दीप शिखा (सजिल्द) - महादेवी वर्मा Deep Shikha (hard cover) - Hindi book by - Mahadevi Verma
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दीप शिखा (सजिल्द)

महादेवी वर्मा

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
आईएसबीएन : 9788180313073 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :121 पुस्तक क्रमांक : 6677

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मेरे गीत अध्यात्म के अमूर्त आकाश के नीचे लोक-गीतों की धरती पर पले हैं...

Deep Shikha - A hindi book by Mahadevi Verma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दीप-शिखा में मेरी कुछ ऐसी रचनाएं संग्रहीत हैं जिन्हें मैंने रंगरेखा की धुंधली पृष्ठभूमि देने का प्रय़ास किया है। सभी रचनाओं को ऐसी पीठिका देना न सम्भव होता है और न रूचिकर, अतः रचनाक्रम की दृष्टि से यह चित्रगीत बहुत बिखरे हुए ही रहेंगे।
मेरे गीत अध्यात्म के अमूर्त आकाश के नीचे लोक-गीतों की धरती पर पले हैं।

चिन्तन के कुछ क्षण

सत्य काव्य का साध्य और सौन्दर्य साधन है। एक अपनी एकता में असीम रहता है और दूसरा अपनी अनेकता में अनन्त। इसी से साधन के परिचय-स्निग्ध खण्डरूप से साध्य की विस्मयभरी अखण्ड स्थिति तक पहुँचने का क्रम आनन्द की लहर-पर-लहर उठाता हुआ चलता है।
इस व्यापक सत्य के साथ हमारी सीमा का सम्बन्ध कुछ जटिल-सा है। हमारी दृष्टि के सामने क्षितिज तक जो अनन्त विस्तार फैला हुआ है वह मिट नहीं सकता, पर हम अपनी आँख के तिल के सामने एक छोटा-सा तिनका भी खड़ा करके, उसे इन्द्रजाल के समान ही अपने लिए लुप्त कर सकते हैं फिर जब तक हम उसे अपनी आँख से कुछ अन्तर पर एक विशेष स्थिति में, उस विस्तार के साथ रख कर न देखें तब तक हमारे लिए वह क्षितिजव्यापी विस्तार नहीं के बराबर है। केवल तिनका ही हमारी दृष्टि की सीमा को सब ओर से घेर कर विराट बन जायेगा। परन्तु उस तृण विशेष पर ही नहीं लता, वृक्ष, खेत, वन आदि सभी खण्डरूपों पर ठहरती हमारी दृष्टि उस विस्तार का ज्ञान करा सकती है। बिना रूपों की सीमा के उस असीम विस्तार का बोध होना कठिन है और विस्तार की व्यापक पीठिका के अभाव में उन रूपों की अनेकात्मकता की अनुभूति सम्भव नहीं। अखण्ड सत्य के साथ हमारी स्थिति भी बहुत कुछ ऐसी ही रहती है। उसका जितना अंश हम अपनी सीमा से घेर सकते हैं उसे ऐसी स्थिति में रख कर देखना आवश्यक हो जाता है जहाँ वह हमारी सीमा में रहकर भी सत्य की व्यापकता में अपनी निश्चित स्थिति बनाये रहे। व्यक्ति की सीमा में तो सत्य की ऐसी दोहरी स्थिति सहज ही नहीं स्वाभाविक भी है। अन्यथा उसे तत्वतः ग्रहण करना सम्भव न हो सकेगा। परन्तु खण्ड में अखण्ड की इस स्थिति को प्रेषणीय बना लेना दुष्कर नहीं तो कठिन अवश्य है। आकार की रेखाओं की संख्या, लम्बाई-चौड़ाई, हल्का-भारीपन आदि गणित के अंकों में बाँधे जा सकते हैं, परन्तु रेखा से परिणाम तक व्याप्त सजीवता का परिचय, संख्या, मात्रा या तौल से नहीं दिया जा सकता। आकार को ठीक नाप-जोख के साथ दूसरे तक पहुँचा देना जितना सहज है, जीवन को सम्पूर्ण अतुलनीयता के साथ दूसरे को दे सकना उतना ही कठिन।

