वाल्मीकि रामायण (सजिल्द) - वाल्मीकि Valmiki Ramayan (hard cover) - Hindi book by - Valmiki
लोगों की राय

पौराणिक कथाएँ >> वाल्मीकि रामायण (सजिल्द)

वाल्मीकि रामायण (सजिल्द)

वाल्मीकि

प्रकाशक : ड्रीमलैण्ड पब्लिकेशन्स प्रकाशित वर्ष : 2008
आईएसबीएन : 81-7301-254-7 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :200 पुस्तक क्रमांक : 6332

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

28 पाठक हैं

रामायण एक भारतीय ग्रन्थ है। हमने इस गाथा को दो-सौ पृष्ठों में बहुरंगी चित्रों सहित सरल भाषा में आपके सामने पेश किया है।

Valmiki Ramayan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ग्रन्थ-परिचय


रामायण जगत-प्रसिद्ध भारतीय धर्मिक ग्रन्थ है।
देवर्षि नारद द्वारा वाल्मीकि को दिए गए दो अक्षरों के महामन्त्र- ‘राम’- से ‘रामयाण’ का सूत्रपात हुआ था। वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण संस्कृति का सर्वप्रथम महाकाव्य माना जाता है। इसलिए इसे आदिकाव्य भी कहा जाता है।
कहते हैं कि नारद जी ने वाल्मीकि से कहा था- ‘जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत सिर उठाए खड़े रहेंगे, कल-कल ध्वनि करती नदियाँ बहती रहेंगी, ‘रामायण’ नामक ग्रन्थ मनुष्यों द्वारा श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाएगा।’
स्पष्टत: ‘रामायण’ श्री रामचन्द्र जी की जीवन गाथा को लेकर रचा गया ग्रन्थ है। उनके जीवन चरित्र का वर्णन सुचारु रूप से करने हेतु इस महाकाव्य को आठ काण्डों में विभक्त किया गया है। ये काण्ड निम्न प्रकार हैं :
1. बाल काण्ड
2. अयोध्या काण्ड
3. अरण्य काण्ड
4. किष्किन्धा काण्ड
5. सुन्दर काण्ड
6. लंका काण्ड
7. उत्तर काण्ड
8. लव-कुश काण्ड

वाल्मीकि का ‘रामायण’ नामक महाकाव्य अन्य महान काव्यों का प्रेरणा स्रोत्र बना। इसकी कथा पर आधारित हिन्दी, तमिल और बंगला भाषाओं में भी रामायण लिखी गई। उत्तर भारत में तुलसीदास जी ने ‘रामचरित-मानस’ की रचना की। दक्षिण में कम्बन ने रामायण पर अपना महाकाव्य रचा।

‘रामायण’ की कथा के अंशों को दृश्य-चित्रों और भित्ति-चित्रों के रूप में भी अंकित किया गया है। ये चित्र केवल भारतीय मन्दिरों में ही नहीं बल्कि इण्डोनेशिया, जावा तथा कम्पूचिया आदि देशों के मन्दिरों में भी देखे जा सकते हैं।

(बाल काण्ड)

1. दशरथ द्वारा सूर्य भगवान की उपासना


प्रतापी सूर्यवंश के आदि प्रवर्तक वैवस्वत मनु हैं। सूर्य के श्राद्धदेव नाम के पुत्र हुए जिन्हें मनु भी कहते हैं। सूर्यवंश इनसे ही प्रारम्भ हुआ है। मनु मानव जाति के प्रथम शासक हुए।
मनु के ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु ने सरयू नदी के किनारे अयोध्या नगरी बसाई। तब से अयोध्या सूर्यवंश के अनेक प्रतापी राजाओं की जैसे कि सत्यवादी हरिश्चन्द्र, सागर, भागीरथ, दिलीप, रघु, अज, दशरथ तथा स्वयम् भगवान राम की राजधानी रही।
कालान्तर में सूर्यवंश रघुवंश के नाम से प्रसिद्ध हो गया क्योंकि चक्रवर्ती सम्राट रघु ने सर्वदक्षिणा यज्ञ में स्वयं के शरीर पर पहने हुए वस्त्रों के अतिरिक्त अपनी समस्त सम्पत्ति दान-दक्षिणा में दे दी थी।
महाराजा दशरथ रघु के पौत्र थे। उनमें अपने पूर्वजों के सभी गुण विद्यमान थे। इसके साथ-साथ वे स्वयम् भी बड़े ही गुणज्ञ थे। वे इतने शक्तिशाली थे कि उनका कोई शत्रु नहीं था। उनकी सम्पदा इन्द्र तथा कुबेर दोनों से अधिक थी। दशरथ धर्मज्ञ तथा राज-ऋषि थे। नित्य प्रात:काल उठकर वे अपने कुलगुरु वशिष्ठ के साथ अपने इष्टदेव सूर्यदेवता की उपासना किया करते थे।

