परीक्षा गुरु - लाला श्रीनिवास दास Pariksha Guru - Hindi book by - Lala Shriniwas Das
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परीक्षा गुरु

लाला श्रीनिवास दास

प्रकाशक : अनुरोध प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-88135-23-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :200 पुस्तक क्रमांक : 5848

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हिन्दी का पहला उपन्यास....

Pariksha Guru

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

परीक्षा-गुरु

प्रकरण-1
सौदागर की दुकान


चतुर मनुष्य को जितने खर्च में अच्छी प्रतिष्ठा अथवा धन मिल सकता है, मूर्ख को उससे अधिक खर्चने पर भी कुछ नहीं मिलता।

लार्ड चेस्टरफ़ील्ड

लाला मदनमोहन एक अँग्रेजी सौदागर की दुकान में नई-नई फ़ैशन का अँग्रेजी अस्बाब देख रहे हैं। लाला ब्रजकिशोर, मुंशी चुन्नीलाल और मास्टर शम्भूदयाल उनके साथ हैं।
‘‘मिस्टर ब्राइट ! यह बड़ी काच की जोड़ी हमको पसन्द है, इसकी कीमत क्या है ?’’ लाला मदनमोहन ने सौदागर से पूछा।
‘‘इसके साथ की जोड़ी अभी तीन हजार रुपये में हमने एक हिन्दुस्तानी रईस को दी है लेकिन आप हमारे दोस्त हैं, आपको हम चार सौ रुपये कम कर देंगे।’’
‘‘निस्सन्देह ये काच आपके कमर लायक हैं, इनके लगने से उसकी शोभा दुगनी हो जाएगी।’’ शम्भूदयाल बोले।
‘‘आहा ! मैं तो इनके चोखटों की कारीगिरी देखकर चकित हूँ। ऐसे अच्छे फूल-पत्ते बनाए हैं कि सच्चे बेल-बूटों को मात करते हैं। जी चाहता है कि कारीगर के हाथ चूम लूँ।’’ मुंशी चुन्नीलाल ने कहा।

‘‘इनके बिना आपका इस समय कौन-सा काम अटक रहा है ?’’ लाला ब्रजकिशोर कहने लगे। ‘‘खेल-तमाशे की चीजों से भोलेभाले आदमियों का जी ललचाता है। वह सौदागर की सब दुकान को अपने घर ले जाना चाहते हैं, परन्तु बुद्धिमान अपनी जरूरी चीजों के सिवाय किसी पर दिल नहीं दौड़ाते लाला ब्रजकिशोर बोले।

‘‘जरूरत भी तो अपनी-अपनी रुचि के समान अलग-अलग होती है।’’ मुंशी चुन्नीलाल ने कहा।
‘‘और जब दरिद्रियों की तरह धनवान भी अपनी रुचि के समान काम न कर सकें तो फिर धनी और दरिद्रों में अन्तर ही क्या रहा ?’’ मास्टर शम्भूदयाल ने पूछा।
‘‘नामुमकिन काम करके कोई नुकसान के नहीं बच सकता।’’


धनी दरिद्री सकल जन हैं जग के आधीन।
चाहत धनी विशेष कछु तासों ते अति दीन।।


लाला ब्रजकिशोर करने लगा, ‘‘मुनासिब रीति से थोड़े खर्च में सब तरह का सुख मिल सकता है परन्तु इन्तजाम और काम के सिलसिले बिना बड़ी-से-बड़ी दौलत भी जरूरी खर्चों को पूरी नहीं हो सकती। जब थोथी बातों में बहुत-सा रुपया खर्च हो जाता है तो जरूरी काम के लिए पीछे से जरूर तकलीफ उठानी पड़ती है।’’
‘‘चित्त की प्रसन्नता के लिए मनुष्य सब काम करते हैं। फिर जिनके देखने से चित्त प्रसन्न हो, उनका खरीदना थोथी बातों में कैसे समझा जाए ?’’
मुंशी चुन्नीलाल ने कहा।
‘‘चित्त प्रसन्न रखने की यही रीति नहीं है। चित्त तो उचित व्यवहार से प्रसन्न रहता है।’’ लाला ब्रजकिशोर ने जवाब दिया।
‘‘परन्तु निरी फिलासफी की बातों से भी तो दुनियादारी का काम नहीं चल सकता।’’ लाला मदनमोहन ने दुनियादार बनकर कहा।

