अरी ओ करुणा प्रभामय - अज्ञेय Ari O Karuna Prabhamaya - Hindi book by - Agyeya
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अरी ओ करुणा प्रभामय

अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
आईएसबीएन : 0000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :169 पुस्तक क्रमांक : 5484

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श्रेष्ठ कविता-संग्रह...

Ari O Karuna Prabhamaya - A Hindi Book by Agyeya - अरी ओ करुणा प्रभामय -अज्ञेय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पहले संस्करण की भूमिका

प्रस्तुत संग्रह की अधिसंख्य कविताएँ इस ओर से पूर्व अप्रकाशित हैं। इस कारण यह भी रहा है कि जिस काल-खण्ड की ये कविताएँ हैं उस में मैं अधिकतर प्रवासी रहा, और यह भी कि प्रकाशन के लिए उपयुक्त माध्मय की कमी रही। जो लिख कर फिर छपाया भी गया, उसके बारे में दीन अथवा याचक भाव दरसाना लेखक को पाखण्ड-विनय ही जान पड़ता है; पर उसका यह चाहना अनुचित नहीं है कि उसकी रचना वहाँ छपे जहाँ उसके छपने से ही उसे तृप्ति, सन्तोष या कृतार्थता का बोध हो। ऐसा ‘वहाँ’ हिन्दी में कहाँ है, इस एक-आध का उत्तर तो हो सकता है, पर कहाँ-कहाँ है इसकी गिनती करने चलने पर एक हाथ की उँगलियों से आगे बढ़ना कदाचित् कठिन होगा। यों पत्र-पत्रिकाएँ अनेक हैं, उन के प्रति लेखक कृतज्ञता का भी अनुभव करता है और अपने कर्तव्य का भी...

एक कविता (संख्या 20, ‘ऋतुराज’) पुरानी है—कोई पन्द्रह वर्ष पहले की।
इन कविताओं को किन-किन कोटियों में बाँटा जा सकता है, इस बारे में कुछ कहकर समीक्षक की सहायता करना (या उसे चिढ़ाना) लेखक को अभीष्ट नहीं; पर कुछ कविताओं को अलग उल्लिखित करना आवश्यक है। क्रम-सूची में संख्या 53-79, जो ‘एक चीड़ का ख़ाक़ा’ नामक खण्ड के अन्तर्गत हैं, जापानी कविताओं के अनुवाद हैं। मूल कवि के नाम कविता के अन्त में दिये गये हैं। जहाँ ये अनुवाद न होकर केवल छायानुवाद रह गये हैं, वहाँ कारण इस लेखक की मौलिकता नहीं है बल्कि उसकी असमर्थता ही; जापानी भाषा न जानने से वह मूल पाठ रोमन में पढ़कर भी उसे समझने से वंचित रहा और अँगरेज़ी अनुवादों, या जापानी बन्धुओं द्वारा की गयी व्याख्याओं पर ही निर्भर रहा। कहीं-कहीं, जहाँ मूल से अपनी दूरी को लेखक स्वयं स्पष्ट देख सकता था, वहाँ उस ने जापानी कवि का नामोल्लेख अपने अधिकार से बाहर मान कर केवल जापानी काव्य का ऋण स्वीकार कर लिया है (संख्या 53, 58, 64,75)।

जापान और साधारणतया पूर्वेशिया का ऋण इतना ही नहीं है। जापान की ‘ज़ेन’ बौद्ध विचार और साधना-पद्धति का, और तत्सम्बन्धी साहित्य औऱ सम्प्रदाय का भी, लेखक आभारी है। प्रत्येक साधना दृष्टि देती है : कला के सन्दर्भ में किसी भी ‘देखने’ में कुछ ‘न देखना’ भी सन्निहित होता है क्योंकि कलादृष्टि अनिवार्य तथा चयनधर्मा (सेलेक्टिव) है। कला-दृष्टि की सम्पूर्णता अनेक की विवृतियों के जोड़ का नहीं, एक के सारभूत तादृशत्व का नाम है। चीन और जापान की चित्रकला और जापान की काव्यकला से, पश्चिम से कई कवियों ने नयी दृष्टि पायी। हम भारतवासी, जो केवल ‘पूर्व’ होने के नाते ‘दूर-पर्व’ और ‘पश्चिम’ के बीच में आते हैं, इन देशों की कला से उतने दूर नहीं हैं जितने फ्रान्स या जर्मनी के कवि थे। फिर भी हम उन से नयी दृष्टि पा सकते हैं—उनकी परम्परा में भारत की जो देन रही, उसी के तद्देशीय रूप से भी।

