तीसरा सप्तक - अज्ञेय Teesra Saptak - Hindi book by - Agyeya
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तीसरा सप्तक

अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-263-0822-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :239 पुस्तक क्रमांक : 564

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श्री अज्ञेय जी की उत्कृष्ट कविताओं का संग्रह...

Teesra Saptak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जैसा कि एक विकासमान काव्य-परम्परा में उचित ही था, कविता-सप्तकों के अनुक्रम में यह तीसरा सप्तक पहले दोनों से आगे बढ़ा हुआ है या पिछले दोनों सप्तक अपने युग के सर्वोत्तम सात कवियों का संकलन हैं, ऐसा कोई दावा नहीं है। पर उत्सुक पाठक-वर्ग के सामने एक साथ इतने विशिष्ट कवियों का कृतित्व प्रस्तुत करने का काम केवल सप्तक ही करते रहे हैं। ये संकलन न केवल उनका प्रतिनिधित्व करते हैं वरन् अपने युग का भी। और यह भी सत्य है कि तार सप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक नयी हिन्दी कविता के इतिहास का अनिवार्य अंग बन चुके हैं। आधुनिक काल में किसी भी कला की साधना साहस-कर्म है। काव्य रचना में तो यह साहस निहित है ही, क्योंकि आज वह एक वैचारिक साहसिकता भी माँगती हैं। इस एडवेंचर ऑफ आइडियाज में कवि और पाठक-वर्ग सहभागी होता रहे - यही सप्तकों का उद्देश्य है, और इसी दृष्टि से उनका सम्पादन हुआ है। समकालीन समीक्षा में उनकी चर्चा इसका प्रमाण है कि उन्होंने काव्य-चिन्तन को कितनी प्रेरणा दी है। प्रस्तुत है तीसरा सप्तक का यह नवीन संस्करण।

भूमिका

‘तार सप्तक’ की भूमिका प्रस्तुत करते समय इन पंक्तियों के लेखक में जो उत्साह था, उसमें संवेदना की तीव्रता के साथ निस्सन्देह अनुभव-हीनता का साहस भी रहा होगा। संवेदना की तीव्रता अब कम हो गयी है, ऐसा हम नहीं मानना चाहते; किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि अनुभव ने नये कवियों का संकलन प्रस्तुत करते समय दुविधा में पड़ना सिखा दिया है। यह नहीं कि ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों की संगृहीत रचनाओं के बारे में हम उससे कम आश्वस्त, या उनकी सम्भावनाओं के बारे में कम आशामय हैं जितना उस समय ‘तार सप्तक’ के कवियों के बारे में थे। बल्कि एक सीमा तक इससे उलटा ही सच होगा। हम समझते हैं कि ‘तीसरा सप्तक’ के कवि अपने-अपने विकास-क्रम में अधिक परिपक्व और मँजे हुए रूप में ही पाठकों के सम्मुख आ रहे हैं। भविष्य में इन में से कौन कितना और आगे बढ़ेगा, यह या तो ज्योतिषियों का क्षेत्र है या स्वयं उनके अध्यवसाय का। ‘तीसरा सप्तक’ के कवि भी एक ही मंजिल तक पहुँचे हों, या एक ही दिशा में चले हों, या अपनी अलग दिशा में भी एक-सी गति से चले हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। निस्सन्देह ‘तार सप्तक’ में भी यह स्पष्ट कर दिया गया था कि संगृहीत कवि सब अपनी-अपनी अलग राह का अन्वेषण कर रहे हैं।
दुविधा और संकोच का कारण दूसरा है। ‘तार सप्तक’ के कवि अपनी रचना के ही प्रारम्भिक युग में नहीं, एक प्रवृत्ति की प्रारम्भिक अवस्था में सामने आये थे। पाठक के सम्मुख उनके कृतित्व की माप-खोज करने के लिए बने-बनाये मापदण्ड नहीं थे। उनकी तुलना भी पूर्ववर्ती या समवर्ती दिग्गजों से नहीं की जा सकती थी - क्योंकि तुलना के कोई आधार ही अभी नहीं बने थे। इसलिए जहाँ उनकी स्थिति झारखण्ड की झाड़ी पर प्रत्याशित फूले हुए वन-कुसुम की-सी अकेली थी, वहाँ उन्हें यह भी सुविधा थी कि उनके यत्किंचित अवदान की माप झारखण्ड के ही सन्दर्भ में हो सकती थी - दूर के उद्यानों में से कोई प्रयोजन नहीं था।

