गन्धमादन - कुबेरनाथ राय Gandhmadan - Hindi book by - Kubernath Ray
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गन्धमादन

कुबेरनाथ राय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1998
आईएसबीएन : 0000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :215 पुस्तक क्रमांक : 5438

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एक और श्रेष्ठ निबन्ध संग्रह...

Ghandhmadan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रिया नीलकण्ठी और रस आखेटक के यशस्वी कृतिकार श्री कुबेरनाथ राय का एक और संग्रह-गन्धमादन। गन्धमादन का अभिधार्ध होगा-जो सुगन्ध द्वारा मादन करे। प्रस्तुत संग्रह के निबंध वाक्यों के वे चंदन (काष्ठ) हैं जिन्हें निर्मल, तरल मन देकर घिसने पर भावों और विचारो की सुगंध प्राप्त होती है।
दिनमान ने लिखा था यदि संस्कार परम्परावादी हों तो क्या दृष्टि आधुनिक हो सकती है, यानी आप अपने प्राचीन को आत्मसात् कर, पचाकर कुछ ऐसा कहें जो वर्तमान से इतना समानधर्मी लगे कि आप उसकी बाँह थामकर भविष्य की ओर बढ सकें-इस प्रश्न का जितना साफ उत्तर कुबेरनाथ राय के निबन्ध पढ़कर मिलता है उतना हिन्दी में लिखी गयी किसी कृति को पढ़कर नहीं मिलता। इन निबन्धों को पढ़ना एक नया अनुभव पाना है।
अत्यन्त सशक्त और चुम्बकीय शैली में लिखे श्री राय के इन निबन्धों को आप भी शायद वैसे ही पढ़ें जैसे प्रिया नीलकण्ठी के निबन्ध बच्चन जी ने पढ़े और फिर उन्हीं के स्वर में आप भी कहें-शायद ही किसी उपन्यास को भी इतनी रुचि से पढ़ा हो। किसी समय फिर पढ़ने की इच्छा है। प्रत्येक सुरुचि-सम्पन्न व्यक्ति के लिए पठनीय निधि।

शब्द-श्री


कभी पढ़ा था कि व्याकरण भाषा का पुलिसमैन है। जब कोई शब्द वाक्य के भीतर कुमार्गगामी होता है तो उसकी आवारागर्दी को ठीक करने के लिए व्याकरण उस पर लाठीचार्ज करता है, अश्रु-गैस छोड़ता है और गिरफ्तार करता है, जिससे वाक्य-संहिता का ठीक-ठीक पालन होता रहे। तब भी कुछ कालिदासों और शेक्सपियरों की शह पाकर कुछ शब्द नक्सलपन्थी रास्ता अख्तियार कर ही लेते हैं और बाद में अपनी क्रान्ति की संवैधानिक स्वीकृति भी पा जाते हैं। तब बेचारा व्याकरण अपना-सा मुँह लेकर रह जाता है। तथ्य तो यह है कि कौतुकमयी शब्दरूपा वाक्श्री व्याकरण की चौकीदारी में रहते हुए भी उसके पाश-अंकुश के या उसके लाठी-बिल्ले के आधीन नहीं। यह तेजोमयी ‘चटुल चक्षुः’ शब्द-श्री अपनी गरिमा को छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों रूपों में प्रकाशित करती है। छन्द या नियम मानना इसके लिए आवश्यक नहीं। चिट्ठी-पत्री और बोलचाल के स्तर पर और कथा-वार्ता के स्तर पर यह नियम मानकर चलती है, पर अपने चरम प्रस्फुटन के अवसर पर यह शब्द-श्री नियमाधीन नहीं रहती। उस समय यह कभी तेजोमय भास्वर मन्त्र बनकर वृषभ-सी हँकड़ती है और एक-एक अक्षर बीजमन्त्र बनकर शक्ति-टंकार करने लगता है, तो कभी यह हेमवती उमा बनकर आदिम शक्तियों को विद्या का उपदेश दे जाती है और कठोपनिषद् बोल जाती है, तो कभी पूर्णिमा जैसा चेहरा धारण कर पंचबाण मारती है और हृदय-हृदय में कविता का स्वाद जन्म लेता है, तो कभी यह क्रोध-उन्मत होकर धूमावती रूप धारण करके गाली-गलौज और बीभत्स रस की नदी भी बहा देती है। इस चरम रूप में प्रस्फुटित शब्द-श्री की ‘खटकामुखी’ नृत्य-मुद्रा की चटुल नेत्र-भंगिमा ही कविता है, अनिमेष शान्त स्निग्ध दृष्टि ही दर्शन है और चतुर-चैतन्य सावधान दृष्टि ही चिन्तन है। इसी कामरूपा इच्छावपु-धारिणी शब्द-श्री के कविता रूप का वर्णन करते हुए कविवर जयदेव ने एक सुन्दर श्लोक में लिखा है कि कविवर चोर ही इसके चिकुर-निकर अर्थात् केशपाश हैं, मयूर भट्ट कर्णपूर हैं, भास इसके हास हैं, कविगुरु कालिदास इसकी विलास-छटा हैं, कवि हर्ष इसके हर्ष अर्थात् आनन्द हैं और बाणभट्ट ही हृदय में बस जाने वाले इसके चितवन में पंचबाण हैं :

