अक्लांत कौरव - महाश्वेता देवी Aklant Kaurav - Hindi book by - Mahasweta Devi
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अक्लांत कौरव

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
आईएसबीएन : 9788183611619 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :114 पुस्तक क्रमांक : 6089

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यह उपन्यास सामयिक वाम-राजनीति के परस्पर विरोधी पक्षों के संघर्ष का प्रामाणिक दस्तावेज है...

Aklant Kaurav a hindi book by Mahasweta Devi - अक्लांत कौरव - महाश्वेता देवी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह उपन्यास सामयिक वाम-राजनीति के परस्पर विरोधी पक्षों के संघर्ष का प्रामाणिक दस्तावेज है और इतनी परिपक्व राजनीति सूझबूझ और प्रखर सामाजिक चेतना से ओतप्रोत कि वाम-राजनीति की विचारधाराओं के घटाटोप आकाश के स्पष्ट दिशा-संकेत देता है।

संथालों के जागुला गाँव में द्वैपायन सरकार का आगमन एक ऐसी थीसिस लिखने के लिए होता है, जिसका उद्देश्य संथालों को डरपोक गैर-लड़ाकू सस्ते में खरीदी जानेवाली आदिवासी की एकता को छिन्न-भिन्न किया जा सके। वाम-राजनीति के दक्षिणी छोर के स्थायी निवासी द्वैपायन सरकार किन्ही अदृश्य शक्तियों से चलित होकर अक्सर इसी तरह के विषयों के अनुसंधानकर्ता के रूप में प्रख्यात हैं; किन्तु अब उन्हे पहचान लिया गया है।

युवा इन्द्र प्रामाणिक कलकत्ता के यूनियन फ्रंट पर बड़े नेताओं के बदलते तेवर देखकर ईमानदारी से गाँव में काम करने के लिए आया है, किन्तु नवीन बाबू और मोती बाबू जैसे सजे-धजे काडरों का उसे नक्सल सिद्ध करने में कौन-सास मकसद है?

ईमानदार काडर और बेईमान काडर तथा छुटभैये कॉमरेडों के इस संघर्ष में संथालों को अपनी विश्वसनीय पक्ष ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती।

यह उपन्यास पश्चिमी बंगाल सरकार द्वारा खेतिहर भूमि के बँटवारे के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन बर्गा’ के लाभो से वंचित आदिवासी जातियों की न्याय की लड़ाई का प्रामाणिक दस्तावेज है।

 

अक्लांत कौरव

 

1980 का सूखा जोरों से हावी होता कि जागुला में बारिश शुरू हो गयी। जागुला अभी शान्त है, एकदम शान्त। यह शान्ति अग्निगर्भी है या वाकई वास्तविक, पता नहीं चलता।
जागुला आने से पहले द्वैपायन सरकार ने सब—कुछ पता लगा लिया था। हालाँकि वह एक प्रौढ़ रिसर्चस्कॉलपर है और वाम राजनीति के दक्षिणी छोर का स्थाई निवासी है, फिर भी जाने कौन लुटेरे उसके मष्तिष्क-कोष को खोदकर सब-कुछ उठा ले गए और उसके अनदेखे में एक नियन्त्रक मशीन उसके चिन्तन-कोष में बैठा गए हैं। फलस्वरूप बाहर से चेहरा पहले जैसा ही है, मगर दिमाग में अजीब-अजीब से ख्याल मँडराते रहते हैं। लुटेरे लोग इस मुल्क के बहुतेरे मस्तिष्कों को आजकल नियन्त्रित कर रहे हैं। फलस्वरूप नियन्त्रित इन्सान मुल्क और मुल्क के इन्सान के लिए नुकसानदेह बहुत सोचते है, काम करते हैं और उसके बाद भी अपने को ईमानदार तथा विवेकशील समझते हैं। सभी कुछ लुटेरों के मन मुताबिक होता है। लुटेरों का एक मात्र मकसद है शोषितों के खेमें हिंसात्मक तथा सशस्त्र प्रतिवाद फिर कहीं न दिखाई दे, ताकि हिंसात्मक तथा सशत्र होने का एकमात्र अधिकार शासको के पास ही रहे।

