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खट्टर काका

हरिमोहन झा

14.95

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
आईएसबीएन : 978-81-7178-605 पृष्ठ :199
आवरण : सजिल्द पुस्तक क्रमांक : 6863
 

धर्म, दर्शन और इतिहास, पुराण के अस्वस्थ, लोकविरोधी प्रसंगों के दिलचस्प लेकिन कड़ी आलोचना प्रस्तुत करनेवाली, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हरिमोहन झा की बहुप्रशंसित, उल्लेखनीय व्यंग्यकृति

Khattar Kaka - A Hindi Book - by Harimohan Jha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व खट्टर काका मैथिली भाषा में प्रकट हुए। जन्म लेते ही वह प्रसिद्ध हो उठे। मिथिला के घर-घर में उनका नाम चर्चित हो गया। जब उनकी कुछ विनोद-वार्ताएँ ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ आदि में छपीं तो हिंदी पाठकों को भी एक नया स्वाद मिला। गुजराती पाठकों ने भी उनकी चाशनी चखी। वह इतने बहुचर्चित और लोकप्रिय हुए कि दूर-दूर से चिटिठियाँ आने लगीं—‘यह खट्टर काका कौन हैं, कहाँ रहते हैं, उनकी और-और वार्ताएँ कहाँ मिलेंगी ?’’
खट्टर काका मस्त जीव हैं। ठंडाई छानते हैं और आनंद-विनोद की वर्षा करते हैं। कबीरदास की तरह खट्टर काका उलटी गंगा बहा देते हैं। उनकी बातें एक-से-एक अनूठी, निराली और चौंकानेवाली होती है। जैसे —‘‘ब्रह्मचारी को वेद नहीं पढ़ना चाहिए। सती-सावित्री के उपाख्यान कन्याओं के हाथ में नहीं देना चाहिए। पुराण बहू-बेटियों के योग्य नहीं हैं। दुर्गा की कथा स्त्रैणों की रची हुई है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को फुसला लिया है। दर्शनशास्त्र की रचना रस्सी को देखकर हुई। इसली ब्राह्मण विदेश में हैं। मूर्खता के प्रधान कारण हैं पंडितगण ! दही-चिउड़ा-चीनी सांख्य के त्रिगुण हैं। स्वर्ग जाने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है...!’’

खट्टर काका हँसी-हँसी में भी जो उलटा-सीधा बोल जाते हैं, उसे प्रामाणित किए बिना हीं छोड़ते। श्रोता को अपने तर्क-जाल में उलझाकर उसे भूल-भुलैया में डाल देना उनका प्रिय कौतुक है। वह तसवीर का रुख यों पलट देते हैं कि सारे परिप्रेक्ष्य ही बदल जाते हैं। रामाणय –महाभारत गीता, वेद, पुराण-सभी उलट जाते हैं। बड़े-बड़े दिग्गज चरित्र बौने-विद्रप बन जाते हैं। सिद्धांतवादी उनकी सिद्ध होते हैं, और जीवनमुक्त मिट्टी के लोंदे। देवतागण गोबर-गणेश प्रतीत होते हैं। धर्मराज अधर्मराज, और सत्यनारायण असत्यनारायण भासित होते हैं। आदर्शों के चित्र कार्टून जैसे दृष्टिगोचर होते हैं....। वह ऐसा चश्मा लगा देते हैं कि दुनिया ही उलटी नजर आती है।
स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित हिंदी पाठकों के लिए एक अनुपम कृति—खट्टर काका !

खट्टर काका की विनोद-वार्ता


काव्य-शास्त्र –विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्

संस्कृत साहित्य में काव्य-शास्त्र-विनोद की असंख्य रस-धाराएँ बहती हैं। उनकी अपूर्व भंगिमाएँ हैं। कोई शोख चंचल निर्झरिणी की तरह इठलाती चलती हैं। कोई बरसात की उमड़ती हुई गंगी की तरह बाँध तोड़ देती है। कोई उछलते समुद्र की तरह अपनी उत्तर तरंगों से आप्लावित कर देती हैं। कहीं रस की उफान है। कहीं व्यंग्य के बुलबुले हैं। कहीं हास्य की हिलोरें हैं। कहीं परिहास के प्रवाह हैं। कभी शास्त्रों पर छींटे बरसते हैं। कभी काव्य से अठखेलियाँ होती हैं। कभी वेद-पुराण में नोक-झोंक होती है। कभी देवताओं से छेड़खानियाँ होती हैं। कभी भगवान से भी हास-परिहास होते हैं। इसी विनोद-परंपरा के एक जीवंत प्रतीक हैं खट्टर काका। वह काव्य-शास्त्र-चर्चा में मग्न रहते हैं और अपने वाग्वैचित्र्य से चमत्कार की सृष्टि करते हैं।

खट्टर काका मस्त जीव हैं। ठंढ़ाई छानते हैं और आनंद-विनोद की वर्षा करते हैं। मौज में आकर अद्भुत रस की धारा बहा देते हैं। वह अक्खड़ तार्किक हैं। शास्त्रार्थ में किसी की रियासत नहीं करते। रामचंद्रजी की ससुराल (मिथिला) के निवासी होने के नाते वह भगवान से भी मीठी चुटकियाँ लेने अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। तब औरों की क्या हस्ती ! वह जिन पर लगते हैं, उन्हें व्यंग्य के रस –रंग से शराबोर कर देते हैं। उनकी हास्य-लहरी में पड़कर शास्त्र-पुराण, स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, सभी की नावें डगमगाने लगती हैं।  व्यंग्य-विनोद की बाढ़ में बड़े-बड़े देवता भस जाते हैं !

