अपने अपने दर्पण में - आशापूर्णा देवी Apne Apne Darpan Mein - Hindi book by - Ashapurna Devi
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अपने अपने दर्पण में

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
आईएसबीएन : 0000000000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :135 पुस्तक क्रमांक : 6392

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इस उपन्यास की पटभूमि एक बंगाली समाज है जो एक बदलाव के मोड़ से गुज़र रहा है। यहाँ प्राचीन धारणाओं, प्राचीन आदर्शों तथा मूल्यबोध पर आधारित मानव जीवन नवीन सभ्यता की चकाचौंध से कुछ विभ्रांत-सा हो गया है।...

Apne Apne Darpan Mein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस उपन्यास की पटभूमि एक बंगाली समाज है जो एक बदलाव के मोड़ से गुज़र रहा है। यहाँ प्राचीन धारणाओं, प्राचीन आदर्शों तथा मूल्यबोध पर आधारित मानव जीवन नवीन सभ्यता की चकाचौंध से कुछ विभ्रांत-सा हो गया है।
उपन्यास के दो मुख्य चरित्र शक्तिनाथ तथा क्षेत्रबाला एक सनातनी बंगाली परिवार के दो सबल स्तंभ है। प्राचीन आदर्शों ने इन्हें दूसरों के लिए जीना सिखाया है। परन्तु सामाजिक और नैतिक मूल्यों के मापदंड में बदलाव आने के साथ-साथ इनकी धारणाओं का नवीन विचारधाराओं से टकराव होता है। परिवार के अन्य चरित्र उसी विचारधारा के प्रतीक हैं।
यह आशापूर्णा देवी की लेखनशैली की विशेषता है कि उन्होंने किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं किया बल्कि इस उपन्यास में उन्होंने यही दर्शाया है कि अपने अपने दर्पण में सभी चरित्र अपने आपको सही पाते हैं। दोषारोपण किसी पर नहीं किया जा सकता, न किसी व्यक्ति विशेष पर, न समाज की बदलती धारा पर। जो हो रहा है उसी पर इस उपन्यास में आलोकपात किया गया है।
फिर भी, चाहे सभी चरित्र अपने आपको दोषमुक्त क्यों न कर लें, इस उपन्यास को पढ़कर ऐसी अनुभूति होती है कि प्राचीन संस्कृति हमें सबके साथ मिलकर जीने का मंत्र सिखाती थी जबकि नवीन भावधारा व्यक्तिगत सुख को ही जीवन का मुख्य लक्ष्य मानकर चलती है। ऐसा अनुभव होता है कि कहीं कुछ टूट रहा है, कहीं कुछ छूट रहा है।