‘‘यस्याश्चोरश्चिकुरनिकरः कर्णपूरो मयूरः,
भासो हासः कविकुलगुरुः कालिदासो विलासः।
हर्षो हर्षो हृदयवसतिः पंचबाणस्तु बाणः,
केषां नैषा कथय कविताकामिनी कौतुकाय।

परन्तु भारतीय जाति कर्मकाण्ड और कल्पों (रिचुअल्स) की इतनी प्रेमी है कि न केवल मन और अहंकार को, बल्कि मति-बुद्धि को भी वह कल्पबद्ध और कर्मकाण्ड-बद्ध करके चलती है। यह जाति भोजन से अधिक महत्त्व थाली-तसले और आसन को देती है, उपासना से अधिक महत्त्व षोडशोपचार को देती है, मनुष्यत्व से अधिक महत्त्व वर्णव्यवस्था को देती है, और भावों-विचारों से अधिक महत्त्व व्याकरण को देती है। यह अपनी शिथिल कर्म-निष्ठा को छिपाने के लिए तरह-तरह के कर्मकाण्ड-कलाप रचती है। फलतः ‘यस्य ज्ञानदयासिन्धो...’ बारह बरस रटने के बाद बुद्धि यह सोचने में असमर्थ हो जाती है कि व्यास या मनु का अमुक कथन किस ‘उद्देश्य’ और ‘सन्दर्भ’ में व्यक्त हुआ है और उक्त उद्देश्य और सन्दर्भ की अनुपस्थिति में यह कथन कहाँ तक उचित है, किस सीमा तक वरेण्य है। इसने न केवल भाषा का व्याकरण रच रखा है बल्कि धर्म, समाज-व्यवस्था, व्यक्तिगत आचार-विचार, यहाँ तक कि भोजन और मल-त्याग का भी एक-एक स्थायी अपरिवर्तनीय व्याकरण रचकर छोड़ा है कि कम्युनिस्टों की मस्तिष्क-प्रक्षालन विधियाँ इनके सामने मात हैं। एक प्रतिभाशाली यायावरीय कवि ने सुन्दर श्लोक में लिखा है कि माधव की सारी प्रियाओं में श्वेत, चन्द्रवर्ण, दुग्ध-गौर रुक्मिणी वैसे ही श्रेष्ठ है जैसे सारी विद्याओं में ‘शब्द-विद्या’ श्रेष्ठ है।

‘‘तासां माधवपत्नीनां सर्वासां चन्द्रवर्चसाम्।
शब्दविद्येव विद्यानां मध्ये जज्वाल रुक्मिणी।।

काव्यमीमांसा (राजशेखर)

