अघोरियों के बीच - सुरेश सोमपुरा Aghoriyon Ke Beech - Hindi book by - Suresh Sompura
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अघोरियों के बीच

सुरेश सोमपुरा

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 81-7457-252-X मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :177 पुस्तक क्रमांक : 6298

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रहस्य रोमांच से भरी हुई घटनाएँ अघोरियों के बीच प्रस्तुति सुरेश सोमपुरा की.......

Aghoriyon Ke Beech -A Hindi Book by Suresh Sompura - अघोरियों के बीच - सुरेश सोमपुरा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अघोरियों के बीच

एक रोमांचक सन्देश

‘युवदर्शन’ कार्यालय में अपनी मेज के सामने आकर मैं बैठ गया। डाक आ चुकी थी। प्रूफों का भी ढेर लगा था। ताजा अखबारों पर एक सरसरी नजर डाली। भ्रष्टाचार, दुर्घटनाओं और आपाधापी के समाचार समा नहीं रहे थे। विस्तार से बाद में पढ़ूंगा’, ऐसा सोच कर सबसे पहले मैंने प्रूफों के साथ न्याय किया।

फिर मैं डाक खोलने लगा। लिफाफों में कहानियाँ और लेख इत्यादि थे। उन्हें मैंने अलग रख दिया। एक वजनदार और पुराना-सा लिफाफा मेरे हाथ में आया। पते की लिखावट पहचानते ही मेरी आँखें चमकने लगीं।
दत्तू से चाय लाने के लिए कहकर मैंने उसे आतुरता से खोला। वह चिट्ठी मेरे परम मित्र स्वामी शिवानन्द की थी। बड़े दिनों बाद उनकी चिट्ठी मिलने का रोमांच मैंने महसूस किया। रोमांच का एक और भी कारण था, स्वामी शिवानंद को मैंने आज सुबह ही याद किया था। तंत्र-मंत्र के वैज्ञानिक परीक्षण के अपने अनुभवों की जो पहली पुस्तक मैंने लिखी थी ‘चमत्कार को नमस्कार’, उसकी पाण्डुलिपि में उन्हें दिखाने के बाद ही प्रेस में देना चाहता था, सवाल यह था कि उस घुमक्कड़ प्राणी का पता कैसे लगाया जाए ? वह किसी भी क्षण भारत के किसी भी कोने में हो सकते थे। कैसा संयोग ! उन्हें ढूँढ़ने की चिन्ता अपने-आप दूर हो गई थी।
मैंने पत्र पढ़ना शुरू किया

‘प्रिय सुरेश भाई,
‘बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ। इन गर्मियों में दक्षिण भारत के गाँवों में भटकता रहा। अभी, कुछ ही दिन पहले हरिद्वार आया हूँ।
‘पाँचेक साल पहले जब हम वेल्लूर में थे तब आपने एक इच्छा व्यक्त की थी, आप को याद होगा। आपने कहा था, सच्चे अघोरियों से आप मिलना चाहते हैं। न जाने कितने कपालिकों, तांत्रिकों इत्यादि से आप मिल चुके हैं, किन्तु सच्चे अघोरियों से मिलने का अवसर कभी नहीं मिला। मुझे मालूम है, आप कितने जिज्ञासु व्यक्ति हैं। इसीलिए आपकी इच्छा मन में अंकित होकर रह गई थी।

यहाँ, हरिद्वार में, अभी कल ही अचानक मेरी भेंट बाबा भैरवनाथ से हुई। उनका कद साढ़े छह फीट से कम न होगा। ऊँचाई के ही अनुपात में चौड़ा सीना, चेहरे पर माता के इतने गहरे दाग कि घनी, काली दाढ़ी के भी आरपार दिखाई पड़ें। वेधक आँखें। अंग्रेजी और फ्रेंच फर्राटे से बोल सकते हैं। स्वाभाविक ही था कि मैंने उनसे परिचय विकसित किया। उन्होंने बताया कि वह अघोरपंथी हैं। अघोरपंथ की सैकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा को जीवित रखने वाले जो थोड़े से अघोरी इस देश में बचे हैं, उनमें से एक श्री लकुलेश जी उनके गुरु हैं। ‘‘लकुलेश’ नाम आपको नया नहीं लग रहा होगा। पुराने इतिहासों में यह कई बार आया है।

