अंग्रेजी के श्रेष्ठ कवि और उनकी श्रेष्ठ कविताएँ - कुलदीप सलिल Angregi Ke Shrestha Kavi Aur Unki shrestha kavitay - Hindi book by - Kuldip Salil
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अंग्रेजी के श्रेष्ठ कवि और उनकी श्रेष्ठ कविताएँ

कुलदीप सलिल

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-7028-604-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :162 पुस्तक क्रमांक : 6294

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इस संकलन की अधिकांश कविताओं का अनुवाद पिछले सात-आठ वर्षों में किया गया है। कवितायें ऐसी चुनी गई हैं जो कि बहुत मशहूर हैं। विद्यार्थी इस संग्रह से विशेष रूप से लाभान्वित होंगे।

Angregi Ke shrestha Kavi Aur Unki shrestha kavitayein a hindi book by Kuldeep Salil - अंग्रेजी के श्रेष्ठ कवि और उनकी श्रेष्ठ कविताएँ - कुलदीप सलिल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


लगभग चालीस वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए एक इण्टरव्यू में मुझसे विलियम वर्ड्सवर्थ पर प्रश्न पूछे गये जिनका उत्तर देते हुए मैंने वर्ड्सवर्थ की मशहूर कविता ‘इम्मारटेलिटी ओड’ के एक अंश का काव्यानुवाद भी सुनाया। अंग्रेज़ी विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.सरूप सिंह को यह अनुवाद पसंद आया और उन्होंने मुझे रॉबर्ट फ्रॉस्ट की बहु-चर्चित कविता ‘स्टॉपिंग बाई वुड्ज़ ऑन ए स्नोई ईवनिंग‘ का भी अनुवाद करने का सुझाव दिया। तब से अंग्रेज़ी कविताओं के अनुवाद करने का मेरा सिलसिला शुरू हुआ। क्योंकि ये कवितायें मैं वर्षों से पढ़-पढ़ा रहा हूँ इनका अनुवाद करने में मुझे कोई विशेष कठिनाई पेश नहीं आयी। एक तरह से, यह काम मुझे सुखद ही लगा। इसके अलावा, मैं पिछले कई वर्षों से अंग्रेज़ी में कवितायें लिख रहा हूँ और इनका अनुवाद भी करता हूँ। ये कवितायें और अनुवाद अनेक पत्र-पत्रिकाओं में एक साथ प्रकाशित होते हैं। इन कविताओं का अनुवाद करने में मुझे बहुत ही कम समय लगता है। नियमित रूप से अपनी कविताओं के अनुवाद करने का एक लाभ यह हुआ कि अंग्रेज़ी कवियों की कविताओं का अनुवाद करना मेरे लिए और भी सुगम हो गया।

अनुवाद चाहे कविता का हो या गद्य का, इसमें दक्षता अभ्यास से आती है। किसी कविता का अनुवाद करने के लिए, उससे लगाव होना, उसे आत्मसात् करना भी ज़रूरी है, मैं तो कहूँगा कि अनुवादक का कवि होना भी ज़रूरी है। मूल हो या अनुवाद, कविता, ध्वनि (Sound) और अनदरूनी लय से आगे बढ़ती है। अगली पंक्ति और कई बार तो अगला विचार भी ध्वनि आदि से आता है। बात यह है कि यदि आप किसी कविता को एन्जॉय (enjoy) करते हैं तो वह आपके दिल-दिमाग़ में रच-बस जाएगी, उसे आप बेहतर एसिमिलेट (assimilate) करेंगे और उसका अनुवाद अच्छा होगा। अच्छा अनुवाद फेथफुल (faithful) भी होना चाहिए और उसमें मूल कविता की आत्मा भी आनी चाहिए। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि मक्खी पर मक्खी मारी जाये। शेफ़र्ड पीच के अनुसार ‘‘Translation is not just translating ideas from one language to other; a good translation is always akin to the original poem, sometimes even better.’’ ट्रांसलेशन केवल ट्रांस्लेशन न होकर ट्रांस्क्रिएशन होना चाहिए तभी अनुवाद में मूल कविता की आत्मा आ पाएगी। अत: कविता के अनुवाद का काम कविता लिखने से कमतर नहीं है।

