राह न रुकी - रांगेय राघव Raah Na Ruki - Hindi book by - Rangey Raghav
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राह न रुकी

रांगेय राघव

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-263-1134-7 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :120 पुस्तक क्रमांक : 741

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इस उपन्यास में महावीर युग के उस पुनर्जागरण को प्रस्तुत किया गया है जिसमें पहली बार ब्राह्मण संस्कृति को तगड़ी चुनौती मिली थी...

Rah na Ruki

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

रांगेय राघव विलक्षण मेधा के धनी थे। वे समकालीनता के ही प्रखर पारखी नहीं थे बल्कि इतिहास की धड़कनों को भी पूरी संवेदना से महसूस करते थे और उनकी बारीकियों को पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश करते थे। ‘राह न रुकी में’ ‘चन्दना’ एक ऐसी ही पात्र है जिसके माध्यम से उन्होंने बुद्ध और महावीर युग के उस पुनर्जागरण को प्रस्तुत किया है, जिसमें पहली बार ब्राह्मण संस्कृति को तगड़ी चुनौती मिली थी और हजारों वर्षों के वैदिक युग की उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह्र लग गया था।

 ‘राह न रुकी’ में साध्वी चन्दनबाला के रूप में जैन साहित्य में ख्यात एक प्रमुख नारी-पात्र वसुमती के चरित्र को उभारा गया है। राजकुमारी वसुमती को साध्वी चन्दनबाला के रूप में श्रद्धा के दृष्टि से देखा जाता है। स्वंय भगवान महावीर ने चन्दनबाला को स्त्री-संघ में सर्वोच्च आसन प्रदान किया था। उन्हें केन्द्र में रखकर राज्य, समाज और धार्मिक चेतना का ताना-बाना लेखक ने इस उपन्यास बुना है। व्यक्ति-स्वातन्त्र्य और स्त्री-स्वातन्त्र्य का जो पाठ इसमें नजर आता है उससे यह उपन्यास और भी प्रांसगिक बन गया है।

भूमिका

‘राह न रुकी’ एक ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें मैंने बुद्ध-महावीर-युग के उस पुनर्जागरण को प्रस्तुत किया है जो हजारों साल के वैदिक युग के अन्त में भारत में उपस्थिति हुआ था। यह बात कितनी महत्त्वपूर्ण है कि आज हम एक नये पुनर्जागरण युग में हैं।
लोगों ने प्रायः बुद्धमत को अधिक देखा है; उन्हें जैनमत का भी व्यापक प्रभाव देखना चाहिए। जिनमार्ग को अपनाने वालों ने अपने समय में बड़े-बड़े प्रयोग किये थे, जो आज भी अपना महत्त्व रखते हैं। एक दृष्टि से महावीर का मत अधिक व्यापक था, क्योंकि उन्होंने गृहस्थ को अधिक महत्त्व दिया था और स्त्रियों को भी उन्होंने साधना के पथ में प्रायः बराबरी का दर्जा दे दिया था।

इस उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र है वसुमती। सती वसुमती को जैन साहित्य में चन्दनबाला के नाम से बड़ी साध्वी के रूप में माना गया है। उसका ऊँचा स्थान है। महावीर स्वामी ने स्त्री -घ के लिए उसे सबसे ऊँची जगह दी थी। हमारे समाज में उच्चवर्ग की जो स्त्रियाँ आज झूठी स्त्री-स्वतन्त्रता की बातें करती हैं, उनके लिए उपन्यास की पात्र वसुमती एक पाठ है। राज्य की जो समस्या तब थी, वही अपने मूल रूप में आज भी है। अपने इस उपन्यास में मैंने कुछेक मूलभूत समस्याओं को उठाया हैं...

रांगेय राघव

राजकुमारी


‘‘ओ तेरा सत्यानाश हो जाए।’’
‘‘ओ तेरे मुँह में आग लग जाए !’’
‘‘ठहर कलमुँही ! तेरे बाल-बच्चों को जीता-जागता नदी में डूबता देखूँ।’’
‘‘कीड़े पड़ जाएँ तेरी जीभ में कमीनी ! तेरी इज्जत चौराहे पर चील-कौए खाएँ। तेरी सात-सात पीढ़ी प्यासी तरसें। तेरा आदमी कोढ़ी हो जाए !’’
‘‘बस, बस,’’ एक पुरुष-स्वर, ‘‘क्या लड़ती हो दिन-रात। कलेस मचा रखा है बस्ती में।’’
‘‘हाय भइया ! तू मुझसे ही कहता है। उससे नहीं कहा कुछ ! दिन रात मेरा खून पीती है !’’
‘‘तो तेरी वह है कौन ? पड़ोसिन है। उससे तेरा नाता नहीं, तेरे कुटुम्ब की वह नहीं। तू दाल-भात में मूसरचन्द की तरह क्यों लगती है उसके मुँह ?’’