सत्य की व्यापकता में से हम चाहे जिस अंश को ग्रहण करें वह हमारी सीमा में बँध कर व्यष्टिगत हो ही जाता है और इस स्थिति में हमारी सीमा के साथ सापेक्ष पर अपनी व्यापकता में निरपेक्ष बना रहता है। दूसरे के निकट हमारी सीमा से घिरा सत्य हमारा रह कर ही अपना परिचय देना चाहता है औऱ दूसरा हमें तौल कर ही उस सत्य का मूल्य आँकने की इच्छा रखता है। इतना ही नहीं, उसकी तुला पर रूचिवैचित्र्य, संस्कार स्वार्थ आदि के न जाने कितने पासंगों की उपस्थिति भी संभव है, अतः सत्य के सापेक्ष ही नहीं निरपेक्ष मूल्य के संबंध में भी अनेक मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं।
इसके अतिरिक्त मनुष्य की चिर अतृप्त जिज्ञासा भी कुछ कम नहीं रोकती-टोकती। ‘हमने अमुक वस्तु को अमुक स्थिति में पाया’ इतना कथन ही पर्याप्त नहीं, क्योंकि सुनने वाला कहाँ-कहाँ कहकर उसे अपने प्रत्यक्ष ज्ञान की परिधि में बाँध लेने को व्याकुल हो उठेगा। अब यदि वह हमारी ही स्थिति में, हमारे ही दृष्टिकोण से उसे न देख सके तो वह वस्तु कुछ भिन्न भी लग सकती है औऱ तब विवाद की कभी न टूटने वाली श्रृंखला में नित्य नई कड़ियाँ जुड़ने लगेंगी। बाह्य जीवन में तो यह समस्या किसी अंश तक सरल की भी जा सकती है, परन्तु अन्तर्जगत में इसे सुलझा लेना सदा ही कठिन रहा है।

इस सत्य सम्बन्धी उलझन को सुलझाने के लिए जीवन न ठहर सकता है और न इसे छोड़ कर आगे बढ़ सकता है, अतः वह सुलझाता हुआ चलता है बाह्य जीवन में राजनीति समाज-शासन, धर्म आदि इतिवृत्त के समान सत्य का परिचय भर देते चलते हैं। मनुष्य की हठीली जिज्ञासा किसी ग्रन्थि को पकड़ कर रूक न जाय, इस भय से उन्होंने प्रत्येक ग्रन्थि पर अनुग्रह और दण्ड की इतनी चिकनाहट लगा दी है जिससे हाथ फिसल भर जाये। कहीं महाभाष्य के समान बहुत विस्तार में उलझे हुए और कहीं सूत्रों के समान संक्षिप्त रूप में सुलझे हुए सिद्धान्त कभी सत्य के संग्रहालय-जैसे जान पड़ते हैं और कभी अस्त्रागार जैसे कहीं सत्य की विकलांग मूर्तियों को स्मरण करा देते हैं और कहीं अधूरे रेखाचित्रों का, पर व्यापक स्पन्दित सत्य का अभाव नहीं दूर कर पाते। मनुष्य के बाह्य जीवन की निर्धनता देखने के लिए वे सहस्त्राक्ष बनने पर बाध्य हैं औऱ उसके अन्तर्जगत के वैभव के लिए धृतराष्ट्र होने पर विवश।

हमारी बुद्धिवृत्ति बाहर के स्थूलतम बिन्दु से लेकर भीतर के सूक्ष्मतम बिन्दु तक जीवन को एक अर्धवृत्त में घेर सकती है, परन्तु दूसरा अर्धवृत्त बनाने के लिए हमारी रागात्मिकता वृत्ति ही अपेक्षित रहेगी। हमारे भावक्षेत्र और ज्ञानक्षेत्र की स्थिति पृथ्वी के दो गोलाद्धों के समान है जो मिलकर भूगोल को पूर्णता देते हैं और अकेले आधा संसार ही घेर सकते हैं। एक ओर का भूखण्ड दूसरे का पूरक बना रहने के लिए ही उसे अन्तर पर रखकर अपनी दृष्टि का विषय नहीं बना पाता परन्तु इससे दोनों में से किसी की भी स्थिति संदिग्ध नहीं हो जाती।
हमारी बुद्धि और रागात्मिकता वृत्ति के दो अर्धवृत्तों से घिरे सत्य के सम्बन्ध में भी यही सत्य रहेगा। हमारे व्यावहारिक जीवन का प्रत्येक कार्य, संकल्प-विकल्प कल्पना-स्वप्न, सुख-दुख आदि की भिन्नवर्णी कड़ियों वाली श्रृंखला के एक सिरे में झूलता रहता है। इस श्रृंखला की प्रायः सभी कड़ियों की स्थिति अन्तर्जगत में ही सम्भव है। व्यवहार-जगत केवल कार्य से सम्बन्ध रखता है, बुद्धि कार्य के स्थूल ज्ञान से लेकर उसे जन्म देने वाले सूक्ष्म विचार तक जानती है  औऱ हृदय तज्जनित सुख-दुःख से लेकर स्वप्न- कल्पना तक की अनुभूतियाँ संचित करता है। इस प्रकार बाह्य-जीवन की सीमा में वामन-जैसा लगने वाला कार्य भी हमारे अन्तर्जगत की असीमता में बढ़ते-बढ़ते विराट हो सकता है।

