नीड़ का निर्माण फिर - हरिवंशराय बच्चन Neer Ka Nirman Phir - Hindi book by - Harivansh Rai Bachchan
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नीड़ का निर्माण फिर

हरिवंशराय बच्चन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2009
आईएसबीएन : 81-7028-116-4 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :272 पुस्तक क्रमांक : 663

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प्रख्यात लोकप्रिय कवि हरिवंशराय बच्चन की बहुप्रशंसित आत्मकथा का दूसरा खंड ‘नीड़ का निर्माण फिर’।

neer ka nirman Harivansh Ray Bachchan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रख्यात लोकप्रिय कवि हरिवंशराय बच्चन की बहुप्रशंसित आत्मकथा हिन्दी साहित्य की एक कालजयी कृति है। यह चार खण्डों में है : ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ और ‘दशद्वार’ से ‘सोपान’ तक। यह एक सशक्त महागाथा है, जो उनके जीवन और कविता की अन्तर्धारा का वृत्तान्त ही नहीं कहती बल्कि छायावादी युग के बाद के साहित्यिक परिदृश्य का विवेचन भी प्रस्तुत करती है। निस्सन्देह यह आत्मकथा हिन्दी साहित्य के सफ़र का मील-पत्थर है। बच्चनजी को इसके लिए भारतीय साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार -‘सरस्वती सम्मान’ से सम्मानित भी किया जा चुका है।

अपने पाठकों से
पहले संस्करण की भूमिका


आज आपके हाथों में अपने आत्म-चित्रण का दूसरा खंड ‘नीड़ का निर्माण फिर’ रखते हुए कुछ सन्तोष का अनुभव कर रहा हूँ।
एक वादा किया था आपसे; पूरा कर सका हूँ; संतोष का अवसर है ही मेरे लिए, जब मेरी अवस्था और तन्दुरुस्ती ऐसी है कि किसी वक़्त वे मुझे दग़ा दे सकती हैं।

यह आत्म-चित्रण मैं क्यों कर रहा हूँ, इस सम्बन्ध में मैं क्या याद करूँ, की भूमिका में बता चुका हूँ। मैं मानकर चलता हूँ कि इस पुस्तक को हाथ में लेने के पूर्व आपने ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ पढ़ लिया होगा। उसको पढ़े बग़ैर यदि इसे आप पढ रहे हैं, या पढ़ना चाहते हैं-ऐसा आप किसी विविशता से, अथवा संयोगवश भी कर सकते हैं,- तो मैं आपको रोक भी कैसे सकता हूँ। ज़रूरी नहीं कि ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ पहले से न पढ़ रखने के कारण ‘नीड़ का निर्माण फिर’ आपको बिल्कुल असम्बद्ध, संदर्भ-रहित अथवा पहेलीवत् लगे। जीवन एक बहती हुई नदी है। प्रयाग में गंगा-स्नान का आनन्द लेने के लिए यह आवश्यक नहीं कि पहले गंगोत्री या हरिद्वार में डुबकी लगा ली जाए। कहीं-कहीं आपको पूर्वापर सम्बन्ध का अभाव खटक सकता है; पर इस कमी को आप अपनी थोड़ी-सी कल्पना से पूरा कर सकते हैं। मैं प्रत्येक खंड को अपने-आप में पूर्ण समझता हूँ। अलबत्ता मैं जो पहले खंड की भूमिका में कह आया हूँ उसे यहाँ न दुहराना चाहूँगा। पहला खंड 1936 तक की घटनाओं-रचनाओं पर समाप्त हुआ था- रचनाएँ  भी मेरी जीवन-कहानी की अविभाज्य अंग हैं; शायद उन्हीं के कारण तो आप मेरे जीवन की कहानी में रुचि लेते हैं, वरना मेरे जैसे आदमी के जीवन में ऐसा असाधारण हो भी क्या सकता है कि आप उसकी ओर आकर्षित हों।

इस खंड को मैं 1954 तक लाना चाहता था। पर जैसी स्वाभाविकता के साथ मैं लिखना चाहता हूँ, लिख भी रहा हूँ, उसमें सब कुछ पूर्व आयोजित रूप से पूर्ण कर देना असम्भव है- सम्भव कर भी दिया जाए तो कृतिमता आ जाने का भारी ख़तरा है। 1951 तक की घटनाएँ-रचनाएँ ही उस आकार तक फैल गईं जिस तक, पृष्ठ संख्या की दृष्टि से खंड को सीमित रखना था।

