जैसे उनके दिन फिरे - हरिशंकर परसाई Jaise Unke Din Phire - Hindi book by - Harishankar Parsai
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जैसे उनके दिन फिरे

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-263-1027-8 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :112 पुस्तक क्रमांक : 732

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चेतना को झकझोर देनेवाले व्यंग्य और मन को तिलमिला देनेवाली कहानियाँ...

Jaise Unke din Phire

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जैसे उनके दिन फिरे की ये कहानियाँ हरिशंकर परसाई की मात्र हास्य-कहानियाँ नहीं हैं-यों हँसी इन्हें पढ़ते-पढ़ते अवश्य आ जायगी,पर पीछे जो मन में बचेगा,वह गुदगुदी नहीं,चुभन होगी। मनोरंजन प्रासंगिक है,वह लेखक का उद्देश्य नहीं। उद्देश्य है-युग के समाज का,उसकी बहुविध विसंगतियों,अन्तर्विरोधों,विकृतियों और मिथ्याचारों का उद्घाटन। परसाई जी की इन कहानियों में हँसी से बढ़कर जीवन की तीखी आलोचना है। चेतना को झकझोर देनेवाला व्यंग्य और मन को तिलमिला देनेवाली व्यंजना तो पाठक को इन कहानियों में मिलेगी ही,साथ ही वे सब दृश्य चेहरे और हालात,जो बहुत पास होकर भी अनदेखे रह जाते हैं,उसके सामने प्रकट हो उठेंगे। प्रस्तुत है पुस्तक का नया संस्करण।

जैसे उनके दिन फिरे

एक था राजा। राजा के चार लड़के थे। रानियाँ ? रानियाँ तो अनेक थीं, महल में एक ‘पिंजरापोल’ ही खुला था। पर बड़ी रानी ने बाकी रानियों के पुत्रों को जहर देकर मार डाला था। और इस बात से राजा साहब बहुत प्रसन्न हुए थे। क्योंकि वे नीतिवान् थे और जानते थे कि चाणक्य का आदेश है, राजा अपने पुत्रों को भेड़िया समझे। बड़ी रानी के चारों लड़के जल्दी ही राजगद्दी पर बैठना चाहते थे, इसलिए राजा साहब को बूढ़ा होना पड़ा।

एक दिन राजा साहब ने चारों पुत्रों को बुला कर कहा, पुत्रों मेरी अब चौथी अवस्था आ गयी है। दशरथ ने कान के पास के केश श्वेत होते ही राजगद्दी छोड़ दी थी। मेरे बाल खिचड़ी दिखते हैं, यद्यपि जब खिजाब घुल जाता है तब पूरा सिर श्वेत हो जाता है। मैं संन्यास लूँगा, तपस्या करूँगा। उस लोक को सुधारना है, ताकि तुम जब वहाँ आओ, तो तुम्हारे लिए मैं राजगद्दी तैयार रख सकूँ। आज मैंने तुम्हें यह बतलाने के लिए बुलाया है कि गद्दी पर चार के बैठ सकने लायक जगह नहीं है। अगर किसी प्रकार चारों समा भी गये तो आपस में धक्का-मुक्की होगी और सभी गिरोगे। मगर मैं दशरथ सरीखी गलती नहीं करूँगा कि तुम में से किसी के साथ पक्षपात करूँ। मैं तुम्हारी परीक्षा लूँगा। तुम चारों ही राज्य से बाहर चले जाओ। ठीक एक साल बाद इसी फाल्गुन की पूर्णिमा को चारों दरबार में उपस्थित होना। मैं देखूँगा कि इस साल में किसने कितना धन कमाया और कौन-सी योग्यता प्राप्त की। तब मैं मन्त्री सलाह से, जिसे सर्वोत्तम समझूँगा, राजगद्दी दे दूँगा।
जो आज्ञा, कहकर चारों ने राजा साहब को भक्तिहीन प्रणाम किया और राज्य के बाहर चले गये।