जापानी ‘ज़ेन’ भारतीय ‘ध्यान’ का ही रूप है, किन्तु ज़ेन का साहित्य-भण्डार आज के भारतीय लेखक के लिए भी कितना स्फूर्तिप्रद है ! प्रस्तुत संग्रह में अनुवादों को छोड़ कर अन्य अनेक कविताओं में भी पर्व के (और पश्चिम के भी क्यों नहीं ?) प्रभाव मिलेंगे; लेखक सभी का स्वीकारी है। इतने से ही वह अ-भारतीय या अ-हिन्दी हो गया है, ऐसा न वह मानता है और न पूर्व और पश्चिम के प्रभाव देने वाले (यदि वे इस संग्रह को पढ़ सकते !) मानते। हिन्दी के प्राध्यापन-रत आलोचक ऐसा कहते आये हैं और अब स्वयं लेखक की स्वीकारोक्ति का प्रमाण भी दे सकेंगे, इस सम्भावना से वह आशंकित नहीं है। बन्द घर में प्रकाश पूर्व या पश्चिम या किसी भी निश्चित दिशा से आता है—पर खुले आकाश में वह सभी ओर से समाया रहता है, इसी में उस का आकाशत्व है। उसी खुले आकाश को अपनी बाँहों में भर सके, यह लेखक का स्वप्न रहा है; घरों के मामलों में तो वह यायावर ही है।
अज्ञेय

दूसरे संस्करण की भूमिका


पहले संस्करण के बाद के दो दशकों में ‘हाइकू’ का तो देश में फ़ैशन ही हो गया है; जापानी साहित्य से परिचय भी बढ़ा है। इस शुभ प्रवृत्ति में लेखक के द्वारा किये गये अनुवादों का योग भी कर रहा, यह उसके लिए सन्तोष का विषय है; यद्यपि उसे यह दुःख भी है कि हाइकू की बहिया में अनेक कवि ऐसे बहे हैं कि उस काव्य-धारा (बल्कि समूची काव्य-संवेदना) को रूप देने वाली संस्कृति तथा आधार देने वाली दार्शनिक भूमि की ओर से उन का ध्यान हट गया है।

यह और भी दुःखद इसलिए है कि किसी स्वच्छ विदेशी मुकुर में अपना चेहरा देख कर तो कुतूहल होता है और अपनी और सही पहचान में मदद कर सकता है। पर अगर कोई ध्यान से देखे ही नहीं और मुकुर के जड़ाऊ चौखटे से भी मोह-भ्रमित हो जाय तब पहचान क्यों होगी ! मुझे तो दूसरे संस्करण के लिए पाण्डुलिपि तैयार करते हुए बार-बार स्मरण हुआ है कि कितनी-कितनी बार विदेशों के (प्रस्तुत सन्दर्भ में जापान के) अनुभवों ने मुझे अपने देश की ओर देखने को बाध्य किया, और कैसे प्रत्येक बार अपनी चारित्रिक छवि कुछ और विशदतर हो कर सामने आयी ! इतना ही नहीं, ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ के प्रथम खण्ड की कई कविताओं में कवि ने विदेशी आलोक में भारतीय काव्य-परम्परा को ही जिस नयी दृष्टि से देखा है, वह दृष्टि नई होकर भी न तो अभारतीय है और न ही उसके कारण कवि के आत्मविश्वास में कमी आयी है। मुझे तो आश्चर्य होता है कि कितने लोग कितनी आसानी से आयातित मानदण्डों को अपना कर सब कुछ उन्हीं से नापने लगते हैं बिना यह सोचे की उनके ये मानदण्ड उन चीज़ों के आयामों तक पहुँचते भी हैं या नहीं।

यों कविता को इन बातों के विचार के बिना भी, केवल कविता की तरह पढ़ा जा सकता है। यहाँ यह देना इस लिए प्रासंगिक जान पड़ा कि पहली भूमिका में भी इस का कुछ उल्लेख था, और इसलिए भी इन बीस वर्षों में इस बारे में काफ़ी कुछ ऐसा लिखा गया है जो केवल भ्रम फैलाता है और आत्मवसाद को बढ़ावा देता है। ‘सतहों की भीड़’ में ‘भीतर की किरण’ फिर ‘नीलाम चढ़ने’ को बाध्य न हो, यही मेरी कामना होगी !
अज्ञेय

अच्छा खंडित सत्य


अच्छा
खंडित सत्य
सुघर नीरन्ध्र मृषा से,
अच्छा
पीड़ित प्यार सहिष्णु
अकम्पित निर्ममता से।

अच्छी कुण्ठा रहित इकाई
साँचे-ढले समाज से,
अच्छा
अपना ठाठ फ़क़ीरी
मँगनी के सुख-साज से।

अच्छा
सार्थक मौन
व्यर्थ के श्रवण-मधुर भी छन्द से।
अच्छा
निर्धन दानी का उघडा उर्वर दुख
धनी सूम के बंझर धुआँ-घुटे आनन्द से।


अच्छे
अनुभव की भट्टी में तपे हुए कण-दो कण
अन्तर्दृष्टि के,
झूठे नुस्खे वाद, रूढि़, उपलब्धि परायी के प्रकाश से
रूप-शिव, रूप सत्य की सृष्टि के।