अब वह परिस्थिति नहीं है। ‘द्विवेदी काल’ के श्री मैथिलीशरण गुप्त या छायावादी युग के श्री ‘निराला’ जैसा कोई शलाका-पुरुष नयी कविता ने नहीं दिया है (न उसे अभी इतना समय ही मिला है), फिर भी तुलना के लिए और नहीं तो पहले दोनों सप्तकों के कवि तो हैं ही, और परम्पराओं की कुछ लीकें भी बन गयी हैं। पत्र-पत्रिकाओं में ‘नयी कविता’ ग्राह्य हो गयी है, सम्पादक गण (चाहे आतंकित हो कर ही !) उसे अधिकाधिक छापने लगे हैं, और उसकी अपनी भी अनेक पत्रिकाएँ और संकलन-पुस्तिकाएँ निकलने लगी हैं, उधर उसकी आलोचना भी छपने लगी है, और धुरन्दर आलोचकों ने उसके अस्तित्व की चर्चा करना गवारा किया है-चाहे अधिकतर भर्त्सना का निमित्त बनाकर ही।
और कृतिकारों का अनुधावन करने वाली, स्वल्प पूँजी वाली ‘प्रतिभाएँ’ भी अनेक हो गयी हैं।
कहना न होगा कि इन सब कारणों से ‘नयी कविता’ का अपने पाठक के और स्वयं अपने प्रति उत्तरदायित्व भड़ गया है। यह मानकर भी कि शास्त्रीय आलोचकों से उसे सहानुभूतिपूर्ण तो क्या, पूर्वग्रह-रहित अध्ययन भी नहीं मिला है, यह आवश्यक हो गया है कि स्वयं आलोचक तटस्थ और निर्मम भाव से उसका परीक्षण करें। दूसरे शब्दों में परिस्थित की माँग यह है कि कविगण स्वयं एक-दूसरे के आलोचक बनकर सामने आवें।
पूर्वग्रह से मुक्त होना हर समय कठिन है। फिर अपने ही समय की उसकी प्रवृत्ति के विषय में, जिससे आलोचक स्वयं सम्बद्ध है, तटस्थ होना और भी कठिन है। फिर जब समीक्षक एक ओर यह भी अनुभव करे कि यह प्रवृत्ति विरोधी वातावरण से घिरी हुई है और सहानुभूति ही नहीं, समर्थन और वकालत भी माँगती है, तब उसकी कठिनाई की कल्पना की जा सकती है।

लेकिन फिर भी नयी कविता अगर इस काल की प्रतिनिधि और उत्तरदायी रचना-प्रवृत्ति है, और समकालीन वास्तविकता को ठीक-ठीक प्रतिबिम्बित करना चाहती है, तो उसे स्वयं आगे बढ़कर यह त्रिगुण दायित्व ओढ़ लेना होगा। (कृतिकार के रूप में नये कवि को साथ-साथ वकील और जज दोनों होना होगा (और सम्पादक होने पर साथ-साथ अभियोक्ता भी) !।
‘तीसरा सप्तक’ के सम्पादन की कठिनाई के मूल में यही परिस्थिति है। ‘तार सप्तक’ एक नयी प्रवृत्ति का पैरवीकार माँगता था, इससे अधिक विशेष कुछ नहीं। ‘तीसरा सप्तक’ तक पहुँचते न पहुँचते प्रवृत्ति की पैरवी अनावश्यक हो गयी है, और कवियों की पैरवी का तो सवाल ही क्या ? इस बात का अधिक महत्त्व हो गया है कि संकलित रचनाओं का मूल्यांकन सम्पादक स्वयं न भी करे तो कम-से-कम पाठक की इसमें सहायता अवश्य करें।
नयी कविता की प्रयोगशीलता का पहला आयाम भाषा से सम्बन्ध रखता है। निस्सन्देह जिसे अब ‘नयी कविता’ की संज्ञा दी जाती है, वह भाषा सम्बन्धी प्रयोगशीलता को बाद की सीमा तक नहीं ले गयी है - बल्कि ऐसा करने को अनुचित भी मानती रही है। यह मार्ग ‘प्रपद्यवादी’ ने अपनाया जिस ने घोषणा की कि ‘चीजों का एक मात्र सही नाम होता है’ और वह ( प्रपद्यवादी कवि) ‘प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और छन्द का स्वयं निर्माता है।’

‘नयी कविता’ के कवि को इतना मानने में कोई कठिनाई न होती कि कोई शब्द किसी दूसरे शब्द का सम्पूर्ण पर्याय नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्येक शब्द के लिए अपने वाच्यार्थ के अलावा अलग-अलग लक्षणाएँ और व्यंजनाएँ होती हैं-अलग संस्कार और ध्वनियाँ। किन्तु ‘प्रत्येक वस्तु का एक अपना नाम होता है,’ इस कथन को उस सीमा तक ले जाया जा सकता है जहाँ कि भाषा का एक नया रहस्यवाद जन्म ले ले और अल्लाह के निन्यानवे नामों से परे उसके अनिर्वचनीय सौवें नाम की तरह हम प्रत्येक वस्तु के सौवें नाम की खोज में डूब जावें। भाषा-सम्बन्धी यह निन्यानवे का फेर प्रेषणीयता का औऱ इसलिए भाषा का ही बहुत बड़ा शत्रु हो सकता है। शब्द अपने-आप में सम्पूर्ण या आत्यन्तिक नहीं है, किसी शब्द का कोई स्वयंभूत अर्थ नहीं है। अर्थ उसे दिया गया है, वह संकेत है जिसमें अर्थ की प्रतिपत्ति की गई है। ‘एकमात्र उपयुक्त शब्द’ की खोज करते समय हमें शब्दों की यह तदर्थता नहीं भूलनी होगी : वह ‘एकमात्र’ इसी अर्थ में है कि हमने (प्रेषण को स्पष्ट, सम्यक् और निर्भ्रम बनाने के लिए) नियत कर दिया है कि शब्द रूपी अमुक एक संकेत का एकमात्र अभिप्रेत क्या होगा।

