सबसे बड़ा रुपैया - सुरेश पद्मनाभन Sabse Bada Rupaiya - Hindi book by - Suresh Padmanabhan
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सबसे बड़ा रुपैया

सुरेश पद्मनाभन

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 81-88266-54-x मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :235 पुस्तक क्रमांक : 5494

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प्रस्तुत पुस्तक में आपको ऐसे कई विचार और अवधारणाएँ मिलेंगी, जो आपको पसंद आएँगी और जिन्हें आप स्वीकार भी करेंगे...

Sabse Bada Rupaiya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पुस्तक का शीर्षक ‘सबसे बड़ा रुपैया’ पैसे अथवा रुपए के साथ हमारे संबंधों की मौलिक रूपरेखा प्रस्तुत करता है। पुस्तक को जब भी आप खोलेंगे, आपको याद आएगा कि जब ‘पैसा’, ‘व्यक्तिगत शक्ति’ और ‘व्यापक बल’ :ये तीनों आपके साथ होंगे तो आपको जीवन में संतुलित और सामंजस्यपूर्ण विकास की अनुभूति होगी।
रुपए से संबद्ध ऐसी कई तकनीकें और सूत्र हैं, जिन्हें मनी वर्कशॉप (रुपए की कार्यशाला) में पहले आजमाया जा चुका है। अत: आपको स्वयं कुछ नया खोजने की जरूरत नहीं है; इन तकनीकों या सूत्रों के माध्यम से आपका जीवन सरल और सुखमय बन सकता है।

इस पुस्तक में आपको ऐसे कई विचार और अवधारणाएँ मिलेंगी, जो आपको पसंद आएँगी और जिन्हें आप स्वीकार भी करेंगे; क्योंकि आपको ऐसा महसूस होगा जैसे ये सभी विचार आपके अपने ही हैं।
‘सबसे बड़ा रूपैया’ पुस्तक में निहित विचारों या तकनीकों के आधार पर अपनी कार्य-योजना तैयार करें, क्योंकि ‘कार्य’ ही आपकी जेब में पैसों के संचालन या प्रवाह को बढ़ाएँगे और इस प्रकार आप उच्च श्रेणी के जीवन का आनंद ले सकेंगे। पुस्तक में रुपए की महत्ता व समर्थता के साथ ही यह भी बताया गया है कि रुपए की आसक्ति में मानवीय और भावनात्मक संबंधों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

आभार


जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब हम अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। आज कई ज्ञात और अज्ञात व्यक्तियों के प्रति अपना आभार प्रकट करते समय मैं स्वयं को ऐसी ही स्थिति में पा रहा हूँ। यह छोटे से पात्र में चाँद की परछाईं देखकर उसे पकड़ने की कोशिश करने जैसा है।
एक बार एक आध्यात्मिक गुरु ने आधी रात में अचानक अपने शिष्य को बुलाया। शिष्य गुरु के घर के बाहर ध्यान लगा रहा था। बुलाने पर वह तुरंत गुरु के पास पहुँचा। गुरु ने कहा, ‘‘एक जरूरी बात करने के लिए मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया है। पिछले कई वर्षों से मैं अपनी छड़ी से तुम्हें मारता आ रहा हूँ। मारने के बाद हर बार तुम्हें कुछ-न-कुछ नया सीखने को मिला, इस प्रकार तुम्हारे ज्ञान में वृद्धि हुई। मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम (आत्मज्ञान के) बहुत निकट पहुँच गए हो और सुबह तक ही तुम बुद्ध बन जाओगे। इसलिए आज मैं तुम्हें अंतिम बार मारना चाहता हूँ।’’

गुरु की बात सुनकर शिष्य एक बार मुसकराया और फिर सिर झुकाकर खड़ा हो गया, ताकि गुरु उसे मार सकें। गुरु ने उसे अंतिम बार मारकर अपनी इच्छा पूरी की। शिष्य का हृदय अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता से भर उठा। आँखों में कृतज्ञता के आँसू लिये हुए वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा।
जी हाँ, आपको जो भी जगाता है वही गुरु है। मैं भी एक शिष्य की तरह हूँ, जिसने ‘सबसे बड़ा रुपैया’ को पूर्ण करके आज बोध प्राप्त किया है।