‘‘वलायत की सब उन्नति का मूल लार्ड बेकन की यह नीति है कि केवल विचार ही विचार में मकड़ी के जाले बनाओ। आप परीक्षा करके हर एक पदार्थ का स्वभाव जानों।’’ मिस्टर ब्राइट ने कहा।
‘‘क्यों साहब ! ये काच कहाँ के बने हुए हैं ?’’ मुंशी चुन्नीलाल ने सौदागर से पूछा।
‘‘फ्रांस के सिवाय ऐसी सुडोल चीज कहीं नहीं बन सकती। जबसे ये काच यहाँ आए हैं, हर वक्त देखने वालों की भीड़ लगी रहती है और कई कारीगर तो इनका नक्शा भी खींच ले गए हैं।’’
‘‘अच्छा जी ! इनकी कीमत हमारे हिसाब में लिखो और ये हमारे यहाँ भेज दो।’’

‘‘मैंने एक हिन्दुस्तानी सौदागर की दुकान में इसी मेल के काच देखे हैं। उनके चोखटों में निस्संदेह ऐसी कारीगिरी नहीं है, परन्तु कीमत में यह बहुत ही सस्ते हैं।’’ लाला ब्रजकिशोर बोले।
‘‘मैं तो अच्छी चीज का ग्राहक हूँ। चीज पसन्द आए पीछे मुझको कीमत की कुछ परवाह नहीं रहती।’’
‘‘अँग्रेजों की भी यह चाल है।’’ मास्टर शम्भूदयाल ने कहा।
‘‘परन्तु सब बातों में अँग्रेजों की नकल करनी क्या जरूरी है ?’’ लाला ब्रजकिशोर ने जवाब दिया।
‘‘देखिए ! जब से लाला साहब यह अमीरी चाल रखने लगे हैं, लोगों में इनकी इज्जत कितनी बढ़ती जाती है !’’ मास्टर शम्भूदयाल ने कहा।

‘‘सर, समान से सच्ची इज्जत नहीं मिल सकती। सच्ची इज़्ज़त तो सच्ची लियाकत से मिलती है।’’ लाला ब्रजकिशोर कहने लगे, ‘‘और जब कोई मनुष्य बुद्धि के विपरीत इस रीति से इज्जत पाना चाहता है तो उसका परिणाम बड़ा भयंकर होता है।’’
‘‘साहब ! इतनी बात तो मैं हिम्मत से कहता हूँ कि जो इसके साथ की जोड़ी शहर में दूसरी जगह निकल आवेगी तो मैं ये काच मुफ्त नजर करूँगा।’’ मिस्टर ब्राइट ने जोर देकर कहा।
‘‘कदाचित् इसके साथ की जोड़ी दिल्ली-भर में न होनी, परन्तु कीमत की कमती-बढ़ती भी तो चीज की हैसियत से बमूज्जिब होनी चाहिए।’’ लाला ब्रजकिशोर ने जवाब दिया।

‘‘जिस तरह मोतियों के हिसाब में किसी दाने की तोल जरा ज्यादा होने से शो बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, इसी तरह इन शीशों की कीमत का भी हाल है। मुझको लाला साहब से ज्यादा नफा लेना मंजूर न था, इस वास्ते मैंने पहले ही असली कीमत में चार सौ रुपये कम कर दिए, इस पर भी आपको कुछ सन्देह हो तो आप तीसरे पहर मास्टर साहब को यहाँ भेज दें। मैं बीजक दिखलाकर इनसे कीमत ठहरा लूँगा।’’

‘‘अच्छा ! मास्टर शम्भूदयाल मदरसे से लौटती बार आपके पास आएँगे, पर ये काच हमसे पूछे बिना आप और किसी को न दें।’’ लाला मदनमोहन ने कहा।

इस बात से सब अपने-अपने जी में राजी हुए—ब्रजकिशोर ने इतना अवकाश बहुत समझा, मदनमोहन के मन में हाथ से चीज निकल जाने का खटका न रहा, चुन्नीलाल और शम्भूदयाल का अपने कमीशन सही करने का समय हाथ आया और मिस्टर ब्राइट को लाला मदनमोहन की असली हालत जानने के लिए फुरसत मिली।

‘‘बहुत अच्छा’’ मिस्टर ब्राइट ने जवाब दिया, ‘‘लेकिन आपको फुरसत हो तो आप एक बार यहाँ फिर भी तशरीफ लाएँ। हाल में नई-नई तरह की बहुत-सी चीजें वलायत से ऐसी उमदा आई हैं जिनको देखकर आप बहुत खुश होंगे, परन्तु अभी वह खोली नहीं गई हैं और इस समय मुझको रुपये की कुछ जरूरत है। इन चीजों की कीमत के बिल का रुपया देना है। आप मेहरबानी करके अपने हिसाब में से थोड़ा रुपया मुझको इस समय भेज दें तो बड़ी इनायत हो।’’