बहिर्जगत अन्तर्जगत तक फैले और ज्ञान तथा भावक्षेत्र में समान रूप से व्याप्त सत्य की सहज अभिव्यक्ति के लिए माध्यम खोजते-खोजते ही मनुष्य ने काव्य और कलाओं का आविष्कार कर लिया होगा। कला सत्य को ज्ञान के सिकता-विस्तार में नहीं खोजता, अनुभूति की सरिता के तट से एक विशेष बिन्दु पर ग्रहण करती है। तट पर एक ही स्थान पर बैठे रह कर भी गम असंख्य नई तरंगों को सामने आते और पुरानी लहरों को आगे जाते देखकर नदी से परिचित हो जाते हैं, वह किस पर्वतीय उद्गम से निकल कर कहाँ-कहाँ बहती हुई किस समुद्र की अगाध तरलता में विलीन हो जाती है, यह प्रत्यक्ष न होने पर भी हमारी अनुभूति में नदी पूर्ण है औऱ रहेगी। जब हम कहते हैं कि हमने एक ओर चाँदी की धूल-जैसी झिलमिलाती बालू और दूसरी ओर दूर हरीतिमा में तट-रेखा बनाती हुई अथाह नील जल से भरी नदी देखी’ तब सुनने वाला कोई प्रचलित नाप-जोख माँगता। हमने इतने गज प्रवाह नापा है, इतने सौ लहरें गिनी हैं, इतने फीट गहराई नापी है, इतने सेर पानी तोला है आदि-आदि नाप-तोल न बता कर भी हम नदी का ठीक परिचय दूसरे के हृदय तक पहुँचा देते हैं। सुनने वाला इस, नदी को ही नहीं उसके शाश्वत सौन्दर्य को भी प्रत्यक्ष पाकर एक ऐसे आनन्द की स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ गणित के अंकों में बँधी नाप-जोख के लिए स्थान नहीं।

मस्तिष्क और हृदय परस्पर पूरक रह कर भी एक ही पथ से नहीं चलते। बुद्धि में समानान्तर पर चलने वाली भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ है और अनुभूति में एकतारता लिये गहराई। ज्ञान के क्षेत्र में एक छोटी रेखा के नीचे उससे बड़ी रेखा खींच कर पहली का छोटा और भिन्न अस्तित्व दिखाया जा सकता है। इसके असंख्य उदाहरण, विज्ञान जीवन की स्थूल सीमा में और दर्शन जीवन की सूक्ष्म असीमता में दे चुका है। पर अनुभूति के क्षेत्र में एक की स्थिति से नीचे और अधिक गहराई में उतर कर भी हम उसके साथ एक ही रेखा पर रहते हैं। एक वस्तु को एक व्यक्ति अपनी स्थिति-विशेष में अपने विशेष दृष्टि-बिन्दु से देखता है। दूसरा अपने धरातल पर अपने से और तीसरा अपनी सीमा रेखा पर अपने से। तीनों ने वस्तु-विशेष को जिन विशेष दृष्टिकोणों से, जिन विभिन्न परिस्थितियों में देखा है वे उनके तद्विषयक ज्ञान को भी भिन्न रेखाओं से घेर लेंगी। इस विभिन्न रेखाओं के नीचे ज्ञान के एक सामान्य धरातल की स्थिति है अवश्य, परन्तु वह अपनी एकता के परिचय के लिए ही इस अनेकता को सँभाले रहती है। 

