हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे - शरद जोशी Hum Bharstan ke Bhrasta Hamare - Hindi book by - Sharad Joshi
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हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

शरद जोशी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-263-1026-x मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :144 पुस्तक क्रमांक : 725

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प्रस्तुत कृति ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ शरद जोशी के व्यंग्य-लेखों के एक विशाल संग्रह से साभिप्राय चुनी गयी रचनाओं का संकलन हैं।

Hum Bhrashtan ke Bhrasht Hamare

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी व्यंग्य-लेखन में जिन रचनाकारों को सर्वाधिक लोकप्रियता हासिल हुई है, उनमें से एक नाम है शरद जोशी। व्यंग्य को समृद्ध बनाने में गुणवत्ता में भी और परिमाण में भी, एवं उसे साहित्य का दर्जा दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। श्री जोशी ने ना-कुछ विषयों को लेकर आज के गम्भीर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मसलों तक की बकायदा खबर ली है। वे अनेक पत्र-पत्रिकाओं के स्तम्भ लेखक रहे हैं। रोज़मर्रा के विषयों में उनकी प्रतिक्रिया इतनी सटीक है कि पाठक का आन्तरिक भावलोक उमग उठे बिना नहीं रहता।

प्रस्तुत कृति ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ में उनके व्यंग्य-लेखों के एक विशाल संग्रह से साभिप्राय चुनी गयी रचनाएँ संकलित हैं। वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक सन्दर्भ में इन लेखों की सार्थकता और बढ़ जाती है।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

देश के आर्थिक नन्दन कानन में कैसी क्यारियाँ पनपी-सँवरी हैं भ्रष्टाचार की, दिन-दूनी रात चौगुनी। कितनी डाल कितने पत्ते, कितने फूल और लुक छिपकर आती कैसी मदमाती सुगन्ध। यह मिट्टी बड़ी उर्वरा है, शस्य श्यामल, काले करमों के लिए। दफ्तर दफ्तर नर्सरियाँ हैं और बड़े बाग़ जिनके निगहबान बाबू, सुपरिनटेंडेड डायरेक्टर। सचिव, मन्त्री। जिम्मेदार पदों पर बैठे जिम्मेदार लोग क्या कहने, आई.ए.एस., एम.ए. विदेश रिटर्न आज़ादी के आन्दोलन में जेल जाने वाले, चरखे के कतैया, गाँधीजी के चेले, बयालीस के जुलूस वीर, मुल्क का झंडा अपने हाथ से ऊपर चढ़ाने वाले, जनता के अपने, भारत माँ के लाल, काल अंग्रेजन के, कैसा खा रहे हैं, रिश्वत गप-गप ! ठाठ हो गये सुसरी आज़ादी मिलने के बाद। खूब फूटा है पौधा सारे देश में, पनप रहा केसर क्यारियों से कन्याकुमारी तक, राजधानियों में, ज़िला दफ्तर, तहसील, बी.डी.ओ., पटवारी के घर तक, खूब मिलता है काले पैसे का कल्पवृक्ष पी.डब्ल्यू डी., आर टी. ओ. चुंगी नाके बीज़ गोदाम से मुंसीपाल्टी तक। सब जगह अपनी-अपनी किस्मत के टेंडर खुलते हैं, रुपया बँटता है ऊपर से नीचे, आजू बाजू। मनुष्य- मनुष्य के काम आ रहा है, खा रहे हैं तो काम भी तो बना रहे हैं। कैसा नियमित मिलन है, बिलैती खुलती है, कलैजी की प्लेट मँगवाई जाती है। साला कौन कहता है राष्ट्र में एकता नहीं, सभी जुटे हैं, खा रहे हैं, कुतर-कुतर पंचवर्षीय योजना, विदेश से उधार आया रुपया, प्रोजेक्टों के सूखे पाइपों पर ‘फाइव-फाइव-फाइव’ पीते बैठे हँस रहे हैं ठेकेदार, इंजीनियर, मन्त्री के दौरे के लंच-डिनर का मेनू बना रहे विशेषज्ञ। स्वास्थ्य मन्त्री की बेटी के ब्याह में टेलिविजन बगल में दाब कर लाया है दवाई कम्पनी का अदना स्थानीय एजेंट। खूब मलाई कट रही है। हर सब-इन्स्पेक्टर ने प्लॉट कटवा लिया कॉलोनी में। टॉउन प्लानिंग वालों की मुट्ठी गर्म करने से कृषि की सस्ती ज़मीन डेवलपमेंट में चली जाती है। देश का विकास हो रहा है भाई। आदमी चाँद पर पहुँच रहा है। हम शनिवार की रात टॉप फाइव स्टार होटल में नहीं पहुँच सकते, लानत है ऐसे मुल्क पर !