द्वैपायन सरकार की उम्र साठ साल है। चेहरा सुतवाँ, बुद्धि तेज। अपने पीछे वह एक रक्ताक्त अतीत छोड़ आया है और उसे ही मिटाने के लिए उसने अब अहिंसा, साम्यवाद, समाजवाद जैसे पंचरंगी प्रोग्रामों की दीक्षा ली है।
शोध के सिलसिले में ही उसका जागुला में आगमन हुआ है अचानक। दरअसल अगर मातो डोम भूत के डर से न डरता तो धर्मपूजा के मेले में हुल्लड़ में द्वैपायन के अचानक आगमन पर किसी का ध्यान ही न जाता।

मातो रिक्शा तेजी से चलाता है और आदत के मुताबिक कभी भी रिक्शा की बत्ती नहीं जलाता। लालमोहन कांस्टेबल ने थाने के सामने उसे रोका और बगैर बत्ती के रिक्शा चलाने के लिए ‘साले को बहुत गर्मी चढ़ी है’ कहकर उसकी जेब पर झपट्टा मारने की कोशिश की। पैसे के बदले धर्मठाकुर के भार-जन्तर पाकर लालमोहन चिढ़कर चिल्लाने लगा। झगड़े को रोकने के लिए देवकी मिसिर ने बाहर निकलकर दोनोंको फटकारा तो मातो कहने लगा, ‘‘भूत देखकर भागा, इसीलिए बत्ती जलाने की बात याद नहीं रही।’’
‘‘भूत ?’’
‘‘हाँ, भूत।’’
‘‘कहाँ ?’’
‘‘काली बाबू के दफ्तर में।’’
‘‘आँ ! क्या कहता है ?’’
‘बाबू, कालीबाबू तो कब के मर गए। उनके अखबार का दफ्तर भी बन्द रहता है। वहाँ जाकर देखा, वह बैठे हैं बत्ती जलाकर। देखकर डर गया।’’
अब देवकी मिसिर बहुत ही चिढ़ गया। कहने लगा, ‘‘मर गया ? काली बाबू ?’’
‘‘हाँ, बाबू !’’

‘‘’साला, थाने की दीवार पर उसकी तस्वीर क्यों टँगी रहती है ? लापता हैं, नहीं जानते ? मर गया !’’
शराब के नशे और प्रेत के डर से बेबस मातो ने कहा, ‘‘वह जिन्दा नहीं हैं, मर गए हैं।’’ वह रो पड़ा, ‘‘भले आदमी को मार दिया, बाबू ! उसके परिवार को पातकी बना डाला।’’
‘‘क्या कह रहा है तू ?’’
‘‘सभी को पता है। बसाई टुडु को खत्म करने के लिए पुलिस चरसा के जंगल में घुसी थी। बाप रे मिलेट्री ! काली बाबू भी वहाँ थे। बसाई को न पाकर उसे ही मारकर जंगल में डाल दिया। बेतुल काउरा वहाँ से हड्डियों को चद्दर में बाँधकर ला रहा था, उसे भी मार डाला। सारी कहानी हाट-बाजार में फैल गई। तुमने और थाना बाबू ने उस समय कितनी दौड़ -धूप की थी। उसके बाद सामन्त बाबू ने जाने क्या सलाह दी कि काली बाबू की तस्वीर खोलकर टाँग दी गई कि काली बाबू अभी भी जिन्दा हैं, लापता हैं ! उनकी पत्नी को भी यही बताया था। इसीलिए तो वह सिन्दूर नहीं पोंछती, लोहा नहीं उतारती। काली बाबू को तुम लोगों ने मार डाला है न ?’’

‘शराब पीकर तू पागल हो गया है ? ऐसी बात कहने पर तुझे भी हवालात में डाल दिया जाएगा।’’

‘‘किरिया-करम नही हुआ, इसीलिए मरा हुआ आदमी घर पर आकर बैठा है। मैंने देखा है।’’
‘‘गलती की, मेरे बाप !’’
देवकी मिसिर ने बहुत ही परेशानी में मातो को बाप कह डाला।
1977 के बसाई टुडु-ऑपरेशन में चरसा के जंगल में पुलिस ने काली साँतरा को मारकर उसी जंगल में लाश फेंक दी थी। महीने-भर बाद बेतुल काउरा उसकी हड्डी, चश्मा तथा सड़ी-गली चप्पल निकाल, चद्दर से बाँधकर थाने में ले आया और थाने में उसे जमा करके काली की मौत को लेकर बहुत रोया-गाया। फलस्वरूप उसे भी मरना पड़ा। यह तमाम बातें सत्य हैं और कोई भी घटना सामन्त या एस-आई. या देवकी से छिपी नहीं है। इसीलिए काली साँतरा की तसवीर टाँगकर उसे ‘लापता’ घोषित किया गया है। काली की पत्नी गिनिमाला को सधवा के लिबास में रहने को कहा गया। देवती अब इस बारे में बातचीत नहीं करना चाहता। इसीलिए उसने मातो से कहा, ‘‘घर जा, बाप ! वह तो कोई बाबू है। किसी काम से आया है। बैठकर काली बाबू का अखबार देख रहा है, इसी से तू डर गया। काली बाबू का समाचार अगर दे सका तो बख्शीस मिलेगी।’’