भूमिका


बंगला साहित्य गगन में असंख्य सितारे दीप्तिमान हैं, जिनमें एक चमकता सितारा अपनी विशिष्टता से अनायास ही हमारी दृष्टि को आकर्षित कर लेता है। इसमें भड़कीली चमक-दमक तो नहीं, पर इसका समुज्जवल निरंतर प्रकाश हमें मंदिर के उस दिये की याद दिलाता है, जो न केवल अंधकार दूर करता है, बल्कि जीवन के प्रति एक अटल विश्वास जगा सकता है।
बारहवें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती आशापूर्णा देवी एक ऐसी ही सितारा हैं, जिन्होंने उपन्यास तथा कहानी-लेखन में समान रूप से दक्षता का परिचय दिया। इनका जन्म सन् 1910 के 8 जनवरी को कलकत्ते के एक संरक्षणशील परिवार में हुआ। स्कूल-कॉलेज की औपचारिक शिक्षा इन्हें प्राप्त नहीं हुई। यह परम आश्चर्य की बात है कि जिन्होंने जीवन में उन्मुक्तता का स्वाद नहीं चखा, उनकी दृष्टि में इतना विस्तार कैसे आ गया। शायद यह उनकी साहित्य-प्रेमी माँ की प्रेरणा का फल था कि साहित्य में उनकी गहरी रुचि बचपन से ही हो गई।
उनकी प्रथम पुस्तक ‘जल आर आगुन’ सन् 1940 में प्रकाशित हुई। उन्हें ‘लीला पुरस्कार’ (सन् 1954), ‘मोतीलाल घोष पुरस्कार’ (1959), भुवन मोहिनी स्मृति पदक (1963), रवीन्द्र पुरस्कार (1966), तथा प्रथम उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि से भूषित किया। इसके अतिरिक्त जब्बलपुर विश्वविद्यालय रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय तथा वर्धमान विश्वविद्यालय से इन्हें मानद डी.लिट्. की उपाधि प्रधान की गई।
मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में इन्होंने लिखना प्रारम्भ किया और जीवन के अंतिम दिनों तक लिखती रहीं। अपने सारे कर्तव्य पूरी तरह निभाते हुए, आचार-आचरण, पारिवारिक प्रथाओं को पूर्ण मान्यता देते हुए भी वे साहित्य-सृष्टि के कार्य में सतत् प्रयत्नशील रहीं।
चारदीवारी के भीतर रहकर उन्होंने वही जीवन देखा जो उनकी खिड़की के सामने था वह जीवन लाखों-करोड़ों मध्यवित्त लोगों का जीवन था और उनका अपना भी। इस जीवन में साधारण दृष्टि से कोई नाटकीयता नहीं थी। घटनाएँ वैसे ही सामान्य जैसी प्रति-दिन हमारे आस-पास घटती हैं। इस एक सुरे, स्वादहीन जीवन में आशापूर्णा देवी ने नाटक की रोचकता का आस्वादन किया, तरंगहीन नदी के भीतर से समुद्र की लहरों की तान सुनी। इस प्रकार ‘बिंदु में सिंधु दर्शन’, यही उनके लेखन की विशेषता रही। प्रतिपल घटने वाली सामान्य घटना कहानी के एक मोड़ पर आकर असामान्य हो गई। जीवन के आसपास मँडराते अनगिनत चरित्र, जिन्हें हम कोई मूल्य नहीं देते, लेखन के जादू-स्पर्श से वही चरित्र अचानक असामान्य होकर उभरे। पढ़कर ऐसा लगा-‘ऐसा ही चरित्र तो हमने देखा है, पर कभी इस तरह से उसे देखा समझा नहीं।’ यह आशापूर्णा देवी की अन्तर्दृष्टि ही है जो सामान्य में भी असामान्य का दर्शन कराती है।

अपने उपन्यास या कहानी के माध्यम से उन्होंने कभी कोई उपदेश या आदर्श स्थापित करने की चेष्टा नहीं की। उन्होंने जीवन को जिस रूप में देखा, वैसे ही प्रस्तुत किया। उसमें कहीं भी रत्ती भर अतिरंजन नहीं हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में निम्नवर्ग के दलितों की कथा नहीं है, उस उच्च वर्ग की कहानी भी नहीं है, आधुनिक साहित्य में आज जिसकी बड़ी चर्चा है। उन्होंने तो उसी जीवन को अपने लेखन का आधार बनाया, जिसका वह एक अभिन्न अंग थीं और उसी जीवन की उपलब्धियों को लोगों के सामने रखा।

साधारणतः हम कहानी का रस काव्यों और ग्रंथों में ढूँढ़ते हैं। परन्तु यह रस हमारे वास्तविक जीवन के आस-पास भरा पड़ा है, केवल हमें दिखाई नहीं देता। वह अन्तर्दृष्टि हमारे पास नहीं है, जिसकी सहायता से ‘सुख-दुख-समस्या’ भरे इस जीवन में से उस रस को निचोड़कर उसका आनन्द ले सकें। आशापूर्णा देवी ने अपनी पैनी अन्तर्दृष्टि से उस रस को खोज निकाला और अपनी निपुण रचनाओं द्वारा पाठकों को भी इसका रसास्वादन कराया।

इनकी रचनाओं में जीवन की दैनंदिन समस्याओं का उल्लेख है, सीधे-सादे सरल शब्दों में उनका वर्णन है। परन्तु जिस प्रकार एक कुशल चित्रकार अपनी तूलिका के निपुण स्पर्श से चित्र में जान डाल देता है, वैसे ही आशापूर्णा देवी की लेखन-कुशलता सामान्य कथानक को असमान्य बना देती हैं।