हालाँकि अंग्रेज़ी कविताओं का अनुवाद करना मैंने बहुत पहले शुरू कर दिया था, इस संकलन की अधिकांश कविताओं का अनुवाद पिछले सात-आठ वर्षों में किया गया है। कवितायें ऐसी चुनी गई हैं जो कि बहुत मशहूर हैं। स्वाभाविक है कि इस चुनाव में बहुत-सी दूसरी अच्छी और मशहूर कवितायें छूट गई हैं। दो-एक बड़े कवियों का प्रतिनिधित्व भी नहीं हो सका।
समय के साथ, अंग्रेज़ी भाषा में बदलाव आते रहे हैं, विशेषकर स्पेलिंग में। इस पुस्तक में वही स्पेलिंग रखे हैं जो कवि के जीवनकाल में प्रचलित थे। विक्टोरियन युग की अंग्रेज़ी और आज की अंग्रेज़ी में अंतर है ही।
मुझे उम्मीद है कि जिन पाठकों को अंग्रेज़ी कविता पढ़ने का अधिक अवसर नहीं मिला यह पुस्तक उनकी एक कमी को पूरी करेगी, और जिनका अंग्रेज़ी कविता से सरोकार है वे इसे रुचिकर पाएँगे। विद्यार्थी इस संग्रह से विशेष रूप से लाभान्वित होंगे। अनुवाद के साथ कवियों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है, यह परिचय बहुत हद तक इन कवियों की मेरी निजी समझ पर आधारित है।

कुलदीप सलिल


विलियम शेक्सपियर
(1564-1616)


शेक्सपियर अंग्रेज़ी भाषा के या शायद किसी भी देश और भाषा के सबसे बड़े कवि-नाटककार हैं। उनकी सैकड़ों पंक्तियाँ सूक्तियाँ बन चुकी हैं। जीवन और मानव-मन की शायद ही कोई ऐसी स्थिति हो, जिस पर उनकी कोई अविस्मरणीय उक्ति न हो। जीवन की ऐसी गहरी समझ, मानव-मन का ऐसा सूक्ष्म अध्ययन और मानव-अध्ययन की ऐसी पकड़ शायद ही किसी और कवि के यहाँ मिले। उन्होंने अनगिनत पात्रों का सृजन किया, जो एक दूसरे से एकदम अलग तथा पूर्ण रूप से विश्वसनीय, वास्तविक और जीवंत हैं। इसमें से कई पात्र तो अमर हो गए हैं जैसे फालस्टाफ, हैमलेट, जेक्स, ‘किंग लीय्’ और ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का यहूदी तथा परासपैरो, कैलीबान, मिरांडा आदि। इनके नाटकों में दर्जनों राजे, रानियाँ और खलनायक हैं, परन्तु कोई दो राजे़ या कोई दो खलनायक एक जैसे नहीं हैं। ये पात्र जितने अलग पहचान वाले हैं उतने ही सार्वभौमिक हैं। आप हैमलेट है, या ‘शायलाक मत बनों’- जैसे वाक्य आज मुहावरों का दर्जा पा गए हैं। विस्मय होता है कि एक ही व्यक्ति जीवन के इतने विविध और विपरीत पहलुओं का ऐसा प्रामाणिक चित्रण कैसे कर सकता है। उनके पात्र ही प्रामाणिक नहीं हैं, तरह-तरह की स्थितियाँ भी प्रामाणिक है !

पात्रों के सृजन, मानव-मनोविज्ञान आदि की समझ के अलावा शेक्सपियर की महानता का रहस्य उनके उद्दात और महान् कवि-पक्ष में निहित है। ये कविता के जादूगर हैं। रोमन और यथार्थ, बुराई-भलाई, सुख-दु:ख, प्रेम और विरह, मन की उधेड़-बुन, चक्र-कुचक्र, यानी जीवन-जगत का कोई ऐसा पक्ष नहीं, जो उनकी कलम की पैनी नोक से छूटा हो। जीवन का इतना बारीक अध्ययन और ऐसी उर्वर कल्पनाशीलता केवल उन्हीं के पास है। यदि यह कहा जाए कि इतनी विविधता, इतनी प्रामाणिकता और इतनी कल्पनाशीलता एक मानव की न होकर महामानव का ही हिस्सा है तो अतिशयोक्ति न होगी।