अनुभूति के सम्बन्ध में यह कठिनाई सरल हो जाती है। एक व्यक्ति अपने दुःख को बहुत तीव्रता से अनुभव कर रहा है। उसके निकट आत्मीय की अनुभूति में तीव्रता की मात्रा कुछ घट जायेगी और साधारण मित्र में उसका और भी न्यून हो जाना संभव है। पर जहाँ तक दुःख के सामान्य संवेदन का प्रश्न है वे तीनों एक ही रेखा पर, निकट, दूर, अधिक दूर की स्थिति में रहेंगे। हाँ जब उनमें से कोई उस दुःख को, अनुभूति के क्षेत्र से निकाल कर बौद्धिक धरातल पर रख लेगा तब कथा ही दूसरी हो जायेगी। अनुभूति अपनी सीमा में जितनी सबल है उतनी बुद्धि नहीं। हमारे स्वयं जलने की हल्की अनुभूति भी दूसरे के राख हो जाने के ज्ञान से अधिक स्थायी रहती है।

बुद्धिवृत्ति अपने विषय को ज्ञान के अनन्त विस्तार के साथ रखकर देखती है, अतः व्यष्टिगत सीमा में उसका संदिग्ध हो उठना स्वाभाविक ही रहेगा। ‘अमुक ने धूम देकर अग्नि पाई’ की जितनी आवृत्तियाँ होंगी हमारा धूम और अग्नि की सापेक्षता विषयक ज्ञान उतनी ही निश्चित स्थिति पा सकेगा। पर अपने विषय पर केन्द्रित होकर उसे जीवन की अनन्त गहराई तक ले जाना अनुभूति का लक्ष्य रहता है इसी से हमारी व्यक्तिगत अनुभूति जितनी निकट और तीव्र होगी दूसरे का अनुभूत सत्य हमारे समीप उतना ही असंदिग्ध होकर आ सकेगा। ‘तुमने जिसे पानी समझा वह बालू की चमक है, ‘तुमने जिसे काला देखा वह नीला है, ‘तुमने जिसे कोमल पाया वह कठोर है, आदि-आदि कहकर हम दूसरे में, स्वयं उसी के इन्द्रियजन्य ज्ञान के प्रति, अविश्वास उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु ‘तुम्हें जो काँटा चुभने की पीड़ा हुई वह भ्रान्ति है’ यह हमसे असंख्य बार सुनकर भी कोई अपनी पीड़ा के अस्तित्व में संदेह नहीं करेगा।

जीवन के निश्चित बिन्दुओं को जोड़ने का कार्य हमारा मस्तिष्क कर लेता है, पर इस क्रम से बनी परिधि में सजीवता के रंग भरने की क्षमता हृदय में ही संभव है। काव्य या कला मानों इन दोनों का सन्धिपत्र है, जिसके अनुसार बुद्धिवृत्ति झीने वायु-मण्डल के समान बिना भार डाले हुए ही जीवन पर फैली रहती है और रागात्मिका वृत्ति उसके धरातल पर, सत्य अनन्त रंगरूपों में चिर नवीन स्थिति देती रहती है। अतः कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम दूसरा व्यक्त अखण्ड सत्य है।

सौन्दर्य सम्बन्धी समस्या भी कुछ कम उलझी हुई नहीं है। बाह्य जगत अनेक रूपात्मक है और उन रूपों का, सुन्दर तथा कुरूप में एक व्यावहारिक वर्गीकरण भी हो चुका है। क्या कला इसी वर्गीकरण की परिधि में आने वाले सौन्दर्य को ही सत्य का माध्यम बना कर शेष को छोड़ दे। केवल बाह्य रेखाओं और रंगों का सामंजस्य ही सौन्दर्य कहा जावे तो प्रत्येक भूखण्ड का मानव-समाज ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति भी अपनी रूचि में दूसरे से भिन्न मिलेगा। किसके रूचिवैचित्र्य के अनुसार सामंजस्य की परिभाषा बनाई जावे यह प्रश्न सत्य से भी जटिल हो उठेगा।

सत्य की प्राप्ति के लिए काव्य और कलाएँ जिस सौन्दर्य का सहारा लेते हैं वह जीवन की पूर्णतम अभित्यक्ति पर आश्रित है केवल बाह्य रूप-रेखा पर नहीं। प्रकृति का अनन्त वैभव, प्राणिजगत की अनेकात्मक गतिशीलता, अन्तर्जगत की रहस्यमयी विविधता सब कुछ इसके सौन्दर्य कोष के अन्तर्गत है और इसमें से क्षुद्रतम वस्तु के लिए भी ऐसे भारी मुहूर्त आ उपस्थित होते हैं जिनमें वह पर्वत के समकक्ष खड़ी होकर ही सफल हो सकती है और गुरूतम वस्तु के लिए भी ऐसे लघु क्षण आ पहुँचते हैं, जिनमें वह छोटे तृण के साथ बैठकर ही कृतार्थ बन सकती है।