यहाँ यह मान लें कि शब्द के प्रति यह नयी, और कह लीजिए मानववादी दृष्टि है; क्योंकि जो कि व्यक्ति शब्द का व्यवहार कर के शब्द से यह प्रार्थना कर सकता था कि ‘अनजाने उस में बसे देवता के प्रति कोई अपराध हो गया हो तो देवता क्षमा करें’ वह इस निरूपण को स्वीकार नहीं कर सकता-नहीं मान सकता कि शब्द में बसने वाला देवता कोई दूसरा नहीं है, स्वयं मानव ही है जिसने उसका अर्थ निश्चित किया है। यह ठीक है कि शब्द को जो संस्कार इतिहास की गति में मिल गये हैं उन्हें मानव के दिये हुए’ कहना इस अर्थ में सही नहीं है कि उनमें मानव का संकल्प नहीं था - फिर भी वे मानव द्वारा व्यवहार के प्रसंग में ही शब्द को मिले हैं और मानव से अलग अस्तित्व नहीं रख या पा सकते थे।
किन्तु ‘एकमात्र सही नाम’ वाली स्थापना को इस तरह मर्यादित करने का यह अर्थ नहीं है कि किसी भी शब्द का सर्वत्र, सर्वदा सभी के द्वारा ठीक एक ही रूप में व्यवहार होता है - बल्कि यह तो तभी होता है जबकि वास्तव में ‘एक चीज का एक ही नाम’ होता है और एक काम की एक चीज होती ! ‘प्रत्येक शब्द का प्रत्येक समर्थ उपयोक्ता उसे नया संस्कार देता है।’ इसी के द्वारा पुराना शब्द नया होता है-यही उसका कल्प है। इसी प्रकार शब्द ‘वैयक्तिक प्रयोग भी होता है और प्रेषण का माध्यम भी बना रहता है, दुरूह भी होता है और बोधगम्य भी, पुराना परिचित भी रहता है और स्फूर्तिप्रद अप्रत्याशित भी।
नये कवि की उपलब्धि और देन की कसौटी इसी आधार पर होनी चाहिए। जिन्होंने शब्द को नया कुछ नहीं दिया है, वे लीक पीटने वाले से अधिक कुछ नहीं हैं-भले ही जो लीक वे पीट रहे हैं वह अधिक पुरानी न हो। और जिन्होंने उसे नया कुछ देने के आग्रह में पुराना बिल्कुल मिटा दिया है, वे ऐसे देवता हैं जो भक्त को नया रूप दिखाने के लिए अन्तर्धान हो ही गये हैं ! कृतित्व का क्षेत्र इन दोनों सीमा-रेखाओं के बीच में है। यह ठीक है कि बीच का क्षेत्र बहुत बड़ा है, और उसमें कोई इस छोर के निकट हो सकता है तो कोई उस छोर के। दुरूहता अपने-आप में कोई दोष नहीं है, न अपने आप में इष्ट है। इस विषय को लेकर झगड़ा करना वैसा ही है जैसा इस चर्चा में कि सुराही का मुँह छोटा है या बड़ा, यह न देखना कि उसमें पानी भी है या नहीं।

प्रयोक्ता के सम्मुख दूसरी समस्या सम्प्रेष्य वस्तु की है। यह बात कहने की आवश्यकता नहीं होना चाहिए कि काव्य का विषय और काव्य की वस्तु (कण्टेण्ट) अलग-अलग चीजें हैं, पर जान पड़ता है इस पर बल देने की आवश्यकता प्रतिदिन बढ़ती जाती है ! यह बिलकुल सम्भव है कि हम काव्य के लिए नये से नया विषय चुनें पर वस्तु उसकी पुरानी ही रहें, जैसे यह भी सम्भव है कि विषय पुराना रहे पर वस्तु नयी हो...निस्सन्देह देश-काल की संक्रमणशील परिस्थितियों में संवेदनशील व्यक्ति बहुत कुछ नया देखे-सुने और अनुभव करेगा; और इसलिए विषय के नये पन के विचार का भी अपना स्थान है ही, पर विषय केवल ‘नये’ हो सकते हैं , ‘मौलिक’ नहीं-‘मौलिकता वस्तु से ही सम्बन्ध रखती है।’ विषय सम्प्रेष्य से नहीं है, वस्तु सम्प्रेष्य है। नये (या पुराने भी) विषय की, कवि की संवेदना पर प्रतिक्रिया और, उससे उत्पन्न सारे प्रभाव जो पाठक श्रोता ग्राहक पर पड़ते हैं, और इन प्रभावों को सम्प्रेष्य बनानें में कवि का योग (जो सम्पूर्ण चेतना भी हो सकता है, अंशतः चेतना भी, और सम्पूर्णतया अवचेतन भी)-मौलिकता की कसौटी का यही क्षेत्र है। यही कवि की शक्ति और प्रतिभा का भी क्षेत्र है। क्योंकि यही कविमानस की पहुँच और उसके सामर्थ्य का क्षेत्र है। कहाँ तक कवि नयी परिस्थिति को स्वायत्त कर सका है (आयत्त करने में रागात्मक प्रतिक्रिया भी और तज्जन्य बुद्धि-व्यापार भी है जिसके द्वारा कवि संवेदना का पुतला-भर न बना रह कर उसे वश करके, उसी के सहारे उस से ऊपर उठकर उसे सम्प्रेष्य बनाता है), इसी से हम निश्चय करते हैं कि वह कितना बड़ कवि है । (फिर सम्प्रेष्ण के साधनों और तन्त्र (टेकनिक) के उपयोग की पड़ताल करके यह भी देख सकते हैं कि वह कितना सफल कवि है-पर इस पक्ष को अभी छोड़ दिया जाये)

