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भारत के अमर क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद

मीना अग्रवाल

5.95

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 81-7182-211-8 पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 5660
 

चन्दशेखर आजाद भारत के महान् क्रान्तिकारियों में एक.....

Bharat Ke Amar Krantikari Chandrashekhar Azad a hindi book by Mina Agrawal - भारत के अमर क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद - मीना अग्रवाल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत के अमर क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक अनुपम और अद्वितीय विभूति हैं। एक अभावग्रस्त परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने अपने व्यक्तित्व हितों को सदा तुच्छ समझा और मातृभूमि की स्वाधीनता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। वह संस्कृत का अध्ययन करने हेतु बनारस गए, किन्तु किशोरावस्था में ही स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। यही से उनका क्रान्तिकारी जीवन प्रारम्भ हुआ। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि जीवन की सुख-सुविधाएँ तथा क्रान्ति दोनों के मार्ग सर्वथा भिन्न हैं। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने चरित्रबल को नहीं डिगने दिया।
काकोरी ट्रेन डकैती तथा साण्डर्स हत्याकांड में अंग्रेजी सरकार की पुलिस लाख प्रयत्न करने पर भी उन्हें पकड़ने में असमर्थ रही; और अन्त में पुलिस संघर्ष में वीरगति प्राप्त कर उन्होंने अपने आज़ाद नाम को सार्थक कर दिखाया। भारत राष्ट्र के निर्माण में आज़ाद की भूमिका विश्व के स्वतन्त्रता प्रेमियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।

चन्द्रशेखर आज़ाद भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन की एक निरुपम विभूति हैं। भारत की स्वतंत्रता के लिए उनका अनन्य देश-प्रेम, अदम्य साहस, प्रशंसनीय चरित्रबल आदि इस राष्ट्र के स्वतंत्रता-प्रहरियों को एक शाश्वत आदर्श प्रेरणा देते रहेगा। एक अति निर्धन परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने राष्ट्र-प्रेम का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय ही नहीं, स्तुत्य भी है। आज़ाद वस्तुतः देश-प्रेम, त्याग, आत्मबलिदान आदि सद्गुणों के प्रतीक हैं।


दो शब्द


भारत की स्वत्रन्त्रता-प्राप्ति तथा इस राष्ट्र के निर्माण में क्रान्तिकारियों का योगदान अन्य आन्दोलनों की तुलना में किसी प्रकार कम नहीं रहा है। वास्तविकता तो यह है कि भरतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास 1857 क्रांति से ही प्रारम्भ होता है, किन्तु खेद का विषय है कि हमारे इतिहास लेखकों ने क्रांतिकारियों के इस योगदान का उचित मूल्यांकन नहीं किया है।
चन्द्रशेखर आज़ाद भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन की एक निरूपम विभूति हैं। भारत की स्वतंत्रता के लिए उनका अन्नय देश-प्रेम, अदम्य साहस, प्रशंसनीय चरित्रबल आदि इस राष्ट्र के स्वतंत्रता-प्रहरियों को एक शाश्वत आदर्श प्रेरणा देते रहेंगे। एक अति निर्धन परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने राष्ट्र-प्रेम का जो आदर्श किया है, वह प्रशंसनीय ही नहीं स्तुत्य भी है। आज़ाद वस्तुतः देश-प्रेम, त्याग, आत्मबलिदान आदि सदगुणों के प्रतीक हैं।
भारत के महापुरुषों में आत्मप्रशंसा से दूर रहने की परम्परा रही है। इसलिए आज़ाद भी अपने विषय में अपने साथियों तक को कभी कुछ नहीं बताते थे। एक बार भगतसिंह द्वारा उनके घर-परिवार आदि के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था-‘‘दल का संबंध मुझसे है, मेरे घर वालों से नहीं। मैं नहीं चाहता कि मेरी जीवनी लिखी जाए।’’ इसके साथ ही क्रांतिकारियों के आन्दोलन गुप्त आन्दोलन थे। अतः अन्य आन्दोलनों के समान इसका निर्विवाद इतिहास मिलना असम्भव-सा लगता है। यही कारण है कि आज़ाद के जीवन की घटनाओं का विभिन्न पुस्तकों में भिन्न-भिन्न प्रकार से वर्णन उपलब्ध होता है। इस पुस्तक में आज़ाद के जीवन की सभी घटनाओं के विषय में उपलब्ध सामग्री को क्रमबद्ध रूप में पिरोने की अल्प चेष्टा की गई है। जिन घटनाओं विद्वानों में विवाद है, उनका उल्लेख यथास्थान कर दिया गया है। यह प्रयास कितना सफल रहा, इसका निर्णय तो सुधी पाठक ही करेंगे। यह पुस्तक वीरश्रेष्ठ आज़ाद के जीवन की ऐतिहासिक घटनाओं का संकलन मात्र है, अतः इसके विषय में मौलिकता का दावा करना केवल वंचना ही कही जाएगी। इसके लेखन में श्री मन्थनाथ गुप्त, यशपाल, वैशम्पायन श्री वीरेन्द्र, व्यथित, हृदय, यशपाल शर्मा, शिव वर्मा, सीता रमैया आदि विद्वान लेखकों की पुस्तकों से सहायता ली गई है, अतः इन सबके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं।