इनकी रचनाओं में सर्वप्रमुख विशेषता है—इनका नारी चरित्र-चित्रण। अपने श्रेष्ठ उपन्यास—‘प्रथम प्रतिश्रुति’, ‘सुवर्णलता’ तथा ‘बकुलकथा’ में इन्होंने तीनों युगों से निकलते हुए नारी-जीवन के संघर्ष का चित्रण किया है। ‘सत्यवती’, ‘सुवर्णलता तथा ‘बकुल’ अपने-अपने युग की निर्यातिता नारी का प्रतीक हैं, जो निरंतर कुरीतियों से, असंतुलित समाज-व्यवस्था से तथा पुरुष-प्रधान समाज में घटित नारी-निग्रह से जूझती रहती हैं। अपने विभिन्न उपन्यासों तथा कहानी के माध्यम से इन्होंने नारी-चरित्र का मनोविश्लेषण बहुत गहराई से किया है।
आज नारी-मुक्ति, नारी-आंदोलन आदि के नित नये नारे सभा-समितियों में गूँजते सुनाई पड़ते हैं। वहाँ विद्रोह है, विक्षोभ है, पुरुष-विद्वेष है, जिसके धुएँ में प्रायः नारी अपनी मर्यादा को भी धूमिल कर देती है।

आशापूर्णा ने नारी स्वाधीनता के बड़े-बड़े नारे नहीं लगाए, न ही किसी को नीचा दिखाया। समाज के बंधन में रहकर, संस्कार और लोकाचार निभाकर भी उन्होंने कुछ चरित्र ऐसे आँके, जिनमें नारी मुक्ति की सही छवि है। प्रथम प्रतिश्रुति की सत्यवती एक ऐसी ही स्वाभिमानिनी नारी है। नारी का यह रूप उन्होंने अपनी कहानियों तथा अपने उपन्यासों में बार-बार अंकित किया है। यह नारी समाज-व्यवस्था के विरोध में आवाज उठाती है। शोर-गुल और नारों से नहीं, अपनी मृदु स्पष्ट आवाज में वह अन्याय का विरोध करती है, अन्त तक संघर्ष करती है पर समझौता नहीं करती।

यद्यपि आशापूर्णा देवी ने नारी चरित्र को अपने लेखन का मूल विषयवस्तु बनाया, उनकी रचनाएँ केवल इसी विषय में केंद्रित नहीं रहीं। मानव-चरित्र की अनजान गलियों पर उन्होंने इस खूबी से प्रकाश डाला इस रोचक ढंग से उन्हें उबारा कि पाठक को लगा कि जो दिखाई देता है, वह कुछ भी नहीं। जो उसके भीतर है, उसकी आकस्मिक झलक ही यह बता देती है कि भीतर है अथाह सागर, जिसकी गहराई में छिपे हैं अनमोल मोती, जिनका दर्शन, जीवन के किसी मोड़ पर, किसी विशेष क्षण में अकस्मात् ही हो जाता है। ऐसे विशेष पल का स्फुरण आशापूर्णा देवी की कहानियों में हमें बार-बार देखने को मिलता है।

इनकी रचनाओं का अनुवाद हिन्दी तथा विभिन्न आंचलिक भाषाओं में हुआ जिसके फलस्वरूप उनकी अमूल्य रचनाएँ बंगला भाषा के सीमित दायरे से बाहर निकलकर भारतीय साहित्य में शोभित हो रही हैं। दीर्घ पचास वर्ष की साहित्य रचनाओं में एक ओर श्रीमती आशापूर्णा देवी के उपन्यासों में नारी चरित्र के जटिल भावों का मंथन और अमृत की उपलब्धि है, तो दूसरी ओर उनकी छोटी कहानियों के जीवन के विभिन्न पहलुओं के भीतर से मानव-चरित्र का अनोखा रूपायण देखने को मिलता है।