हम कृती नहीं हैं


हम कृती नहीं हैं
कृतिकारों के अनुयायी भी नहीं कदाचित्।
क्या हों, विकल्प इस का हम करें, हमें कब
इस विलास का योग मिला ?—जो
हों, इतने भर को ही
भरसक तपते-जलते रहे—रहे गये ?
हम हुए, यही बस,
नामहीन हम, निर्विशेष्य,
कुछ हमने किया नहीं।


या केवल
मानव होने की पीड़ा का एक नया स्तर खोलाः
नया रन्ध्र इस रुँधे दर्द की भी दिवार में फोड़ाः
उस से फूटा जो आलोक, उसे
--छितरा जाने से पहले—
निर्निमेष आँखों से देखा
निर्मम मानस से पहचाना
नाम दिया।

चाहे
तकने में आँखें फूट जायें,
चाहे
अर्थ भार से तन कर भाषा झिल्ली फट जाये,
चाहे
परिचित को गहरे उकेरते
संवेदना का प्याला टूट जायः
देखा
पहचाना
नाम दिया।

कृती नहीं हैः
हों, बस इतने भर को हम
आजीवन तपते-जलते रहे—रह गये।


शब्द और सत्य


यह नहीं कि मैं ने सत्य नहीं पाया था
यह नहीं कि मुझ को शब्द अचानक कभी-कभी मिलता है :
दोनों जब-तब सम्मुख आते ही रहते हैं।
प्रश्न यही रहता है :
दोनों जो अपने बीच एक दीवार बनाये रहते हैं
मैं कब, कैसे, उन के अनदेखे
उस में सेंध लगा दूँ
या भर कर विस्फोटक
उसे उड़ा दूँ।

कवि जो होंगे हों, जो कुछ करते हैं, करें,
प्रयोजन मेरा बस इतना है :
ये दोनों जो
सदा एक-दूसरे से तन कर रहते हैं,
कब, कैसे, किस आलोक-स्फुरण में
इन्हें मिला दूँ—
दोनों जो हैं बन्धु, सखा, चिर सहचर मेरे।


नया कवि : आत्म स्वीकार


किसी का सत्य था
मैं ने सन्दर्भ में जोड़ दिया।
कोई मधु-कोष काट लाया था
मैं ने निचोड़ लिया।

किसी की उक्ति में गरिमा थी
मैं ने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया,
किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था
मैं ने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया।

कोई हुनरमन्द था :
मैं ने देखा और कहा, ‘यों !’
थका भारवाही पाया—
घुड़का या कोंच दिया, ‘क्यों ?’


किसी की पौध थी,
मैं ने सींची और बढ़ने पर अपना ली,
किसी की लगायी लता थी,
मैं ने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली।

किसी की कली थी
मैं ने अनदेखे में बीन ली,
किसी की बात थी
मैंने मुँह से छीन ली।

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ :
काव्य-तत्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ ?
चाहता हूँ आप मुझे
एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें।
पर प्रतिमा—अरे, वह तो
जैसे आप को रुचि आप स्वयं गढ़े !


बड़ी लम्बी राह


न देखो लौट कर पीछे
वहाँ कुछ नहीं दीखेगा
न कुछ है देखने को
उन लकीरों के सिवा, जो राह चलते
हमारे ही चेहरों पर लिख गयीं
अनुभूति के तेज़ाब से

राह चलते
बड़ी लम्बी राह।

गा रही थी एक दिन
उस छोर बेपरवाह,
लोभनीय, सुहावनी, रूमानियत की चाह
--अवगुण्ठवमयी ठगिनी !—
एक मीठी रागिनी

बड़ी लम्बी राह।
आज सँकरे मोड़ पर यह
वास्तविक विडम्बना
रो रही है :
एक नंगी डाकिनी

बड़ी लम्बी राह : आह,
पनाह इस पर नहीं—
कोई ठौर जिस पर छाँह हो।
कौन आँके मोल उस के शोध का
मूल्य के भी मूल्य की जो थाह पाने
एक मरु-सागर उलीच रहा अकेला ?
जल जहाँ है नहीं
क्या वह अब्धि है ?
रेत क्या
उपलब्धि है ?

बड़ी लम्बी राह। जब उस ओर
थे हम, एक संवेदना की डोर
बाँधती थी हमें—तुम को : और हम-तुम मानते थे
डोरियाँ कच्ची भले हों, सूत क्योंकि
पुनीत है, उन से बँधे
सरकार आयेंगे चले

बड़ी लम्बी राह ! अब इस ओर पर
संवेदना की आरियाँ ही
मुझे तुम से काटती हैं :
और फिर लोहू-सनी उन धारियों में
और राहों की अथक ललकार है।
और वे सरकार ? कितनी बार हम-तुम और जायेंगे छले !

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