पड़ोसी राज्य में पहुँच कर चारों राजकुमारों ने चार रास्ते पकड़े और अपने पुरुषार्थ तथा किस्मत को आजमाने चल पड़े।
ठीक एक साल बाद-
फाल्गुन की पूर्णिमा को राज-सभा में चारों लड़के हाजिर हुए। राजसिंहासन पर राजा साहब विराजमान थे, उनके पास ही कुछ नीचे आसन पर प्रधानमन्त्री बैठे थे। आगे भाट, विदूषक और चाटुकार शोभा पा रहे थे।
राजा ने कहा, ‘‘पुत्रों ! आज एक साल पूरा हुआ और तुम सब यहाँ हाजिर भी हो गये। मुझे उम्मीद थी कि इस एक साल में तुममें से तीन या बीमारी के शिकार हो जाओगे या कोई एक शेष तीनों को मार डालेगा और मेरी समस्या हल हो जायेगी। पर तुम चारों यहाँ खड़े हो। ख़ैर अब तुममें से प्रत्येक मुझे बतलाये कि किसने इस एक साल में क्या काम किया कितना धन कमाया और राजा साहब ने बड़े पुत्र की ओर देखा।

बड़ा पुत्र हाथ जोडकर बोला, ‘‘पिता जी, मैं जब दूसरे राज्य में पहुँचा, तो मैंने विचार किया कि राजा के लिए ईमानदारी और परिश्रम बहुत आवश्यक गुण है। इसलिए मैं एक व्यापारी के यहाँ गया और उसके यहाँ बोरे ढोने का काम करने लगा। पीठ पर मैंने एक वर्ष बोरे ढोये हैं, परिश्रम किया है। ईमानदारी से धन कमाया है। मजदूरी में से बचाई हुई ये सौ स्वर्णमुद्राएँ ही मेरे पास हैं। मेरा विश्वास है कि ईमानदारी और परिश्रम ही राजा के लिए सबसे आवश्यक है और मुझमें ये हैं, इसलिए राजगद्दी का अधिकारी मैं हूँ।

वह मौन हो गया। राज-सभा में सन्नाटा छा गया।
राजा ने दूसरे पुत्र को संकेत किया। वह बोला, ‘‘पिताजी, मैंने राज्य से निकलने पर सोचा कि मैं राजकुमार हूँ, क्षत्रिय हूँ-क्षत्रिय बाहुबल पर भरोसा करता है। इसलिए मैंने पड़ोसी राज्य में जाकर डाकुओं का एक गिरोह संगठित किया और लूटमार करने लगा। धीरे-धीरे मुझे राज्य कर्मचारियों का सहयोग मिलने लगा और मेरा काम खूब अच्छा चलने लगा। बड़े भाई जिसके यहाँ काम करते थे, उसके यहाँ मैंने दो बार डाका डाला था। इस एक साल की कमाई में पाँच लाख स्वर्णमुद्राएँ मेरे पास हैं। मेरा विश्वास है कि राजा को साहसी और लुटेरा होना चाहिए, तभी वह राज्य का विस्तार कर सकता है। ये दोनों गुण मुझमें हैं, इसलिए मैं ही राजगद्दी का अधिकारी हूँ।’’
पाँच लाख सुनते ही दरबारियों की आँखें फटी-की फटी रह गयीं।

राजा के संकेत पर तीसरा कुमार बोला, ‘‘देव मैंने उस राज्य में जाकर व्यापार किया। राजधानी में मेरी बहुत बड़ी दूकान थी। मैं घी में मूँगफली का तेल और शक्कर में रेत मिलाकर बेचा करता था। मैंने राजा से लेकर मजदूर तक को सालभर घी-शक्कर खिलाया। राज-कर्मचारी मुझे पकड़ते नहीं थे क्योंकि उन सब को मैं मुनाफ़े में से हिस्सा दिया करता थ।। एक बार स्वयं राजा ने मुझसे पूछा कि शक्कर में यह रेत-सरीखी क्या मिली रहती है  ? मैंने उत्तर दिया कि करुणानिधान, यह विशेष प्रकार की उच्चकोटि की खदानों से प्राप्त शक्कर है जो केवल राजा-महाराजाओं के लिए मैं विदेश से मँगाता हूँ। राजा यह सुनकर बहुत खुश हुए। बड़े भाई जिस सेठ के यहाँ बोरे ढोते थे, वह मेरा ही मिलावटी माल खाता था। और मँझले लुटेरे भाई को भी मूँगफली का तेल-मिला घी तथा रेत-मिली शक्कर मैंने खिलाई है। मेरा विश्वास है कि राजा को बेईमान और धूर्त होना चाहिए तभी उसका राज टिक सकता है। सीधे राजा को कोई एक दिन  भी नहीं रहने देगा। मुझमें राजा के योग्य दोनों गुण हैं, इसलिए गद्दी का अधिकारी मैं हूँ। मेरी एक वर्ष की कमाई दस लाख स्वर्णमुद्राएँ मेरे पास हैं।
‘दस लाख’ सुनकर दरबारियों की आँखें और फट गयीं।