गीतालि भट्टाचार्य

अपने अपने दर्पण में


दोपहर की तेज धूप जैसे ही ढलने को हुई कि शक्तिनाथ बाहर के दलान पर आकर बैठ जाते हैं। हाथ में रहता है डिब्बे में भरा चश्मा और महात्मा काली प्रसन्न सिंह के महाभारत का कोई एक खण्ड।

दो-तीन बार शुरू से अन्त तक पढ़ चुके हैं, अब विशेष-विशेष कांड, फिर से विशेष ध्यान देकर पढ़ते हैं।
शक्तिनाथ के पिता योगनाथ ने जब ‘वसुमती साहित्य मंदिर’ से अट्ठारह पर्व महाभारत का यह सम्पूर्ण ‘सेट’ खरीद कर बड़े जतन से अपने चंदन काठ की संदूक सज़ा रखा था, तब शक्तिनाथ की उम्र अट्ठारह वर्ष की थी। खेल का नशा था, पड़ोस के लड़को को लेकर व्यायाम-संघ बनाने का सपना था मन में, पिता के इस संग्रह की ओर उसने पलट कर भी नहीं देखा था।
योगनाथ ने कहा था, ‘महाभारत पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। जिस उम्र में पढ़ोंगे, कुछ-न-कुछ मज़ा आएगा, आज मत पढ़ो, दो दिन बाद पढ़ना, मगर पढ़ना अवश्य। महाभारत नहीं पढ़ने से भारत के मान का जीवन असम्पूर्ण रह जाता है।’
कहने की आवश्यकता नहीं, अट्ठारह वर्ष के लड़के के अनिच्छुक कानों पर इस निर्देश ने मधुवर्षण नहीं किया था, परन्तु आदेश बनकर मन के किसी कोने में जड़ पकड़ कर बैठ गया था। लेकिन तब उस आदेश के पालन करने का समय कहाँ था उनके पास ? तब और बाद में भी ?
जीविका-निर्वाह की चिन्ता में जीवन के सक्षम दिन तो भाग-दौड़ में निकल गये। रिटायर होने के बाद घर की मरम्मती कराने में काफी दिन निकल गये।
प्रॉवीडेंट फण्ड की मोटी रकम हाथ आ गई थी, उन्होंने सोचा- झटपट काम करा लें।
क्षेत्रबाला ने भी कहा था, ‘‘गृहस्थ के हाथ आई रकम कमल के पत्ते पर ठहरा पानी है भैया, अभी है, अभी नहीं ! अचानक आँख खोलकर देखोंगे, पता नहीं कब लुढ़क गया।........घर की मरम्मत एक मोटी जिम्मेदारी है, पहले उसी से निपट लो !’’
क्षेत्रबाला की शक्तिनाथ की आजीवन की मंत्री हैं। अत: उन्हीं की सलाह के अनुसार दक्षिण के लम्बे खुले दलान को खिड़की-दरवाज़े से घर कर एक बरामदा बना लिया था शक्तिनाथ ने। रसोईघर की छत को पक्का कर दिया था और खटाल की छत को डबल पुआल देकर मजबूत कर दिया गया था।
और यह बाहर का दलान टूट-फूट कर मिट्टी-गारे बिखरा रहा था उस पर लाल सीमेंट का फर्श बनवा लिया था। लाल फर्श के चारों ओर चौड़ी-चौड़ी काली धारी, बीच में काले रंग का ही एक बड़ा कमल बनवाया था।
इसका बड़ा शौक था शक्तिनाथ को अपनी जवानी के दिनों से ही। हो नहीं सका था। केवल पैसे की ही कमी नहीं थी, कमी थी समय की भी। बीच-बीच में छोटा-मोटा जो काम करवाया भी गया, वह सब क्षेत्रबाला ने स्वयं मिस्त्री लगवाकर कराया, रकम भी छोटी-मोटी लगी। मोटी रकम और काफी समय हो तभी तो भारी और शौकीन काम हाथ में लिया जा सकता है। यह सब काम चुकता कर, आराम से बैठ कर बाबूजी का संदूक खोल कर आदेश-पालन करने में जुट गये शक्तिनाथ, अब तो नशा-सा हो गया है।


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