‘बाबा भैरवनाथ ने एक विचित्र बात बताई। उनके दावे के अनुसार, इस देश में लगभग एक लाख वाममार्गी हैं। अघोरपंथ में विश्वास रखनेवाले स्वयं को वाममार्गी ही कहते हैं। वाममार्गी खुल्लमखुल्ला अघोरियों की तरह घूमते या बर्ताव नहीं करते। यह शहरी लोगों के साथ, प्रतिष्ठित नागरिकों की तरह ही घुलमिल कर रहते हैं, किन्तु वाममार्ग के कट्टर अनुयायी हैं। उन्होंने मुझे कुछ ऐसे नाम बताए, जिनसे मैं भी चौंक गया।
फिर तो वाममार्ग की साधना एवं तत्व ज्ञान आदि को लेकर देर तक चर्चा होती रही। स्वाभाविक था कि उनके सामने मैंने आपका उल्लेख किया। ‘‘कल्पना-योग’’ के सन्दर्भ में आपके जो विचार हैं, वे मैंने उनके सामने प्रस्तुत किए। सब स्वीकार करने को वह तैयार नहीं थे, प्रभावित हुए हैं, ऐसा लगा। जब मैंने बताया कि चैतन्यानंद जी के साथ आपके सम्बन्ध क्या थे, तब उन्होंने आपसे मिलने की उत्सुकता दर्शाई। लगा, जैसे वह चैतन्यानंद जी को पहचानते हैं, हालांकि इस बाबत उन्होंने मुझसे कहा कुछ नहीं।

उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के जंगलों में अघोरी शीघ्र ही एक अत्यन्त गुप्त साधना-शिविर का आयोजन कर रहे हैं। भारत के सर्वोच्च अघोरी उसमें भाग लेंगे। अनायास मैं पूछ बैठा, ‘‘क्या सुरेश जी को उस शिविर में आप आमंत्रित कर सकते हैं ?’’
जवाब में उन्होंने पूछा, ‘‘क्या सुरेश जी आना चाहेंगे ?’’
उत्साहित होकर मैंने कह दिया, ‘‘अवश्य ! उन्हें यह प्रस्ताव अवश्य पसंद आयेगा।’’
जब कि मुझे बिल्कुल पता नहीं है कि इन दिनों आपकी व्यस्तताएँ क्या हैं। क्या सचमुच आप उस शिविर में जा सकते हैं ? मैंने तो, पाँच वर्ष पहले आपने जो इच्छा प्रकट की थी, उसी आधार पर हामी भर दी। भैरवनाथ जी ने कहा कि साधना के समय आपको शिविर में प्रवेश दिलवाने का प्रयास वह करेंगे।

लेकिन इसके बाद उन्होंने जो बातें बताईं—साधना के स्वरूप एवं भयानकता की—वे ऐसी थीं कि मैं सोचे बिना न रह सका, ‘‘ऐसे शिविर में सुरेश जी न जाये, तो ही अच्छा, ‘‘वहाँ वशीकरण के प्रयोग होंगे। अघोरी बाबा भैरवनाथ ने मुझसे दावे के साथ कहा कि वह भयानक शेर को भी वशीकरण के प्रयोग से बकरी जैसा मासूम बना सकते हैं। उन्होंने येतु विद्या के बारे में भी विचित्र दावे किए और बताया कि उस विद्या से वह मनुष्यों को किस सीमा तक वश में कर सकते हैं। मूठ मार कर, सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठ कर भी, किसी की हत्या कैसे की जा सकती है। इसकी जानकारी उन्होंने मुझे अपनी लाक्षणिक शैली में दी। जीवन एवं यौन-जीवन के विषय में उनके विचार ऐसे हैं। साधना में मानव बलिदान आदि पर भी उनकी मान्यताएँ ऐसी भयानक हैं कि सुनकर कँपकँपी छूटे।
इसके बावजूद यह पत्र आपको लिख रहा हूँ। आज सुबह ही भैरवनाथ जी मुझसे कह गए कि साधना शिविर में आपकी उपस्थित की अनुमति मिल गई है। साधना अमावस्या से सातेक दिन पहले शुरु होगी। अमावस्या के बाद तीन दिनों तक चलेगी। आप जब चाहें, तब शिविर में जा सकते हैं। शिविर के बारे में कुछ भी प्रकाशित करने से पहले आपको उनके मुख्य अधिकारी से अनुमति लेनी होगी।

आप अपनी इच्छा मुझे तार द्वारा सूचित करिए। सबसे पहले आपको जबलपुर पहुँचना होगा। वहाँ मैं आपसे मिलूँगा। इसके बाद बाबा भैरवनाथ आपके साधना-स्थली तक जाने का प्रबन्ध करेंगे। यह स्थली कहाँ है, उन्होंने बताया नहीं है।

अभी मैं यहीं हरिद्वार में हूँ। आप आनंद आश्रम के पते पर मुझे जवाब दें। शेष कुशल। सस्नेह शिवानंद।’’

बड़ी देर तक मैं इस पत्र को थामें बैठा रह गया। सामने रखी चाय ठंडी हो चुकी थी। अघोरियों के बारे में जो अनेक काल्पनिक कथाएं पढ़ रखी थीं। उनके विचित्र और भयानक चरित्र मेरी आँखों के आगे साकार होने लगे। पाँच वर्ष पहले का वह दिन मुझे विस्तार के साथ याद आया, जब मैंने शिवानंद जी के सामने वास्तविक अघोरियों से मिलने की अपनी इच्छी प्रकट की थी।

