके आस-पास नीचे जमीन पर बैठे भक्तजन अपने-अपने हाथों में विभिन्न वाद्य लिए स्वामीजी की अगुआई में भजन गाते दिखाई देते हैं। भजन के अन्तरों के बीच ‘भागो, भागो, भागो’ की पार्श्वध्वनियाँ उभरती हैं, जो इस भक्ति-भावमयी वातावरण को चीर रही हैं। जब-जब ये ध्वनियाँ उभरती हैं, मंच पर पात्र फ्रीज़ हो जाते हैं। कुछ क्षणों बाद भजन की लय तेज़ होने लगती है। एक-एक करके भक्तजन नृत्य-मुद्रा में खड़े होने लगते हैं। ‘भागो-भागो’ की पार्श्वध्वनियाँ अब जल्दी-जल्दी विघ्न डालने लगती हैं।
[गायन। वादन। पार्श्वध्वनियाँ। फ्रीज़। मौन।]

[दो-तीन बार यही क्रम।] [विक्षिप्त दार्शनिक का प्रवेश।]

वि.दा. : भागो, भागो, भागो.....(भक्तजन कुछ क्षण अनिश्चय की मुद्रा में विक्षिप्त दार्शनिक की ओर देखते हैं, फिर असमंजस में भागने लगते हैं।)
स्वामी : ठहरो। (सभी पात्र फ्रीज़ हो जाते हैं। बाद में यह फ्रीज़ स्वामी और दार्शनिक के वार्तालाप के बीच टूट जाता है।) क्या बात है ?
वि.दा. : भागो, भागो, भागो।
स्वामी : कहाँ भागें ? क्यों भागें ?
वि.दा. :तुमने आज रेडियो नहीं सुना ?
स्वामी : सुना है। और यह भी सुना है कि जिस चीज़ की कमी की ख़बर रेडियो पर आती है, वह अचानक बाज़ार से ग़ायब हो जाती है।
वि.दा. : जिस चीज़ का राष्ट्रीयकरण होता है, वह बाज़ार से उड़ जाती है।
स्वामी : क्या तुम भी किसी ऐसी ही चीज़ के लिए भाग रहे हो, जैसे दूध ?
पात्र-1: गेहूँ ?
पात्र-2: चीनी ?
पात्र-3: चावल ?
पात्र-4: तेल ?
पात्र-4: पेट्रोल ?
वि.दा. : नहीं, नहीं, नहीं। ये आवाज़ें सुन रहे हो ?

(पार्श्व में ‘भागो, भागो’ का शोर)

स्वामी : ये लोग कहाँ भागे जा रहे हैं ? कहीं लाइन लगानी है ? अनाज के लिए, पानी के लिए, हवा के लिए ?
वि.दा. : लगता है तुमने आज रेडियो से समाचार बुलेटिन नहीं सुना ? (सभा पात्र एक-दूसरे की तरफ़ देखते हैं। आपस में, ‘सुना’ ‘नहीं सुना’ की भिनभिनाहट। सभी आश्चर्यचकित हो दार्शनिक की तरफ़ देखते हैं।)
अभी-अभी ख़बर आयी है कि दुनिया के सारे गधों को पकड़कर जेल में बन्द किया जायेगा।
पात्र-1 और-2 : स्वामी !
स्वामी : चुप ! हम कोई गधे थोड़े ही हैं। (दार्शनिक से) और भाई, देखने में तो तुम भी गधे दिखाई नहीं देते। फिर क्यों भागें ?
वि.दा. : कुछ पता नहीं है। बहुमत के आधार पर कब किसे गधा साबित कर दिया जाये।
सभी पात्र : हाँ, स्वामी। बहुमत के आधार पर गधा साबित किया जा सकता है।
वि.दा. : इसीलिए कहता हूँ, भागो. भागो...

(दार्शनिक का ठहाका। पात्रों में भगदड़।)