राजा ने तब सब से छोटे कुमार की ओर देखा। छोटे कुमार की वेश-भूषा और भाव-भंगिमा तीनों से भिन्न थी। वह शरीर पर अत्यन्त सादे और मोटे कपड़े पहने था। पाँव और सिर नंगे थे। उसके मुख पर बड़ी प्रसन्नता और आँखों में बड़ी करूणा थी।
वह बोला, ‘‘देव, मैं जब दूसरे राज्य में पहुँचा तो मुझे पहले तो यह सूझा ही नहीं कि क्या करूँ। कई दिन मैं भूखा-प्यासा भटकता रहा। चलते-चलते एक दिन मैं एक अट्टालिका के सामने पहुँचा। उस पर लिखा था ‘सेवा आश्रम’। मैं भीतर गया तो वहाँ तीन-चार आदमी बैठे ढेर-की-ढेर स्वर्ण-मुद्राएँ गिन रहे थे। मैंने उनसे पूछा, भद्रो तुम्हारा धन्धा क्या है ?’
‘‘उनमें से एक बोला, त्याग और सेवा।’ मैंने कहा, ‘भद्रो त्याग और सेवा तो धर्म है। ये धन्धे कैसे हुए ?’ वह आदमी चिढ़कर बोला, तेरी समझ में यह बात नहीं आयेगी। जा, अपना रास्ता ले।’
‘‘स्वर्ण पर मेरी ललचायी दृष्टि अटकी थी। मैंने पूछा, ‘भद्रो तुमने इतना स्वर्ण कैसे पाया ?’
वही आदमी बोला, ‘धन्धे से।’ मैंने पूछा, कौन-सा धन्धा ? वह गुस्से में बोला, ‘अभी बताया न ! सेवा और त्याग। तू क्या बहरा है ?’

‘‘उनमें से एक को मेरी दशा देख कर दया आ गयी। उसने कहा, ‘तू क्या चाहता है ?’
‘‘मैंने कहा, मैं भी आप का धन्धा सीखना चाहता हूँ। मैं भी बहुत सा स्वर्ण कमाना चाहता हूँ।’
‘‘उस दयालु आदमी ने कहा, ‘तो तू हमारे विद्यालय में भरती हो जा।
हम एक सप्ताह में तुझे सेवा और त्याग के धन्धे में पारंगत कर देंगे। शुल्क कुछ नहीं लिया जायेगा, पर जब तेरा धन्धा चल पड़े तब श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा दे देना।’
‘‘पिताजी, मैं सेवा-आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने लगा। मैं वहाँ राजसी ठाठ से रहता, सुन्दर वस्त्र पहनता, सुस्वादु भोजन करता, सुन्दरियाँ पंखा झलतीं, सेवक हाथ जोड़े सामने खड़े रहते। अन्तिम दिन मुझे आश्रम के प्रधान ने बुलाया और कहा, ‘वत्स, तू सब कलाएँ सीख गया। भगवान् का नाम लेकर कार्य आरम्भ कर दे।’ उन्होंने मुझे ये मोटे सस्ते वस्त्र दिये और कहा, ‘बाहर इन्हें पहनना। कर्ण के कवच-कुण्डल की तरह ये बदनामी से तेरी रक्षा करेंगे। जब तक तेरी अपनी अट्टालिका नहीं बन जाती, तू इसी भवन में रह सकता है, जा, भगवान् तुझे सफलता दें।’

