पोस्टमैन - यादवेन्द्र शर्मा Postman - Hindi book by - Yadvendra Sharma
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पोस्टमैन

यादवेन्द्र शर्मा

प्रकाशक : अनुरोध प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-88135-21-6 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :128 पुस्तक क्रमांक : 5857

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प्रस्तुत है सामाजिक उपन्यास.....

Postman

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘पोस्टमैन’ हिन्दी और राजस्थानी भाषा के विख्यात रचनाकार यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ का ऐसा उपन्यास है जो पाठकों तथा समीक्षकों को एक नये चरित्र से परिचित कराता है—एक ऐसा नया चरित्र जो हिन्दी-कथा साहित्य में सम्भवतः पहली बार ही देखने को मिलेगा। प्रस्तुत उपन्यास में ‘डाकिया’ के जीवन के द्वन्द्व, संघर्ष और आन्तरिक यथार्थ को सशक्त ढंग से उजागर किया गया है। कथ्य में नवीनता, भाषा और सहजता तथा शैली में मार्मिकता स्पष्ट दिखाई देती है। इस अपठनीयता के युग में श्री यादवेन्द्र ‘चन्द्र’ का यह उपन्यास सहृदय पाठकों को बेहद भाएगा, ऐसा विश्वास है।

मैं इतना ही कहूँगा

पोस्टमैन मेरा ऐसा उपन्यास है जो अपने कथ्य के कारण आपको पठनीयता का नया आस्वाद देगा।
राजस्थानी परिवेश और उसके जीवन को प्रसूत करनेवाला यह उपन्यास उन आन्तरिक सत्यों का उद्घाटन करता है जो कहीं-न-कहीं आपको अपने लगेंगे। सहज जीवन इस बाज़ारवाद में जीना दुष्कर है। जीवन की विसंगतियाँ कैसे-कैसे कौंचती हैं और इन्सान कैसे-कैसे उन्हें झेलता है, यह समझने की बात है।
आप इसे पढ़कर अपनी राय भेजिए।

यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’

पोस्टमैन

पहला पहलू


सूनी-सपाट पगडण्डी। अन्तहीन व्यथा की कथा लिये इस सूनी पगडण्डी के पहले मोड़ पर एक चबूतरा बना हुआ है। कुछ दिन पहले की बात है कि इसी भैंरू बाबा के चबूतरे के समीप उगे खेजड़े के टूटते छाया-वृत्तों के तले एक युवती ने अपनी काया का लिबास बदल लिया, यानी वह औरत से चुड़ैल बन गई; डायन हो गई।
रामदास को मालूम है उस युवती की अपार व्यथा-कथा।

सोमवार का दिन था। वह रियासत के बड़े पोस्ट ऑफ़िस से डाक-चमड़े का बना थैला और शिनाख्त रजिस्टर लेकर चला। उसके सिर पर दो धारी-वाला साफा था जिसका लाल रंग दूर से चमकता था। कमर में बैल्ट था जिस पर अंग्रेजी में लिखा था—विलेज पोस्टमैन—गाँव का डाकिया।

उम्र होगी यही उन्नीस-बीस वर्ष। गठीला बदन। गेहुंआ रंग। आकर्षक आँखें। सुन्दर होंठ पर दाँत कुछ पीलापन लिये हुए। वह नोकदार जूती पहने हुए था जो चलते समय चर्रमर्र-चर्रमर्र की ध्वनि करती थीं। जूती नई थीं जिसे वह अभी-अभी बारह आने में लाया था। किसी परिचित मोची से सस्ती बनवाई थीं जिसका मनीऑर्डर रामदास हर माह लाता था। मोची का बेटा फ़ौज में था। ...दूसरे महायुद्ध में वह मिस्र तक लड़ आया था। जूती को मुलायम करने के लिए उसने तेल लगा लिया था जिससे धूल की परत उस पर जम गई थी।
वह सोमवार को निकलता था और रेगिस्तान की बन्ध्या धरती के फैले अनाकर्षक आँचल को नापता हुआ वापस शनिवार को लौट आता था।

आज भी वह डाक लेकर निकला।
शहर के बाहर बजरी की खान थी। मजदूर लोग खान में से बजरी निकाल रहे थे। दो लादे-वाले अपने लादों को बेचकर धीरे-धीरे एक लोक-गीत गुनगुनाते हुए जा रहे थे—

खेजड़ी रो खेतरपाल रे
भैंरू भलो रे भलो....।

दोनों लादे-वाले की दाढ़ियाँ बेतरतीब थीं। खान के समीप ‘अकूड़ी’ थी जिसके पास गिद्घ बैठे हुए थे जो शायद किसी मरे जन्तु की प्रतीक्षा में थे।
रामदास अपने हाथ की लकड़ी खड़खटाता हुआ बढ़ा जा रहा था। खट्-खट् की गति से लगता था कि उसकी चाल तेज है। वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रहा है।