यहाँ स्वीकार किया जाये कि नये कवियों में ऐसों की संख्या कम नहीं है जिन्होंने विषय वस्तु समझने की भूल की है, और इस प्रकार स्वयं भी पथभ्रष्ट हुए हैं और पाठकों में नयी कविता के बारे में अनेक भ्रान्तियों के कारण बने हैं।
लेकिन ‘नक़लचियों से सावधान !’ की चेतावनी असली माल वाले प्रायः नहीं देते, या तो वे देते हैं जिन्हें स्वयं अपने माल की असलियत के बारे में कुछ खटका हो, या फिर वे दे सकते हैं जो स्वयं माल लेकर उपस्थित नहीं हैं और केवल पहरा दे रहे हैं।
अर्थात कवि स्वयं चेतावनी नहीं देते, यह काम आलोचकों, अध्यापकों और सम्पादकों का है। यह भी उन्हीं का काम है कि नक़ली के प्रति सावधान करते हुए असली की साख भी न बिगाड़ने दें...ऐसा न हो कि नक़ली से धोखा खाने के डर से सारा कारोबार ही ठप हो जाये !
इस वर्ग ने यह काम नहीं किया है, यह सखेद स्वीकार करना होगा। बल्कि कभी तो ऐसा जान पड़ता है कि नक़लची कवियों से कहीं अधिक संख्या और अनुपात नक़ली आलोचकों का है-धातु उतनी खोटी नहीं है जितनी की कसौटियाँ ही झूठी हैं ! इतनी अधिक छोटी-मोटी ‘एमेच्योर’ (और इम्मेच्योर) साहित्य पत्रिकाओं का निकलना, जब कि दो-चार सामान्य पत्रिकाएँ हैं, वे सामग्री की कमी से क्षयग्रस्त हो रही हैं, इसी बात का लक्षण है कि यह वर्ग अपने कर्तव्य से कितना च्युत हुआ है। यह ठीक है कि ऐसे छोटे-छोटे प्रयास एक आस्था की घोषणा करते हैं और इसी प्रकार एक शक्ति (चाहे कितनी स्वल्प) के लक्षण हैं, पर यह भी उतना ही सच है कि इस प्रकार व्यापक, पुष्ट और दृढ़ आधार वाले मूल्यों की उपलब्धि और प्रतिष्ठा का काम क्रमशः कठिनतर हो जाता है।

पर नक़लची हर प्रवृत्ति के रहे हैं, और जिनका भण्डाफोड़ अपने समय में नहीं हुआ, उन्हें पहचानने में फिर समय की दूरी अपेक्षित हुई है। अधिक दूर न जावें तो न तो ‘द्विवेदी युग’ में नक़लचियों की कमी रही है, न छायावाद युग में। और न ही (यदि इस सन्दर्भ में उनका उल्लेख भी उचित हो जिनकी उपलब्धि भी ‘प्रयोगवादी सम्प्रदाय’ से विशेष अधिक नहीं जान पड़ती) प्रगतिवाद ने कम नक़लची पैदा किये। हमें किसी भी वर्ग में उनका समर्थन या पक्ष-पोषण नहीं करना है-पर माँग यह भी करनी है कि उनके अस्तित्व के कारण मूल्वान की उपेक्षा न हो, असली को नक़ली से न मापा जाये।
शिल्प, तंत्र या टेकनीक के बारे में भी दो शब्द कहना आवश्यक है। इन नामों की चर्चा इतनी पहले नहीं होती थी। पर वह इसीलिए कि इन्हें एक स्थान दे दिया गया था जिसके बारे में बहस नहीं हो सकती थी। यों ‘साधना’ की चर्चा होती थी, और साधना अभ्यास और मार्जन का ही दूसरा नाम था। बड़ा कवि ‘वाकसिद्ध’ होता था, और भी बड़ा कवि ’रससिद्ध’ होता था। आज ‘वाकशिल्पी’ कहलाना अधिक गौरव की बात समझा जा सकता है-क्योंकि शिल्प आज विवाद का विषय है। यह चर्चा उत्तर छायावाद काल से अधिक बढ़ी, जबकि प्रगति के सम्प्रदाय ने शिल्प, रूप, तन्त्र आदि सबको गौड़ कहकर एक ओर ठेल दिया, और ‘शिल्पी’ एक प्रकार की गाली समझा जाने लगा। इसी वर्ग ने नयी काव्यप्रवृत्ति को यह कहकर उड़ा देना चाहा है कि वह केवल शिल्प का, रूपविधान का आन्दोलन है, निरा फार्मेलिज्म है। पर साथ-साथ उसने यह भी पाया है कि शिल्प इतना नगण्य नहीं है; कि वस्तु से रूपाकार को बिल्कुल अलग किया ही नहीं जा सकता; कि दोनों का सामंजस्य अधिक समर्थ और प्रभावशाली होता है; और इसी अनुभव के कारण धीरे-धीरे वह भी मानो पिछवाड़े से आकर शिल्पाग्रही वर्ग में आ मिला है। बल्कि अब यह भी कहा जाने लगा है कि ‘प्रयोगवाद के जो विशष्ट गुण बताये जाते थे (जैसा बताने वाले वे ही थे !) उनका प्रयोगवाद ने ठेका नहीं लिया है-प्रगतिवादी कवियों में भी वे पाये जाते हैं।’ इससे उलझी परिस्थिति और भ्रामक हो गयी है। वास्तव में नयी कविता ने कभी अपने को शिल्प सीमित रखना नहीं चाहा, न वैसी सीमा स्वीकार की। उस पर यह आरोप उतना ही निराधार था जितना दूसरी ओर यह दावा कि केवल प्रगतिवादी काव्य में सामाजिक चेतना है, और कहीं नहीं। यह मानने में कोई कठिनाई न होनी चाहिए कि प्रगतिवाद सबसे अधिक समाजाग्रही रहा है; पर केवल इसी से यह नहीं प्रमाणित हो जाता कि उस वाद के कवियों में गहरी सामाजिक चेतना है या कि जैसी है वही उसका स्वस्थ रूप है-उसकी पड़ताल प्रत्येक कवि में अलग से करनी ही होगी।

