सद्गति तथा अन्य नाटक - चित्रा मुदगल Sadgati Tatha Anya Natak - Hindi book by - Chitra Mudgal
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सद्गति तथा अन्य नाटक

चित्रा मुदगल

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
आईएसबीएन : 9788170289531 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :124 पुस्तक क्रमांक : 648

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प्रेमचन्द्र की कहानियों का हिन्दी नाट्य रूपान्तर...

Sadgati Tatha Anya Natak - A hindi Book by - Chitra Mudgal सद्गति तथा अन्य नाटक - चित्रा मुदगल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रेमचन्द्र की इन कहानियों का चुनाव और नाट्य-रूपान्तर व्यास सम्मान से सम्मानित हिन्दी की प्रतिष्ठित कथाकार चित्रा मुद्रल ने किया है। ‘आवाँ’ जैसे चर्चित उपन्यास की लेखिका होने के साथ-साथ वे प्रसार-भारती बोर्ड की हिन्दी सलाहकार सदस्य भी हैं, और दृश्य-श्रव्य माध्यम का समृद्ध अनुभव भी उनके पास है। आशा है, प्रेमचन्द्र की कहानियों के इन नाट्य-रूपान्तरों का पाठकों के बीच स्वागत होगा।


गुल्ली डंडा


स्थान : सोनपुर क़स्बा, एक इंजीनियर के घर की बैठक
काल : आज़ादी से पूर्व
संगीत : लोकवाद्य, डफली की धुनों का अधिक प्रयोग

पात्र

निशिकान्त : सहृदय इंजीनियर
गया : निशिकान्त के बचपन का दलित बाल-सखा
लड़का : उम्र दस वर्ष
लड़के 2, 3, 4, (केवल खेलते हैं)

1


निशिकान्त अपनी बैठक में बैठा हुआ स्वतः

निशिकान्त : (दर्शकों से उन्मुख) हमारे अंग्रेज दोस्त माने या न माने, मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। आज भी, जब कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते हुए देखता हूँ तो जी लोट-पोट हो जाता है। लगता है, दौड़कर उनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लॉन की ज़रूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की ! मज़े से एक पेड़ से टहनी काट ली, उसी का डंडा और गुल्ली बना ली। और दो आदमी-भर आ गए तो खेल-खेल में अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न रहता। न छूत-अछूत का। न मान-अभिमान की गुंजाइश !

यह गुल्ली-डंडा ही है कि बिना हर्द-फिटकरी के चोखा रंग देता है। पर हम अंग्रेजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीज़ों से अरुचि हो गई है। हमारे स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलों की फ़ीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाए। जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अंग्रेज़ी खेल उनके लिए हैं जिनके पास धन है।

ठीक है, गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है, तो क्या, क्रिकेट से सिर फूट जाने, टाँग टूट जाने का भय नहीं रहता ?
मुझे गुल्ली सब खेलों में अच्छी लगती है। बचपन की मीठी स्मृतियों में गुल्ली सबसे मीठी है।

वह प्रातःकाल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटना, उसका गुल्ली-डंडा बनाना, खिलाड़ियों का वह जमघट, रूठना-मनाना—सब बहुत याद आता है—घरवाले बिगड़ते मुझ पर। माँ दौड़-दौड़कर दरवाज़े पर जातीं और मेरे लौटने की बाट जोहतीं। पिता खाना खाते झुलझुलाते। उन्हें मेरा गुल्ली-डंडा खेलना तनिक न भाता। उन्हें लगता, उनके बेटे निशिकान्त का भविष्य अन्धकारमय है। पढ़ेगा ख़ाक, जब पूरे-पूरे दिन लड़कों के संग गुल्ली-डंडा के खेल में मस्त, पदने और पदाने में मशगूल रहता है ?

न खाने की सुधि, न नहाने-धोने की ! पर बाबूजी क्या जानें ! गुल्ली है तो ज़रा-सी पर उसे दुनिया-भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनन्द भरा हुआ है ! जिसे मैं आज भी नहीं भूल पाया...
गाँव में मेरे हमजोलियों में एक लड़का था। नाम था उसका गया ! था तो वह मुझ से दो-तीन साल बड़ा। पर हमारे गुल्ली क्लब का चौम्पियन था। जिसकी तरफ़ वह आ जाए, समझ लो उसकी जीत निश्चित।
एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे। मैंने खेलों में गया को जम कर पदाया। लेकिन जब मेरी बारी आई तो दुम दबाकर घर भागा ! गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा मेरी ओर तान कर बोला—

(संगीत-लोकधुन)

(दृश्यान्तर)

2


(गाँव का मैदान। साँझ का समय। दोनों बाल-सखा एक-दूसरे से तकरार में उलझे हुए हैं)