कहाँ पर नहीं खिल रहे भ्रष्टाचार के फूल। जहाँ-जहाँ जाती है सरकार उसके नियम कानून मन्त्री अमला कारिन्दे साथ होते हैं। जहाँ-जहाँ जाती है सूरज की किरन, वहीं-वहीं पनपता है भ्रष्टाचार का पौधा। खूब बॉटनी है इसकी, बड़ी फैली ज्यॉग्राफ़ी, मोटा इतिहास, निरन्तरनिजी लाभ का अलजेब्रा, उज्जवल भविष्य, भारतीय नेताओं, कर्मचारियों अफ़सरों के हाथ में भाग्य रेखा के समानान्तर भ्रष्टाचार की नयी रेखा बन रही है। आजकल पालने में दूध पीता बच्चा सोचता है, आगे चलकर विधायक बनूँ या सिविल इंजीनियर, माल कहाँ ज्यादा कटेगा ? पेट में था जब अभिमन्यु तब रोज़ रात भ्रष्ट बाप सुनाया करते थे जेवरों से लदी माँ को अपने फाइलें दाब रिश्वत खाने के कारनामे। सुनता रहता था कोख में अभिमन्यु। कितना अच्छा है ना ! संचालनालय, सचिवालय के चक्रव्यूह में भतीजों को मदद करते हैं चाचा। लो बेटा, हम खाते हैं, तुम भी खाओ। मैं भी इस चक्रव्यूह में जाऊँगा माँ, आइस्क्रीम खाते हुए कहता है बारह वर्ष का बालक। माँ लाड़ से गले लगा लेती है, कान्वेंट, मिरांडा में पढ़ी, सुघड़ अँग्रेज़ी बोलनेवाली माँ गले लगा लेती है होनहार बेटे को।

मन्त्रिमंडलों में बिराजते हैं भ्रष्टाचार के महाप्रभु, सबके सिर पर स्नेह का अदृश्य हाथ फेरते हुए। चिन्ता न करो भाई ! हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे। चारों तरफ लगता है। हरा-भरा देश, विकास ग्रांट, दौरे, भाषण स्वागत। कुलाँचे भरते हैं यहाँ से वहाँ। आँगन में खेलते हैं ठुमक-ठुमक चमचे, लाइसेंस के उम्मीदवार, पुराने यार आन्दोलन के ज़माने के। मधुर मुस्कान लिये देखते हैं मन्त्री महोदय अपनी उपजाति के नवयुवकों को। भाई, जानता हूँ, तुम्हारे लिए भी कुछ करना है। फोन लगाओ फ़लाँ को, मैं बात करूँगा। शायद तुम्हारे लिए कोई अच्छी जगह निकल आये उसके कारखाने में। हलो हाँजी हलो। हाँजी, अवश्य अवश्य आपकी जैसी आज्ञा।