राजशेखर के मन में ‘शब्द-विद्या’ के माने जो हो, पर टीकाकारों ने व्याकरण-आविष्ट बुद्धि से ‘शब्द-विद्या’ का अर्थ लगाया है ‘व्याकरण-विद्या’, और फलतः एक सुन्दर श्लोक बिलकुल श्री-हीन और अस्पताल जैसा अशोभन हो गया है। भला कहाँ चन्द्रोपम नारी रुक्मिणी और कहाँ बारह वर्ष तक गोखुर-शिखा धारण कर ‘इको यणचि’ रटकर प्राप्त होनेवाला नीरस ज्ञान। एक अंगे-अंगे शोभन, अंगे-अंगे दूध की तरह बूँद-बूँद स्निग्ध और मधुर, तो दूसरा आदि से अन्त तक शुद्ध ब्राह्मण खाद्य-सत्तू और नमक। टीकाकारों की बुद्धि पर तरस आता है कि जिन्होंने कान्ता, कामिनी और प्रेमिका की तुलना व्याकरण, बीजगणित और ज्यामिति से करने में कोई अनौचित्य नहीं देखा। मुझे यह तुलना स्वीकार नहीं। मेरी समझ में ‘शब्द-विद्या’ का अर्थ होना चाहिए ‘कोष-विद्या’, ‘कोष-श्री’, ‘लेक्सिकन’ (Lexicon) या ‘शब्द-श्री’ जो सारी अभिव्यक्तियों का स्रोत है, जो अपने में श्लील-अश्लील द्वन्द्व से परे निस्संग एवं वाक्य-मुक्त शब्दों का संचयन है, जिसमें तान्त्रिक बीजाक्षरों, मन्त्राभिषिक्त शब्दों से लेकर कहारों, पालकी-वाहकों, मल्लाहों, दरवेशों और बाजीगरों तक के शब्द आ जाते हैं, जिससे प्रेमिका के रोदन-मधु और मनुहार-मधु से लेकर दुर्धर्ष गाली-गलौज का चण्डी-पाठ तक—सभी कुछ अभिव्यक्त होता है। परन्तु इस कोश-श्री के अन्दर ये शब्द सन्दर्भ-मुक्त या वाक्य-मुक्त अकेले-अकेले अपने विशुद्ध रूप में विकारहीन रूप में स्थिर होते हैं। इसी से इस कोष-श्री की तुलना परमाप्रकृति त्रिपुरसुन्दरी माधव-प्रिया के साथ करना ठीक जँचता है। नयी पीढ़ी ठीक ही कहती है कि कोई शब्द अश्लील नहीं होता। परन्तु तभी तक, जब तक कि वह कोष-श्री की परमाप्रकृति का अंग है। कोष से बाहर आकर वाक्यों के बीच बैठकर, अर्थ का सगुण संसार रचते हुए वही शब्द अपनी निर्गुण निर्विकार गरिमा  देता है और तब सन्दर्भ-आश्रित होकर वह श्लील-अश्लील की शीलाचारिकी का दास बन जाता है। अतः ‘कोष-श्री’ या ‘कोष-विद्या’ ही उक्त श्लोक की ‘शब्द-विद्या’ का सार्थक अर्थ हो सकता है। टीकाकारों ने इसका निर्थक अर्थ प्रस्तुत किया है। कहाँ सारे रसों के रस माधव की प्रिया और कहाँ व्याकरण का नमक-सत्तू। कहाँ शब्दों का नवरसों के मार्ग पर अभिसार और कहाँ प्रत्यय-विभक्तियों की तड़ातड़ बजती लाठियाँ और सन्धि-समास का अश्रु-गैस। पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी को भले ही व्याकरण के लाठी-सोटे की पैंतरेबाजी मनमोहक लगे, पर मैं तो साठोत्तरी का कामुक-यक्ष मेघ हूँ और भाषा के ‘दिङ्नागानाम्’ के स्थूल हस्तचपेटों से बच-बचाकर शब्दरूपा श्री का ‘चाश्रुष-यज्ञ’ भोग रहा हूँ। मेरे जीवन का क्षण-प्रतिक्षण इसी के यश का मन्त्रगान बनना चाहता है, मेरे ‘अ’ से ‘ह’ तक सारे वर्णोंच्चार, मेरे सारे उच्चारण, मेरा सारा ‘अहं’, इसी की भाषामयी आरती है। यही सारी विद्याओं की अभिव्यक्ति का आधार है। इसी से इसे परमाप्रकृति माधवप्रिया के समकक्ष रखा जा सकता है। यही सभी अनुभवों को अभिव्यक्त और प्रकाशित करती है, ‘संचारिणी दीपशिखा’ की तरह जिस अनुभव के चेहरे पर यह दृष्टिपात करती है, वही अभिव्यक्त और अर्थवान् हो उठता है, अन्यथा अर्थातीत के अन्धकार में अपने अस्तित्व की छपछपाहट भोगता रहता है।