‘‘मैं लगती हूँ मुँह कि वह मेरे आड़े आती है। जब देखेगी कि मैं कहीं घर से निकलनेवाली हूँ तो जान-बूझकर खाली घड़ा लेकर ठीक उसी बखत निकलेगी मेरे सामने से। सौ बार कह चुकी हूँ इस बिल्ली से कि मेरा रास्ता मत काट, पर पाप की जनी में हया-शरम कहाँ ?’’
‘‘अपनी बहन की जीभ पर कोड़ा लगा दे तू भी, उसके भैया। पाप की जनी होगी वह आप, और होगा तू भी। हाँ खबरदार, जो मेरी माँ को कुछ कहा।’’
‘‘देखा भैया, अभी तो मुझसे थी, अब तुझ तक से उलझ पड़ी। देखा ! इसे न औरत का डर, न मरद की शरम। कुटनी है कुटनी। हजार मर्दों की इसे लाज नहीं, ऐसी है यह कुलटा। एक सीधा-सा मिल गया है न इसे ! उसे देखती हूँ तो सोचती हूँ कि वह तो मर जाए तो भला। आदमी की जाति को फिर ऐसा कलंक तो न लगे।’’
जरिता आ गयी।

मैंने पूछा, ‘‘ले आयी ?’’
‘‘हाँ, ले आयी।’’
उसने मेरा कटिबन्ध मुझे दे दिया। और कहा, ‘‘गिरते ही यह हलका-सा उड़ा और बगल में झाड़ी पर जा गिरा। तभी धूल नहीं लगी इसे। पर कुमारी अब न गिराना इसे। चलो सारथी !’’
सारथी ने रथ बढ़ाया।
मैंने कहा, ‘‘जरिता अम्माँ ! कटिबन्ध गिरा और जितनी देर में तुम इसे लायी उतनी देर में तो यहाँ मैंने युद्ध देख लिया।’’
‘‘अरे ! किसने लड़ाई की ?’’
‘‘वही, कोई दो औरतें थीं। एक आदमी समझा रहा था।’’

का क्या ? दिन-भर लड़ती हैं। ऐसी-ऐसी गालियाँ देती हैं कि कहा नहीं जा सकता।’’
वृद्ध सारथी मारुत हँसा और बोला, ‘‘और राजकुमारी ! साँझ होते ही सब मिलकर बैठ जाती हैं और गीत गाती हैं और जब गीत खत्म होने को होते हैं तो फिर लड़कर अलग होती हैं।’’
जरिता ने समझाया, ‘‘नीच लोग हैं। बुनकर, उनकर ! इनका क्या छोटी स्वामिनी ! गाली तो ऐसी देती हैं कि सुनने से कानों में आग लगती है। हम तो आप जैसों के पास रहती हैं, वहाँ रहने से अब हम भी सुनती हैं तो शरम आती है। सच, पुरुष भी लजा जाएँ, मगर उन्हें रोक नहीं। जो मन आये बक जाएँ।’’
मैंने पूछा, ‘‘पर लड़ती क्यों हैं ?’’

‘‘गँवार हैं,’’ सारथी ने कहा, ‘‘पुरुष को तो धन्धा करना पड़ता है। सब तरह के लोगों से काम पड़ता है, घर के बाहर रहता है। इन्हें क्या है ? दिन-भर घर पर रहना। खाना, पीना और झगड़ना। छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई हो जाती है। बच्चे सीखते हैं।’’
‘‘और छोटी स्वामिनी !’’ जरिता ने कहा, ‘‘ऊधम तो तब होता है इनका, जब इनके पति लौटते हैं। बहुधा तो वे तरह दे जाते हैं, पर कभी कोई उबल पड़ा तो फिर तो लट्ठ बज जाते हैं। ऐसी आग लगा देती हैं ये स्त्रियाँ।’’
रथ अब खुले मैदान में आ गया था। दोनों तरफ पेड़ों की बड़ी अच्छी हरियाली दिखाई दे रही थी। उनपर कोसल पक्षी उड़ रहे थे। मुझे बड़ा अच्छा लगा। मैंने कहा, ‘‘जरिता ! देख यह जगह कितनी सुन्दर है ! दूर तक फैले हुए खेत। कैसी कालीनों से भर गयी है धरती ! तरह-तरह की हरियाली है : मखमली, रेशमी और सब कितनी प्यारी है !’’

‘‘हाँ बिटिया !’’ जरिता ने कहा, ‘‘तुम अच्छी हो तो सब अच्छा लगता है।’’
मैंने कहा, ‘‘जरिता ! वह छोटे-छोटे घरोंवाला गाँव वहाँ कैसा प्यारा लगता है, उन घने पेड़ों की छाया में ! एक बार गाँव तो मैं चलूँगी। चलो, अभी चलें।’’
‘‘फिर कभी चलेंगे बिटिया ! सैनिक भी साथ लाएँगे। ऐसे जाना ठीक नहीं है।’’