स्वामी : रुको।
(सभी पात्र अपने-अपने स्थान पर खड़े हो जाते हैं।)
वि.दा. : क्या आप सबको इस बेचारगी पर एक मिनट तसल्ली से बैठकर हँसने की फ़ुरसत नहीं है ? (पॉज़) नहीं है। अच्छा, हँसना नहीं चाहते तो मत हँसो। रो लो, उन पर जो बलि के लिए ,समर्पित हैं।
स्वामी : बलि के लिए समर्पित ? कौन भाई ?
वि.दा. : आदर्श।
पात्र-1 : अभाव में कोई आदर्श नहीं चलता।
वि.दा. : राष्ट्रीय चरित्र।
पात्र-2 : भूखे का कोई चरित्र नहीं होता।
वि.दा. : सभ्यता।
पात्र-3 : रोटी नहीं देती।
वि.दा. : संस्कृति।
पात्र-4 : कल्चर, एग्रीकल्चर की तरह जरूरत पूरी नहीं करता।
वि.दा. : देश-कृषि प्रधान है।
पात्र-5 : देश कुरसी-प्रधान है।
स्वामी : अभाव, भूख, बीमारी।
वि.दा. : थोड़े से अवसरवादी, चन्द मुनाफाखोर सारी स्थिति का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं।
सभी पात्र : शैतान के उस्ताद।
वि.दा. : हाँ। आज ज़िन्दगी के दिन की शुरुआत दूध के लिए लाइन में खड़े होने से होती है। इन्होंने इस युग के उस महान सत्यवादी को भी झूठा साबित कर दिया, जिसने कहा था, स्वराज के बाद दूध की नदियाँ बहेंगी।
सभी पात्र : गधे, सुअर, कुत्ते।
वि.दा. : अपने मालिक और अपने प्रति वफ़ादार। लेकिन ये सब और कितने दिन चलेगा ?
(पार्श्व में शेर की दहाड़। सभा भयभीत)
स्वामी : यह आवाज़ कैसी है ? देखना भई !

(एक पात्र थोड़ा आगे विंग्स की तरफ़ जाता है। तेज़ी से लौटता है।)

पात्र : शेर ! शेर !
(सभी पात्र भागो, भागो’ चिल्लाते हुए मंच से बाहर भाग जाते हैं। दार्शनिक विस्मित खड़ा है। उन्हें भय से भागते हुए देखता है।
भाग गये ! सब आतंक में जी रहे हैं। गीदड़ !
(शेर का प्रवेश।)
शेर : अभी तुमने कई जानवरों के नाम लिए। क्या तुम्हें हमसे कोई शिकायत है।
वि.दा. : हाँ, सहमा माहौल। पर चेहरा डरा हुआ। सब तरफ़ जंगल का राज।
शेर : आदमी के लिए आदमी का राज।
वि.दा. : हाँ, आदमी के लिए आदमी का राज। (हँसता है।)
शेर : तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता ?
वि.दा. : तुमसे ?
शेर : हाँ, मुझसे।
वि.दा. : तुमसे डरने-जैसी कोई बात नहीं है। मुझे तुमसे कोई खतरा नहीं हो सकता, क्योंकि न तुम्हारा कोई आदर्श है, न ही सिद्धान्त। कोई मजहब भी नहीं है, तुम्हारा। कोई राजनेता भी नहीं हो, तुम। फिर क्यों डरूँ ?
शेर : मैं आदमी को मार डालता हूँ।

वि.दा. : आदमी आदमी को मार डालता है। आदमी से तुम्हें डर नहीं लगता ?
शेर : जानता हूँ। आदमी बड़ा चालाक प्राणी है। अपनी हर कमज़ोरी को वह एक नाम दे देता है।
वि.दा. : जैसे ?
शेर : जब आदमी हमें मारता है, तो उसे खेल कहा जाता है। जब हम आदमी को मारते हैं, तो उसे पशुता कहा जाता है।
वि.दा. : समझदारी आदमी का गुण है।
शेर : समझदार आदमी युद्ध क्यों करता है ? कभी तुमने सुना कि पशुओं में कोई वर्ल्ड वार हुई ?
वि.दा. : युद्ध राजनीतिक विचारों की टकराहट है।
शेर : एक बात बताओ। बहुत दिनों से किसी आदमी से पूछने को सोच रहा था। आज तुम मिल गये।
वि.दा. : पूछो।
शेर : ये आये दिन इतनी लड़ाइयाँ होती हैं। इनमें हजारों आदमी मरते हैं। इन सबको आदमी खाता कैसे है ?
वि.दा : आदमी उन्हें खाने के लिए नहीं मारता।
शेर : फिर आदमी चाहता क्या है ? एक लड़ाई के बाद दूसरी लड़ाई। आदमी के हाथों आदमी की मौत। आदमी जानवर से ज्यादा खतरनाक है।

(प्रकाश लुप्त होता है। अन्तरालयिक क्षणिक पार्श्वध्वनियाँ। कुत्ते के भौंकने की आवाज़। दुबारा प्रकाश आने पर एक व्यक्ति, जो शराब पिये हुए है, इस तरह मंच पर आता है मानो उसे धकेल दिया गया हो। वह किसी तरह सँभलकर खड़े होने की कोशिश करता है और एक कुत्ते को मंच पर उपस्थित मानकर उससे बातें करता है। कुत्ता बीच-बीच में कई बार भौंकता है, लेकिन दिखाई नहीं देता।)

