अगला यथार्थ - हिमांशु जोशी Agla Yatharth - Hindi book by - Himanshu Joshi
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अगला यथार्थ

हिमांशु जोशी

प्रकाशक : पेंग्इन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 0-14-306194-1 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :258 पुस्तक क्रमांक : 7147

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हिमांशु जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों का संग्रह...

Agla Yatharth - A Hindi Book - by Himanshu Joshi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अच्छी कहानी क्या है ? जब कोई मुझसे पूछता है तो मैं हिंदी कथाकार हिमांशु जोशी की कहानियों का दृष्टांत देती हूं। एक लेखिका ही नहीं, अनुवादिका के रूप में भी जब उनकी रचनाओं से साक्षात्कार हुआ तो उनमें एक प्रकार का विचित्र वैचित्र्य लगा। लगा कि वे ज़िंदगी के एक खंडित, किंतु अंतरंग भाग को कितनी गहराई से छू रही हैं।

-प्रतिभा राय, उड़िया लेखिका

कथा से कथा-यात्रा तक

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो सच नहीं लगता। अरे, पूरी आधी शताब्दी बीत गई, पर वे सारी घटनाएं मुझे कल की सी क्यों लगती हैं—अभी-अभी की जैसी !
ज़िंदगी तब शुरु कर ही रहा था। अंधे तूफानी सागरों को अपनी हथेलियों की पतवार से पार करने का दुस्साहस !
अजीब संघर्षों के दिन थे वे !
पत्थर की कठोर चट्टानों को अपने नाख़ूनों से खुरच-खुरच कर पांव टिकाने भर की ठौर तलाश रहा था।

हरे-भरे शीतल, शांत हिमाच्छादित पर्वतों की सुनहरी क्षितिज-रेखाओं को पार कर, धधकती आग के जंगल में भटकता हुआ, भीड़ में अपने को खोज रहा था—अनजान अपरिचित बीहड़ों में।
दिन भर भटकने के पश्चात जब शाम को ‘सराय’ पर लौटता, तो सारे दिन की थकान घनीभूत होकर, सारी देह को संज्ञाशून्य कर देती।
ज़िद थी मेरी !

मैं अपनी राह स्वयं बना रहा था। अपना भवितव्य स्वयं गढ़ रहा था। हथेली पर सारा ब्रह्मांड रख कर हर असंभव को संभव बनाने के लिए जैसे कृत संकल्प !
एक दिन यों ही भटकता हुआ जैनेंद्र जी से मिलने चला गया—दरियागंज !
जैनेंद्र जी अपनी दार्शनिक मुद्रा में बैठे थे। बातों ही बातों में रोम्या रोला का ज़िक्र आया, फिर लेव तल्स्तोय का। जैनेंद्र जी बोले, ‘‘तल्स्तोय कहते थे—परमात्मा ने आदमी को खोने के लिए एक मुंह दिया है तो काम करने के लिए दो हाथ भी। परंतु आज तक दुनिया में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाई जो दो हाथों को समुचित काम देकर, उसे स्वाभिमान से जीने का हक़ प्रदान कर सकें।’’

कुछ देर बैठ कर उठने लगा तो जैनेंद्र जी मेरे हाथ में पकड़े काग़ज़ों को देखकर बोले, ‘‘यह क्या है ?’’
‘‘जी, कुछ नहीं...।’’
‘‘कुछ तो है !’’ ‘‘नहीं, नहीं, कुछ नहीं...।’’ संकोच से मैंने कहा।
‘‘अरे भई, कुछ तो है, फिर कुछ क्यों नहीं...?’’ उन्होंने अंतिम शब्दों पर किंचित बल देते हुए कहा।
‘‘ऐसे ही कल रात कुछ लिख रहा था...।’’
‘‘कहानी है—?’’

‘‘कहानी-वहानी क्या, ऐसा ही कुछ व्यर्थ-सा।’’
‘‘दिखलाओ ! हम भी देखें कैसा लिखते हो।’’
उन्होंने गोलाई में लिपटे उन काग़ज़ों को ले लिया। और शाम चार बजे ले जाने के लिए कहा, तब तक वे पढ़ लेंगे। मैं अजीब उलझन में। कहानी जैसी कहानी हो तो कुछ बात भी हो। पर, जैनेंद्र जी की ज़िद के आगे...।
ठीक चार बजे वहां पहुंचा तो बोले, ‘‘कहानी पढ़ ली है। यहीं पास ही दस, दरियागंज में ‘नवभारत टाइम्स’ का कार्यालय है। अक्षय को दे आओ। कहना कि जैनेंद्र जी ने भिजवाई है। वे मुझे फ़ोन कर लें।’’

मैं गहरे संकोच में।
‘‘जी, कहानी साधारण है। छपने के स्तर की नहीं...।’’ मैं अभी कह ही रहा था कि जैनेंद्र जी कुछ ऊँचे स्वर में बोले, ‘‘अरे भई, तुम्हें कैसे पता कि यह छपने लायक़ नहीं है। कहानी अच्छी है, बहुत अच्छी। जाओ, दे आओ।’’
‘ऋषि-भवन’ से दस दरियागंज।
पांच मिनट में रास्ता तय कर वहां पहुंच तो गया, पर मन को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। भले ही अब तक खाता भी खुला नहीं था, कुछ भी छपा नहीं था, फिर भी किसी के कहने पर कुछ छपे, मेरा स्वाभिमान इसे स्वीकार करने को तैयार न था।