उनके जीवन के बारे में जानकारी कम ही उपलब्ध है। जन्म स्ट्रेटफर्ड-ऑन-एवॅन में हुआ, विधिवत् औपचारिक शिक्षा सम्भवत: स्ट्रेटफर्ड ग्रामर स्कूल में तीन-चार जमात तक ही हुई, परन्तु अपने परिवेश और होलेनशेड तथा प्लूर्टाक के ग्रन्थों का उन्होंने सूक्ष्म अध्ययन किया। फिर वे लंदन चले गए। पहले उन्होंने मंच से जुड़े छोटे-मोटे काम किए और धीरे-धीरे एक अभिनेता और नाटककार बन गए। 10 वर्ष के अन्दर एक लेखक के रूप में उनका नाम सारे लंदन में और उसके बाहर भी मशहूर हो चुका था। 46 साल की उम्र में जब वे ख्याति के शिखर पर थे, लंदन छोड़कर स्ट्रेटफर्ड-ऑन-एवॅन चले गए जहाँ बावन वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ।


Under the Greenwood Tree



Under the Greenwood Tree
Who loves to lie with me,
And turn his merry note
Unto the sweet bird’s throat,
Come hither! Come hither!
Here shall he see
No enemy
But winter and rough weather,
Who doth ambition shun
And loves to live i’ the sun,
Seeking the food he eats
And pleased with what he gets,
Come hither! Come hither! Come hither!
Here shall he see
No enemy
But winter and rough weather

(As You Like It)


हरे-भरे इस पेड़ के नीचे



हरे-भरे इस पेड़ के नीचे
कौन रहेगा मेरे साथ
और पंछियों का बन मीत
मधुर-मधुर गायेगा गीत

आये, आये खुशी से आए
कोई शत्रु नहीं यहाँ पर
न ही रुत कोई विपरीत

आये, आये खुशी से आए
धूप सेंकना जो चाहे,
छोड़ ख्वाहिशें दुनिया की
खुशी से मिल जाये जो, खाये।

आये, आये, खुशी से आए
आए जो भी आए मीत,
जाड़े के मौसम को छोड़
कोई शत्रु नहीं यहाँ पर
न ही कोई रुत विपरीत


All the World’s a Stage



All the world’s stage,
And all the men and women merely players.
They have their exits and their entrances,
And one man in his time plays many parts,
His acts being seven ages. At first the infant,
Mewling and puking in the nurse’s arms.
Then the whining school-boy, with his satchel
And shining morning face, creeping like snail
Unwillingly to school, And then the lover,
Sighing like furnace, with a woeful ballad
Made to his mistress’ eyebrow. Then a soldier,
Full of strange oaths, and bearded like the pard,
Jealous in honour, sudden, and quick in quarrel,
Seeking the bubble reputation
Even in the cannon’s mouth. And then the justice,
In fair round belly with good capon lin’d,
With eyes severe and beard of formal cut,
Full of wise saws and modern instances;
And so he plays his part. The sixth age shifts
Into the lean and slipper’d pantaloon,
With spectacles on nose and pouch on side,
His youthful hose, sav’d, a world too wide
For his shrunk shank’ and his big manly voice,
Turning aging toward childish treble pipes
And whistles in his sound. Last scene of all,
That ends this strange eventful history,
Is second childishness and mere oblivion,
Sans teeth, sans eyes, sans taste, sans every thing

(As You Like It)


सारी दुनिया एक मंच है



सारी दुनिया एक मंच है, नर-नारी सब अभिनेता
सात अवस्थाएँ जीवन की, सात अंकों के नाटक में
अपना-अपना खेल दिखाकर हर इनसान चला जाता।

दूध गिराता शिशु पहले रिरियाता माँ की बाँहों में,
मन मारे, बस्त लटकाये चींटी की फिर चाल से चलता
पढ़ने जाता सुबह-सवेरे उजले चेहरे वाला बच्चा,

और फिर आशिक आहें भरता आता तपती भट्टी-सा
आँखों पर प्रेयसी की लिक्खी दर्द भरी ग़ज़लें गाता।
फिर आता है एक सिपाही, दढ़ियल, अड़ियल, कसमें खाता