खैर, यहाँ पुराने झगड़ों को उठाना अभीष्ट नहीं है। कहना यह है कि नया कवि नयी वस्तु को ग्रहण और प्रेषित करता हुआ शिल्प के प्रति कभी उदासीन नहीं रहा है, क्योंकि वह उसे प्रेषण से काटकर अलग नहीं करता है। नयी शिल्पदृष्टि उसे मिली है; यह दूसरी बात है कि वह सब में एक-सी गहरी न हो, या सब देखे पथ पर एक-सी सम गति से न चल सके हों। यहाँ फिर मूल्याँकन से पहले यह समझना आवश्यक है कि वह नयी दृष्टि क्या है, और किधर चलने की प्रेरणा देती है।
संकलित कवियों के विषय में अलग-अलग कुछ कहना कदाचित् उनके और पाठक के बीच में व्यर्थ एक पूर्वग्रह की दीवार खड़ा करना होगा। एक बार फिर इतना ही कहना अलम् होगा कि ये कवि किसी सम्प्रदाय के नहीं हैं; न सब की साहित्यिक मान्यताएँ एक हैं, न सामाजिक, न राजनीतिक; न ही उनकी जीवनदृष्टि में ऐसी एकरूपता है। भाषा. छन्द, विषय, सामाजिक प्रवृत्ति, राजनीति आग्रह या कर्म की दृष्टि से प्रत्येक की स्थिति या दशा अलग हो सकती है; कोई इस छोर के निकट पायी जा सकती है कोई उस छोर के, कोई ’बायें’ तो कोई दाहिने’ , कोई ‘आगे’ तो कोई ‘पीछे’, कोई सशंक तो कोई साहसिक। यह नहीं कि इन बातों का कोई मूल्य न हो। पर ’तीसरा सप्तक’ में न तो ऐसा साम्य कलन का आधार बना है, न ऐसा वैषम्य बहिष्कार का। संकलन कर्ता ने पहले भी इस बात को महत्त्व नहीं दिया है कि संकलित कवियों के विचार कहाँ तक उसके विचारों से मिलते हैं या विरोधी हैं; न अब वह इसे महत्त्व दे रहा है। क्योंकि उसका आग्रह रहा है कि काव्य के आस्वादन के लिए इससे ऊपर उठ सकना चाहिए और उठना चाहिए। सप्तकों की योजना का यही आधार भूत विश्वास है। प्रयोजनीय यह है कि संकलित कवियों में अपने कविकर्म के प्रति गम्भीर उत्तरदायित्व का भाव हो, अपने उद्देश्य में निष्ठा और उन तक पहुँचने के साधनों के सदुपयोग की लगन हो। जहाँ प्रयोग हो वहाँ कवि मानता हो कि वह सत्य़ का ही प्रयोग होना चाहिए। यों काव्य में सत्य क्योंकि वस्तुसत्य का रागाश्रित रूप है इसलिए उसमें व्यक्ति-वैचित्र्य की गुंजाइश तो है ही, बल्कि व्यक्ति की छाप से युक्त होकर ही वह काव्य का सत्य हो सकता है। क्रीड़ा और लीला भाव भी सत्य हो सकते हैं-जीवन की ऋजुता भी उन्हें जन्म देती है और संस्कारिता भी। देखना यह होता है कि वह सत्य के साथ खिलवाड़ या ‘फ्ल़र्टेशन’ मात्र न हो।

इन कवियों के एकत्र पाये जाने का आधार यही है ऐसा दावा नहीं है कि जिस काल या पीढ़ी के ये कवि हैं, उसके यही सर्वोत्कृष्ट या सबसे अधिक उल्लेख्य कवि हैं। दो-एक और आमन्त्रित होकर भी इसलिए रह गये कि वे स्वयं इस में आना नहीं चाहते थे-चाहे इसलिए कि दूसरे कवियों का साथ उन्हें पसन्द नहीं था, चाहे इसलिए कि सम्पादक का सम्पर्क उन्हें अप्रीतिकर या हेय लगा, चाहे इसलिए कि वे अपने को पहले ही इतना प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मानते थे कि ‘नये’ कवियों के साथ आने में उन्होंने अपनी हेठी या अपना अहित समझा। एक इसलिए रह गये कि उनकी स्वीकृति के बावजूद दो वर्ष के परीश्रम के बाद भी उनकी रचनाएँ न प्राप्त हो सकीं। एक-दो इसलिए भी छोड़ दिये गये कि एकाधिक स्वतंत्र संग्रह प्रकाशित हो चुकने के कारण उनका ऐसे संकलन में आना आवश्यक हो गया था-स्मरण रहे कि मूल योजना यह थी कि सप्तक ऐसे कवियों को सामने लायेंगे जिनके स्वतंत्र संग्रह प्रकाशित नहीं हुए हैं और जो इस प्रकार भी ‘नये’ हैं। यदि प्रस्तुत संकलन के भी दो-एक कवियों के स्वतंत्र संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तो वह इसी बात का द्योतक है कि ‘तीसरा सप्तक’ की पाण्डुलिपि बनने और उसके प्रकाशन में एक लम्बा अन्तराल रहा है। यों हम तो चाहते हैं कि सभी कवियों के स्वतंत्र संग्रह छपें-बल्कि सप्तक में उन्हें लाने का कारण ही यह विश्वास है कि उनके अपने-अपने संग्रह छपने चाहिए।
इन शब्दों के साथ हम ओट होते हैं। भूमिका का काम भूमि तैयार करना है; भूमि ‘तैयार’ वही है जिस पर चलने में उसकी ओर से बेखटके होकर उसे भुला दिया जा सके। पाठक से अनुरोध है कि वह आगे बढ़ कर कवियों से साक्षात्कार करे। उपलब्धि वहीं है।