यह शब्द-श्री या कोष-श्री  एक दियासलाई की एक डिबिया है। प्रत्येक शब्द एक-एक तीली है। डिबिया में पड़ी है, कोई कीमत नहीं। पर अचानक प्रयोग की रगड़ खाकर भक से जल उठती है और उस क्षण दीप्ति-रुक्मिणी स्वाहा-रूपिणी कमललोचना शब्द-श्री तेजस्वी रूप-शिखा के मध्य अवतरित हो जाती है, तब चाहे उससे तुलसी चौरे का दीप जला लो, चाहे अध्ययन-मनन के लिए टेबल लैम्प जलाओ चाहे रतियज्ञ के लिए विलासकक्ष आलोकित करो, या ग्राम, नगर, रेलवे-स्टेशन, विद्यालय जाकर भस्मीभूत-क्षार कर डालो, तुम्हारी मरजी। तुम बली हो क्योंकि तुम्हारे पास दीप्ति-रूपिणी, स्वाहा-रूपिणी शब्दों की कोष-श्री है और तुम उसका प्रयोग करने में समर्थ हो। तुम सुप्तत शब्द-शक्ति को प्रयोग-द्वारा जाग्रत करने की कला जानते हो, तो तुम सब कुछ कर सकने में समर्थ हो। क्योंकि प्रयोग द्वारा ही जो अनुभव जन-जन के हृदय अन्धकार में छटपटा रहा है, उसके चेहरे पर इस शब्द-श्री की संचारिणी दीप का आलोक फेंका जा सकता है, और उस अनुभव को प्रकाशित कर जन-जन को उसके आस्तित्व के प्रति सचेत किया जा सकता है तथा उन्हें अनुभव चेतना के माध्यम से कर्मपथ पर प्रेरित किया जा सकता है।

यों शब्द शव की तरह निष्क्रिय रहता है, पर प्रयोग द्वारा उसमें ‘चिति’ का संचार हो जाता है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य में शब्द के शक्ति-संचार के रहस्य को ‘प्रयोगेण अभिज्वलति’ कहकर निर्देशित किया है। आकाश शब्द का आश्रय है, कान से उपलब्ध होता है, बुद्धि से उसका विग्रह (रूप का ज्ञान) होता है, पर प्रयोग से वह रगड़ खाकर भक से जल उठता है और तब अपने तथा दूसरे के अनुभवों का चेहरा अनभिव्यक्ति के अन्धकार को काटकर स्पष्ट हो उठता है। प्रत्येक अनुभव सार्थक होने के लिए शब्द पाना चाहता है। शब्द न पाना, नाम  ना पाना, अनामा रह जाना एक बहुत बड़ी व्यथा है। नाम न रहे तो गोबर और गौरी-गणेश में फर्क ही क्या है। फर्क आया नाम के कारण। व्यक्तित्व मिला नाम के कारण। अस्तित्व तो पहले से ही था, पर इसे ‘अस्ति’ की चेतना मिली नाम के कारण। अतः शब्द पाने की, नाम पाने की, संज्ञा पाने की साधाना का ही नाम है ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता-संस्कृति। बिना नाम पाये, बिना संज्ञा प्राप्त किये, यह सब असम्भव था।