लेखक

प्रथम अध्याय

प्रारम्भिक जीवन


इस राष्ट्र के निर्माण में, इसकी स्वतन्त्रता के लिए न जाने कितने वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान किया, उनमें से अनेक वीरों के नाम भी ज्ञात नहीं हैं। जिन क्रान्तिकारी वीरों के नाम ज्ञात भी हैं। उन्हें भी आज हम भूल जैसे गए हैं। उनके नाम केवल इतिहास की पुस्तकों तक ही सीमित रह गए हैं। भारतीय स्वतन्त्रता का इतिहास सन् 1857 की क्रान्ति से ही प्रारम्भ होता है। यद्यपि स्वतंत्रता के इस पहले संग्राम को अंग्रेजों ने असफल कर दिया था, फिर भी दासता की जंजीरों में बँधे भारतीयों को इससे जो प्रेरणा मिली,
उसी प्रेरणा ने उन्हें स्वत्रंता के लिए लगातार प्रयत्न करने की शिक्षा दी। भारतीय राष्ट्रीय की स्थापना के बाद भले ही इस दल ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अहिंसक आधार पर स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी, आज सारा श्रेय कांग्रेस को ही दिया जाता है। किन्तु कांग्रेस के साथ ही भारत के क्रांतिकारी सपूतों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध सामानान्तर रूप में युद्ध किया। अंग्रेज सरकार के लिए ये क्रान्तिकारी एक चुनौती बन गए थे। हिंसा के माध्यम से विदेशी शासकों को देश से निकाल बाहर करना और मातृभूमि को स्वतन्त्र कराना ही इनका लक्ष्य था।

भयंकर विपत्तियों का सामना करते हुए सभी-सुख-सुविधाओं को त्यागकर, अपने प्राणों की परवाह न करके भारतीय वीर क्रान्तिकारी अपने पावक कार्य को आगे बढ़ाते रहे। इन्हीं वीरों में एक नाम वीर शिरोमणि अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद का भी है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वत्रन्त्रता के लिए अपने जीवन को ही बलिदान कर दिया। यहाँ वीर का जीवन-चरित्र प्रस्तुत किया जा रहा है।


आज़ाद की वंश-परम्परा एवं उनका मूल स्थान


चन्द्रशेखर आज़ाद के पूर्वजों के मूल स्थान आज़ाद के निवास-स्थान आदि के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ हैं। आज़ाद के पितामह मूलरूप से कानपुर के निवासी थे, जो बाद में गाँव बदरका, जिला उन्नाव में बस गए थे। इसलिए आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी का बचपन यहीं व्यतीत हुआ और यहीं उनकी युवावस्था का प्रारम्भिक काल भी बीता। पंडित सीताराम तिवारी के तीन विवाह हुए। उनकी पहली पत्नी जिला उन्नाव के ही मौरावा की थीं। अपनी इस पत्नी से उनका एक पुत्र भी हुआ था, जो अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया था। पंडित तिवारी का अपनी इस पत्नी के साथ अधिक दिनों तक निर्वाह न हो सका, अतः उन्होंने इसे छोड़ दिया जो अपने शेष जीवन में मायके में ही रहीं। इसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया। उनकी दूसरी पत्नी उन्नाव के ही सिकन्दरापुर गाँव की थीं। उनकी द्वितीय पत्नी भी उनके जीवन में अधिक दिनों तक न रह सकी; वह शीघ्र ही दिवंगत हो गईं। इसके बाद उन्होंने तीसरा विवाह जगरानी देवी के से किया। जगरानी देवी गाँव चन्द्रमन खेड़ा, उन्नाव की थीं। बदरका, उन्नाव में ही तिवारी दम्पति को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई इस पुत्र का नाम उन्होंने सुखदेव रखा।


आज़ाद का जन्म एवं बाल्यकाल


इस पुत्र के जन्म के बाद पंडित सीताराम आजीविका की खोज में मध्य भारत की एक रियासत अलीराजपुर चले गए। बाद में उन्होंने अपनी पत्नी जगरानी देवी तथा पुत्र सुखदेव को भी वहीं बुला लिया। अलीराजपुर के गाँव भाभरा को उन्होंने अपना निवास-स्थान बनाया। यहीं सुखदेव के जन्म के 5-6 वर्ष बाद सन् 1905 में जगरानी देवी ने एक और पुत्र को जन्म दिया यही बालक आगे चलकर चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से विख्यात हुआ। इस नवजात बालक को देखकर बालक के माता-पिता को बड़ी निराशा हुई, क्योंकि बालक अत्यन्त कमजोर था तथा जन्म के समय उसकी भार भी सामान्य बच्चों से बहुत कम था। इससे पूर्व तिवारी दम्पति कि कुछ सन्तानें मृत्यु को प्राप्त हो गई थीं। अतः माँ-बाप इस शिशु के स्वास्थ्य से अति चिन्तित रहते थे। बालक दुर्बल होने पर भी बड़ा सुन्दर था; उसका मुख चन्द्रमा के सामान गोल था।

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