क्या भूलूँ क्या याद करूँ - हरिवंशराय बच्चन Kya Bhulun Kya Yaad karun - Hindi book by - Harivansh Rai Bachchan
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क्या भूलूँ क्या याद करूँ

हरिवंशराय बच्चन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
आईएसबीएन : 81-7028-134-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :254 पुस्तक क्रमांक : 664

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प्रख्यात हिन्दी कवि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का पहला खंड, ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’। इस आत्मकथा के माध्यम से कवि ने गद्य-लेखक में भी नये मानदंड स्थापित किये।

kya bhulun kya yaad karun.

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

प्रख्यात हिन्दी कवि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का पहला खंड, ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, जब 1969 में प्रकाशित हुआ तब हिन्दी साहित्य में मानो हलचल-सी मच गई। यह हलचल 1635 में प्रकाशित मधुशाला से किसी भी प्रकार कम नहीं थी। समकालीन अनेक लेखकों ने इसे हिन्दी के इतिहास की ऐसी पहली घटना बताया जब अपने बारे में इतनी बेबाकी से सब कुछ कह देने के विकास और समूचे काल तथा क्षेत्र को भी उन्होंने अत्यन्त जीवन्त रूप में उभरकर प्रस्तुत किया।

इसके बाद आत्मकथा के आगामी खंडों की बेताबी से प्रतीक्षा की जाने लगी और उन सभी का जोरदार स्वागत होता रहा सभी के अनेक संस्मरण हुए और हो रहे हैं। प्रथम खंड ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ के बाद ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ और ‘दशद्वार से सोपान तक’ लगभग पंद्रह वर्षों में उसके चार खंड प्रकाशित हुए। इस आत्मकथा के माध्यम से कवि ने गद्य-लेखक में भी नये मानदंड स्थापित किये।

बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
प्रख्यात लोकप्रिय कवि हरिवंशराय बच्चन की बहुप्रशंसित आत्मकथा हिन्दी साहित्य की एक कालजयी कृति है। यह चार खण्डों में है : ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ‘, ‘नीड़ का निर्माण फिर‘, ‘बसेरे से दूर’ औरा’ ‘‘गशद्वार’’ से ‘‘सोपान’’ तक’। यह एक सशक्त महागाथा है, जो उनके जीवन और कविता की अन्तर्धारा का वृत्तान्त ही नहीं कहती बल्कि छायावादी युग के बाद के साहित्यिक परिदृश्य का विवेचन भी प्रस्तुत करती है। निस्सन्देह, यह आत्मकथा हिन्दी साहित्य के सफ़र का मील-पत्थर है। बच्चनजी को इसके लिए भारतीय साहित्य के सर्वोच्य पुरस्कार-‘सरस्वती सम्मान’ से सम्मानित भी किया जा चुका है।
डॉ. धर्मवीर भारती ने इसे हिन्दी के हज़ार वर्षों के इतिहास में ऐसी पहली घटना बताया जब अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह दिया गया है।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इसमें केवल बच्चनजी का परिवार और व्यक्तित्व ही नहीं उभरा है, बल्कि उनके साथ समूचे काल और क्षेत्र भी अधिक गहरे रंगों में उभारा है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’: हिन्दी प्रकाशनों में इस आत्मकथा का अत्यंत ऊचा स्थान है।
डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की राय में ऐसी अभिव्यक्तियाँ नई पीढ़ी के लिए पाथेय बन सकेंगी, इसी में उनकी सार्थकता भी है।

नारेन्द्र शर्मा : यह हिन्दी के आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है।
चार खंडों में प्रकाशित कवि बच्चन की आत्मकथा हिन्दी साहित्य की कालजयी रचनाओं में गिनी जाती है। प्रस्तुत प्रथम खंड प्रकाशित होते ही अपनी स्पष्टवादिता के कारण चर्चा का विषय बन जाता था। इसके गद्य-लेखक में नये मानक स्थापित किये।
‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ सहित आत्मकथा के चारों खंडों को तीन लाख रुपये के ‘सरस्वती सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है।

 

पहले संस्कण की भूमिका

 

 

लेखन द्वारा अपने को अभिव्यक्त करते हुए मुझे चालीस वर्षो से ऊपर हो चुके हैं। इतने दिनों में मैं  अपने हृदय पर हाथ रखकर कह सकता हूँ-और कलाकार के लिए इससे बड़ी सौगंध नहीं-कि मैंने कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो मेरे अन्तर से नहीं उठा, जो उसमें नहीं उमड़ा-घुमड़ा-अनुवादों के मामले में भी।