वस्तुत: मैं तो इस पूरी प्रक्रिया का एक साधन मात्र रहा हूँ। इसमें कई अन्य व्यक्तियों का सौजन्यपूर्ण सहयोग रहा, जिसके बिना शायद यह संभव ही नहीं था। मैं उन सभी के प्रति अपना आभार प्रकट करता हूँ।

आभार-सतत प्रेरणा व प्रोत्साहन के लिए सर्वश्री आकाश शर्मा, अतुल भावे, दीपक कुलकर्णी, जी. बालाजी, कैज़ाद, कृष्णा अय्यर, कृष्णा शर्मा, महादेव अंबेकर, मीनाक्षी शर्मा, रचना शर्मा, संपत, श्रीधर, उषा हरयानी, वैशाली वारेनेकर, विरल मानेक के प्रति; मनी वर्कशॉप के दुनिया भर में फैले प्रतिभागियों के प्रति, जिनसे मुझे पैसे की दुनिया के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। सचमुच, उनका अत्यन्त मूल्यववान् सहयोग रहा। अपने पिता जी श्री वी.एस. पद्मनाभन, माताजी श्रीमती बृंदा पद्मभावन, बहन अनुराधा और बहनोई के.एस. बुवरागन के प्रति, जिनकी शुभेच्छा और आशीर्वाद सदैव मेरे साथ रहे हैं। पत्र के माध्यम से मुझ तक प्रेम व प्रेरणा प्रेषित करनेवाले सभी ज्ञात-अज्ञात व्यक्तियों के प्रति।
अंत में, आप सभी के प्रति जो ‘सबसे बड़ा रुपैया’ की उपयोगिता को अपने जीवन की उपयोगिता से जोड़कर देख रहे हैं।
सुरेश पद्मनाभन

प्राक्कथन


आपने देखा होगा कि पुस्तक का प्राक्कथन प्राय: किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा लिखा गया होता है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसमें व्यक्ति-चाहे वे सामान्य हों या महान्-आते हैं और चले जाते हैं; कुछ भी तो नहीं है स्थायी यहाँ। मैं स्थायी हूँ और तब तक रहूँगा जब तक यह ब्राह्मांड रहेगा। मैं ‘रुपया’ हूँ और मैं आपके साथ हूँ; आप इसे पसंद करें या नहीं, यह अलग बात है। हाँ, मेरा रूप बदल सकता है, अलग-अलग रूपों में मैं आपके साथ हो सकता हूँ, पर मेरा अस्तित्व कभी नहीं बदलता। मेरे बारे में लोगों में बहुत सी गलतफहमियाँ फैली हुई हैं, जिन्हें आज मैं हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर देना चाहता हूँ। मेरी कुछ सच्चाइयाँ हैं, जिन्हें समझा जाना चाहिए, उन पर अमल किया जाना चाहिए। अपनी इन सच्चाइयों को आप सभी तक पहुँचाने और अपने विभिन्न पहलुओं को प्रकाश में लाने के लिए मैंने सुरेश पद्मनाभन को चुना है, जो मेरे चौंकानेवाले रहस्यों को आपके सामने लाएँगे।

यह तो अभी शुरुआत ही है, उनकी (सुरेश पद्मनाभन की) पुस्तकों, कैसेटों, व्याख्यानों और कार्यशालाओं के माध्यम से मैं बराबर आपके संपर्क में रहूँगा। बहुत सी ऐसी बातें हैं, जो अब तक अनकही रह गई हैं; बहुत से ऐसे रहस्य हैं, जिन पर से परदा उठाया जाना अभी शेष है। अपनी सजगता और सतर्कता से आप एक-एक कर मेरे रहस्यों को जान सकेंगे। यह पुस्तक पढ़ते समय शायद आपको लगे कि सुरेश पद्मनाभन ने पुस्तक लिखने में देर कर दी। सचमुच इस पुस्तक के रूप में उन्होंने ऐसा कुछ लिखा है, जो वर्षों पहले लिखा जाना चाहिए था। अब इस शुरूआत को समझें और इसे मन से स्वीकार करके देखें।