जीवन का जो स्पर्श विकास के लिए अपेक्षित है उसे पाने के उपरान्त छोटा, बड़ा लघु, गुरू सुन्दर, विरूप, आकर्षक, भयानक कुछ भी कलाजगत से बहिष्कृत नहीं किया जाता। उजले कमलों की चादर-जैसी चाँदनी में मुस्कुराती हुई विभावरी अभिराम है। पर अँधेरे के स्तर-पर-स्तर ओढ़कर विराट बनी हुई काली रजनी भी कम सुन्दर नहीं। फूलों के भार से झुक-झुक पड़ने वाली लता कोमल है, पर शून्य नीलिमा की ओर विस्मित बालक-सा ताकने वाला ठूँठ भी कम सुकुमार नहीं। अविरत जलदान से पृथ्वी को कँपा देने वाला बादल ऊँचा है, पर एक बूँद ओस के भार से नत और कम्पित तृण भी कम उन्नत नहीं। गुलाब के रंग और नवनीत की कोमलता में कंकाल छिपाये हुए रूपसी कमनीय है, पर झुर्रियों में जीवन का विज्ञान लिखे हुए वृद्ध भी कम आकर्षण नहीं। बाह्य-जीवन की कठोरता, संघर्ष, जय-पराजय सब मूल्यवान हैं, पर अन्तर्जगत की कल्पना, स्वप्न, भावना आदि भी कम अनमोल नहीं।

सत्य पर जीवन का सुन्दर ताना-बाना बुनने के लिए कलासृष्टि ने स्थूल-सूक्ष्म सभी विषयों का अपना उपकरण बनाया। वह पाषाण की कठोर स्थलता से रंग-रेखाओं की निश्चित सीमा, उससे ध्वनि की क्षणिक स्थिति और तब शब्द की सूक्ष्म व्यापकता तक पहुँची अथवा किसी और क्रम से, यह जान लेना बहुत सहज नहीं, परन्तु शब्द के विस्तार में कला-सृजन को पाषाण की मूर्तिमत्ता, रंग-रेखा की सजीवता, स्वर का माधुर्य सब कुछ एकत्र कर लेने की सुविधा प्राप्त हो गई। काव्य में कला का उत्कर्ष एक ऐसे बिन्दु तक पहुँच गया, जहाँ से वह ज्ञान को सहायता दे सका।
उपयोग की कला और सौन्दर्य की कला को लेकर बहुत-से विवाद सम्भव होते रहे, परन्तु कला के यह भेद मूलतः एक-दूसरे से बहुत दूरी पर नहीं ठहरते।

कला शब्द से किसी निर्मित पूर्ण खण्ड का ही बोध होता है और कोई भी निर्माण अपनी अन्तिम स्थिति में जितना सीमित है आरम्भ में उतना ही फैला हुआ मिलेगा। उनके पीछे-स्थूल-जगत का अस्तित्व, जीवन की स्थिति, किसी अभाव की अनुभूति, पूर्ति का आदर्श, उपकरणों की खोज, एकत्रीकरण की कुशलता आदि-आदि का जो इन्द्रजाल रहता है उसके अभाव में निर्माण की स्थिति शून्य के अतिरिक्त कौन-सी संज्ञा पा सकेगी। चिड़िया का कलरव कला न होकर कला का विषय हो सकेगा पर मनुष्य के गीत को कला कहना होगा। एक में वह सहज प्रवृत्ति मात्र है, पर दूसरे ने सहज प्रवृत्ति के आधार पर अनेक स्वरों को विशेष सामंजस्यपूर्ण स्थिति में रख-रखकर विशेष रागिनी की सृष्टि की है जो अपनी सीमा में जीवनव्यापी सुख-दुःखों की अनुभूति को अक्षय रखती है। इस प्रकार प्रत्येक कला-कृति के लिए निर्माण-सम्बन्धी विज्ञान की भी आवश्यकता होगी और उस विज्ञान की सीमित रेखाओं में व्यक्त होने वाले जीवन के व्यापक सत्य की अनुभूति की भी। जब हमारा ध्यान किसी एक पर ही केन्द्रित हो जाता है तब दोनों को जोड़ने वाली कड़ियाँ अस्पष्ट होने लगती हैं।

अधिक गूँजती क्यों प्राण वंशी ?
शून्यता तेरे हृदय की
आज किसकी साँस भरती ?
प्यास को वरदान करती,
स्वर-लहरियों में बिखरती !
आज मूक अभाव किसने कर दिया लयवान वंशी ?