मातो आँखे पोंछता है। फिर सिर हिलाकर करने लगा, ‘‘नहीं बाबू, वह काम अब नहीं करता। बाबा अब मेरे साथ बातचीत करता है। बाबा ने मना किया है। थाने में खबर भी नहीं करेंगे, पैसे भी नहीं लेंगे।’’
‘‘रतन क्या कहता है ?’’
‘‘कहता है, वह गुहखोरी का काम है। तुझे रुपया भी नहीं मिला और बस में तेरी नौकरी भी नहीं लगी....। और मत जाना।’’
‘‘तब तो अच्छी बात है। घर जा। रतन कहाँ है ?’’
‘‘घर पर।’’
‘‘अब क्या करता है ?’’
‘‘मैं क्या जानू ?’’
मातो चला गया। देवकी मिसिर ने सिर हिलाया। छोटी जात का रुतबा बहुत बढ़ गया है। मातो खोचर1 का काम नहीं करना चाहता। कभी करता था। रतन, उसका बाप जरूर उसे सलाह दे रहा है।

लालमोहन कांस्टेबल देवकी के साथ कमरे में आकर बैठ गया। उसके बाद कहने लगा, ‘‘मेले में बहुत बात बढ़ी, मिसिर जी। धरमराज के मेले में हम लोग उगाही तो करते ही हैं। इस बार इन्दर बाबू ने सबसे मना किया है, किसी ने कुछ नहीं दिया। इन्दर बाबू क्या पार्टी का काम नहीं करता ?’’
‘‘कौन ? इन्द्र प्रामाणिक ? वह यहाँ ?’’‘
‘‘हाँ, मिसिरजी !’’
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1-खूफियागिरी

देवकी मिसिरजी ने कहा, ‘‘अब सब समझ गया। तू जा।’’ मन ही मन उसे खतरे का अन्देशा मिला। ‘इन्द्र प्रामाणिक’ नाम बहुत ही परेशानी में डालनेवाला है। राजनीति के खेल में खरीद-फरोख्त, भाग-बँटवारा हो जाने के बाद इन्द्र प्रामाणिक जैसा युवक सभी को परेशानी में डालनेवाला है। पार्टी को भी। पश्चिमी बंगाल में हर जगह जैसा चल रहा है, जागुला में भी वैसा ही है। जागुला में जो कुछ हुआ है, उसे अच्छी तरह समझने पर सारे पश्चिमी बंगाल के मानचित्र को मोटे तौर पर समझा जा सकेगा। इस भयंकर रूप से जटिल या निहायत ही सरल मानचित्र में पश्चिमी बंगाल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी के लिए इन्द्रप्रामाणिक जैसा ईमानदार और लड़ाकू कैडर एक जंजाल है। स्थानी जनप्रतिनिधि सामन्त के लिए भी। देवकी मिसिर के लिए तो है ही सामन्त और सामन्तपंमा पार्टी के लोगों के लिए आज इन्द्र प्रामामिक की अपेक्षा देवकी मिसिर अधिक जरूरी है, अधिक भरोसे के काबिल है। विश्वसनीयता के क्षेत्र में देवकी या एस-आई. निश्चय ही इन्द्र के पाँव के नाखून के लायक नहीं हैं। मगर पार्टी-नेतृत्व के लिए आज इन्द्र जैसे कैडरों की अपेक्षा थाना-पुलिस अधिक जरूरी है। पुलिस को खुश करने की बात को लेकर ही इन्द्र और सामन्त में बड़ा वितण्डावाद मचा। सामन्त ने उस दिन जल-भुन कर कहा, ‘‘कली साँतरा गया—तुम आए। विवेक की भूमिका देख रहा हूँ, अब तुम्हारी बारी है।’’
‘‘काली-दा का नाम आप जुबान पर न लाएँ।’’