एक युवा लेखक के रूप में सुरेश पद्मनाभन में एक अलग तरह की दृष्टि विद्यमान है। उन्होंने अपने मन में पहले ही यह बात सोच ली थी कि यह पुस्तक सार्वाधिक बिकनेवाली पुस्तक होगी। पुस्तक पढ़ते समय बीच-बीच में आपको कुछ बेचैनी, बेताबी-सी महसूस होगी और साथ ही जैसे-जैसे आप मूल बात को समझेंगे वैसै-वैसै आपको पहले की गई अपनी गलतियों का अहसास होता जाएगा। मनुष्य के शरीर की बनावट को लेकर आपके मन में एक तरह से कृतज्ञता का भाव जागेगा; क्यों ? क्योंकि मनुष्य की शारीरिक बनावट कुछ ऐसी है कि वह स्वयं अपनी पीठ पर वार नहीं कर सकता। आपके मन में एक अलग ही कहानी चल रही होगी। पुस्तक में लिखी एक-एक बात को आप अपने ढंग से समझने और उसका अर्थ लगाने की कोशिश करेंगे। मन में बस यही इच्छा होगी-और पढ़ो...पढ़ते जाओ। सुरेश की इस रचना की सुंदरता इसी बात में निहित है कि इसे पढ़ते समय आप स्वयं को इसके भीतर, इसमें समाया हुआ महसूस करेंगे। यह खुली आँखों से देखी गई जीवन की सच्चाई है।

अब बात आती है कि इस प्रकार पुस्तक को पढ़ने और स्वयं को उसमें समाया हुआ महसूस करने का परिणाम क्या हो सकता है ? व्यक्तिगत रूप से आप स्वयं को मानो गहरी निद्रा से जागा हुआ महसूस करेंगे और रुपए की दुनिया में आपका जो अगला कदम होगा, वह आत्मविश्वास और सजगता से भरा हुआ होगा। ‘सबसे बड़ा रुपैया’ का अहसास करके आपको एक तरह की खुशी मिलेगी। ‘सबसे बड़ा रुपया’ को तैयार करने में पर्याप्त श्रम और समर्पण लगाया गया है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि पुस्तक को पूरा पढ़ लेने के बाद आप मुझसे अर्थात रुपए से प्रेम करने लगेंगे। इतना ही नहीं, मुझे तो यह भी विश्वास है कि आप ‘सबसे बड़ा रुपैया’ से एक अलग तरह का लगाव, अपनापन महसूस करने लगेंगे और यदि आपको सुरेश से मिलने का मौका मिला तो आप उनके प्रति भी अपने मन में प्रेम का भाव विकसित होने से नहीं रोक पाएँगे। इन सब कामों के लिए मैंने सुरेश को ही चुना; क्योंकि उनके चेहरे पर फैली आकर्षक मुसकान, उनकी चमकती आँखें और उनकी गंभीरता चित्त को चुरानेवाली थी, जब उन्होंने मुझसे कहा था, ‘‘तुम रुपया हो सकते हो, पर मेरे लिए तो तुम मेरे जीवन का मिशन हो।’’

अचानक ही मुझे लगा कि मुझमें और भी ऐसी कई बातें हैं, जिनके बारे में आप नहीं जानते। सच है कि मैं आपके जीवन में आपके साथ इतने लंबे समय से रहा हूँ, पर आप शायद ही मुझे अच्छी तरह जानते हों। अगर आपको ऐसा लगता भी हो कि आप मुझे जानते हैं तो जरूर आप अपने आस-पास मेरे बारे में फैली गलतफहमियों को ही जानते होंगे। मुझे जरा गौर से देखिए, शायद आपको सच्चाई की झलक मिल जाए। इतने लंबे समय से मैं चुप रहा हूँ, लेकिन अब और ज्यादा चुप नहीं रह सकता। सच्चाई सामने आएगी, सच्चाई को जानिए, सच्चाई को प्रकट कीजिए, सच्चाई में भागीदार बनिए और फिर यही सच्चाई आपको मुक्त करेगी।
मैं आपसे प्यार करता हूँ। आशा है, आप भी मुझसे प्यार करते हैं। हमेशा के लिए आपका साथी,    
रुपया

आरंभिक निष्कर्ष


जरा सोचिए, जीवन कैसा होगा, यदि आपको अंत (परिणाम) की जानकारी कार्य शुरू करने पर ही हो जाए ? बिलकुल आरंभ में ही मैं आपको पुस्तक पढ़ने की एक निश्चित पद्धति बता देना चाहता हूँ, जिसके अनुसार ही आपको यह पुस्तक पढ़नी है। इस प्रकार आपको पहले पृष्ठ की सामग्री पढ़ने के साथ ही परिणाम मिलने शुरू हो जाएँगे। यही इस पुस्तक का मूल उद्देश्य भी है। बस, पढ़ते जाइए-