अमिट मसि के अंक से
सूने कभी थे छिद्र तेरे,
पुलक के अब हैं बसेरे,
मुखर रंगों के चितेरे,
आज ली इनकी व्यथा किन उँगलियों ने जान वंशी ?

मृणमयी तू रच रही यह
तरल विद्युत ज्वार सा क्या ?
चाँदनी घनसार सा क्या ?
दीपकों के हार सा क्या ?
स्वप्न क्यों अवरोह में, आरोह में दुखगान वंशी ?
गूंजती क्यों प्राण वंशी ?


दीप मेरे जल अकम्पित,
घुल अचंचल !

सिन्धु का उच्छ्वास घन है,
तड़ित्, तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल !

स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,
मीड़ सब भू की शिरायें,
गा रहे आँधी-प्रलय
तेरे लिए ही आज मंगल।

मोह क्या निशि के वरों का
शलभ के झुलते परों का,
साथ अक्षय ज्वाल का
तू ले चला अनमोल सम्बल !

पथ न भूले, एक पग भी,
घर न खोये, लघु विहग भी,
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्जवल !

हो लिये सब साथ अपने,
मृदुल आहटहीन सपने,
तू इन्हें पाथेय बिन, चिर
प्यास के मरु में न खो, चल !

धूम में अब बोलना क्या,
क्षार में अब तोलना क्या !
प्रात हँस रोकर गिनेगा,
स्वर्ण कितने हो चुके पल !

दीप रे तू गल अकम्पित, चल अचंचल !

पथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !

घेर ले छाया, अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा लें यह घिरा घन;
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ ‘पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला !

अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शून्य को संकल्प सारे;

दुखव्रती निर्माण उन्मद,
यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण वेला !

दूसरी होगी कहानी,
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी,

आज जिस पर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ’
चिनगारियों का एक मेला !

हास का मधु-दूत भेजो,
रोष की भ्रू-भंगिमा पतझार को चाहे सहे जो !

ले मिलेगा उर अचंचल,
वेदना-जल-स्वप्न-शतदल;
जान लो वह मिलन एकाकी
विरह में है दुकेला !

ओ चिर नीरव !

मैं सरित विकल,
तेरी समाधि की सिद्धि अकल,
चिर निद्रा में सपने का पल,
ले चली लास में लय-गौरव

मैं अश्रु-तरल,
तेरे ही प्राणों की हलचल,
पा तेरी साधों का सम्बल,
मैं फूट पड़ी ले स्वर-वैभव !

मैं सुधि-नर्तन,
पथ बना, उठे जिस ओर चरण,
दिशा रचता जाता नुपूर-स्वन,
जगता जर्जर जग का शैशव !

मैं पुलकाकुल,
पल पल जाती रस-गागर ढुल,
प्रस्तर के जाते बन्धन खुल,
लुट रहीं व्यथा-निधियाँ नव-नव !

मैं चिर चंचल,
मुझसे है तट-रेखा अविचल,
तट पर रूपों का कोलाहल,
रस-रंग-सुमन-तृण-कण-पल्लव !

मैं ऊर्म्मि विरल,
तू तुंग अचल, वह सिन्धु अतल,
बाँधें दोनों को मैं चल चल,
धो रही द्वैत के सौ कैतव !

मैं गति विह्वल,
पाथेय रहे तेरा दृग-जल,
आवास मिले भू का अंचल,
मैं करुणा की वाहक अभिनव !

प्राण हँस कर ले चला जब
चिर व्यथा का भार !

उभर आये सिन्धु उर में
वीचियों के लेख,
गिरि कपोलों पर न सूखी
आँसुओं की रेख।
धूलि का तब से न रुक पाया कसक-व्यापार !

सान्त दीपों में जगी नभ
की समाधि अनन्त,
बन गये प्रहरी पहन,
आलोक-तिमिर, दिगन्त।
किरण तारों पर हुए हिम-बिन्दु बन्दनवार।

स्वर्ण-शर-से साध के
घन के लिया उर बेध,
स्वप्न-विहगों को हुआ
यह क्षितिज मूक निषेध !
क्षण चले करने कणों का पुलक से श्रृंगार !