यह जो आत्म-चित्रण आज मैं आपके हाथों में रख रहा हूँ, इसी प्रकार मानस-मन्थन का परिणाम है।
जीवन की जिस पीढ़ी पर मैं हूँ, उसपर अतीत का स्मरण शायद स्वाभाविक होता है- मेरे पास औरों का मन जानने के लिए भी केवल अपने मन का पैमाना है।

 मुझे कई वर्षों से लग रहा था कि जब तक मैं अपने अंतर में निरन्तर उठती-स्मृतियों को चित्रित न कर डालूँगा तब तक मेरा मन शान्त नहीं होगा।

मेरी जिन अभिव्यक्तियों से आपके मन को भी यत्किंचित् शान्ति-‘शान्ति शब्द मैं इतने व्यापक अर्थ में प्रयोग कर रहा हूँ कि उसमें अशान्ति भी शामिल हो सके— मिलती रही है, मैं उन्हें अपने मन को ही शान्ति देने के लिए प्रस्तुत करता रहा हूँ।
इसी विश्वास के बल पर मैं यह आत्म-चित्रण प्रकाश में ला रहा हूँ।
मेरा जीवन एक साधारण मनुष्य का जीवन है।
और इसे मैंने अपना सबसे बड़ा सौभाग्य, और अपनी सबसे बड़ी प्रसन्नता का कारण माना है। मुझे फिर से इच्छानुकूल जीवन जीने की क्षमता दे दी जाए तो मैं अपना जीवन जीने के अतिरिक्त और किसी का जीवन जीने की कामना न करूँगा—उसकी सब त्रुटियों, कमियों, भूलों, पाछतावों के साथ।
सबसे बड़ा कारण, कि इसी के बल पर तो मैं दुनिया के साधारण जनों के साथ अपनी एकता का अनुभव करता हूँ।
इतने बड़े संसार में अपने को अकेला अनुभव करने से बड़ा बन्धन नहीं। सायुज्य मुक्ति यही है—सबसे युक्त होकर मुक्त।
आपका भी यह विश्वास हो तो मुझ साधारण से युक्त  होना आपके सर्वसाधारण से युक्त होने का एक कदम हो सकता है।
युक्त होना दोनों पर निर्भर है—कितना आप हो सकते हैं, कितना मैं कर सकता हूँ। मेरी ईमानदारी आपके सम्मुख है। पता नहीं यह आपकी कितनी सहानुभूति पा सकेगी।

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ मेरी पूरी योजना का एक तिहाई भाग है। इतने ही बड़े दो और भाग यथासमय आपके सामने आएँगे-‘नीड़ का निर्माण फिर’ और ‘जीवन की आपाधापी में’ यदि समय और स्वास्थ्य ने साथ दिया।
मैं यह भी बताना चाहता था कि यह आत्म-चित्रण मैंने किस मनोवृत्ति से किया है, पर जिन शब्दों में उसे मैं बता सकता था उनसे कहीं अधिक समर्थ और सशक्त शब्दों में आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व फ्रांस का एक महान लेखक, मानतेन, अपना आत्म-चित्रण करते समय उसे व्यक्त कर चुका है। जब-जब मैंने इस आत्म-चित्रण के लिए लेखनी उठाई है तब-तब मैंने उसे स्वस्ति-वाचन की श्रद्धा से पढ़ लिया है; और आपसे यह प्रार्थना करना चाहूँगा कि जब-जब आप इस आत्म-चित्रण को पढ़ें, आप उसे भी पढ़ लें। आप उसे इस कृति के प्रथम पृष्ठ के पूर्व पाएँगे।
मैं जो कुछ लिखता हूँ उसपर अपने पाठकों की प्रतिक्रिया जानना चाहता हूँ, उससे लाभान्वित भी होता हूँ। यदि आप यथासुविधा अपनी प्रतिक्रिया मुझे देंगे तो आप मेरा उपकार करेंगे।
खेद है, जब पान्डुलिपि को प्रेस भेजने का समय आया है, मैं लम्बेगो में पड़ा हूँ। प्रेस के लिए इसे अन्तिम रूप देने का कार्य श्री सत्येन्द्र शरत् ने किया है। इस सहयोग के लिए मैं उन्हें जितना भी धन्यवाद दूँ कम है।


अगस्त, 1969


तीसरे संस्करण के अवसर पर

 