अप्रैल 1952 से जुलाई 1954 तक का समय मेरे जीवन में विशेष महत्त्व का है। इसमें मैंने अपने देश-घर-परिवार से दूर, सर्वथा एकाकी-आत्मनिर्भर, बिलकुल अपरिचितों-अजनबियों के बीच, इंग्लैंड और आयरलैंड में प्रवास किया, आइरिश महाकवि विलियम बटलर ईट्स पर शोध करके केम्ब्रिज यूनिवर्स्टी से डाक्टरेट की उपाधि ली, सौ से ऊपर कविताएँ लिखीं- जिनके लिए प्रेरणाएँ लाया उनकी गिनती यहाँ नहीं थी-और बहुत कुछ नया देखा, सुना, सोचा, अनुभव किया। इस सबको आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूँ तो इसे एक खंड अलग देना पड़ेगा। वह खंड सम्भव हुआ तो अगले वर्ष आपके हाथों में रखूँगा। नाम उसका सोचा है रखने को-‘हंस का पश्चिमी प्रवास’।

‘जीवन की आपाधापी में’ उसके बाद का और अन्तिम खंड होगा, यदि समय ने मुझसे लिखा लिया।
मेरे बहुत से मित्रों ने ‘क्या भूलँ क्या याद करूँ’ की प्रशंसा अतिशयोक्तियों में की है। उनके प्रति आभार प्रकट करता हूँ। साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि जो कलाकार मित्रों की प्रशंसा का विश्वास करता है वह विनाश के पथ पर है। इसलिए बाबा तुलसीदास ने उत्तम कृति का मापदण्ड यह रखा है कि ‘सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान’। पर यह तो उस ज़माने में लिखा गया था जब लोग दुश्मन और दुश्मन के सृजन में अन्तर कर सकते थे। दृष्टि-संकीर्णता के इस युग में उनके अविरोध अथवा मौन को उसका ‘बखान’ मान लेना होगा। शायद कुछ ग़लती कर रहा हूँ। विरोध का स्वर अभी मैंने नहीं सुना तो क्या; मौन अवज्ञा का भी हो सकता है।

उपेक्षा से बढकर अपमान भी कोई होता है ? ख़ैर।
अपमान-बखान से निःस्पृह रह जिस मनोवृत्ति से यह आत्म-चित्रण किया जा रहा है उसकी याद मैं मानतेन के शब्दों में अपने पाठकों को एक बार फिर दिलाना चाहूँगा। उन्हें आप इस कृति के प्रथम पृष्ठ के पूर्व पाएँगे।
मैं जो कुछ लिखना चाहता हूँ उस पर पाठकों की प्रतिक्रिया जानना चाहता हूँ; उचित समझें तो यथासुविधा, यथामसय ‘नीड़ का निर्माण फिर’ पर अपनी प्रतिक्रिया दें; आभारी हूँगा।
श्री अजीत कुमार ने पूरी टंकित पांडुलिपि पढ़कर उसे संशोधित करने का कष्ट किया। डॉ. जीवन प्रकाश जोशी ने संशोधित पांडुलिपी की अतिरिक्त प्रति तैयार की। इन दोनों के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहूँगा।
मैं विशेष अभारी हूँ श्री सत्येन्द्र शरत् का जिन्होंने प्रारम्भ से ही इस आत्म-चित्रण में रुचि ली और इसे अन्तिम रूप देने में, हर दर्जें पर, मुझे सहयोग-सहायता दी , प्रूफ़ देखने में भी।

नवम्बर, 1970
13 विलिंगडन क्रिसेंट, नई दिल्ली-11

-बच्चन

दूसरे संस्करण के अवसर पर


‘नीड़ का निर्माण फिर’ प्रकाशित हुए अभी केवल तीन महीने बीते हैं और मेरे प्रकाशक मुझसे नए संस्करण के लिए प्रेस-कापी माँग रहे हैं।
मैं अपने पाठकों के प्रति आभारी हूँ जिन्होंने इसे पढ़कर अपने इष्ट-मित्रों को पढने-ख़रीदने के लिए प्रेरित किया है और इसकी माँग बढ़ाई है। मेरी हमेशा से यह राय रही है और इधर उसकी विशेष पुष्टि हुई है कि किसी पुस्तक के प्रचार में समालोचना अथवा विज्ञापन से अधिक उसके पाठक सहायक होते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि मेरी कृति मेरे पाठकों को रुचिकर प्रतीत हुई।