अक्षय जी संपादक थे। कार्यालय में बड़ी चमक-दमक थी, पर कहीं मेरा दम घुट-सा रहा था। दरवाजे के बाहर खड़े चपरासी को रचना सौंप कर मैं सीढ़ियों से उतर पड़ा।
मुक्ति का जैसा अहसास हुआ।
छपना क्या था उसे ! बात आई-गई हो गई। मैं भागदौड़ में भूल भी गया उस रचना को।
लगभग दो महीने बाद, अपने ‘रैन-बसेरे’ के पास सुबह-सुबह चाय पीने बैठा था। लकड़ी की हिलती हुई पुरानी मेज पर, मरी हुई चील के से डैने फैलाए एक समाचार-पत्र पंखे की हवा से फड़फड़ा रहा था।

यों ही पढ़ने के लिए उठाया तो देखा—मेरी कहानी !
एक ही सांस में पूरी पढ़ गया। एक भी शब्द कहीं बदला नहीं था।
यह मेरी पहली कहानी थी।
तब से आज तक यानी उस पहली कहानी से लेकर ‘सागर तट के शहर’ तक पचास वर्ष लंबा समय बिखरा है। यानी आधी शताब्दी का लेखन।
हां, लेखन का क्रम निरंतर थोड़ा-बहुत सदैव चलता रहा। कहानी-संग्रह, उपन्यास, संस्मरण-काग़ज़ काले करता रहा। इसे मैं अपना सौभाग्य कहूं या पाठकों की स्नेहशीलता या निर्व्याज उदारता-सदैव उदात्त भाव सबका प्यार मिलता रहा।

दिल्ली अभी आया-आया ही था। एकदम अजनबी।
उस वर्ष राजधानी में आयोजित कहानी-प्रतियोगिता में मित्रों ने मेरी कहानी ‘अंततः’ भी भिजवा दी। मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही, जब मैंने देखा कि सर्वश्रेष्ठ कहानी का सम्मान उसे मिला। दूसरे वर्ष फिर आयोजन हुआ तो फिर मेरी ही रचना को प्रथम पुरस्कार मिला।
तभी ‘प्रगतिशील प्रकाशन’ द्वारा ‘स्वाधीनता के पश्चात हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां’ में ‘अंततः’ को भी शामिल किया गया। पहली कृति ‘अरण्य’ को तभी ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान’ का ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ मिला।

मेरा अनुभव रहा है कि लेखक के लिए संघर्ष अभिशाप ही नहीं होते, बल्कि वरदान भी सिद्ध होते हैं। जो अनुभव जो अनुभूतियां इन संघर्षों ने दीं, संभवतः उनके ही कारण मेरे लेखन में इतना वैविध्य रहा। मात्र वैविध्य ही नहीं, एक प्रकार की जीवंतता भी।
पर्वतीय ग्राम्यांचल में पैदा हुआ, जिसके कारण गांव की मिट्टी की सुगंध भी रचनाओं में घुली-मिली रही।
क़स्बे में पला, बढ़ा। अतः कस्बे के संस्कार, वहां का वातावरण, वहां की समस्याओं की झलक भी उभरे बिना न रही। शेष आधी शताब्दी के महानगरीय जीवन ने और भी अधिक गहन अनुभूतियां दीं। अनेक चलते-फिरते, हंसते-रोते प्रतिबिंब।
 
‘कांछा,’ ‘अगला यथार्थ,’ ‘इस बार फिर बर्फ़ गिरी तो’ आदि में वह परिवेश सहज ही देखा जा सकता है। वहां की आंचलिकता ने मेरी रचनाधर्मिता को एक संस्कार दिया और पारदर्शी दृष्टि भी। अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग नामों से वह आंचलिकता सदैव पनपती रही कहीं माणिक वंद्योपाध्याय या ताराशंकर वंद्योपाध्याय के रूप में, तो कहीं कालिंदीचरण पाणिग्रही अथवा गोपीनाथ मोहंती के नाम से। कहीं तकषि शिवशंकर पिल्लै, या झवेरचंद मेघाणी के नाम से। यदि संपूर्ण भारतीय वाङ्मय में से प्रेमचंद या प्रेमचंद की परंपरा—यानी आंचलिकता को हटा दिया जाए, तो भारतीय साहित्य की पहचान ही समाप्त हो जाएगी।

शरच्चंद्र चट्टोपाध्याय की कालजयी कृतियों का भी भारतीय जन-मानस में कुछ कम व्यापक प्रभाव नहीं रहा। मानव-संबंधों का इतना ऊष्मा भरा आत्मीय अहसास अन्यत्र कहां ! आज की अनेक रचनाओं में वह कमनीयता, आत्मीयता आसानी से देखी जा सकती है—एक दूसरे रूप में।

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