‘‘डाकिया जी !’’ एक पतली-सी आवाज आई। आवाज एक ‘खोले’ (खड्डे) में से आ रही थी—कुछ प्रतिध्वनि करती हुई। रामदास रुक गया। उसने इधर-उधर देखा। सामने से गवरली कुम्हारिन आती हुई दिखाई पड़ी। लाल ओढ़ना, पीला लहंगा, पाँव में चाँदी की कड़ियाँ, सिर पर बोरला। छाती पर काँचली जो पीछे से कसियों से बँधी हुई थी। रंग काला।
‘‘डाकिया जी !’’ वह रामदास के समीप आकर खड़ी हो गई।
‘‘क्या है ?’’
‘‘चिट्ठी !’’ वह शरमा गई।

गवरली का पति कई सालों से दिल्ली चला गया था। गवरली उसे पसन्द नहीं थी। उसका काला रंग उसकी आँखों में नहीं बसा। वह उसे हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। वहाँ जाकर उसने एक चिट्ठी लिखी। वही उसकी पहली और आखिरी चिट्ठी थी। गवरली के नाम नहीं, अपने बाप के नाम ! लिखा था—सिद्धि श्री दिल्ली शुभ स्थाने लिखी पुज्य काका जी से हरखू का पाँव धोक बंचना ! मैं अब वापस नहीं आऊँगा। ऐसे लुगाई के संग मेरा निर्वाह नहीं हो सकता।
परती का दुःख हो गया गवरली का दुःख !...धीरे-धीरे यौवन की अमराइयाँ जब उसके अंग-अंग में खिल गईं, तब वह भी अपने पति की ‘अडीक’ रखने लगी। प्रतीक्षा में डूबी आँखें सावन-भादों की रातों में तारों को गिनती रहतीं। निर्दय पति को कोसतीं। फिर बावली-सी आकर हर सप्ताह रामदास से पूछती, ‘‘डाकिया जी, मेरी कोई चिट्ठी ?’’

रामदास उसके चेहरे पर गहरी वेदना की रेखाएँ देखता। उसका मन एक कसक से भर जाता। वह अपने साफे को सिर पर दबाता हुआ कहता, ‘‘नहीं, तेरी कोई चिट्ठी-पत्री नहीं।’’ यही सदी का प्रश्न और यही सदा का उत्तर।
और आज भी।

‘‘डाकिया जी, आज मेरी चिट्ठी जरूर आनी चाहिए। आज भोर होते हैं मेरे घर के आंगन की मुंडेर पर कौवा बोला था—काँव-काँव !...डाकिया जी, आज चिट्ठी आनी ही चाहिए।’’
‘‘तू पगली है। चिट्ठी आती तो तुझे जरूर देता। अरी, चिट्ठियाँ बाँटने के लिए ही तो अंगरेजी सरकार मुझे महीना (तनखा) देती है।’’
गवरली की आँखें गीली हो गईं। टूटे हुए इन्सान की तरह वह धीरे-धीरे घाटी में उतर गई। डाकिया रामदास का भावुक हृदय उसके दुःख से भर आया। वह जाती हुई गवरली को देखता रहा। शायद वह गुनगुना रही थी। रामदास के पाँव रुक गये। सुरीला तीखा स्वर आ रहा था :

साजन घर आओ जी,
म्हलां में डरपै सुन्दर अकेली...।

रामदास चल पड़ा। आगे रेतीली पगडण्डी थी। वह सोचता हुआ जा रहा था—साजन अब तो घर आ जाओ, महल में ‘सुन्दर’ अकेली डरती है।...वह चला जा रहा है।
सूना सपाट रास्ता आ गया था। दूर-दूर तक कोई भी गहर-गम्भीर बड़ा वृक्ष नहीं। छोटी-छोटी ‘बोटियाँ’, कैर के पल्लवहीन छोटे-छोटे पेड़ और एकाध खेजड़ा। रामदास इस धरती की प्रकृति से परिचित है। ठण्ड से बेहद ठण्डी और गर्मी में आग की तरह तपती हुई ! दम लेने को कोई ठाँव नहीं, छाँव नहीं। सिर्फ चलना। एक निरन्तर यात्रा ! उसे जाना पड़ता है पूरे सप्ताह-भर शहर के आस-पास गाँवों में डाक बाँटने। वह अब भी चला जा रहा था। गर्मी जब बहुत तेज हो गई तो उसने अपने कन्धे के पीछे झूलते छाते को खोल लिया। गमछे से पसीने को पोंछा।..थोड़ी दूर पर गवरली का गाँव दिखाई दे रहा था। वह तेज कदम बढ़ाने लगा।