गया : (नाराज़गी भरे स्वर में) पदाया तो तुमने बड़े बहादुर बनके निशि, पदने के बेर क्यों भागे जाते हो ? मेरा दाँव देकर जाओ, ऐसे नहीं जाने दूँगा !
निशि : (हेकड़ी से) देख गया, आगे मेरा खेलने का जी नहीं। तू दिन-भर पदाएगा और मैं दिन-भर पदता रहूँगा ? क्या समझा है तूने, हाँ ?
गया : बारी तुम्हारी है। दिन-भर पदना ही पड़ेगा।
निशि : (चिढ़कर) क्यों दिन-भर पदना पड़ेगा ? न खाने जाऊँ न पीने ?

गया : हाँ, हाँ, मेरा दाँव दिए बिना तुम कहीं नहीं जा सकते ?
निशि : मैं तुम्हारा गुलाम नहीं हूँ ?
गया : तुम मेरे गुलाम हो।
निशि : मैं घर जाऊँगा, देखू तुम मेरा क्या कर लेते हो ?
गया : कैसे घर जाओगे; खेल कोई दिल्लगी है ? दाँव दिया है, दाँव लेंगे।
निशि : अच्छा, तो कल मैंने तुम्हें जो अमरूद खिलाया था, वह लौटा दो !
गया : वह तो पेट में चला गया ?

निशि : निकालो पेट से ? तुमने क्यों खाया मेरे अमरूद ?
गया : अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। माँगने नहीं गया था मैं तुमसे ?
निशि : जब तक मेरे अमरूद न दोगे, मैं तुम्हें दाँव न दूँगा ! अमरूद पैसे के पाँच वाले थे। तुम्हें सपने में भी नसीब न होते ! मेरा अमरूद भी खा गए, ऊपर से दाँव माँगते हो ? शर्म नहीं आती तुम्हें ? हाथ छोड़ो मेरा ! छोड़ो हाथ !
गया : (अपनी ओर खींचते हुए) हाथ नहीं छोड़ूँगा निशि ! दाँव देकर जाओ। अमरूद-समरूद मैं कुछ नहीं जानता।
निशि : (क्रोध से) तू, तू उल्लू का पट्ठा है, छोड़ मेरा हाथ गया ? छोड़ता है कि नहीं ?
गया : (उग्र होकर) उल्लू का पट्ठा होगा तू निशि, तू बेईमान है, सीधी तरह नहीं मानेगा तो ले, ऽऽऽ चटाक् ! (चाँटा रसीद देता है)

निशि : मैं थानेदार का लड़का, तूने मुझे चाँटा मारा गया ? अभी दिखाता हूँ तुझे...। तेरी बाँह को न चबा लूँ तो बोल।
(बाँह में काट खाता है)
गया : (पीड़ा से चीखता है) आ ऽऽऽ, आ ऽऽऽ तूने मुझे दाँत से काटा निशि ऽऽऽ ? मैं डंडे से तेरा सिर फोड़ दूँगा, समझता क्या है ! अपने को। तड़् (डंडे से मारने की आवाज़)
निशि : आँ ऽऽऽ ओं ऽऽऽ मेरा कन्धा तोड़ दिया रे ऽऽऽ मैं तेरी बोटी-बोटी नोंच डालूँगा गया ऽऽऽऽ मैं, मैं.....
(संगीत-लोकधुन)

(दृश्यान्तर)

3


(निशिकान्त अपने कमरे की बैठक में बैठा ठहाका भरता है और कहता है)
निशिकान्त : (स्वतः) क्या दान थे ! (फिर हँसते हैं) जानते हैं, घर पहुँचकर मैंने किसी से शिकायत न की। उन्हीं दिनों पिताजी का सोनपुर से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशी में ऐसा फूला, ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का मुझे बिलकुल दुख न हुआ। पिताजी अलबत्ता दुखी थे। सोनपुर बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्माजी भी दुखी थीं। सोनपुर में सब चीज़े सस्ती थीं। मुल्ले की स्त्रियों से घराव-सा हो गया था। उन्हें छोड़ते हुए दुख होना स्वाभाविक था।

बीस साल गुज़र गए। इंजीनियरी पास की और संयोग देखिए, उसी ज़िले का दौरा करता हुआ, उसी क़स्बे, सोनपुर में पहुँचा और वहीं डाक बँगले में ठहरा ! उस स्थान को देखते ही बचपन की मधुर बाल-स्मृतियाँ हृदय में जाग उठीं। मैंने छड़ी उठाई और क़स्बे की सैर पर निकल पड़ा। आँखे किसी प्यासे पथिक की भाँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थीं। परिचित नामों के सिवा वहाँ और कुछ परिचित न था।

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