मुझे इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ के प्रकाशन के साल-भर बाद ही उसके तीसरे संस्करण की आवश्यकता आ पड़ी है। जिन कमियों की ओर मेरे कतिपय पाठकों ने संकेत किया था उनमें से अधिकांश का निराकरण कतिपय संशोधन और परिशिष्टों द्वारा करने का प्रयत्न इस संस्करण में किया जा रहा है। संशोधनों में सुझाव और सहायता के लिए में श्री सत्येन्द्र शरद् का आभारी हूँ।
मैंने पहले संस्करण में कहा था कि आत्म-चित्रण की मेरी योजना का दूसरा खंड, ‘नीड़ का निर्माण फिर’ इस संस्करण के साथ उपलब्ध हो जाएगा।

 

15 अगस्त 1970

 

चौथे संस्करण के अवसर पर

 

 

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ को प्रकाशित हुए अभी दो वर्ष भी नहीं हुए और इसका चौथा संस्करण निकलने जा रहा है।
मैं उन सब लोगों के प्रति आभारी हूँ जिन्होंने इसे पढ़कर अपने इष्ट-मित्रों एवं परिचितों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया, जिसके कारण इसकी माँग बराबर बनी हुई है-बढ़ रही है। इस संस्करण के एकाध प्रसंगों को, जिनके स्मृति-आधारित होने के कारण कुछ भ्रम फैलने की सम्भावना थी, अधिक तथ्य-संगत और स्पष्ट कर दिया गया है।
पुस्तक के सम्बन्ध में आप अपनी प्रतिक्रिया भेजकर मुझे बाधित करेंगे।

 

1 जून, 1971

 

सातवें संस्करण के अवसर पर

 

 

लेखक के लिए इससे अधिक प्रसन्नता और संतोष का विषय क्या हो सकता है कि उसकी कृति के संस्करण निकलते जाएँ।
इस अवसर पर उन सहयोगियों के प्रति अपना आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जिन्होंने किसी भी रूप में इस कृति को बोधप्रिय बनाने में सहयोग दिया है-प्रकाशक के प्रति भी जो उसे नई साज-सज्जा से प्रस्तुत कर रहे हैं।
अपने नए पाठकों की प्रतिक्रिया का भी मैं स्वागत करूंगा।

 

मार्च 1980

 

आठवें संस्करण की भूमिका

 

 

मुझे इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि मेरी आत्म-कथा को प्रथम खंड ‘क्या भूलू क्या याद करूँ’ का आठवाँ संस्करण निकलने जा रहा है। इसका श्रेय मैं उन पाठकों को देना चाहता हूँ, जिन्होंने इसे पढ़कर मित्रों एवम् सम्बन्धियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। मेरी हमेशा से यह धारणा रही है कि किसी भी पुस्तक के प्रचारक उसके सुरुचिपूर्ण पाठक ही होते हैं।
मैं आशा करता हूँ, यह क्रम बराबर चलता रहेगा और अच्छी कृति लोगों का मनोरंजन करती रहेगी।

 

जनवरी, 1982

 

-बच्चन

 

‘‘पाठकों, यह किताब इमानदारी के साथ लिखी गई है। मैं आपकों पहले से ही आगाह कर दूँ कि इसके लिखने में मेरा एकमात्र लक्ष्य घरेलू अथवा निजी रहा है। इसके द्वारा पर-सेवा आत्म-श्याला का कोई विचार मेरे मन में नहीं है ! ऐसा ध्येय मेरी क्षमता से परे है। इसे मैंने अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए तैयार किया है कि जब मैं न रहूँ (ऐसी घड़ी दूर नहीं है) तब वे इन पृष्ठों से मेरे गुण-स्वभाव के कुछ चिह्न संचित कर सकें और इस प्रकार जिस रूप में उन्होंने मुझे जीवन में जाना है उससे अधिक सच्चे और सजीव रूप में वे अपनी समृति में रख सकें। अगर मैं दुनिया के किसी पुरस्कार का तलबगार होता तो मैं अपने-आपको और अच्छी तरह सजाता-बजाता, और अधिक ध्यान से रँग-चुँगकर उसके सामने पेश करता है। मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे मेरे सरल, स्वाभाविक और साधारण स्वरूप में देख सकें-सहज निष्प्रयास प्रस्तुत, क्योंकि मुझे अपना ही तो चित्रण करना है। मैं अपने गुण-दोष जग-जीवन के सम्मुख रखने जा रहा हूँ, पर ऐसी स्वाभाविक शैली में जो लोक-शील मर्यादित हो। यदि मेरा जन्म उन जातियों में हुआ होता जो आज भी प्राकृतिक नियमों की मूलभूत स्वच्छन्दता का सुखद उपयोग करती हैं तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बड़े आनन्द से अपने-आपको आपाद-मस्तक एकदम नग्न उपस्थिति कर देता। इस प्रकार, पाठकों, मैं स्वयं अपनी पुस्तक का विषय हूँ; और मैं कोई वजह नहीं देखता कि आप अपनी फुरसत की घड़ियाँ ऐसे नगण्य और निरर्थक विषय पर सर्फ़ करें ! इसलिए मानतेन की विदा स्वीकार कीजिए-1 मार्च, 1580।’’