एक अविकसित अधूरी भाषा को लेकर कोई भी व्यक्ति या जाति विकसित उन्नत और ऊर्ध्वागामी नहीं हो सकती। सभ्यता की प्रगति का इतिहास इस हवा-पानी, पशु-पक्षी, पेड़-पल्लव को निर्वैयक्तिक सृष्टि से अलग होने की, एक व्यक्तित्व और नाम पाने की साधना का इतिहास है। जैसे-जैसे मनुष्य आगे बढ़ता गया, उसका अनामापन मिटता गया, उसके नाम के सारे बौद्धिक, मानसिक और आत्मिक कटाव, सारे नोक, सारी नक्काशी स्पष्ट से स्पष्टतर होने लगी। इसी से आज मनुष्य माने ‘व्यक्ति’ पर गाय माने गाय, इमली माने इमली और आम माने आम। मनुष्य व्यक्तिवाचक संज्ञा तक विकसित हो गया, जबकि शेष सृष्टि बौद्धिक-आत्मिक-मानसिक दृष्टि से जातिवाचक तक ही सीमित रह गयी। नाम व्यक्तित्व के मणि-सर्प की त्रिगुणात्मक मणि है, और आहार-निद्रा, भय-मैथुन के समय भी यह मणि उसके मस्तक के मध्य, बाहर-भीतर प्रकाशित होती रहती है। यह नाम की मणि ही है जिसके संस्पर्श से वह आहार-निद्रा-भय-मैथुन को पाशविक क्रियाओं का षटरस-नवरस-रूपान्तर कर चुका है। अन्य पशुओं के पास भूख है, पर इस व्यक्तिधारी, नामधारी मनुष्य के पास केवल भूख नहीं, ‘ऊख, महूख, पियूख’ की विशेष भूख है और उससे भी बढ़कर उसकी चरम क्षुधा या चरम पिपासा है—रूप-तृषा, बतरस-तृषा और संग-तृषा। वह ‘संग-परस-सुधा’ के लिए व्याकुल रहता है। अन्य पशुओं के भोग या भोजन का उद्देश्य है भोग या भक्षण। पर मनुष्य के भोग और भोजन—दोनों लीला हैं, दोनों को वह लीला के रूप में, क्रीड़ा के रूप में, आनन्द के माध्यम के रूप में ग्रहण करता है। यह मनुष्य ही है जो चटनी-अचार खाता है; क्योंकि उसकी भोजन-क्रिया, पशुओं की तरह शरीर या स्वास्थ्य की माँग के अनुसार नहीं, उसके व्यक्तित्वधारी-नामधारी मन की क्रीड़ा के अनुसार होती है। पर अजीब बात है कि व्यक्तित्व और नाम के माध्यम से इतनी बौद्धिक, मानसिक और आत्मिक समृद्धि पाकर भी कुछ ऐसे निकलते हैं जो व्यक्तित्व और नाम के ऊर्णनाभ पाश को काटकर अखण्ड-मण्डलाकारम् आकाशोपम् सत्ता के साथ एकाकार हो जाना चाहते हैं, पुनः निर्वैयक्तिकता की ओर, ब्रह्मत्व की ओर लौट जाना चाहते हैं, जिसमें आकाश पिता है, धरती माता है, घास-पात भाई बहन हैं। शायद यह भी एक लीला है। लीला के पाश को तोड़कर साँड़ की तरह हँकड़ने की लीला। लोग कहते हैं कि उनके अन्दर विश्व-प्रेम रहता है। पर व्यक्तिगत व्यवहार में ये संन्यासी बड़े ही निर्मम और अक्खड़ होते हैं, ‘तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्’ कहकर हँकड़नेवाले छुट्टा मुक्त साँड़ की तरह। क्योंकि निर्वैयक्तिक प्रेम केवल एक आइडिया है, एक बौद्धिक तथ्य है, ‘समाजवाद’ की तरह। इनके पास भाववाचक ऐब्सट्रैक्ट ‘प्रेम’ है, पर सगुण व्यक्तिवाचक प्रेमपात्र या प्रेमिका नहीं। यह सगुणबोध नहीं है। व्यक्तिवाचक या माया-जगत् हमारे लिए मन्दाक्रान्ता छन्द है तो इन कौपीनधारी अक्खड़ों के लिए मोह-पाश। हमें छन्द वरण करने में मौज मिलती है तो इन्हें पाश तोड़ने में।