परिचय

[त्रिपाठी, प्रयागनारायण : जन्म रायबरेली के एक गाँव में, सन् 1919 । हाई स्कूल तक शिक्षा इलाहाबाद में; फिर चार वर्ष के व्यवधान के बाद एम. ए. (अँग्रेजी) तक कानपुर में पायी। व्यवधान काल में साढ़े तीन वर्ष तक टीकमगढ़ (झाँसी) में सर्वे विभाग में साढ़े सात रुपये मासिक पर काम किया; फिर वहीं वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद् में क्लर्की की। एम. ए. की तैयारी करते हुए पूरे समय, और अनन्तर चार वर्ष तक चौथाई समय, दैनिक ‘प्रताप’ के सम्पादकीय विभाग में काम करते रहे। इन चार वर्षों (1946-50) में सनातन धर्म कॉलेज कानपुर में अँग्रेज़ी का अध्यापन भी किया। सन् 1950 से भारत सरकार के सूचना मन्त्रालय के हिन्दी विभाग में सम्पादक रहे।
‘‘आरम्भ से ही दो कार्य विशेष रुचिकर रहे हैं : एक, दूर-दूर की यात्रा, विशेषतया पहाड़ों की। (बचपन में एक बार तीन महीने का वज़ीफा एक साथ मिलने पर घर से भाग निकले और हिमालय की तलहटी छूकर ही वापस लौटे।) दूसरे, होड़ बदना। होड़ा-होड़ी में वे एक बार जेठ की दोपहरी में गंगा की रेती पर नंगे-पाँव दो मील चले; एक अन्य अवसर पर बत्तीस रोटियाँ गटक गये (और हज़म कर गये) ! यों पिछले सोलह वर्ष से एकाहारी हैं।’’ तीरन्दाज़ी तैराकी और पैदल-पर्यटन में भी रुचि रही; तैरने और पैदल चलने का अब भी अच्छा अभ्यास है। पर तीरन्दाजी छूट गई है क्योंकि ‘‘तीर सभी खो गये हैं, और कमान टूट चुकी है।’’
रामायण, गीता, उपनिषदादि पर ‘धुआँधार’ भाषण दे सकते हैं। रामायण के अनेक पारायण कर चुके हैं। स्मरण-शक्ति ‘‘खराब है-मित्रों के नाम तक याद नहीं रहते’’-पर अपनी सब कविताएँ कण्ठस्थ हैं।]

वक्तव्य

अपनी कविताओं के विषय में कुछ कह सकना, कम से कम मेरे लिए, आसान नहीं। इसका मुख्य कारण यह है कि मैं अपनी कविताओं को अभी कविताएँ नहीं मानता अभ्यास ही मानता हूँ। उनमें अनुभूति और चिन्तन की सच्चाई तो है, पर अभिव्यक्ति की वह पूर्णता नहीं है जो मुझे सन्तोष दे सके। आप को दे सके, तो इसे अपनी सफलता नहीं बल्कि आपकी उदारता मानूँगा।
इस से एक बात और स्पष्ट हो जाती है। कविता के क्षेत्र में मैं एक अन्वेषी ही हूँ। इस अन्वेषण की यात्रा का एक लम्बा इतिहास है। 13 वर्ष की आयु में मैं ने पहली कविता लिखी थी जिसकी अन्तिम दो पंक्तियाँ इस प्रकार थीं :
करता गान कला का जिसकी भारत-भू का प्रति आवास,
भारत-हृदय, भक्त-चूड़ामणि गोस्वामी श्री तुलसीदास।

रूढ़ि और परम्परा के वातावरण में, राम-भक्त वैष्णव परिवार में जन्म लेकर और पल कर मैं और कुछ लिख ही कैसे सकता था ? काव्यविषयक मेरे आरम्भिक विचार रामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली और ब्रजमाधुरी-सार के निरन्तर अध्ययन से बने। फिर ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, ‘निराला’, पन्त, ‘प्रसाद’, महादेवी वर्मा को पढ़ा। माखनलाल चतुर्वेदी ‘नवीन’, ‘दिनकर’, ‘नरेन्द्र शर्मा’ और अज्ञेय-ये सभी मुझे समय-समय पर प्रिय लगे हैं। सन् 1950 तक मैंने जो कुछ लिखा (मेरे विषय में मेरे कृपालु मित्र यह सोचते रहे हैं कि मैं जब भी क़लम उठाता हूँ तो ‘धुआँधार’ लिखता हूँ, पर मैंने यह अब तक बहुत कम लिखा है, और, जैसा कि ऊपर निवेदन कर चुका हूँ, सन्तोषप्रद तो कुछ भी नहीं लिखा) वह इन्हीं अँग्रेज़ों की देन है, ऐसा मानता हूँ और सभी के प्रति कृतज्ञता-पूर्वक प्रणत हूँ।