मेरे जिन मित्रों और पाठकों ने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है उसके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ। बहुतों के लिए आत्मकथा के पहले भाग, ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, इस भाग की तुलना करना स्वाभाविक था। किन्हीं को दूसरा भाग पहले से ज्यादा अच्छा, किन्हीं को पहले ही जैसा और किन्हीं को पहले से कम अच्छा लगा है। मैं एक पुरानी कहावत दुहराऊँ ?-पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं। सन्तुलित निर्णय उँगलियों पर नहीं पंजे पर होता है। अभी दो भाग और आने को हैं। प्रसंगवश एक बात बता दूँ कि तीसरे भाग का नाम अब मैं ‘हंस का पश्चिम प्रवास’ न रखकर ‘बसेरे से दूर’ रख रहा हूँ।

मैं अपने पाठकों को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं प्रत्येक की सम्मति का समादर करता हूँ और उन्हें आमन्त्रित करता हूँ कि वे अपनी प्रतिक्रिया मुझे निःसंकोच लिखें उससे निश्चय मैं लाभान्वित हूँगा।

मई, 1971
13, विलिंगडन क्रिसेंट, नई दिल्ली-11

-बच्चन

तीसरे संस्करण के अवसर पर


मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि ‘नीड़ का निर्माण फिर’ का तीसरा संस्करण प्रकाशित होने जा रहा है। मैं अपने सभी इष्ट मित्रों, पाठकों, आलोचकों के प्रति आभारी हूँ जिन्होंने इस कृति को बहुचर्चित कर लोगों में इसके प्रति रुचि जगाई है।
प्रूफ़ की गलतियों को संशोधित करने के अतिरिक्त इसके मूल पाठ में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। एक परिशिष्ट अवश्य जोड़ा गया है ।
नए पाठकों की प्रतिक्रिया का स्वागत है।
26.5.73
20, प्रेसीडेन्सी सोसाइटी
नार्थ-साउथ रोड-7
जुहू पारले स्कीम, बम्बई-56

बच्चन

चौथे संस्करण के अवसर पर


‘नीड़ का निर्माण फिर’ का चौथा संस्करण प्रकाशित होने जा रहा है। इसमें मूल पाठ में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।
तीन परिशिष्ट अवश्य जोड़े गए हैं। जीवन से समद्ध कुछ कविताओं का हवाला देते हुए मैंने पुस्तक में केवल संग्रह का नाम और कविता संख्या का संकेत कर दिया था। बहुत से पाठकों ने शिकायत की थी कि पुस्तक पढ़ते समय संग्रह समीप न होने से उन्हें प्रसंगों को पूरी तरह से समझने में कठिनाई होती है। शिकायत वाजिब थी। इस संस्करण में संबद्ध कविताएँ परिशिष्ट में दे दी गई है।
आशा है, नए पाठक इस सुविधा का स्वागत करेंगे।
सितम्बर 1976
13, विलिंगडन क्रिसेंट, नई दिल्ली-11
‘प्रतीक्षा’
14, उत्तर-दक्षिण रास्ता नं. 10 बम्बई-56

-बच्चन

पाँचवे संस्करण के अवसर पर


यह संस्करण मात्र चौथे संस्करण का मुद्रण है। अब इसके बाद का आत्म-कथा का तीसरा खंड भी उपलब्ध है-‘बसेरे से दूर’; ‘नीड़ का निर्माण फिर’ के पहले और बाद के खंड को पढ़कर निश्चय ही वे इसके सम्बन्ध में अधिक सन्तुलित निर्णय ले सकेंगे।
पाठकों की प्रतिक्रिया का स्वागत है।
मई, 80
‘प्रतीक्षा’
14, उत्तर-दक्षिण रास्ता दसवाँ
जुहू, पारले स्कीम, बम्बई-56