शून्य के निश्वास ने दी
तूलिका सी फेर,
ज्वार शत शत रंग के
फैले धरा को घेर !
वात अणु अणु में समा रचने लगी विस्तार !

अब न लौटाने कहो
अभिशाप की वह पीर,
बन चुकी स्पन्दन हृदय में
वह नयन में नीर !
अमरता उसमें मनाती है मरण-त्योहार।

छाँह में उसकी गये आ
शूल फूल समीप,
ज्वाल का मोती सँभाले,
मोम की यह सीप !
सृजन के शत दीप थामे प्रलय दीपाधार !

सब बुझे दीपक जला लूँ !
घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी जगा लूँ !

क्षितिज-कारा तोड़ कर अब
गा उठी उन्मत्त आँधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास-तन्मय तड़ित् बाँधी,
धूलि की इस वीण पर मैं तार हर तृण का मिला लूँ !

भीत तारक मूँदते दृग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड़ उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता,
उँगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूँ !

लय बनी मृदु वर्त्तिका
हर स्वर जला बन लौ सजीली,
फैलती आलोक-सी
झंकार मेरी स्नेह गीली,
इस मरण के पर्व को मैं आज दीपावली बना लूं !

देखकर कोमल व्यथा को
आँसुओं के सजल रथ में,
मोम-सी साधें बिछा दीं
थीं इसी अंगार-पथ में,
स्वर्ण हैं वे मत कहो अब क्षार में उनको सुला लूँ !

अब तरी पतवार ला कर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना !
ज्वार को तरणी बना मैं; इस प्रलय का पार पा लूँ !

आज दीपक राग गा लूँ !

हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन !

अगरू-धूम सी सांस सुधि-गन्ध-सुरभित,
बनी स्नेह-लौ आरी चिर अकम्पित;
हुआ नयन का नीर अभिषेक-जल-कण !

सुनहले सजीले रँगीले धबीले,
हसित कंटकित अश्रु-मकरन्द-गीले,
बिखरते रहे स्वप्न के फूल अनगिन !

असित-श्वेत गन्धर्व जो सृष्टि लय के,
दृगों को पुरातन, अपरिचित हृदय के,
सजग यह पुजारी मिले रात औ’ दिन !

परिधिहीन रंगों भरा व्योम-मंदिर,
चरण-पीठ भू का व्यथा-सिक्त मृदु उर,
ध्वनित सिन्धु में है रजत-शंख का स्वन

कहो मत प्रलय द्वार पर रोक लेना,
वरद मैं मुझे कौन वरदान देगा ?
हुआ कब सुरभि के लिए फूल बन्धन ?

व्यथाप्राण हूँ नित्य सुख का पता मैं,
धुला ज्वाल से मोम का देवता मैं,
सृजन-श्वास हो क्यों गिनूँ नाश के क्षण !


आज तार मिला चुकी हूँ !

सुमन में संकेत-लिपि
चंचल विहग-स्वर-ग्राम जिसके,
वात उठता, किरण के
निर्झर झुके, लय-भार जिसके,
वह अनामा रागिनी अब साँस में ठहरा चुकी हूँ !

सिन्धु चलता मेघ पर,
रुकता तड़ित् का कंठ गीला,
कंटकित सुख से धरा,
जिसकी व्यथा से व्योम नीला,
एक स्वर में विश्व की दोहरी कथा कहला चुकी हूँ !

एक ही उर में पले
पथ एक से दोनों चले हैं,
पलक-पुलिनों पर, अधर-
उपकूल पर दोनों खिले हैं,
एक ही झंकार में युग अश्रु-हास घुला चुकी हूँ !

रंग-रस-संसृति समेटे,
रात लौटी, प्रात लौटे;
लौटते युग कल्प पल,
पतझार औ’ मधुमास लौटे;
राग में अपने कहो किसको न पार बुला चुकी हूं !
निष्करुण जो हँस रहे थे
तारकों में दूर ऐंठे
स्वप्न-नभ के आज
पानी हो तृणों के साथ बैठे,
पर न मैं अब तक व्यथा का छंद अन्तिम गा चुकी हूँ।


कहाँ से आये बादल काले ?
कजरारे मतवाले ?

शूल भरा जग धूल भरा नभ,
झुलसीं देख दिशायें निष्प्रभ,
सागर में क्या सो न सके यह
करुणा के रखवाले ?

