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पंचवटी

मैथिलीशरण गुप्त

1.95

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 000000000 पृष्ठ :56
आवरण : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 6327
 

पंचवटी में राम, सीता और लक्ष्मण का किस प्रकार से जीवन व्यतीत हो रहा है इसका बहुत ही रोचक वर्णन किया गया है....

Panchvati

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीराम।।

पूर्वाभास

(1)

पूज्य पिता के सहज सत्य पर
वार सुधाम, धरा, धन को,
चले राम, सीता भी उनके
पीछे चलीं गहन वन को।
उनके पीछे भी लक्ष्मण थे,
कहा राम ने कि ‘‘तुम कहाँ ?’’
विनत वदन से उत्तर पाया—
‘‘तुम मेरे सर्वस्व जहाँ।’’

(2)

सीता बोलीं कि ‘‘ये पिता की
आज्ञा से सब छोड़ चले,
पर देवर, तुम त्यागी बनकर,
क्यों घर से मुँह मोड़ चले ?’’
उत्तर मिला कि ‘‘आर्य्ये, बरबस
बना न दो मुझको त्यागी,
आर्य-चरण-सेवा में समझो
मुझको भी अपना भागी।।’’

(3)

‘‘क्या कर्तव्य यही है भाई ?’’
लक्ष्मण ने सिर झुका लिया,
‘‘आर्य्य, आपके प्रति इन जन ने
कब कब क्या कर्तव्य किया ?’’
‘‘प्यार किया है तुमने केवल !’’
सीता यह कह मुसकाईं,
किन्तु राम की उज्जवल आँखें
सफल सीप-सी भर आईं।

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