गरमियों का दिन था। कुछ लोगों का एक समूह रेगिस्तान में यात्रा कर रहा था। समूह का एक व्यक्ति अपने साथियों से बिछुड़ गया। अपने साथियों के पास वापस पहुँचने के लिए वह काफी देर तक इधर-उधर भटकता रहा। वह बहुत थक गया था। प्यास से उसका गला सूखने लगा था। वह पानी पीना चाहता था, क्योंकि उसकी प्यास लगातार बढ़ती जा रही थी और पानी के बिना वह ज्यादा देर तक नहीं रह सकत था। अचानक उसकी नजर एक नल पर पड़ी और वह उसकी ओर बढ़ने लगा। नल के पास पहुँचकर उसने देखा कि वहाँ पानी से भरा एक गिलास रखा था; उसे देखकर वह बहुत खुश हुआ। वह गिलास उठाकर पानी पीने ही वाला था कि उसकी नजर एक और श्यामपट्ट पर पड़ी, जिस पर लिखा था- ‘पानी से भरा यह गिलास जादुई है, इसलिए यह पानी मत पियो। यह सारा पानी नल में डाल दो और फिर नल चलाओ। इस प्रकार नल से तुम्हें ढेर सारा पानी मिलेगा।’

वह आश्चर्य और दुविधा में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। हाथ में आया हुआ एक गिलास पानी जमीन के नीचे पड़े सैकड़ों लीटर पानी से कहीं ज्यादा अच्छा है। लेकिन वह कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। किंतु अंत में उसने गिलास का पानी नल में डाल दिया।

अब वह नल को चलाने लगा। एक बार, दो बार, तीन बार...लेकिन एक बूँद पानी नहीं आया। फिर चलाना शुरू किया। चौथी बार, पाँचवीं बार, छठी बार...पानी नहीं आया। अब वह श्यामपट्ट पर इस तरह का निर्देश लिखनेवाले को कोसने लगा। फिर उसने सातवीं, आठवीं एवं नौवीं बार नल चलाया और देखते-ही-देखते नल से ढेर सारा पानी आने लगा। अब वह बहुत खुश था। उसने जी भरकर पानी पिया और ढेर सारा पानी अपने रास्ते के लिए भी रख लिया। इसके बाद उसने निर्देश के अनुसार गिलास में पानी भरकर वहीं रख दिया। वह चलने को हुआ, तो उसके मन में कुछ आया और वह श्यामपट्ट के पास पहुँचा। वहाँ पड़ी खड़िया से उसने पहले लिखे निर्देश के नीचे लिख दिया- ‘यह सच है।’

अब किसी को इन निर्देशों पर कोई संदेह नहीं होगा और उसका जादू इसी तरह चलता रहेगा। मैं स्वयं ही वह व्यक्ति हूँ, जिसने तकनीकों से भरा वह पहला गिलास पिया था और जिसे विश्वास था कि यह तकनीक काम करेगी। उसके बाद मैंने ‘मनी वर्कशॉप’ (रुपए की कार्यशाला) के हजारों प्रशिक्षुओं को यह तकनीक सिखाई और इस प्रकार उन्हें भी विश्वास हो गया तथा उनकी ‘रुपए की दुनिया’ खूब दिलचस्प और खुशहाल हो गई। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि आप भी यह सबकुछ जान लेने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि ‘तकनीक काम करती है।’
लेकिन ध्यान रहे-तकनीकों को अपने लिए इस्तेमाल करने के लिए आपको काम करना होगा; वे मूर्ख ही होते हैं जिन्हें परिणाम नहीं मिलता।

भूमिका


‘‘जब तक आप एक नन्हे बालक की तरह स्वयं को नहीं देखते, आप उस परमपिता के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते।’’
पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर आपको जो फोटो दिखाई दे रहा है, वह नन्ही सी और प्यारी बच्ची मोहाना का है। उसे पैसे से उतना ही प्यार है जितना अपने खिलौनों से। लेकिन उसका मन पैसा और जीवन के विचारों-धारणाओं से दूषित नहीं हुआ है। पैसा देखते ही उसकी आँखें चमक उठती हैं-उसी तरह जैसे उसकी कोई पसंदीदा चीज मिलने पर। उसके लिए तो ‘पैसा बस पैसा ही है’।
उसकी आँखों में वही स्वाभाविक चमक है; वे अच्छे- बुरे के विचार से धुँधली और तेजहीन नहीं हुई हैं। उसका मन स्वाभाविक रूप से शुद्ध है।