-बच्चन

‘‘पाठकों यह किताब ईमानदारी के साथ लिखी गई है। मैं आपको पहले से ही आगाह कर दूँ कि इसके लिखने में मेरा एकमात्र लक्ष्य घरेलू अथवा निजी रहा है। इसके द्वारा पर-सेवा अथवा आत्मश्लाघा का कोई विचार मेरे मन में नहीं है ! ऐसा ध्येय मेरी क्षमता से परे है। इसे मैंने अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए तैयार किया है कि जब मैं न रहूं (और ऐसी घड़ी दूर नहीं है) तब वे इन पृष्ठों से मेरे गुण-स्वभाव के कुछ चिह्न संचित कर सकें और इस  प्रकार जिस रूप में उन्होंने मुझे जीवन में जाना है उससे अधिक सच्चे और सजीव रूप में वे अपनी स्मृति में रख सकें। अगर मैं दुनिया से किसी पुरस्कार का तलबगार होता तो मैं  अपने-आपको और अच्छी तरह सजाता-बजाता, और अधिक ध्यान से रंग-चुंगकर उसके सामने पेश करता, मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे मेरे सरल, स्वाभाविक और साधारण स्वरूप में देख सकें- सहज निष्प्रयास प्रस्तुत, क्योंकि मुझे अपना ही तो चित्रण करना है। मैं अपने गुण-दोष जग-जीवन के सम्मुख रखने जा रहा हूँ, पर ऐसी स्वाभाविक शैली में जो लोक-शील से मर्यादित हो। यदि मेरा जन्म उन जातियों में हुआ होता जो आज भी प्राकृतिक नियमों की मूलभूत स्वच्छंदता का सुखद उपभोग करती हैं तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बड़े आनन्द से अपने आपको अपाद-मस्तक एकदम नग्न उपस्थित कर देता। इस प्रकार, पाठकों, मैं स्वयं अपनी पुस्तक का विषय हूँ; और मैं कोई वजह नहीं देखता कि आप अपनी फ़ुरसत की घड़ियाँ ऐसे नगण्य और निरर्थक विषय पर सर्फ़ करें ! इसलिए मानतेन की विदा स्वीकार कीजिए -1मार्च, 1580 ।’’

नीड़ का निर्माण फिर


‘‘LORD ART THOU NOT DISPLEASED WITH THY SERVANT ? I HAVE DONE SO LITTIE, I COULD DO NO MORE…I HAVE STRUGGLED, I HAVE SUFFERED,
I HAVE ERRED, I HAVE CREATED,’’
-ROMAIN ROIIAND (JEAN CHRISTORTOPHE)
‘‘प्रभु, क्या तू अपने सेवक से असन्तुष्ट है ?
मैं कितना कम कर पाया हूँ,
ज़्यादा कर सकना मेरे बस के बाहर था...
मैं जीवन-संघर्ष में धँसा,
मैंने मुसीबतें झेली हैं,
मैंने भूलें की हैं,
मैंने सृजन किया है।’’
-रोमें रोलां (जां क्रिसतोफ़)
नवम्बर,1936

सोलह की रात को मैंने एक सपना देखा जो आज तीस वर्षों के बाद भी मेरी आँखों के आगे वैसा ही स्पष्ट है जैसे उसे मैंने कल रात ही देखा हो। मैंने देखा कि मेरा विवाह हो रहा है, मुझे बसन्ती रंग का जामा-जोड़ा पहनाया गया है, सिर पर मौर बाँधा गया है, चेहरे पर सेहरा लटक रहा है- बेले की कलियों की लड़ियों का। मेरी बारात में चलने को मेरे बहुत-से नाते-रिश्तेदार आए हैं, पड़ोसी, मित्र-जीवित-मृत; और उनमें कोई भेद नहीं है। मैं अपने सेहरे की आड़ में भी उनमें से बहुतों को पहचान रहा हूँ- मेरे छोटे भाई शालीग्राम हैं; मेरे चचेरे भाई शिवप्रशाद, ठाकुर प्रसाद हैं; मोहन-गंशी चाचा हैं; मेरे मामा जी हैं; फफूँद वाले फूफा जी हैं; विश्राम तिवारी हैं; ‘शातिर’ साहब हैं, श्री मोहन हैं, ‘मुक्त’ हैं, महेश है राजनाथ हैं, श्रीकृष्ण हैं, कर्कल भी हैं,  उनके पिता मंगल पंडित भी। सबों ने गले में फूल मालाएँ पहन रखी हैं। इत्र और गुलाब की सुगन्ध से सारा वातावरण गमक रहा है। बाजे बज रहे हैं। एक ओर बहुत-सी स्त्रियाँ बैठी गा रही हैं। उनमें मेरी माँ और चम्पा हैं-सटी बैठीं, बिना छूत-छात का खयाल किए; चाचियाँ हैं; ताइयाँ हैं; राधा, महारानी, बुद्धी हैं; कमला खिल्लो, पगली नब्बन हैं; रानी हैं, चम्पा है- अपने दोनों रूपों में, गौने पर जैसी आई, बदरीनाथ की तीर्थयात्रा से जैसी लौटी; सुन्दर बुआ हैं। फिर मैंने देखा कि मेरी भाँवर पड़ रही है, मंगल पंडित मन्त्र पढ़ रहे हैं और मैं एड़ी से चोटी तक लाल कपड़ों में लज्जा-लिपटी एक नव-वधू के साथ अग्नि-कुंड के चारों ओर फेरे ले रहा हूँ। फिर देखता हूँ कि अग्नि-कुंड की एक लपट ने नव-वधू का आँचल पकड़ लिया है; वह सिर से पाँव  तक लपटों से घिर गई है; फिर भी वह अग्नि-कुंड की परिक्रमा किए जाती है और मैं उसके पीछे-पीछे चला जा रहा हूँ। न मैं, न और कोई उसे बुझाने की प्रयत्न करता है, न कोई घबराता है; जैसे यह सब स्वाभाविक-सा हो रहा है। मैं ही आँच की झाँस न बर्दाश्त कर सकने के कारण खड़ा हो गया हूँ; और तब क्या देखता हूँ कि उस चलती-फिरती ज्वाल-माला से एक हाथ निकलता है। और मेरा हाथ पकड़ लेता, मुझे अपने पीछे खींचने के लिए......और इतने में मेरी आँख खुल जाती है !