गूँजती है स्वर लहरी सारे देश में। तार जुड़ा है आपस में, यहाँ से वहाँ तक। पतली-पतली गलियों से बढ़ रहे हैं दबे पाँव लोग। फैल रहे हैं चूहे, सपनों के गोदाम में कुतर गये इरादे इस देश के। उपसमितियाँ, आयोग, जाँच बयान पटल पर रखी सड़ रही वास्तविकताएँ। अखबारों से निरन्तर आती है काले कारनामों की गन्ध। अर्थशास्त्र और राजनीति में भ्रष्टाचार का पॉल्यूशन। सफाइयाँ पेश करते हैं मुख्यमन्त्री अपने मन्त्रियों की और मन्त्री अपने अफ़सरों की और अफ़सर बाबुओं की। हल्की-हल्की गुर्राहट, खुसफुसाहट, वादे, बोतल समाप्त होने के उपरान्त के भावुक स्वर। कल जरूर कर देने के इरादे। अपढ़ माँ के अँग्रेजी छाँटते पूत, दवाई न मिलने पर मर गये बाप के लखपति बेटे अँधेरे बार के कोने में कन्या से चहचहाते।

पूरी धरती पर छा गये काले व्यवसाय के बादल। भ्रष्ट अफ़सर खरीदता है खेत यानी फा़र्म, जिसे जुतवाता है कृषि विभाग का असिस्टेंट, ट्रेक्टर कम्पनी के एजेंट से कहकर, जहाँ लगता है मुफ्त पम्प और प्यासी धरती पीती है रिश्वतों का पानी देती है गेहूँ जो बिकता है काले बाज़ार में। सारे सागर की मसी करें और सारी ज़मीन का काग़ज़ फिर भी भ्रष्टाचार का भारतीय महाकाव्य अलिखित ही रहेगा। कैसी प्रसन्न बैठी है काली लछमी प्रशासन के फाइलोंवाले कमलपत्र पर। उद्योगों के हाथी डुला रहे हैं चँवर। चरणों में झुके हैं दुकानदार, ठेकेदार, सरकार को माल सप्लाई करने वाले नम्र, मधुर, सज्जन लोग। पहली सतह जो हो, दूसरी सतह सुनहरी है। बाथरूम में सोना दाब विदेशी साबुन से देशी मैल छुड़ाते सम्भ्रान्त लोग राय रखते हैं खास पॉलिटिक्स में, बहुत खुल कर बात करते हैं पक्ष और प्रतिपक्ष से। जनाब जब तक गौरमेंट कड़ा कदम नहीं उठाती, कुछ नहीं होगा। देख नहीं रहे करप्शन कितना बढ़ रहा है। आप कुछ लेगें, शैम्पेन वगै़रह। प्लीज़ तकल्लुफ़ नहीं, नो फॉर्मेलिटी।

देखिए, जहाँ तक करप्शन का सवाल है, कहाँ नहीं है। सभी देशों में है, भारत में तो काफ़ी कम है। फिर सवाल यह है कि महँगाई कितनी बढ़ रही है ! बेचारा मिडिल क्लास कहाँ जाये ? तनख्वाह से तो गुज़ारा होता नहीं। मैं बीयर लूँगा।
आप ठीक कह रहे हैं। बैरा, दो बीयर। और सुनाइए कब सबमिट कर रहे हैं प्रोजेक्ट रिपोर्ट। हम बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे हैं। हें हें....यह आजकल जो नयी केब्रे गर्ल आयी है, बड़ी दुबली है।

प्रगति कर रहा है। देश मरकरी के नीचे पावडर लगाती सज रही हैं पार्टी के लिए बहुएँ, टाई कसते हुए सीटी बजा रहा हैं ऊँचे दहेज में मिला भ्रष्ट अफ़सर आई.ए.एस. दूल्हा। चीनी लड़कियों से बाल सेट करवा रही है कुलवधु, कालगर्ल के एजेंट से समय तय कर रहा है कॉरिडॉर में पत्नी की प्रतीक्षा करता कम्पनी का सुसंस्कृत पब्लिक रिलेशन अफ़सर। राशन और साबुन की क्यू में खड़े लोग रेडियो की दुकान से आता संगीत सुनते भीगते रहते हैं। रोज़ खुल जाते हैं दफ्तर, शो केस, रोज़ अपनी ज़रूरतों को कम करता जाता है साधारण आदमी। वही क्यू, वही मिलावट वही भाषण !