कबीर दास की तरह खट्टर काका भी उलटी गंगा बहा देते हैं। उनकी बातें एक-से-एक अनूठी, निराली और चौंकानेवाली होती हैं। जैसे, ब्रह्मचारी को वेद नहीं पढ़ना चाहिए। सती-सावित्री के उपाख्यान कन्याओं के हाथ में नहीं देना चाहिए। पुराण बहू-बेटियों के योग्य नहीं हैं दुर्गा की कथा स्त्रैणों की रची हुई है गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को फुसला लिया है। दर्शनशास्त्र की रचना रस्सी देखकर हुई। असली ब्राह्मण विदेश में हैं। मूर्खता के प्रधान कारण हैं पंडितगण। दही-चिउड़ा-चीनी सांख्य के त्रिगुण हैं। स्वर्ग जाने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है !

इस प्रकार खट्टर काका भंग की तरंग में रंग-विरंग की फुसलझड़ियाँ छोड़ते रहते हैं। वह सोमरस को भंग सिद्ध करते हैं, और आयुर्वेद की महाकाव्य ! भगवान को कभी मैसा बनाते हैं, कभी समधी ! कभी उन्हें नास्तिक प्रमाणित करते हैं, कभी खलनायक ! वह षोडशोपचार पूजा को एकांकी नाटक मानते हैं और कामदेव को असली सृष्टिकर्ता ! उन्हें उपनिषद् में विषयानंद, वेद-वेदांत में वाममार्ग और सांख्य-दर्शन में विपरीत रीति की झाँकियाँ मिलती हैं। वह अपने तर्क-कौशल से पातिव्रत्य ही को व्याभिचार सिद्ध करते हैं और असती को सती !

खट्टर काका हँसी-हँसी में भी जो उलटा-सीधा बोल जाते हैं, उसे प्रमाणित किये बिना नहीं छोड़ते। श्रोता को अपने तर्क-जाल में उलझाकर उसे भूल-भुलैया में डाल देना उनका प्रिय कौतुक है। वह तसवीर का रुख यों पलट देते हैं कि सारे परिप्रेक्ष्य ही बदल जाते हैं। रामायण, महाभारत, गीता, वेदांत, वेद, पुराण, सभी उलट जाते हैं। बड़े-बड़े दिग्गज चरित्र बौने –विद्रूप बन जाते हैं। सिद्धांतवादी सनकी सिद्ध होते हैं, और जीवन्मुक्त मि्ट्टी के लोंदे ! देवतागण गोबर-गणेश प्रतीत होते हैं। धर्मराज अधर्मराज, और सत्यनारायण असत्यनारायण भासित होते हैं ! आदर्शों के चित्र कार्टून जैसे दृष्टिगोचर होते हैं। वह ऐसा चश्मा लगा देते हैं कि दुनिया ही उलटी नजर आती है ! वह अपनी बातों के जादू से बुद्धि को सम्मोहित कर उसे शीर्षासन करा देते हैं।

कट्टर पंडितों को खंडित करने में खट्टर काका बेजोड़ हैं। पाखंड-खंडन में वह प्रमाणों और व्यंग्य-बाणों की ऐसी झड़ियाँ लगा देते हैं, जिनका जवाब नहीं। कः समः करिवर्यस्य मालती-पुष्प-मर्दने ! उनके लिए सभी शास्त्र पुराण हस्तामलकवत् हैं। वह शास्त्रों को गेंद की तरह उछालकर खेलते हैं। और, खेल-ही-खेल में फलित ज्योतिष, मुहूर्त-विद्या को धूर्त-विद्या, तंत्र-मंत्र को षड्यंत्र और धर्मशास्त्र को स्वार्थशास्त्र प्रमाणित कर देते हैं। इसी तरह वह आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मोक्ष और ब्रह्म की धज्जियाँ उड़ाकर रख देते हैं।

खट्टर-दर्शन की मान्यता है—सर्वं रसमयं जगत्। उनके रसवाद में षटरस और नवरस, अमरस और काव्यरस, पानी के बताशों की तरह घुलमिलकर एकाकार हो जाते हैं। सांख्य की प्रकृति, वेदांत की माया, पुराण की देवी और स्वर्ग की अप्सरा के भेद मिट जाते हैं। श्रृंगार और भक्ति में उन्हें चोली-दामन का रिश्ता नजर आता है और वैराग्य में भी रस-कलश की झलक मिलती है।