लोग कहते हैं कि नाम में क्या धरा है। आँख के अन्धे का भी नाम पद्मलोचन हो सकता है, ‘क’-अक्षर-गोमांस-समान तक की शिक्षा पाये व्यक्ति का नाम भी वाचस्पति दुबे हो सकता है, तो दूसरी ओर हजारीप्रसाद लक्ष्मीवाहन न बनकर सरस्वती-वाहन होना ही वरण कर सकते हैं। पर ऐसे उदाहरणों में ये नाम आरोपित नाम हैं और इन नामों में न तो पुकारने वाले का विश्वास रहता है और न इन्हें धारण करने वाले का। आरोपित होने के बावजूद ये नाम आत्मविश्वास के अंग नहीं बन पाते, क्योंकि व्यक्तित्व के समानान्तर न होकर ये विपरीत पड़ गये हैं। जो नामधारी के व्यक्तित्व का वाचक नहीं बन पाता, वैसा नाम दम्भ या कपट से अथवा मूल से आरोपित नाम है। उसकी तुलना सर्प-मणि या नाग-मणि से नहीं हो सकती, क्योंकि मणि माथे पर आरोपित नहीं रहती, माथे के भीतर रहती है। व्यक्तित्व और नाम परस्पर-पूरक हैं। कभी-कभी नाम भी व्यक्तित्व पर अद्भुत प्रभाव डालता है। और तो और, मैं अपने गाँव की बात बताता हूँ। मेरे पुराने साथी मुंशी जीउतलाल हैं मरछहा होने के कारण उनके पिता दरबारीलाल ने जीऊत नाम रखा। पढ़-लिखकर वे बेचारे इस नाम से शर्म खाने लगे तो हम साथियों ने सर्वसम्मति से एक निर्विरोध प्रस्ताव द्वारा उनका नाम शुद्ध संस्कृत् भाषा में ‘जीमूतवाहन’ रख दिया और जीमूतवाहन वर्मा की नयी संज्ञा से मैट्रिक के दरवाजे पर धक्कमधुक्की करके तीन उमाँच में उक्त नाम के साथ एक योग्यता का प्रमाणपत्र भी हासिल कर लिया। पर जब से उनका नाम ‘जीमूत’ पड़ा, वे ग्राम की राजनीति में दखल देने लगे, धीरे-धीरे पुराने नाम की दीनता कट गयी, और आजकल कल तो ग्राम की सारी राजनीति वही सँभाल रहे हैं। धूल में रस्सी बटना कोई उनसे सीखे।