श्यामा ने अपने बिस्तर के हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ लिया था-हमारी खाटें मिली-मिली रहती ही थीं-और उसके दुर्बल-शीतल स्पर्श से मैं जाग गया था। मुझे जगाने का उसका यही तरीका था। सुबह हो गई थी।
शोर-गुल, गीत-नार, भीड़-भाड़ और गाजे-बाजे के संसार से सहसा मैं शान्ति की एक छोटी-सी दुनिया में आ गया था जहाँ बस एक लाचार बीमार और तीमारदार की दो चारपाइयाँ पड़ी थीं और एक खूँटी से टंकी हरीकेन लालटेन की मन्द-मन्द जलती लौ प्राभात के बढ़ते प्रकाश में पल-पल निष्प्रभ हो रही थी। सपना कुछ देर मेरी खुली आँखों के सामने भी नाचकर अपना अर्थ माँगने लगा था। क्या मतलब हो सकता है इसका ?

ऐसे रोमांचक, विचित्र और भयंकर सपने मैं लड़कपन से देखता था; अब भी कभी-कभी देखता हूँ। सपनों में देखे बहुत-से बिम्बों, रूपों और प्रतीकों का मैंने अपनी कविता में उपोयोग भी किया है। सपनों का अर्थ समझने का अतीत में, पूर्व में, और आधुनिक समय में पश्चिम में कुछ प्रयत्न हुआ है। कुछ साहित्य भी उसपर उपलब्ध हैं जिसे मैंने कभी देखा था। सपनों से कोई निश्चित परिणाम निकालने में मैं सफल नहीं हुआ- शायद ही कोई होता हो। अब मैं ऐसा समझता हूँ कि लड़कपन में कुछ ऐसा साहित्य पढ़ने और कुछ ऐसे अनुभवों से गुजरने के कारण, जिनको मेरा अपरिपक्व चेतन मष्तिष्क सहज ग्रहण नहीं कर पाता होगा, मेरा अवचेतन मस्तिष्क सुप्तावस्था में उद्बुद्ध और उद्विग्न हो उठता होगा, और अपनी रीति से उनसे जूझाता और निपटता होगा। तब तो निद्रा भंग होने पर कभी-कभी तो दुःस्वप्नों के कारण ही देर तक मेरा दिल घबराया करता था। और मेरी माँ ने उससे त्राण पाने के लिए एक उपाय बताया था-ऐसे सपने आने पर यह दोहा पढ़ लिया करो-

सपने होइ भिखारि नृप, रंक नाकपति होय;
जागे हानि न लाभ कछु, तिमि प्रपंच जिय जोय।

अब तो संदर्भ-सहित मैं इस दोहे का अर्थ समझता हूँ। इसमें दुःस्वप्नों से उत्पन्न मनःस्थिति को शान्त करने के लिए कुछ नहीं है, पर संस्कार के साथ तर्कों की नहीं चलती। अब भी दुःस्वप्न देखने में यह दोहा मेरी ज़बान पर आ जाता है उस दिन भी आ गया था, पर उस दिन मन शान्त नहीं हुआ था। सपना-अपना अर्थ बूझ पाने की हालत में किसी अनर्थ की अशंका मन में बैठने लगी थी।