 

क्या भूलूँ क्या याद करूँ

 

In every little experience of ours is folded the whole of history

 

-Swami Rama Tirtha

 

(हमारे छोटे-से-छोटे अनुभव में मानवता का सारा इतिहास छिपा रहता है।
-स्वामी रामतीर्थ)
कहते है आज से लगभग पाँच-छह सौ बरस पहले की बात है, उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अमोढा़ नामक ग्राम में पान्डेय उपजाति का एक बड़ा ही तपोनिष्ठ और तेजस्वी ब्राह्मण रहता था। उसके एक कन्या थी जो अत्यन्त रूपवती थी, और जिसके सौन्दर्य की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उन्हीं दिनों अमोढ़ा से कुछ मील के फासले पर दुर्ग नामक एक स्थान था जिसका राजा उग्रसेन, जाति का डोम था। बस्ती ज़िले में अब भी एक स्थान डोमीनियम बुर्ज कहलाता है। हो सकता है, इस नाम में डोमिन दुर्ग का ही कोई यादगार अटकी रह गई हो। डोम राजा ने जब ब्राह्मण7 कन्या के अमिंद्य रूप-सौन्दर्य की चर्चा सुनी तब उसने ब्राह्मण के पास यह सन्देश भेजा कि वह अपनी बेटी का ब्याह उसके साथ कर दे। ब्राह्मण के सामने बड़ा भारी धर्म-संकट उपस्थिति हो गया। ‘आपात काल परखिए चारीः धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।’ उसने परिणाम की कुछ भी परवाह किए बिना डोम राजा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस पर डोम राजा ने दल-बल के साथ अमोढा़ पर चढ़ाई कर दी और ब्राह्मण के पूरे परिवार को पकड़कर बन्दीग्रह में डाल दिया।

बन्दीगृह में ब्राह्मण कन्या को एक तरकीब सूझी। उसने राजा से कहला भेजा कि मैं अपने माता-पिता को कष्ट-मुक्त देखने के लिए तुम्हारे साथ विवाह करने को तैयार हूँ, मगर विवाह के पूर्व मैं अयोध्या की तीर्थ यात्रा करना चाहूँगी; मेरे माता-पिता को मेरे लौटने तक बन्धक के रूप में बन्दी रखा जा सकता है। डोम राजा इस पर सहमत हो गया और कन्या तीर्थ यात्रा के लिए छोड़ दी गई।
उन दिनों अयोध्या अवध प्रान्त की राजधानी थी, जिसके सूबेदार रायभगतसिंह थे। जगतसिंह श्रीवास्तव कायस्थ थे। बड़े ही धर्मात्मा, नीति कुशल, न्याय-परायण और पराक्रमी। अयोध्या पहुँचकर ब्राह्मण-कन्या राय साहब के समक्ष उपस्थिति हुई, और उसने उन्हें अपनी और अपनें परिवार की विपदा सुनाई। अपने पूर्वजों के मूल स्थान की देवी स्वरूपा उस कुमारी कन्या का परित्राण करने की राय साहब की प्रतिज्ञा की-बस्ती का पुराना नाम, कहते हैं, श्रावस्ती था जिसे पुराणों के अनुसार राजा श्राव ने बसाया था, और मूलतः वहीं से आने के कारण वहाँ के कायस्थ श्रीवास्तव्य कहलाए। राय साहब ने एक बड़ी सेना सजाकर डेमिन दुर्ग पर चढ़ाई कर दी, डोम राजा के पूरे परिवार का सफाया कर दिया, और ब्राह्मण को कारागार से मुक्त करके उसकी तपः पूत कन्या उसे सौप दी।