लड़ जाता सम्मान की खातिर बात-बात पर,
पैनी दृष्टि, गोल तोंद लिए सूक्तियों का इक भण्डार
नये-नये उदाहरण देता, न्यायधीश फिर मंच सजाता

छटी अवस्था लेकर आती ढलक-ढलक जाती जुर्राबें
टाँगें सूखी, नाक पे चश्मा, ढीला-ढीला पाजामा
मरदाना आवाज के बदले रह जाती जब शिशु-सी चीखें
आँखें धुँधली, दाँत नदारत, स्वाद गए सब
इक पिंजर, जब रह जाता है।
इस अद्भुत, इस अहम इतिहास का
आ जाता है अन्तिम दृश्य,
फिर से बचपन लौट आता है।



To Be or Not to Be



To be, or not to be: that is the question.
Whether ‘tis nobler in the mind to suffer
The slings and arrows of outrageous fortune,
Or to take arms against a sea of troubles,
And by opposing end them. To die; to sleep;
No more; and by a sleep to say we end
The heart-ache and the thousand natural shocks
That flesh is heir to. Tis a consummation
Devoutly to be wish’d. To die; to sleep;-
To sleep? Perchance to dream! Ay, there’s the rub;
For in that sleep of death what dreams may come,
When we have shuffl’d off this mortal coil,
Must give us pause. There’s the respect
That makes calamity of so long life:
For who would bear the whips and scorns of time,
The oppressor’s wrong, the [proud] man’s contumely
The pangs of dispriz’d love, the law’s delay,
The insolence of office, and the spurns
That patient merit of the unworthy takes,
When he himself might his quietus make
With a bare bodkin? Who would fardels bear,
To grunt and sweat under a weary life,
But that the dread of something after death,
The undiscover’d country from whose bourn
No traveler returns, puzzles the will
And makes us rather bear those ills we have
Than fly to others that we know not of?
Thus conscience does make cowards of us all;
And thus the native hue of resolution
Is sicklied o’er with the pale cast of thought,
And enterprises of great pith and moment
With this regard their currents turn [awry],
And lose the name of action.

(Hamlet)



हो कि न हो



हो कि न हो, सवाल ये है
मार खाते रहें मुकद्दर की, या
मुसीबतों के ख़िलाफ़ उठा हथियार
पार उतर जायें दुख के सागर से।

मौत क्या है ? एक लम्बी नींद
एक ऐसी नींद जिसमें दर्दे-दिल
और हज़ारो ग़म जो मुकद्दर हैं हमारा-
उनसे हो जाता है छुटकारा

और क्या होगा इससे अच्छा भला !
मौत यानी नींद, नींद यानी ख्वाब
इसी से बस, इसी से है मुश्किल तमाम
शरीर छोड़ने के बाद, सोचना पड़ता है, जाने
क्या-क्या ख्वाब आये नींद में

इसी लिए ज़िन्दगी की लम्बी मार
पड़ती है सहनी, वरना
कौन चाहेगा खाना कोड़े समय के
जब्र सहना
लताडे़ जाना, होना अपमानित अहंकारी व्यक्तियों से,
लिए फिरना टूटा दिल मुहब्बत में, कौन चाहेगा
कचहरियों के खाना धक्के,
किसे मंजूर होगा अफसरों की हिकारत सहना,
चाहेगा कौन करवाना अवहेलना मूर्खों से

अपनी योग्यता की
जब कि छुरी के एक ही वार से
मिल सकती है, मुक्ति,
ज़िंदगी के ताप से तपना, पिसना इसके बोझ से

मंजूर होगा किसे !
मगर एक अनजानी दुनिया का डर
कोई लौटा नहीं जहाँ से मुसाफिर
कुहासा करता है पैदा, करता है मजबूर

सहने पर
अज्ञात खतरों के बजाय
जानी-पहचानी मुसीबतों को।
अत: ज़रूरत से ज़्यादा अहसास
बनाता है भीरू हमको
सोच की दल-दल में डूब जाती है
कुदरती संकल्प-शक्ति हमारी
और अहम-से अहम उद्यम भी
खो देता है धार क्रियाशीलता की






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