कुछ वर्ष पहले हम-आप भी मोहाना जैसे ही रहे होंगे-सरल, मासूम और स्वाभाविक रूप से शुद्ध।
अपने अंदर की उस बाल-सुलभ सरलता, मासूमियत को ढूँढ़िए और पैसे के प्रति कौतुकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित कीजिए। पैसे के बारे में फैली भ्रांतियों, गलतफहमियों को छोड़िए, क्योंकि ये हमारी ऊर्जा को व्यर्थ ही नष्ट करती हैं। पैसे या रुपए के ऊपर जो ‘भ्रष्ट’, ‘दूषित’ और ‘बुरा’ का लेबल लगा है, उसे हटाकर रुपए को एक बार फिर से देखिए। मोहाना की तरह देखिए-आश्चर्य और कुतूहल भरी नजरों से। तभी यह रुपया अथवा पैसा अपने वास्तविक रुप में आपको दिखाई देगा, जो
 शुद्ध, बेदाग फल देनेवाला होगा।
गर्व से कहिए ‘‘सबसे बड़ा रुपैया।’’  

पुस्तक का शीर्षक ‘सबसे बड़ा रुपैया’ पैसे अथवा रुपए के साथ हमारे संबंधों की मौलिक रूपरेखा प्रस्तुत करता है और साथ ही इसमें पुस्तक का मूल संदेश भी निहित है।
‘सबसे बड़ा रुपैया’-यह वाक्य लगातार दोहराते रहने से आपके मन में, आपकी चेतना में पैसे के प्रति गहरा अनुराग भरने लगेगा।
आरंभ के तीन पृष्ठ क्रिया-कलापों से संबंधित हैं, जिन्हें पूर्ण करने के लिए आपका सहयोग आपेक्षित है। कृपया दिए गए निर्देशों का पालन करें; इससे जब भी आप पुस्तक को खोलेंगे, आपको याद आएगा कि जब ‘पैसा’, ‘व्यक्तिगत ताकत’ और ‘व्यापक बल’-ये तीनों आपके साथ होंगे तो आपको जीवन में संतुलित और सामंजस्यपूर्ण विकास की अनुभूति होगी।
ऐसी कई तकनीकें और सूत्र हैं, जिन्हें मनी वर्कशॉप (रुपए की कार्यशाला) में पहले अजमाया जा चुका है। अत: आपको स्वयं कुछ नया खोजने की जरूरत नहीं हैं; इन तकनीकों या सूत्रों के माध्यम से आपका जीवन सरल और सुखमय बन सकता है। अच्छा परिणाम तब देखने को मिलेगा जब आप लंबे समय से चली आ रही अपने मन की पूर्व-धारणा को छोड़कर उसे भुला दें। यानी पहले भूलना सीखें, फिर याद करना।

पुस्तक को आरंभ से अंत तक पढ़ें और फिर आप कोई भी अध्याय पढ़ सकते हैं, जो आपको पसंद हो; क्योंकि प्रत्येक अध्याय स्वयं में स्वतंत्र है। पढ़ते समय अच्छा होगा, यदि आप अपने साथ पेंसिल तैयार रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर आप अपने विचारों को एक कागज पर लिख सकें। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि आप नियमित रूप से इसे पढ़ेंगे तो आपको ढेर सारी ऐसी बातें मिलेंगी, जो पैसा और आपके जीवन से सीधा संबंध रखनेवाली हैं। जितनी बार आप इसे पढ़ेंगे, हर बार आपको नया दृष्टिकोण और नई दृष्टि मिलेगी।
पुस्तक को हमेशा अपने साथ रखें और कम-से-कम इक्कीस दिनों तक लगातार इसे पढ़ें; क्योंकि अपनी गलतफहमियों या बुरी आदतों को छोड़कर अच्छी आदतें अपनाने में इतना समय तो लग ही जाता है। समय हो तो एक पुस्तक अपने घर में रखें और एक अपने कार्यालय में। इससे आपकी याद बनी रहेगी और नियमित रूप से पुस्तक को पढ़ भी सकेंगे।

    

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