राय साहब के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए निर्धन और असहाय ब्राह्मण के पास कुछ भी नहीं था। उसने अचानक अपने यज्ञोपवीत की ओर देखा और उसे उतार कर राय साबह के कन्धे पर डाल दिया, बोला, ‘‘इसके द्वारा मैं अपना ‘पान्डेय’ आस्पद आपको प्रदान करता हूँ और आपको ब्राह्मण बनाकर अपनी-कन्या आपको समर्पित करता हूँ।’’ ब्राह्मण ने उसी अवसर पर राय साहब से यह वचन ले लिया कि उनके वंश में कोई मदिरा-पान नहीं करेगा और यदि करेंगा तो कोढ़ी हो जाएगा। जगतसिंह के वंशज ‘अमोढ़ा के पान्डे’ के नाम से प्रसिद्ध हुए और दो-तीन शताब्दियों तक अमोढ़ा के ही निवासी रहे। अमोढ़ा किसी समय छोटा-मोटा ग्राम न होकर पूरा जनपद था जिसमें सैकड़ों ग्राम थे।

किसी कारण, किसी समय-शायद आज से दो-ढाई सौ साल पहले-अमोढ़ा के पान्डें लोगों में बहुत-से परिवार अपना मूल स्थान छोड़कर अवध के विभिन्न नगरों-गाँवों में जा बसे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि उनका परिवार भी मूलतः अमोढ़ा का था, और जीविका की तलाश में जीरादेई-बिहार जा पहुँचा था-एक बार बातचीत के सिलसिले में उन्होंने मुझसे कहा था कि वे अपने पूर्वजों की अमोढ़ा की यात्रा भी कर आये थे। शायद अन्य परिवार भी इसी कारण निकले हों, पर सहसा अमोढ़ा से जीविका के साधन विलुप्त कैसे हो गए, इसका किसी को पता नहीं। हो सकता है कोई भारी अकाल पड़ा हो, क्योंकि अकाल के समय जनता प्रायः एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान को चल पड़ती है। सम्भव है किसी राजा या सामन्त ने अमोढ़ा पर आक्रमण किया हो। निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता।

बस्ती, हरदोई, लखनऊ, गोंडा, बहराइच, सीतापुर सुल्तानपुर, फ़ैज़ाबाद, परतापगढ़ और इलाहाबाद में श्रीवास्तव कायस्थों के बहुत-से परिवार ऐसे है जो अपने को ‘अमोढ़ा के पान्डे’ कहते हैं, या अपना अल्ल ‘पान्डे अमोढा़’ बतलाते हैं। ‘अल्ल’ शब्द की व्युत्पत्ति मुझे नहीं मालूम; सम्भवतः देशज शब्द है; अर्थ है इसका कुल या वंश। अमोढ़ा के पान्डे लोगों की विशेषता दो बातों में है-पहली यह कि विवाह के समय ब्राह्मण लोग उनका यज्ञोपवीत संस्कार करते हैं-जबकि शूद्र समझने के कारण, कायस्थों की अन्य साखाओं का उपनयन संस्कार वे नहीं करते, या कुछ समय पहले तक नहीं करते थे, अब तो दक्षिणालोभ में, उदारता के कारण नहीं, उन्होंने अपने बहुत-से समय-रूढ़ सिद्धान्तों के साथ समझौता कर लिया है; दूसरी वे मदिरा नहीं छूते- उनके यहाँ यह किंवदन्ती है कि उनके वंश का जो कोई मदिरा पिएगा वह कोढ़ी हो जाएगा, जबकि अन्य कायस्थ-शाखाएँ अनियंत्रित मदिरापान के लिए मशहूर हैं, या थीं-‘कायस्थ होय प्रधान अहोनिसि रहै पियन्तौ’ (पृथ्वीराज रासो); कभी सोचता हूँ, स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधान के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का पदस्थ होना चन्द बरदाई की उक्ति पर कितना बड़ा व्यंग्य होगा।

विवाह के समय यज्ञोपवीत धारण करने की प्रथा में निश्चय ही उस घटना की समृति जताई जाती है जो जगतसिंह के साथ घटी थी, और जिसके द्वारा उन्हें ‘पान्डेय’ का आस्पद और ब्राह्मण-कन्या पत्नी के रूप में प्राप्त हुई थी। किन्ही पुराणों के अनुसार मैंने ऐसा सुना है, कायस्थों के आदि पुरुष, यमराज के मंत्री और लेखाकार, धर्मराज चित्रगुप्त का विवाह भी ब्रह्मा की कन्या के साथ हुआ था जिससे उन्हें बारह पुत्र-रत्न प्राप्त हुए-श्रीवास्तव्य, माथुर, निगम, सक्सेना आदि, जो कायस्थों की बारह उपजातियों के मूल पुरुष हुए।