गाँव की हद पर कुआँ बना हुआ था। दीनू माली कुएँ की ‘साल’ में बैठा हुआ था। कुएँ के आस-पास नीरवता छाई हुई थी। पास खड़े नीम के विशाल पृक्ष की छाया के नीचे गाँव के कई ढोर इकट्ठे होकर इत्मीनान से जुगाली कर रहे थे।
रामदास को देखते ही दीनू ने ‘बरत’ को ठीक करते-करते कहा, ‘‘पालागी, डाकिया जी। ‘सैर’ की कोई नई खबर।’’
‘‘सब ठीक है, दीनू काका ! क्या हो रहा है ?’’
‘बरत’ दो-चार माह से घिस गई थी इसलिए उसे वापस गूँथ रहा हूँ। संझा पड़े एक ‘कोठा’ सेठ बनवारीलाल जी की ओर छोड़ा जाएगा।...डाकिया जी, इस गर्मी के मौसम में पानी के दान से बड़ा कोई पुण्य नहीं है।...सेठ हर साल एक-दो कोठे पानी गाँव-वालों को मुफ्त का देता है। बड़भागी है यह।’’
‘‘अरे काका, ये सब पैसों की माया है। खूंजो (जेब) भारी तो दुनिया थारी !....काका ! जेब भारी हो दुनिया सारी की सारी तुम्हारी है। अच्छा....राम-राम !’’

रामदास गाँव में घुस गया। गाँव में उसे देखते ही हलचल मच गई।
छोटे-छोटे नंग-धड़ंग बच्चे चिल्लाते हुए इधर-उधर भाग गए। जिनके घर वाले परदेश थे, वे जल्दी-जल्दी आने लगे। रामदास थैला खोलकर बैठ गया। गाँव की डाक, मनीऑर्डर और कार्ड-लिफाफे उसने तरतीब से सजा लिये।
सेठ गोकुलदास, पन्ना माली, रामदेव की माँ और..प्रायः सारी चिट्ठियाँ रामदास को ही पढ़नी पड़ती थीं। उस गाँव की डाक अधिक होती थी। इसमें सेठ बनवारीलाल की डाक सबसे ज्यादा। उसे लगभग पाँच-सात इण्टीमेशन्स भी देने पड़ते थे। हर हफ्ते उसकी कोई-न-कोई बीमा रजिस्ट्री आती थी। उससे ही रामदास को शिनाख्त करानी होती थी कि वह यहाँ डाक बाँटने आया था।

उसके बाद वह चल पड़ता-डाक बाँटने। डाक बाँटकर वह साँझ के समय सेठजी का पाहुना बनता।...वहीं छाछ, रबड़ी और बाजरी को रोटी खाता।
रात को उन्हीं की हवेली में सो जाता।
सुबह ठीक पाँच बजे उठता।
दीनू काका के कुएँ पर से ‘बारे’ को उंडेलने की आवाज आती, ‘‘आया रे !’’ तीखी और मीठी आवाज। इसके बाद बैलों में लगी ‘बरत’ की कील खुलती। पानी का ‘बारा’ फिर कुएँ में जाता।.....कुएँ के ऊपर का ‘भूंगल’ घूमता—घर्ररऽऽ घर्ररऽऽ...। गति तेज होती.... और तेज होता....धम् !
फिर दो नए बैल आते। फिर वही....थोड़ी देर में—‘‘आयो रे....’’

रामदास समझ जाता कि दीनू काका कुएँ में से पानी निकालने लग गया है। वह उठता। ‘जंगल’ जाता। कुएँ पर आकर नीम का दातुन करता और नहाता। फिर राम-राम का जप करता.....और चल पड़ता।
रास्ते में गायों के रंभाने की ध्वनि सुनता। वही साफा। वही पट्टा...और वही आवृत में घिरा हुआ जीवन ! सीधे-साधे लोग, जहाँ सत्य के सिवाय कुछ नहीं, जहाँ सादगी के सिवाय कुछ नहीं। लगता था, उन तमाम गाँवों में एक भाईचारा, एक कौटुम्बिक परम्परा और अलग-अलग धर्मों के मानने वाले होने पर भी एक आन्तरिक समता और अखण्ड प्रेम है !
रामदास गाँव के बाहर की गोचर भूमि से गुजर रहा था। सौकड़ों गायें चर रही थीं। इस गोचर भूमि में अलखिया बाबा रहते थे। तेजस्वी अलखिया बाबा अपनी धूनी के आगे चिमटा गाड़े ‘अलख निरंजन...अलख निरंजन’ की रट लगाते रहते थे।
रामदास ने उनकी झोंपड़ी के आगे जाकर कहा, ‘‘जय अलख निरंजन, बाबा !’’
बाबा ने लाल लंगोट पहन रखा था। तन पर ‘भभूत’ लगाए हुए थे।

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