झोंपड़पट्टी के बाहर खेलते रहते हैं गन्दे काले बच्चे। इम्पाला में रविशंकर का लेटेस्ट एल.पी. खरीदकर लौटती हुई औरत सोचती है, ये लोग अपने बच्चों को स्कूल क्यूँ नहीं भेजते ! रेल के बाहर खिड़कियों में हाथ फैला रोटी, बची हुई सब्जी या पाँच-दस पैसा माँगते हैं, गन्दे घिनौने भिखारी। एयरकंडीशन कार में अपने टोस्ट पर मक्खन लगाता रेलवे केटरिंग को नापसन्द करता वह शरीफ आदमी आमलेट खाते सहयात्री से पूछता है राष्ट्रीय—प्रश्न ये लोग भीख क्यूँ माँगते हैं ? कोई मेहनत-मज़दूरी क्यों नहीं करते ?

हर विषय में खास राय रखते हैं सभ्य जन। पॉलिटिक्स में दो टूक बात करते हैं सलाद पर नमक छिड़कते हुए। रिर्ज़व बैंक की पॉलिसी का विवेचन करते हुए क्लब के सम्भ्रान्त सदस्य कनखियों से नापते रहते हैं दूसरे की पत्नी की कमर। खूब मज़ा है इस देश में। कितना रंगीन और खुशबूदार है प्रगति का चित्र। नासिक और देवास के कारखाने छापते रहते हैं नोट। पेरिस, लन्दन, न्यूयॉर्क से रिसती रहती है विदेशी सहायता। खेलता है डनलपपिलो पर लेटा बालक हांगकांग का खिलौना, रोज़ेज़ लगवाती है नये माली से मैडम खुद खड़ी हो गार्डन में, अन्दर साहब युवा आया को इशारे से स्टडीरूम में बुलाता है। आगे बढ़ रहा है सुसंस्कृत देश। भ्रष्टाचार के नल, नाली चहबच्चे, तालाब, नदी, सींच रहे हैं राष्ट्र का नया व्यक्तित्व। देश की आत्मा चुपके से खा रही है। स्मगल की ऑस्ट्रेलियन पनीर और घिघिया कर देखती है काले धन से उठे समन्दर किनारे के आकाश छूते भवन। प्रगति कर रहा है देश। जीभ लपलपा कर इधर-उधर देख रहे हैं लोग। सबको अपना जीवन छोटा लगने लगा है। कहीं से जमे डोल। सेमिनार में जनसंख्या और ग़रीबी के सवाल पर आँकड़ों से लदा अँगेज़ी में लेख पढ़ होटल के कमरे में लौटता है विदेश से लौटा बुद्धिजीवी। दरवाजा खोल बैरा धीरे-से पूछता है, साहब शौक करते हैं क्या ? लाऊँ, दो नयी आयी हैं। नेपालन या आप जो पसन्द करें। कितनी साफ़ बात कही थी उसने जनसंख्या के सवाल पर, खुद उपमन्त्री चाय के वक्त प्रशंसा कर रहे थे।

उज्जवल है देश का भविष्य कौन कहता है, हम प्रगति नहीं कर रहे, आगे नहीं बढ़ रहे, हर क्षेत्र में। प्रतिभा की कमी नहीं इस देश में। हमारी समस्या है, विकास के लिए पर्याप्त धन का अभाव। इसी कारण हमारी योजनाएँ पूरी नहीं हो पा रहीं। यदि थोड़े धन की व्यवस्था हम जुटा लें, तो बहुत तेजी से अन्य मुल्कों के बराबर आ सकते हैं।
ठीक कह रहे हैं आप। मेरे खयाल से अब खाने का आर्डर दे दिया जाये। वॉट वुड यू लाइक टू हैव ? चिकन !



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