हिन्दुओ की काव्य-प्रियदा ने, अथवा प्रतीकों द्वारा तथ्यों को व्यक्त करने की उनकी प्रवृत्ति ने जहाँ इतिहासों पर दन्तकथाओं का मुलम्मा चढ़ाया, वहाँ दन्त-कथाओं को इतिहास समझने की भूल भी को प्रश्रय दिया। किन ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखकर और किन उद्देश्यों से हिन्दू-मनीषा के चित्रगुप्त की यह कथा गढ़ी होगी, इसे बता सकना कठिन है। मेरी यह कल्पना है; किसी भी व्यापक विकसित और संगठित व्यवस्था में बहुत-से तथ्यों का हिसाब-किताब रखने की आवश्यकता पड़ती है; किसी समय यह कार्य कायस्थ लोग करते होंगे; उनकी अपनी लिपि भी होगी, शायद एक लिपी कैथी ने नाम से प्रसिद्ध भी है सम्भवतः उनका वहीं स्थान होगा जो आज की राज्य व्यवस्था में क्लर्क है-अभिनव शब्दावली में ‘लिपिक’ कहा गया है। इस प्रत्याशा में कि वह तथ्यों के अंकन में पूरी ईमानदारी बरते, किसी प्रकार की गड़बड़ी न करे, उसका सम्बन्ध धर्मराज से जोड़ा गया होगा जो प्रत्येक मनुष्य के पाप-पुण्य का ठीक-ठाक लेखा-जोखा रखते हैं। सब वर्णों के प्रति निष्पक्ष और सबके प्रति निरपेक्ष, एकमात्र व्यवस्था के प्रति निष्ठावान रखने के लिए उसे किसी वर्ण में स्थान न दिया गया होगा-वह ब्राह्मण नहीं है, वह क्षत्रिय नहीं है, वह वैश्य नहीं है, वह शूद्र भी नहीं है-गो ब्राह्मण उसे शूद्रवत् मानते रहे हैं। वह ब्राह्मण के समान ब्रह्मा के मुख से नहीं निकला, वह क्षत्रिय के समान बाहु से, न वैश्य के समान उदर से और न शूद्र के समान चरण से; वह कायस्थ था, पूरी काया में था; और पूरी काया से काया के रूप में निकलने का तो एक ही स्वाभाविक-सप्राण स्थान था। हिन्दू-मनीषा, प्रायः अपने खुले स्वभाव के लिए विख्यात, उसे कहने में क्यों संकोच कर गई ?-मैं नहीं समझ पाता।

किसी भी शासन के दो प्रमुख अंग होते हैं- सुरक्षा और विधि व्यवस्था। यदि कायस्थों ने हिन्दू शासन की विधि-व्यवस्था सँभाली होगी-सुरक्षा क्षत्रिय सँभालते होंगे-तो उन्होंने मुश्लिम शासन में भी यह कार्य किया होगा, क्योंकि बदले हुए शासन में भी विधि व्यवस्था तो रखनी ही पड़ती है, उसका रूप थोड़ा-बहुत भले ही परिवर्तित हो जाए; और इसके लिए कार्य से पूर्व-परिचित और पूर्व-अभ्यस्त हाथों की ज़रूरत होती है शासन के निकट रहने के कारण, और निकट रहने के लिए भी, कायस्थों ने अपने को बहुत बदला होगा-शिक्षा-दीक्षा में, रस्म-रिवाज में, और रहन-सहन के तौर-तरीकों में। मैंने अपने लड़कपन में कई अवसरों पर लोगों को ऐसा कहते सुना था कि कायस्थ आधा मुसलमान होता है। हिंदुओं में ‘मुसलमान’ शब्द, सर्वविदित ऐतिहासिक कारणों से, आदर अथवा प्रशंसा का वाचक नहीं बन सका। ब्राह्मणों ने मुसलामानों को म्लेच्छ कहना शुरू कर दिया था। कायस्थों को शूद्र समझते ही थे, शूद्र को म्लेच्छ से सहयोग करते देखकर उन्होंने उसे अर्द्ध-म्लेच्छ की संज्ञा दी हो तो कुछ अजब नहीं है। अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ी शिक्षा के मुक्त प्रचार, से, और विधि व्यवस्था का भार उन्हीं पर सीमित न रहकर विविध वर्गों में विभक्त हो जाने से, वे ‘अर्ध-कृष्टान’ बनने से बच गए।          



 

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