‘क्यों, उस योग्य नहीं हूँ ?’’
‘‘नहीं। पार्टी की इमेज आप लोगों की दुआ से बहुत पहले ही सड़ने लगी है। इसीलिए काली-दी को विवेक का बोझ ढोना पड़ता था। मुझे आप काली-दा के बराबर मत रखिए। मैं उनके पैर की धूल के बराबर भी नहीं हूँ।’’
‘‘ज्यादा उछल-कूद मत करो।’’
‘‘पार्टी के लड़के को पुलिस ने नहीं मारा ? मिसिर ने सिर्फ नक्सलों को मारा था ? पचहत्तर में कितने लड़के मरे थे ? उसी पुलिस को मदद दे रहे हैं। उसे माई-बाप-भाई कह रहे हैं, मामला क्या है ?’’

‘‘काली उस तरह का था। तुम, देख रहा हूँ...!’’
‘‘काली ‘था’ कह रहे हैं, पहले कहा था ‘काली गया’ ! काली-दा का आप लोगों ने क्या किया, सामन्त-दा ? ‘सा क्या किया आपने कि उसे लेकर सभी बातें कर रहे हैं ? क्या वह सच है ? किसके निर्णय से सामन्त, किसके निर्णय से ?’’
सामन्त उठकर चला गया था। परेशानी बहुत बढ़ रही है। काली साँतरा लापता है, उसे ढूँढ़ा जा रहा है, इस पर किसी को भी विश्वास नहीं। इन्द्र को भी विश्वास नहीं है। बहुत ही गुस्से में आकर सामन्त ने काली के लड़के अनिर्वाण को बुला भेजा था और अपने विख्यात गम्भीर स्वर में कहा था, ‘‘मामला क्या है ?’’
‘‘क्यों, सामन्त चाचा ?’’

‘‘बाप लापता हो गया है, इस आशय का बीच-बीच में अखबार में विज्ञापन तो दे सकते हो। यह काम क्या मेरा है ?’’
काली साँतरा के प्रति उसके लड़के को कोई श्रद्धा नहीं थी। फिर भी काली के मामले में तमाम बाजारू समाचार उसे भी पता है। उसने कहा, ‘‘माँ ने मना किया है। मुझे भी नहीं लगता कि इससे कोई फायदा होगा।’’
‘‘तुम्हारी पत्नी ने कलकत्ते में नौकरी कर ली है ?’’
‘‘हाँ।’’
अनिर्वाण ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘माँ ने यहाँ का मकान, जमीन सब-कुछ बेच देने के लिए कहा है।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘कलकत्ता जाना है।’’
सामन्त तुरन्त ताड़ गया कि काली किस तरह मारा गया है, काली की पत्नी और लड़के को भली भाँति पता है। वे लोग चले जा रहे हैं, यानी डर गए हैं।
‘‘जो तबीयत में आए करो। इन्द्र...इन्द्र ने कुछ कहा है ?’’

अनिर्वाण अचानक सामन्त को हक्काबक्का करते हुए रो पड़ा। फिर आँखों से आँसू पोंछता हुआ बोला, ‘‘पिताजी की उपेक्षा करता रहा। उनकी कीमत नही जानी, ऐसा कहकर लोग मेरी छी-छी करते है। माँ ने सिन्दूर भरना नहीं छोड़ा, इसलिए भी लोग कितनी बातें करते हैं। सामाजिक निमंत्रण पर भी नहीं बुलाते। अगर किसी तरह इस बारे में उस समय सरकारी रिपोर्ट दर्ज करा देते ! सभी लोग कहते हैं कि पिताजी को मार डाला है। आप लोग कहते हैं कि वे लापता हो गए हैं। हम लोग क्या करे ? बेतुल को भी...बेतुल को उनका चश्मा मिला था, वह प्रमाण था। वह अगर आप हमें दे देते तो हम उस समय रिपोर्ट दर्ज करा देते। जब हम लोगों की इस तरह बेइज्जती तो नहीं होती।’’
‘‘तुम कुछ समझ नहीं रहे हो...।’’
‘‘माँ कलकत्ता जाकर गेरुआ धारण करेगी। बारह साल बाद सफेद वस्त्र पहनेगी। हम लोग जा रहे हैं, सामन्त चाचा।’’
‘‘काली नहीं है, प्रमाण पाए बगैर ही मान लोगे कि वह नहीं है ? ऐसा भला कैसा होगा ?’’

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