इस वचन में मिस्टर ब्राइट अपने अस्वाब की खरीददारी के लिए लाला मदनमोहन को ललचाता है, परन्तु अपने रुपये के वास्ते मीठा तकाजा भी करता है। चुन्नीलाल और शम्भूदयाल के कारण उसको मदनमोहन के लेन-देन में बहुत कम फायदा हुआ, परन्तु उसके पचास हजार रुपये इस समय मदनमोहन की तरफ बाक़ी हैं और शहर में मदनमोहन की बाबत तरह-तरह की चर्चा फैल रही है। बहुत लोग मदनमोहन को फिजूलखर्च, दिवालिया बताते हैं और हकीकत में मदनमोहन का खर्च दिन-पर-दिन बढ़ता जाता है। इससे मिस्टर ब्राइट को अपनी रकम का खटका है, इसलिए उसने इन काचों का सौदा इस समय अटकाया है और तीसरे पहर मास्टर शम्भूदयाल को अपने पास बुलाया है।

‘‘रुपया ! ऐसी जल्दी !’’ लाला ब्रजकिशोर ने मिस्टर ब्राइट को वहम में डालने के लिए आश्चर्य से इतनी बात कहकर मन में कहा ‘‘हाय ! इन कारीगरी की निरर्थक चीजों के बदले हिन्दुस्तानी अपनी दौलत वृथा खोए देते हैं।’’
‘‘सच है, पहले आप अपना हिसाब तैयार कराएँ, उसको देखकर अन्दाज से रुपये भेजे जाएँगे।’’ मुंशी चुन्नीलाल ने बात बनाकर कहा।

‘‘और बहुत जल्दी हो तो बिल करके काम चला लीजिए। जब तक कागज के घोड़े दौड़ते हैं, रुपये की क्या कमी है ?’’ ब्रजकिशोर बीच में बोल उठे।
‘‘अच्छा ! मैं हिसाब अभी उतरवाकर भेजता हूँ। इसको इस समय रुपये की बहुज जरूरत है।’’ मिस्टर ब्राइट ने कहा।

‘‘आपने साढ़े नौ बजे मिस्टर रसल को मुलाकात के लिए बुलाया है इस वास्ते अब वहाँ चलना चाहिए।’’ मास्टर शम्भूदयाल ने याद दिलाई।
‘‘अच्छा मिस्टर ब्राइट ! इन काचों को याद रखना और नया अस्बाब खुले जब, हमको जरूर बुला लेना।’’ यह कहकर लाला मदनमोहन ने मिस्टर ब्राइट से हाथ मिलाया और अपने साथियों समेत जोड़ी की एक निहायत उमदा वलायती फिटन में सावर होकर रवाना हुए।

जब बग्गी कम्पनी बाग में पहुँची तो सवेरे का सुहावना समय देखकर सबका जी हरा हो गया। उस समय की शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा बहुत प्यारी लगती थी। वृक्षों पर हर तरह के पक्षी मीठे-मीठे सुरों से चहचहा रहे थे। नहर के पानी की धीमी-धीमी आवाज कान को बहुत अच्छी मालूम होती थी। पन्ने-सी हरी घास की भूमि पर मोती-सी ओस की बूँदें बिखर रही थीं और तरह-तरह की फुलवाड़ी हरी मखमल में रंग-रंग के बूटों की तरह बड़ी बहार दिखा रही थी। इस स्वाभाविक शोभा को देखकर लाला ब्रजकिशोर ने मनमोहन सिंह से थोड़ी देर वहाँ बैठने के वास्ते कहा।
इस समय मुंशी चुन्नीलाल ने जेब से निकालकर घड़ी में चाबी दी और घड़ी देखकर घबराहट से कहा ‘‘ओ ! हो ! नौ पर बीस मिनट चले गए। तो अब मकान को जल्दी चलना चाहिए।’’
निदान लाला मदनमोहन की बग्गी मकान पर पहुँची और ब्रजकिशोर उनसे रुखसत होकर अपने घर गए।

प्रकरण-2
अकाल में अधिक मास


अप्रापति के दिनन में खर्च होत अबिचार।
घर आवत है पाहुनो बणिज न लाभ लगार।।

बृन्द

‘‘हैं अभी तो यहाँ के घण्टे में पौने नौ बजे हैं तो क्या मेरी घड़ी आधा घण्टे आगे थी ?’’ मुंशी चुन्नीलाल ने मकान पर पहुँचते ही बड़े घण्टे की तरफ देखकर कहा। परन्तु ये उसकी चालाकी थी। उसने ब्रजकिशोर से पीछा छुड़ाने के लिए अपनी घड़ी चाबी देने के बहाने से आधा घण्टे आगे कर दी थी।

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