‘‘नहीं। ठीक क्यों नहीं है ?’’
‘‘देखो बिटिया, हठ नहीं करते; मैं बड़ी हूँ न तुमसे ?’’
‘‘तो क्या हुआ ? जरिता अम्मा ! तू तो बड़ी अच्छी है। चलने में दोष ही क्या है ?’’
‘‘लेकिन बिटिया। महारानी मुझे कितना डाँटेंगी। मुझे बन्दीगृह में डलवा देंगी।’’
‘‘और मेरी तो नौकरी चली जाएगी।’’ सारथी ने कहा।
‘‘नहीं, कुछ नहीं होगा। तुमसे अम्ब कुछ नहीं कहेंगी। मैं समझा लूँगी। कह देना हम क्या करते। मालकिन ने आज्ञा दी। जाना पड़ा—ठीक है !’’ मैं हँसी तब वे दोनों भी मुस्कराये।
‘‘चल भैया मारुत ! क्या करूँ ! मेरा तो जी भीतर ही भीतर काँप रहा है। महारानी कहेंगी कि बिटिया तो बच्ची है, तुम क्यों गये ? चल मारुत ! जो होगा सो झेलना ही पड़ेगा।’’
रथ उड़ने लगा।

मारुत ने कहा, ‘‘पर राजकन्ये ! वह गाँव दूर से ही अच्छा लगता है। पास से नहीं लगेगा। गाँव के घर कच्चे होते हैं। आपकी-सी सफाई वहाँ कहाँ ? रास्ते कच्चे हैं। दो-चार ब्राह्मण पुरोहित होंगे; वैसे तो अधिकतर मोटे कपड़े पहने मिलेंगे। और फिर अभी एक दृश्य देखा था न ? वैसा ही होगा वहाँ भी ! और जब जानेंगे कि स्वयं राजकुमारी आयी है तो और घबरा जाएँगे।’’
मैंने कहा, ‘‘तो कहने की क्या जरूरत है कि हम कौन हैं। वैसे ही नागरिक हमसे बचते हैं। बताना नहीं कुछ।’’
जरिता ने माथे पर हाथ लगाकर कहा, ‘‘खूब कहती है बिटिया भी ! बताना ही नहीं। ऐसी सुन्दरता है तुम्हारी, मिलेगी कहीं ढूँढ़े से ! कैसे छिप जाएगी ?’’
‘‘नहीं बताना नहीं !’’

रथ गाँव पहुँचा। मैंने कच्चे घर देखे। हम उतर गये। ‘‘मारुत, उस पेड़ के नीचे ठहर जा।’’
‘‘नहीं राजकन्ये ! मैं भी चलता हूँ।’’
‘‘अरे तू खाली बिटिया कह।’’
जरिता और मारुत ने एक-दूसरे की ओर विवशता से देखा। दिन का समय था। पुरुष खेतों में थे। एक-आधा बूढ़ा किसी पेड़ के नीचे खटोले पर पड़ा था। और बुढ़ापे और मक्खियों को पाल रहा था। कोई-कोई बुढ़िया चर्खा चला रही थी। एक युवती ने देखा तो पास आ गयी।
पूछा, ‘‘कौन हो तुम लोग ?’’
जरिता ने मेरी ओर देखा।
मैंने कहा, ‘‘ऐसे ही घूमने चले थे। प्यास लग आयी। पानी है ?’’
‘‘अरे पानी की क्या कमी ! किसी बड़े घर की लगती हो। ब्याह हो गया ?’’
जरिता ने कहा, ‘‘नहीं।’’

‘‘हाय दैया !’’ उसने कहा, ‘‘इतनी बड़ी लड़की का ब्याह नहीं हुआ।’’ फिर व्यंग्य से कहा, ‘‘बड़े घर की ठहरी।’’
‘‘कुछ बच्चे भी आकर इकट्ठे हो गये। छोटे बच्चों की नाक बह रही थी। ‘‘पानी तो ला !’’ जरिता ने कहा, ‘‘कौन जाति हो तुम लोग ?’’
‘‘हम क्षत्रिय हैं।’’ स्त्री ने गर्व से कहा और कलसा-रस्सी लेकर कुएँ की ओर चली गयी।
मैं देखती रही। बच्चे मुझे कौतूहल से देख रहे थे। तभी एक बोला, ‘‘नानी ! नानी आ गयी है।’’

देखा मैंने। सफेद ऊन के-से बाल। चेहरे पर झुर्रियाँ। हाथों पर हड्डी और नसों का उभार। आँखों में कीचड़। मुँह में दाँत नहीं। बैठकर खिसकती थी। सिर झुका हुआ था, पर उसे आँखों से तो दीख रहा था। मुझे उस पर बड़ी दया आयी। उसने मेरी ओर हाथ और आँखों में आँसू भरकर कहा, ‘‘वह राक्षसी कहाँ गयी ! ओ मुझे कोई मार डालो। यह नहीं रहने देती मुझे।’’
उसकी आवाज बड़ी भर्राई-सी थी। ऐसा लगता था जैसे गले में कफ अटक रहा था। मैं अत्यन्त दुखी हो गयी उसे देखकर। उसकी ओर बढ़ी और, ‘‘क्यों ? क्यों रोती है तू ? तुझे क्या दुःख है ?’’
बुढ़िया शायद उँचा सुनती थी। उसने शून्य दृष्टि से मुझे देखा। जरिता ने जोर से कहा, ‘‘स्वामिनी पूछती हैं कि तुझे क्या दुःख है ?’’


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