उस दिन.... मैं, मेरा दोस्त प्रमोद और हमारा पंजाबी साथी जगजीत वेल्लूर के मंदिरों की मूर्तिकला को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे।
जगजीत तेज स्वभाव का नौजवान था। उस दिन उसकी तबीयत कुछ नासाज थी। दो दिन पहले ही उसने मैसूर में एक बाबा के साथ झगड़ा किया था। बोल कर भले ही वह कुछ नहीं जता रहा था किन्तु उसकी नरम तबीयत का राज मुझे मालूम था। जिसकी जुबान हमेशा कैंची की तरह चलती रहती थी, बात-बात में ठहाके लगाता था, वही जगजीत आज बिलकुल गुमसुम होकर फोटो खींचे जा रहा था। उसके मन में मचे तूफान से मैं अपरिचित नहीं था।

तभी वहां स्वामी शिवानन्द जी आ पहुँचे उन्हें देखकर मुझे आनन्द बहुत हुआ था किन्तु आश्चर्य बिल्कुल नहीं। मैं उन्हें चारेक वर्षों से जानता था।
स्वामी शिवानन्द अकेले जीव हैं- महा-जिज्ञासु। उन्होंने किसी भी धर्म, पंथ या मान्यता की कंठी नहीं बाँधी है। अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं पर उनका अच्छा अधिकार है। विविध विषयों पर बहुत पढ़ रखा है उन्होंने। भारत में घूम-घूमकर वह मानव स्वभाव का अध्ययन करते हैं। तब उनकी उम्र पैंतीस के आसपास रही होगी। अनेक अवसरों पर, अनेक स्थलों में, उनकी और मेरी मुलाकातें अनायास हो जाया करतीं। वह दिन हमने साथ-साथ बिताने का फैसला किया।

सरकिट हाउस में रात का भोजन निबटने के बाद मैं और स्वामी शिवानन्द गप-गोष्ठी जमा कर बैठे थे। तभी प्रमोद वहाँ हक्की-बक्की हालत में आया और बोला, जगजीत को उल्टियाँ हो रही हैं।’’

मैं और शिवानन्द जी वहाँ गए, जहाँ जगजीत लेटा हुआ था। वह अत्यधिक बेचैन था। उसकी आंखें फट गई थी। वह ऐसे दाँत पीस रहा था, जैसे पीड़ा सही न जा रही हो। बार-बार करवटें बदलने और कराहने लगता। मैंने पूछा, ‘‘तुम्हें क्या हो रहा है, जगजीत ?’’
वह मुश्किल से बोल सका, ‘‘सारा बदन टूट रहा है, भयानक पीड़ा हो रही है। जैसे कोई मुझे पीस रहा है।’’

मैं काँप उठा। मैंने जगजीत को समझाया कि अगर उसने आत्म-बल न छोड़ा, तो उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। प्रमोद ने कहीं से लाकर उसे कुछ ब्राण्डी पिलाई। जगजीत को थोड़ी राहत मिली। वह सोने लगा। प्रमोद को उसके पास बिठा कर मैं और स्वामी शिवानंद बाहर निकलें।
‘‘क्या बात है ?’’ शिवानंद जी ने पूछा। मैंने निराशा से कहा, ‘‘जगजीत डर गया है, क्योंकि किसी ने उसे मूठ मारी है।’’
‘‘मूठ ?’’ शिवानन्द जी को आश्चर्य हुआ था और मैंने दो दिन पहले का विचित्र प्रसंग उन्हें कह सुनाया था..........।


दो
भयंकर मूठ


उस दिन दशहरा था और हम मैसूर में फोटोग्राफी कर रहे थे। महाराजाओं के खत्म होने के बाद भी वहाँ सवारी तो निकलती ही है, भले ही उसमें पहले जैसा रौबदाब नहीं होता। ‘फेयर एण्ड फेस्टिवल सीरिज’ की फोटोग्राफी के लिए हम मैसूर पहुँचे थे।

भूतपूर्व महाराजा के विशाल महल के सामने जो चौगान है, वहीं से सवारी शुरू होने वाली थी। सामने के एक मकान के बरामदे में, तिपाइयों पर अपने-अपने कैमरे सजा कर हम तैयार बैठे थे। कुछ लोग कौतूहल से हमारी ओर देख रहे थे।

अचानक एक प्रचंड बाबा आकर जगजीत के कैमरे के सामने खड़ा हो गया। गर्म स्वभाव के जगजीत ने, अपने पंजाबी जमीर के अनुरूप ही, बाबा को जरा गलत ढंग से चुनौती दी और कैमरे के सामने से हट जाने को कहा। बाबा ने ठण्डी उपेक्षा से जगजीत की तरफ देखा और हटने की कोई चेष्टा न की। जगजीत का गुस्सा भड़क उठा। उसने धक्का मार बाबा को दूर हटा दिया। बाबा भी अड़ियल था। वापस वहीं-का-वहीं आकर खड़ा हो गया। इस पर जगजीत बाबा को गालियाँ देने लगा। देखते-देखते दोनों के बीच हाथा पाई होने लगी।


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