‘‘बस, मैंने उसी दिन ‘मानव-सेवा-संघ’ खोल दिया। प्रचार कर दिया कि मानव-मात्र की सेवा करने का बीड़ा हमने उठाया है। हमें समाज की उन्नति करना है, देश को आगे बढ़ाना है। ग़रीबों, भूखों, नंगों, अपाहिजों की हमें सहायता करनी है। हर व्यक्ति हमारे इस पुण्यकार्य में हाथ बँटायें: हमें मानव-सेवा के लिए चन्दा दें। पिताजी, उस देश के निवासी बडे भोले हैं। ऐसा कहने से वे चन्दा देने लगे। मझले भैया से भी मैंने चन्दा लिया था, बड़े भैया के सेठ ने भी दिया और बड़े भैया ने भी पेट काट कर दो मुद्राएँ रख दीं। लुटेरे भाई ने भी मेरे चेलों को एक सहस्र मुद्राएँ दी थीं। क्योंकि एक बार राजा के सैनिक जब उसे पकड़ने आये तो उसे आश्रम में मेरे चेलों ने छिपा लिया था। पिताजी, राज्य का आधार धन है। राजा को प्रजा से धन वसूल करने की विद्या आनी चाहिए। प्रजा से प्रसन्नतापूर्वक धन खींच लेना, राजा का आवश्यक गुण है। उसे बिना नश्तर लगाए खून निकालना आना चाहिए। मुझमें यह गुण है, इसलिए मैं ही राजगद्दी का अधिकारी हूँ। मैंने इस एक साल में चन्दे से बीस लाख स्वर्ण-मुद्राएँ कमाई जो मेरे पास हैं।’’

‘बीस लाख’ सुनते ही दरबारियों की आँखें इतनी फटीं कि कोरों से खून टपकने लगा। तब राजा ने मन्त्री से पूछा, ‘‘मन्त्रिवर आपकी क्या राय है ? चारों में कौन कुमार राजा होने के योग्य है ?’’
मन्त्रिवर बोले, ‘‘महाराज इसे सारी राजसभा समझती है कि सब से छोटा कुमार ही सबसे योग्य है। उसने एक साल में बीस लाख मुद्राएँ इकट्ठी कीं। उसमें अपने गुणों के सिवा शेष तीनों कुमारों के गुण भी हैं-बड़े जैसा परिश्रम उसके पास है, दूसरे कुमार के समान वह साहसी और लुटेरा भी है। तीसरे के समान बेईमान और धूर्त भी। अतएव उसे ही राजगद्दी दी जाये। मन्त्री की बात सुनकर राजसभा ने ताली बजाई।

दूसरे दिन छोटे राजकुमार का राज्याभिषेक हो गया। तीसरे दिन पड़ोसी राज्य की गुणवती राजकन्या से उसका विवाह भी हो गया। चौथे दिन मुनि की दया से उसे पुत्ररत्न प्राप्त हुआ और वह सुख से राज करने लगा।
कहानी थी सो ख़त्म हुई। जैसे उनके दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।

इति श्री रिसर्चाय
सन् 1950 ईसवी-


बाबू गोपाल चन्द्र बड़े नेता थे, क्योंकि उन्होंने लोगों को समझाया था और लोग समझ भी गये थे कि अगर वे स्वतन्त्रता-संग्राम में दो बार जेल-‘ए क्लास’ में न जाते, तो भारत आज़ाद होता ही नहीं।
तारीख़ 3 दिसम्बर 1950 की रात को बाबू गोपाल चन्द्र अपने भवन के तीसरे मंज़िल के सातवें कमरे में तीन फ़ीट ऊँचे पलंग के एक फ़ीट मोटे गद्दे पर करवटें बदल रहे थे। नहीं, किसी के कोमल कटाक्ष से विद्ध नहीं थे वे। वे योजना से पीड़ित थे। उन्होंने हाल ही में क़रीब चार लाख रुपया चन्दा करके स्वतन्त्रता-संग्राम के शहीदों की स्मृति में एक भव्य ‘बलिस्मारक’ का  निर्माण करवाया था। वे उसके प्रवेश द्वार पर देश-प्रेम और बलिदान की कोई कविता अंकित करना चाहते थे। उलझन यही थी कि वे पंक्तियाँ किस कवि की हों। स्वतंन्त्रता-संग्राम में स्वयं जेल-यात्रा करनेवाले अनेक कवि थे, जिनकी ओजमय कविताएँ थीं और वे नयी लिखकर दे भी सकते थे। पर वे बाबू गोपाल चन्द्र को पसन्द नहीं थीं। उनमें शक्ति नहीं है, आत्मा का बल नहीं है उनका मत था।