शराबी : हरामी पिल्ले, आदमी को देखकर भौंकता है। नमक हराम ! आज कुछ देने को नहीं है, तो नहीं है। रोज़ डालता हूँ, उससे सब्र नहीं ? तू समझता है, मैं पिये हूँ। इसलिए भौंकता है। मैं पिये हुए नहीं हूँ। सभी नशे में बोलते हैं। भूँक मत। बिना मतलब कोई आश्वासन पूरे नहीं करता। क्या पूरे नहीं करता ? आश्वासन ! अपना काम देख अपनी पत्नी की फिक्र मत कर। उसे रोज़ पड़ोसी का टॉमी बहलाता है। चुप हो गया ! शाबास। यू आर ए वेरी गुड बोय, यू आर ए वेरी गुड बोय कुत्ते !... तो मैं क्या कह रहा था ? हाँ, आदमी शब्दों में बात करता है। शब्द, जो आश्वासन देते हैं। शब्द, जो प्यार जताते हैं। शब्द, जो नफरत जगाते हैं। (कुत्ता भौंकता है।) कुत्ते भौंकते हैं, तू कुत्ता थोड़े न है कुत्ते ! कारवाँ गुजरते हैं। चुनाव होते हैं। गरीब मरते हैं। अररेरे, पास आने की कोशिश मत कर। दूर रह। तेरे सामने आदमी का बहुत छोटा रूप है रे। हमारे सामने बड़ी-बड़ी योजनाएँ हैं। शोर मत कर। नेशनल एनाउन्समेन्ट सुन ! कोई चीज़ ब्लैक से मत खरीद। भूखा मर जा कुत्ते ! मर जा। तेरे ज़िन्दा रहने से ब्लैक मारकेट ज़िन्दा है। हम जानते हैं, चीज़ों का अभाव है। अनाज जानवरों से बचा। ज्ञान चूहों से। सब चाट जाते हैं।...अरे, तू मुझे आदमी की तरह नहीं, अपनी खुराक की तरह क्यों देख रहा है ? हड्डी के जैसे। किसी की दावत मत कर और करता है, तो वैसी कर जैसी लोमड़ी ने सारस की थी। किसने किसकी की थी ?...हाँ...कुत्ते, यू आर ए वेरी इण्टेलीजेन्ट बोय। मैं नहीं चाहता तुझे नुकसान पहुँचे, कुत्ते। मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ, बेटे। तुझमें बड़ा धैर्य है। आत्मविश्वास है। मैं तेरे पास आता हूँ। काट मत लेना। तुझे बहलाने के लिए आज मेरे पास सिर्फ शब्द हैं। तेरी तारीफ के लिए शब्द। प्यार-भरे शब्द। शब्द, शब्द और शब्द !..
. टामी, टामी, टामी, टामी......

(शराबी मंच से बाहर चला जाता है। प्रकाश क्षीण होता है। हलकी पार्श्वध्वनियाँ। शेर और दार्शनिक पर प्रकाश और एक चीख़)
शेर : यह चीख सुनी ?
वि.दा. : हमारी आवाज़, तुम्हारी आवाज़, सबकी आवाज़ इस अन्धकार में एक चीख़ है।
शेर : लेकिन हर चीख़ की कोई वजह है।
वि.दा. : कमज़ोरी पर ताकत की जीत।
शेर : यह किसी स्त्री की चीख़ थी।

वि.दा. : फिर किसी वहशी ने किसी स्त्री की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया होगा। जानवर !
शेर : जानवर बलात्कार के क़ायल नहीं। क्या तुमने कभी सुना कि किसी लोमड़ी का शीलभंग हुआ ? क्या तुमने कभी किसी कबूतर को घण्टों अपनी प्रेमिका के सामने गुटरगूँ, गुटरगूँ करते नहीं देखा ? जंगल में मोर को मोरनी के सामने नाचते नहीं देखा ? किसी हिरन को हिरनी की आँखों में आँखे डालकर प्रेमप्रलाप करते नहीं देखा ? कहीं कोई ओछापन है उनके सम्बन्धों में।
(पार्श्व में वही चीख फिर सुनायी देती है। शेर और दार्शनिक चीख की दिशा में विंग्स में दौड़ जाते हैं प्रकाश लुप्त। दृश्यों को जोड़ने वाला पार्श्वसंगीत।

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