2. पुत्रेष्टि यज्ञ


यद्यपि महाराजा दशरथ को संसार के सभी सुख प्राप्त थे तथापि सन्तान के अभाव में वे अति दु:खी रहते थे। अत: गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से प्रबल तेजस्वी ऋष्य श्रृंग मुनि को पुत्रेष्टि यज्ञ करने के लिए सादर निमन्त्रित किया गया। जिस समय अयोध्या में यह यज्ञ किया जा रहा था उस समय देवता गण स्वर्ग में विचार-विमर्श कर रहे थे। वे भगवान् विष्णु से प्रार्थना कर रहे थे कि वे राक्षसों का संहार करने के लिए दशरथ के चार प्रतापी पुत्रों के रूप में जन्म लेकर धर्म की स्थापना करें। विष्णु भगवान ने देवताओं को स्वीकृति प्रदान की। महात्मा ऋष्य श्रंग बड़े मेघावी और वेदों की ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी दूर तक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर वे राजा से इस प्रकार बोले, ‘‘महाराज ! मैं आपको पुत्र की प्राप्ति कराने के लिए अथर्ववेद के मन्त्रों से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वैदिक विधि के अनुसार अनुष्ठान करने पर यह यज्ञ अवश्य सफल होगा।’’ यज्ञ के सम्पन्न हो जाने पर अग्निकुंड से दिव्य खीर से भरा हुआ स्वर्ण पात्र हाथ में लिए स्वयं प्राजापत्य पुरुष प्रकट हुए और दशरथ से बोले, ‘‘देवता आप पर प्रसन्न हैं। यह दिव्य खीर अपनी रानियों को खिला देना। इसके प्रताप से आपको चार दिव्य पुत्रों की प्राप्ति होगी। असीम आनन्द के साथ दशरथ ने खीर का स्वर्ण पात्र स्वीकार किया।

3. रानियों द्वारा खीर प्रसाद ग्रहण


परम ज्ञानी गुरु वसिष्ठ की आज्ञा लेकर राजा दशरथ शीघ्रता से अपने महल में पहुँचे। उन्होंने उस खीर का आधा भाग महारानी कौशल्या को दे दिया। फिर बचे हुए आधे भाग का आधा भाग रानी सुमित्रा को अर्पण किया तथा शेष भाग कैकयी को दे दिया। कर्कश वाणी से जो पति का दिल दुखावे, वह है कैकयी। सबसे अन्त में प्रसाद मिलने से कैकयी ने क्रोध में भरकर दशरथ को कठोर शब्द कहे।

उसी समय भगवान शंकर की प्रेरणा से एक चील वहाँ आयी और कैकयी की हथेली पर से प्रसाद उठाकर अंजन पर्वत पर तपस्या में लीन अंजनी देवी के हाथ में रख दिया। प्रसाद का भक्षण करने से अंजनी माँ ने शंकर जैसे प्रतापी श्री हनुमानजी को जन्म दिया। कौशल्या तथा सुमित्रा ने अपनी खीर में से एक भाग कैकयी को दे दिया जिससे तीनों रानियाँ गर्भवती हुईं।

4. पुत्र प्राप्ति की आशा से आनन्द


जैसे ही राजा दशरथ को ज्ञात हुआ कि खीर प्रसाद के प्रभाव से सभी रानियाँ गर्भवती हो गई हैं, वे अति हर्षित हुए। उन्हें ऐसा लगा कि जैसे उन्हें सब कुछ प्राप्त हो गया है। उनके मुख मंडल पर एक दिव्य आभा छा गई। उन्होंने सभी देवताओं का अभिनन्दन किया। सूर्य-भगवान् की उपासना की जिनके प्रताप से सूर्यवंश की परम्परा आगे चलने वाली थी।

दशरथ महाराज ने अपने कुल गुरु वसिष्ठ के चरणों में प्रणाम किया तथा उन्हें यह शुभ समाचार सुनाया। महर्षि ने दशरथ नरेश को समझाया कि गर्भावस्था में उन्हें अपनी रानियों की सभी इच्छाओं की पूर्ति पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दशरथ ने नतमस्तक हो गुरुजी का आदेश स्वीकार किया।

अन्य पुस्तकें

To give your reviews on this book, Please Login