परेशान होकर उन्होंने रखा ग्रन्थ निकाला ‘अकबर बीरबल विनोद’ और पढ़ने लगे एक क़िस्सा :
‘‘...तब अकबर ने जग्गू ढीमर से कहा, ‘देख रे, शहर में जो सब से सुन्दर लड़का हो उसे कल दरबार में लाकर हाज़िर करना, नहीं तो तेरा सिर काट लिया जाएगा।’ बादशाह का हुक़्म सुनकर जग्नू ढीमर चिन्तित हुआ। आख़िर शहर का सबसे सुन्दर लड़का कैसे खोजे। वह घर की परछी में खाट पर बड़ा उदास पड़ा था कि इतने में उसकी स्त्री आयी। उसने पूछा, ‘आज बड़े उदास दीखते हो। कोई बात हो गयी है क्या ?’ जग्गू ने उसे अपनी उलझन बतायी। स्त्री ने कहा, ‘बस, इतनी-सी बात। अरे अपने कल्लू को ले जाओ। ऐसा सुन्दर लड़का शहर-भर में न मिलेगा।’ जग्गू को बात पटी। खुश होकर बोला, ‘बताओ भला ! मेरी अक्ल में इतनी-सी बात नहीं आयी। अपने कल्लू की बराबरी कौन कर सकता है।’ बस, दूसरे दिन कल्लू को दरबार में हाज़िर कर दिया गया। कल्लू खूब काला था। चेहरे पर चेचक के गहरे दाग़ थे। बड़ा-सा पेट, भिचरी-सी आँखें और चपटी नाक।’’

क़िस्सा पढ़कर बाबू गोपाल ठीक जग्गू ढीमर की तरह प्रसन्न हुए। वे एकदम उठे और पुत्र को पुकारा, ‘‘गोबरधन ! सो गया क्या ? ज़रा यहाँ तो आ।’’
गोबरधन दोस्तों के साथ शराब पीकर अभी लौटा था। लड़खड़ाता हुआ आया। गोपाल चन्द्र ने पूछा, ‘‘क्यों रे, तू कविता लिखता है न ?’’ गोबरधन अकबका गया। डरा कि अब डाँट पड़ेगी। बोला, ‘‘नहीं बाबूजी, मैंने वह बुरी लत छोड़ दी है।’’
गोपाल चन्द्र ने समझाया, ‘‘बेटा, डरो मत। सच बताओ। कविता लिखना तो अच्छी बात है।’’ गोबरधन की जान तो आधे रास्ते तक निकल गयी थी, फिर लौट आयी। कहने लगा, ‘‘बाबूजी, पहले दस-पाँच लिखी थीं, पर लोगों ने मेरी प्रतिभा की उपेक्षा की। एक बार कवि-सम्मेलन में सुनाने लगा तो लोगों ने ‘हूट’ कर दिया। तब से मैंने नहीं लिखी।’’
गोपाल चन्द्र ने समझाया, ‘‘बेटा, दुनिया हर ‘जीनियस’ के साथ ऐसा ही सलूक करती है। तेरी गूढ़ कविता को समझ नहीं पाते होंगे, इसलिए हँसते होंगे। तू मुझे कल चार पंक्तियाँ देशभक्ति और बलिदान के सम्बन्ध में लिखकर दे देना।’’
गोबरधन नीचे देखते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैंने इन हलके विषयों पर कभी नहीं लिखा। मैं तो प्रेम की कविता लिखता हूँ। जहूरन बाई के बारे में लिखी है, वह दे दूँ ?’’

गोपाल चन्द गरम होते-होते बच गये। बड़े संयम से मीठे स्वर में बोले, ‘‘आज कल बलिदान त्याग और देश-प्रेम का फ़ैशन है। इन्हीं पर लिखना चाहिए ! ग़रीबों की दुर्दशा पर भी लिखने का फ़ैशन चल पड़ा है। तू चाहे तो हर विषय पर लिख सकता है। तू कल शाम तक बलिदान और देश-प्रेम के भावों वाली चार पंक्तियाँ मुझे जोड़कर दे दे। मैं उन्हें राष्ट्र के काम में लानेवाला हूँ।’’
‘‘कहीं छपेंगी ?’’ गोबरधन ने उत्सुकता से पूछा।
‘‘छपेंगी नहीं खुदेंगी, बलि-स्मारक के प्रवेश द्वार पर।’’ गोपाल चन्द ने कहा।
गोबरधन दास को प्रेरणा मिल गयी। उसने दूसरे दिन शाम तक चार पंक्तियाँ जोड़ दीं। गोपाल चन्द ने उन्हें पढ़ा तो हर्ष से उछल पड़े, ‘‘वाह बेटा, तूने तो एक महाकाव्य का सार तत्त्व भर दिया है इन चार पक्तियों में। वाह...गागर में सागर !’’
वे चार पंक्तियाँ तारीख़ 6 सितम्बर  को ‘बलि-स्मारक’ के प्रवेश-द्वार पर खुद गयीं। नीचे कवि का नाम अंकित किया गया-गोबरधन दास।
सन् 2950 ईसवी-

विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के शोध कक्ष में डॉ. वीनसनन्दन अपने प्रिय छात्र रॉबर्ट मोहन के साथ चर्चा कर रहे थे। इस काल के अन्तरराष्ट्रीय नाम होने लगे। रॉबर्ट मोहन डॉ. वीनसनन्दन के निर्देश में बीसवीं शताब्दी की कविता पर शोध कर रहा था।
मोहन बड़ी उत्तेजना में कह रहा था, ‘‘सर, पुरातत्त्व विभाग में ऐसा ‘क्लू’ मिला है कि उस युग के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कवि का मुझे पता लग गया है। हम लोग बड़े अन्धकार में चल रहे थे। परम्परा ने हमें सब ग़लत जानकारी दी हैं। निराला, पन्त, प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर आदि कवियों के नाम हम तक आ गये हैं परन्तु उस कृतघ्न युग ने अपने सब से महान् राष्ट्रीय कवि को विस्मृत कर दिया। मैं विगत युग को प्रकाशित करनेवाला हूँ।’’

‘‘तुम दम्भी हो।’’ डॉक्टर ने कहा।
‘तो आप मूर्ख हैं।’’ शिष्य ने उत्तर दिया। गुरु-शिष्य सम्बन्ध उस समय इस सीमा तक पहुँच गये थे। गुरु ने बात हँस कर सह ली। फिर बोले, ‘‘रॉबर्ट, मुझे तू पूरी बात तो बता।’’ राबर्ट ने कहा, ‘‘सर, हाल ही में सन् 1950 में निर्मित एक भव्य बलि-स्मारक ज़मीन के अन्दर से खोदा गया है। शिलालेख से मालूम होता है कि वह भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम में प्राणोत्सर्ग करनेवाले देश-भक्तों की स्मृति में निर्मित किया गया था। उसके प्रवेश-द्वार पर एक कवि की चार पंक्तियाँ अंकित मिली हैं। वह स्मारक देश में सबसे विशाल था। ऐसा मालूम होता है कि समूचे राष्ट्र ने इनके द्वारा शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। उस पर जिस कवि की कविता अंकित की गयी है, वह सबसे महान् कवि रहा होगा।
‘‘क्या नाम है उस कवि का ?’’ डॉक्टर साहब ने पूछा।
‘‘गोबरधनदास’’, मोहन बोला। उसने काग़ज पर उतारी हुई वे पंक्तियाँ डॉक्टर साहब के सामने रख दीं।

डॉक्टर साहब ने प्रसन्न मुद्रा में कहा, ‘‘वाह, तुमने बड़ा काम किया है।’’
रॉर्बट बोला, ‘‘पर अब आगे आपकी मदद चाहिए। इस कवि की केवल चार पंक्तियाँ ही मिली हैं, शेर साहित्य के बारे में क्या लिखा जाये ?’’
डॉक्टर साहब ने कहा, ‘‘यह तो बहुत ही सहज है। लिखो, कि उन का शेष साहित्य कला के प्रवाह में बह गया। उस युग में कवियों में गुट-बन्दियाँ थीं। गोबरधनदास अत्यन्त सरल प्रकृति के, ग़रीब आदमी थे। वे एकान्त साधना किया करते थे। वे किसी गुट में सम्मिलिति नहीं थे। इस लिए उस युग के साहित्यकारों ने उनके साथ बड़ा अन्याय किया। उनकी अवहेलना की गयी, उन्हें कोई प्रकाशक नहीं मिला। उनकी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। पर अन्य कवियों ने प्रकाशकों से वे पुस्तकें ख़रीद कर जला दीं।’’


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