आँसू का तन, विद्युत का मन,
प्राणों में वरदानों का प्रण,
धीर पदों से छोड़ चले घर,
दुख-पाथेय सँभाले !

नाँघ क्षितिज की अन्तिम दहली,
भेंट ज्वाल की वेला पहली,
जलते पथ को स्नेह पिला
पग पग पर दीपक बाल !

गर्जन में मधु-लय भर बोले,
झंझा पर निधियाँ धर डोले,
आँसू बन उतरे तृण-कण ने
मुस्कानों में पाले !

नामों में बाँधे सब सपने,
रूपों में भर स्पन्दन अपने,
रंगों के ताने बाने में
बीते क्षण बुन डाले !

वह जड़ता हीरों से डाली,
यह भरती मोती से थाल,
नभ कहता नयनों में बस
रज कहती प्राण समा ले !

यह सपने सुकुमार तुम्हारी स्मित से उजले !

छूकर मेरे सजल दृगों की मधुर कहानी,
इनका हर कण हुआ अमर करुणा वरदानी,
उड़े तृणों की बात तारकों से कहने यह
चुन प्रभात के गीत, साँझ के रंग सलज ले !

लिये छाँह के साथ अश्रु का कुहक सलोना,
चले बसाने महाशून्य का कोना कोना,
इनकी गति में आज मरण बेसुध बन्दी है,
कौन क्षितिज का पाश इन्हें जो बाँध सहज ले।

पंथ माँगना इन्हें नहीं पाथेय न लेना,
उन्नत मूक असीम, मुखर सीमित तल देना,
बादल-सा उठ इन्हें उतरना है जल-कण सा
नभ विद्युत के बाण, सजा शूलों को रज ले !

जाते अक्षरहीन व्यथा की लेकर पाती,
लौटाना है इन्हें स्वर्ग से भू की थाती,
यह संचारी दीप, ओट इनको झंझा दे,
आगे बढ़ ले प्रलय, भेंट तम आज गरज ले !

छायापथ में अंक बिखर जावें इनके जब,
फूलों में खिल रूप निखर आवें इनके जब,
वर दो तब यह बांध सकें सीमा से तुमको,
मिलन-विरह के निमिष-गुँथी साँसों की स्रज ले !

तरल मोती से नयन भरे !

मानस से ले, उठे स्नेह-घन,
कसक-विद्यु पुलकों के हिमकण,
सुधि-स्वाती की छाँह पलक की सीपी में उतरे !

सित दृग हुए क्षीर लहरी से,
तारे मरकत-नील-तरी से,
सूखे पुलिनों सी वरुणी से फेनिल फूल झरे !

पारद से अनबीधें मोती,
साँस इन्हें बिन तार पिरोती,
जग के चिर श्रृंगार हुए, जब रजकण में बिखरे !

क्षार हुए, दुख में मधु भरने,
तपे, प्यास का आतप हरने,
इनसे धुल कर धूल भरे सपने उजले निखरे !


विहंगम-मधुर स्वर तेरे,
मदिर हर तार है मेरा !

रही लय रूप छलकाती तुझे पा बज उठे कण-कण
चली सुधि रंग ढुलकाती, मुझे छू लासमय क्षण-क्षण !
तुझे पथ स्वर्ण रेखा, चित्रमय किरण तेरा मिलन, झंकार-
संचार है मेरा ! सा अभिसार है मेरा !

धरा से व्योम का अन्तर, न कलरव मूल्य तू लेता,
रहे हम स्पन्दनों से भर, हृदय साँसें लुटा देता,
निकट तृण नीड़ तेरा, धूलि का सजा तू लहर-सा खग,
आगार है मेरा ! दीप-सा श्रृंगार है मेरा !

चुने तूने विरल तिनके, गगन का तू अमर किन्नर,
गिने मैंने तरल मनके, धरा का अजर गायक उर,
तुझे व्यवसाय गति है, मुखर है शून्य तुझसे, लय-भरा
प्राण का व्यापार है मेरा ! यह क्षार है मेरा !

उड़ा तू छंद बरसाता, बिछी नभ में कथा झीनी,
चला मन स्वप्न बिखराता, घुली भू में व्यथा भीनी,
अमिट छवि की परिधि तेरी, तडित् उपहार तेरा, बादलों-
अचल रस-पार है मेरा ! सा प्यार है मेरा !

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