 प्रायः देखा जाता है कि जिन समस्याओं पर ज्ञान-विज्ञान असमंजस में पड़े रहते हैं उनका लोक-बुद्धि कोई कल्पित समाधान खोज लेती है। सपनों के विषय में उनका समाधन यह है कि सपने आने वाली घटनाओं की उलटवांसी आगाहियाँ हैं-मृत्यु की सूचना विवाह से दी जाती है, घर आने वाली डोली की सूचना घर से जानेवाली अर्थी से। धीरे-धीरे मुझपर लोक बुद्धि हावी होने लगी थी, गो कहीं मेरा अन्तर्मन उसका विरोध भी कर रहा था।

पिछले कुछ दिनों से श्यामा के स्वास्थ्य में सुधार दिखाई पड़ने लगा था। आज तो उसके चेहरे पर ताज़गी की एक लालिमा भी थी। कभी मैं सोचता, यह महज़ धोखा है। बुझने से पहले चिराग की लौ में एक अद्भुत् ज्योति प्रस्फुटित होती है। रात का अन्धकार टूट रड़ने के पूर्व संध्या एक बार खुलकर चमक उठती है। सपना यही सूचित करने को आया है। कभी सोचता, अन्धविश्वासों में क्या रखा है; ‘मुक्त’ की और मेरी सेवा, डॉक्टरों का इलाज, बाबू रामकिशोर का धन-व्यय, मेरे पिता और भाई की दौड़-धूप, मेरी माँ की प्रार्थनाएँ, मेरे मित्रों की सद्भावनाएँ व्यर्थ नहीं गईं; श्यामा की जिजीविषा अन्त में विजयिनी हुई है। और श्यामा के मुख पर छाई नई लाली मेरे उस अनुमान को हल्की-सी थपकी लगा जाती।

दिन-भर मैं इसी भ्रम को बनाए रहा, इसी आशा के प्रकाश में एक उज्ज्वल भविष्य की कल्पनाएँ संजोए रहा। शायद इसी कारण मौत की जो छाया 17 नवम्बर की शाम को श्यामा पर झपटी वह मुझे अधिक कालिमामयी और भंयकर प्रतीत हुई। वह संध्या साधारण दिन की संध्या नहीं थी। वह श्यामा के जीवन- दिवस की संध्या थी जो मृत्यु की अखंड रात में बदल जाने वाली थी। श्यामा अपने नाम के अनुरूप रूप में या अरूप में विलीन होने लगी थी। शाम को श्यामा को अचानक बेहोशी का एक दौरा आया, उसके दाँत बैठ गए, आँखें डूब गईं, और तब से मध्य-रात्रि तक वह केवल सांसों के ऋण की अन्तिम क़िस्त चुकाती रही। दौरा आने पर डॉ. घोष को बुलाया गया। वे होमियोपैथी का इलाज करते थे। पटना मेडिकल कालेज श्यामा के पेट के आपरेशन में असफल होने के बाद जब से हम इलाहाबाद लाए थे तब से इन्हीं डॉ. घोष का इलाज हो रहा था। पटना से चलते समय तो हमें यह भी आशा नहीं थी कि श्यामा जीवित इलाहाबाद तक पहुँच भी सकेगी, पर डॉ. का होमियोपैथी में अदम्य विश्वास था। उन्होंने अपने उपचार से श्यामा को तीन महीने जिलाए ही नहीं रखा, रोग का बहुत कुछ निवारण भी कर दिया, पर मौत का इलाज तो नहीं बना।

उस संध्या को आकर उन्होंने श्यामा की नाड़ी देखी और बिना कुछ कहे वापस चले जाने लगे। मैंने दरवाज़े तक पीछे-पीछे जाकर कहा, ‘‘डॉक्टर साहब कोई...?’’ वे धीमे स्वर में बोले, ‘‘अब मरीज़ को शान्त पड़ा रहने दो और तुम भी अपने मन को शान्त रखो।’’ पिताजी ने फ़ीस के रुपए उनकी ओर बढ़ाए तो उन्होंने स्वीकार नहीं किए। जो होने वाला था उसमें किसी को सन्देह न रह गया था। घर पर मौत की छाया मँडराने लगी थी, और हमारा छोटा-सा परिवार श्यामा की चारपाई को घेरकर बैठ गया था-सिर लटकाए, सर्वथा असमर्थ, पूर्णतया पराजित। मृत्यु की प्रतीक्षा मृत्यु से अधिक डरावनी होती है।


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