परन्तु 1950 से 1954 के आरम्भ तक मैं कविता की एक पंक्ति भी नहीं लिख सका। इसका कारण भी था मेरे मन का वही असन्तोष जिसकी चर्चा मैं ने आरम्भ में की है। मुझे ऐसा लगा कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ उस का, कथ्य तो मेरा है पर अभिव्यक्ति मेरी नहीं है : परायी है। मुझे लगा कि जिस माध्यम से, अर्थात् ‘छन्द के बन्ध, प्रास के रजत-पाश’ के द्वारा मैं अपने अनुभूत को कहना चाह रहा हूँ, कह नहीं पा रहा हूँ। मैं ने उस वैयक्तिक संक्रान्ति-काल में अपने-आप से कई बार प्रश्न किया था, ‘‘कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम छन्द, तुक और अलंकार की सिद्धि के श्रम से भयभीत होकर परम्परा से पीछा छुड़ाना चाहते हो ?’’ पर हर बार मुझे अपने भीतर से उत्तर मिला, ‘‘नहीं, नहीं, नहीं !’’ गुरुजनों ने मुझे कई बार सत्परामर्श दिया : ‘भावनाओं को संयत, सुन्दर और प्रेषणीय बनाने के लिए परम्परागत छन्दों, तुकों और अलंकारादि की अनिवार्य आवश्यकता होती है।’’ मैं ने एकान्त में इस परामर्श पर खूब सोच-विचार किया पर मेरा मन इसे अनिवार्य आवश्यकता के रूप में नहीं स्वीकार कर सका। अन्ततः मैंने मुक्त छन्द को अपनाया और अब मैं अधिकांशतः उसी के द्वारा अपने आप को व्यक्त करने का यत्न करता हूँ। अधिकांशतः इसलिए कि कभी अभ्यास के लिए औऱ कभी मित्रों को चमत्कृत करने के लिए अब भी यदा-कदा परम्परागत छन्दों में कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ।

परन्तु मुक्त छन्द के विषय में मेरी अपनी कुछ धारणाएँ हैं। एक पाश्चात्य कवि (शायद डी. एच. लारेंस) ने मुक्त छन्द के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा था कि मुक्त छन्दमयी प्रत्येक कविता अपने आप में पूर्ण एक इकाई होती है। वह भावानुकूल शब्द-संयोजन का एक सुचिन्तित और अनुशासित प्रयास होता है-ऐसा प्रयास, जो अराजकता नहीं बल्कि उच्चकोटि का अभिव्यक्ति संयम है-ऐसा संयम जो परम्परा से भिन्न होते हुए भी उससे संयुक्त है क्योंकि नया है मौलिक है, क्योंकि वह वर्तमान के एक क्षण की गहनतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। और कोई भी क्षण समय की अनवरत धारा से विच्छिन्न नहीं है, विभिन्न भले ही हो (बल्कि, विभिन्न तो होगा ही)। ऐसे मुक्त छन्द की अधिकांश कविताओं में मैं ने लय के समावेश और निर्वाह का विशेष ध्यान रखा है क्योंकि मैं मानता हूँ गद्य कविता नहीं है, गद्य ही है। कविता में, चाहे वह आज की हो चाहे आगामी कल की, यदि लय नहीं है, यदि तन्त्रकौशल नहीं है, यदि वह ‘कथन’ मात्र है न कि ‘रचना’ तो मैं उसे कविता नहीं कहूँगा। मैं ‘अज्ञेय’ जी की इस स्थापना से पूर्ण सहमत हूँ कि ‘‘आजकल की कविता बोल-चाल की अन्विति माँगती है, पर गद्य की लय नहीं माँगती। तुक-ताल का बन्धन उसने अनात्यन्तिक मान लिया है, पर लय को वह उक्ति का अभिन्न अंग मानती है। बाह्य अनुशासन को हेय नहीं तो गौण मान लेने पर आन्तरिक अनुशासन को वह अधिक महत्त्व देती है।’’
इस दृष्टि से देखने पर मुझे लगता है कि नयी कविता के नाम पर आज जो कुछ लिखा जा रहा है उसके अन्तर्गत बहुत-कुछ मेरी (मेरी अपनी कविताएँ भी) महज बकवास हैं। पंक्तियों को छोटी बड़ी कर देना, शब्दों को तोड़-मरोड़ देना; कोलन, डैश, उक्ति-चिह्न और कोष्ठकों को निरर्थक ढंग से बैठा देना, मनमाने तौर पर लय को बदल देना; बिना आत्मसात् किये हुए नयी उपमा-उत्प्रेक्षाओं या बिम्बों को परेशान पाठकों के सम्मुख ठेल देना-ये तथा इसी प्रकार के अनेक दोष आज की अनेक कविताओं में दिखाई देते हैं। मैं समझता हूँ कि अब वह समय आ गया है कि हम हृदय-मन्थन करें, सोचें कि कहीं हम ऐसे बिन्दु पर तो नहीं खड़े हुए हैं जिसके लिए मैथ्यू अर्नाल्ड ने लिखा था ‘द वन् डाइंग, द अदर पावरलेस टू बी बॉर्न’-एक युग मर रहा है, पर दूसरा जन्म लेने में असमर्थ है।
नयी हिन्दी कविता में मुझे एक और भी भ्रान्ति दिखाई दे रही है। नये और यथार्थ के चित्रण के नाम पर इस प्रकार की पंक्तियाँ लिखा जा रही हैं, जैसे-
अस्पताल, क्लब, व्यायामालय
साड़ी, ब्लाउज; फ्रॉक, कमीजें
कुश्ती, दंगल, मैच, तमाशे