खट्टर काका का सिद्धांत है—रसं पीत्वा रसं वदेत्। वह जो बोलते हैं, उसमें रस घोल देते हैं। जिस तरह उनकी ठंढ़ाई में गुलाब की पत्तियों के साथ-साथ काली मिर्चे भी रहती हैं, उसी तरह उनकी रस-वार्ता में अलंकार-माधुर्य के साथ-साथ व्यंग्य-विद्रूप-विडंबना के तेज मसाले भी रहते हैं। खट्टर काका की खट्टी-मीठी-तीखी बातों में लोगों को चटपटी चाट का मजा आता है। उनके उत्कट परिहासों में भी वही जायका है जो मिर्च के अँचार में। जैसे ससुराल की अश्लील गालियाँ भी मीठी लगती हैं, वैसे ही खट्टर काका के कटु-मधु मजाक भी बारात के हलके-फुलके वाग्विनोद की तरह प्रिय लगते हैं। न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति !

खट्टर काका के व्यंग्य नाटक के तीर होते हैं। पर वे नुकीले, कटीले और चुटीले होते हुए भी रसीले होते हैं। वे कुमकुमों की तरह मीठी चोट करते हैं, रेशमी फुहारों की तरह गुदगुदा देते हैं। मगर कभी-कभी मोटी पिचकारियों की तेज धार तिलमिला भी देती है। व्रज की होली की तरह। फागुन की मदमत्त पुरवैया की तरह खट्टर काका की लहरों में भी निरंकुश वप्रक्रीड़ा की मस्ती रहती है। उसी को लेकर तो खट्टरत्व है।
खट्टर काका को कोई ‘चार्वाक’ (नास्तिक) कहते हैं, कोई ‘पक्षधर’ (तार्किक), कोई ‘गोनू झा’ (विदूषक) ! कोई उनके विनोद को तर्कपूर्ण मानते हैं, कोई उनके तर्क को विनोदपूर्ण मानते हैं। खट्टर काका वस्तुतः क्या हैं, यह एक पहेली है। पर वह जो भी हों, वह शुद्ध विनोद-भाव से मनोरंजन का प्रसाद वितरण करते हैं, इसलिए लोगों के प्रिय पात्र हैं। उनकी बातों में कुछ ऐसा रस है, जो प्रतिपक्षियों को भी आकृष्ट कर लेता है।

आज से लगभग पचीस वर्ष पहले खट्टर काका मैथिली भाषा में प्रकट हुए। जन्म लेते ही वह प्रसिद्ध हो उठे। मिथिला के घर-घर में उनका नाम खिर गया। जब उनकी कुछ विनोद-वार्त्ताएँ ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ आदि में छपीं तो हिंदी पाठकों को भी एक नया स्वाद मिला। गुजराती पाठकों ने भी उनकी चाशनी चखी। उन्हें कई भाषाओं ने अपनाया। वह इतने बहुचर्चित और लोकप्रिय हुए कि दूर-दूर से चिट्ठियाँ आने लगीं—‘‘यह खट्टर काका कौन हैं, कहाँ रहते हैं, उनकी और-और वार्ताएँ कहाँ मिलेंगी ?’’

बहुत दिनों से साहित्यिक बंधुओं की फरमाइश थी कि खट्टर काका की छिटपुट विनोदवार्ताओं को मैथिली की तरह हिंदी में भी पुस्तकाकार लाया जाय। अवकाश प्राप्त होने पर मैंने उन्हें नये सिरे से सजाना-सँवारना शुरू किया और विगत कई महीनों के परिश्रम के फलस्वरूप खट्टर काका अभिनव रूप में आपके सामने हैं। मैथिली के ‘कका’ से हिंगी के इस ‘काका’ में आकार की वृद्धि तो हुई ही है, प्रकार में भी कुछ विशेषता आयी है। मैथिली संस्करण की कतिपय आंचलिक वार्ताओं को हटाकर हिंदी क्षेत्र के अनुकूल उपयुक्त सामग्री जोड़ी गयी है। फिर भी कहीं-कहीं आंचलिकताओं के झाँकी-दर्शन हो जाएँगे। अंचल के बेल-बूटों की तरह। मैथिली के ‘चूड़ा’ (चिउड़ा) ‘नस’ (नास) जैसे कुछ कोमल शब्दों को यथावत् रहने दिया गया है। आवश्यकानुसार कहीं-कहीं फुटनोट भी दे दिये गये हैं। खट्टर काका के इस हिंदी रूप को यथासंभव मूल की तरह ही रोचक, आकर्षक बनाने की चेष्टा की गयी है।

राजकमल प्रकाशन की प्रबंध-निदेशिका श्रीमती शीला संधू ने इस पुस्तक के प्रकाशन में जो रुचि ली है और मेरी सुविधा की दृष्टि से पटना में मुद्रण की व्यवस्था की है, तदर्थ में उनका आभारी हूँ। प्रिय जगदीशजी ने जिस दिलचस्पी के साथ छपाई की है, तदर्थ वह भी धन्यवादार्ह हैं। फिर भी प्रेस की मशीन यदा-कदा अनजाने मजाक कर बैठती है। कहीं ‘दयामय’ ‘दवामय’ बन गये हैं।

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