ऐसी परिगणना न तो हमारे सम्मुख कोई प्रभावशाली बिम्ब ही उपस्थित करती है और न आज के जीवन यथार्थ के प्रति कोई रागात्मक उत्तेजना ही उत्पन्न करती है।
आप पूछेंगे : नयी कविता का कथ्य क्या है ? क्या वह आज का यथार्थ ही नहीं है ? कहूँगा कि हाँ, वह है। पर केवल वही है, यह मैं नहीं मानता। कवि की संवेदनशीलता देश-कालातीत हो सकती है। वह ‘परिभु’ और ‘स्वयम्भु’ हो सकता है। वह बीते कल के यथार्थ से भी सम्पृक्त हो सकती है और आने वाले कल की सम्भावनाओं से भी। हाँ, यह अवश्य है कि कवि कोरा काल्पनिक या मानवोपरि मानव नहीं है। वह प्रमुखतः आज का जीवित, जाग्रत राग-विरागयुक्त प्राणी है। वह आज के जीवन, चिन्तन, द्वन्द्व-सभी में जीता है, सभी को भोगता है, सभी से प्रतिकृत होता है : कुछ से शरीर द्वारा, कुछ से संवेदित व्यक्तित्व द्वारा। इसी से आज के जीवन-यथार्थ की अभिव्यक्ति ही आज के कवि की प्रधान और सच्ची अभिव्यक्ति है। ऐसी ही अभिव्यक्ति के लिए वह निरन्तर सचेष्ट है, निरन्तर प्रयोगशील है, निरन्तर अन्वेषी है। यह अभिव्यक्ति व्यक्तिगत होकर भी समविष्ट से संश्लिष्ट हो सकती है और समष्टिगत होकर भी व्यक्ति की अनुभूत हो सकती है।

एक अन्तिम निवेदन। मेरा विश्वास है कि कविता दर्शन नहीं है, अध्यात्म नहीं है; मतवाद नहीं। सर्वोपरि वह अभिव्यक्ति है जो पाठक को उद्वेलित करती है। इस उद्वेलन के प्रभाव से आप आनन्दित भी हो सकते हैं और क्षुब्ध भी। आप में प्रेम भी जाग सकता है और घृणा भी। आप क्रान्ति में भी प्रवृत्त हो सकते हैं और समाधि में भी। पर आनन्द, क्षोभ, प्रेम, घृणा, क्रान्ति, समाधि-इन में से एक भी कविता का साध्य नहीं है (दूसरे शब्दों में, सभी कुछ साध्य है)। कवि तो मानो वह पनडुब्बी हो जो वर्तमान के अनुकूल सागर में डूब कर, तल में स्थित सीपी का मुँह चीरकर, मोती निकाल ले आती है और आप को सौंप देती है। अब आप चाहें तो उस मोती को अपनी मेज़ पर सजाकर उसे निर्निमेष देखते रहें, चाहे उसे अपनी प्रिया के आभूषणों में टँकवा दें, चाहे बेचकर बैंक बैलेंस बढ़ा लें। कविता का साध्य तो यथार्थ का तलस्पर्शी, सुन्दर और प्रेषणीय चित्रण हैं। सेसिल डे लुइस के कथन1 से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि ‘कविता यथार्थ को संवेदना और सहयोग प्रदान करने का एक मार्ग है :

1- पोयट्री एज़ वन वे ऑफ सफ़रिंग ऐण्ड को ऑपरेटिंग विद रिएलटी : इट क्रिएट्स रिएलिटी ओनली इन द सेंस दैट इट रिएरेंजेज़ इट्स डेटा इण्टु न्यू पैटर्न्स।
कविता यथार्थ का सृजन केवल इसी अर्थ में करती है कि वह अपनी उपलब्धि को नये रूपों में पुनः संयोजित करती है।’’ यथार्थ से इतर कोई काल्पनिक या भावात्मक उपलब्धि जिस कविता का साध्य हो (जैसा कि आज की अधिकांश ‘आध्यात्मिक’ कविता का है) वह दर्शन या चिन्तन या साधना की प्रभविष्णु अभिव्यक्ति भले ही हो, पर मैं उसे कविता नहीं मानता।

समाधिस्थ

मुझ में कुछ है
जो मेरा बिलकुल अपना है
जो है मेरे क्षीरोज्ज्वल मन के मन्थन का कोमल माखन।
जिस को मैं ने बहुत टूट कर
बहुत-बहुत अपने में रह कर
बहुत-बहुत सह कर पाया है-
जिस को अहरह दुलराया है।
गद्गद चिन्तन, आराधन, एकान्त समर्पण की घड़ियों में
वही-वही है : मेरा आश्रय, मेरा आत्मज, पूर्णभूत मैं।

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