सारे गाँव को तो वे तुर्कनाच नचा रहे हैं। जिस दिन हम लोगों ने उनका यह नाम प्रस्तावित किया उसी दिन से उनमें बौद्धिक और मानसिक परिवर्तन शुरू हुआ और आज तो वे सचमुच घनघोर गर्जन करनेवाले जीमूत हैं, ‘वर्षा घोर निशाचररारी’ वाले जीमूत हैं, और उनकी कृपा से अभागे ग्राम के शीश पर मामले-मुकदमे के मेघ, दफा एक सौ सात के इन्द्रधनुष और फौजदारी के विद्युत्गर्जन से सदा पावस ऋतु छायी रहती है। ‘जीमूत’ शब्द के दो अर्थ होते हैं। प्रथम तो यह कि जो ‘जी’ अर्थात् ‘जीवन’ यानी ‘जल’ को अपने अन्दर ‘मूत’ अर्थात् ‘बद्ध’ रखे, धारण किये रहे। दूसरा यह कि जो ’जी’ अर्थात् ‘जीव’ यानी प्राणियों को ‘मूत’ अर्थात् ‘बद्ध’ यानी अवरुद्ध या कैदी बनाकर रखे, सारा कामधाम बन्द कर दे और लोग घर में या पेड़ के नीचे अवरुद्ध चुपचाप पड़े रहने के लिए बाध्य हों। मेघ में दोनों गुण हैं, पर हमारे मुंशी जी को दूसरा गुण ही रुचिकर लगा। अतः ऐसे उदाहरण के रहते हुए भी मैं कैसे मान लूँ कि नाम क्या रखा है ? अरे, मुझे तो अफसोस है कि माता-पिता ने मुझे ‘कुबेर’ के ‘नाथ’ की नकेल क्यों पहनायी, और ‘कुबेरनाथ’ करके एक महा अड़बंगी, दरिद्र और सनातन हिप्पी देवता का नाम दे डाला, जो अपने चढ़ने के लिए एक घोड़ा तक नहीं जुटा पाया, हाथी और विमान की तो बात ही क्या। हो सकता है कि यदि मेरा नाम मात्र ‘कुबेर’ रहता तो यक्षराज धनद के रथ का पहिया मेरे आँगन में ही टूटता और उस पर लदे हीरे-मोती, रुपये-पैसे के बोरे मेरे आँगन में ही सड़ते। पर अब तो गलती हो ही गयी। अब क्या किया जाय ? अब तो इस जन्म को, इस जीवन को, नाम के अनुरूप रूप में ही उपलब्ध करना है, अन्यथा यह बेचारा नाम निरर्थक हो जाएगा और जन्मभर रोता रह जाएगा। इतने दिन से जो नाम जन्म-सहचर की तरह साथ-साथ छाया की तरह मेरी काया का सहवासी रहा है, उसके प्रति मेरा मोहबद्ध हो जाना स्वाभाविक ही है। इसी से ठोस, झकाझक ठनठनाते ‘अर्थ’ की चिन्ता न कर शब्दों के अर्थ की चिन्ता किया करता हूँ। शब्दों के अर्थ तो भाव और विचार बनकर सदैव सामने प्रस्तुत रहते हैं। यही क्या कम है ? माना कि भावों और विचारों से पेट नहीं भरता, पेट भरने के लिए ठनठनिया चाँदी का ‘अर्थ’ ही चाहिए। परन्तु इन भावों और विचारों के बीच मन अपूर्व अवगाहन, अपूर्व स्नान पा जाता है। यह अपूर्व सुख है। जब तक सम्भव है, यह अपूर्व स्नान करता ही चलूँगा, भले ही खाने को बस, बम-बम महादेव ही रहे।

बम-बम महादेव ! यानी शून्य, हाथ की पकड़ में या मुट्ठी में आनेवाली चीज नहीं। यह मेरे अपने नाम का ही एक अत्यन्त मस्तमौला संस्करण है, अद्भुत फक्कड़ रूपान्तर है। बम-बम महादेव, खाली, शून्य, पर अपूर्व शक्तिमय महोच्चार। लगता है दुनिया की दिगन्त-अवरोधी दीवारें थर्रा गयीं, आसमान की छत गिर पड़ेगी। और इसकी सारी अपूर्वता ‘बम-बम शब्द में है। इस शब्द का आधुनिक ‘बम्ब’ के आविष्कार के पूर्व ही हिन्दुस्तानी मन में आविर्भाव हो चुका था। यह दरअसल, ‘व्योम, व्योम, महादेव’ का विकृत रूप है। महादेव की अष्टमूर्तियाँ हैं : यजमान, चन्द्र, सूर्य, क्षितिज, जल, पावक, पवन और व्योम। व्योम मूर्ति उनकी चरम विराट् निराकार शून्य सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है। दक्षिण भारत के चिदम्बरम् के मन्दिर में उनके आकाश विग्रह या शून्य विग्रह की पूजा होती है। गर्भग्रह में कोई मूर्ति नहीं, पर दीवारों पर भरतनाट्य-शास्त्र की एक सौ आठ नृत्य-मुद्राएँ अंकित हैं। अतः ‘बम-बम-महादेव’ का मुहावरात्मक अर्थ ‘कुछ नहीं’, ‘खाली’ या ‘शून्य’ बावन तोले सवा पाव रत्ती ठीक है। ‘व्योम’ या ‘बम’ शून्य है, इसी से ‘ब्रह्म’ तुल्य है। यह महाशब्द ऊँकार तुल्य है, यह सारी कोष-श्री का सुमेरु-शब्द है। जिस तरह सारे अनुभव ब्रह्म की परमाकृति के विस्तार हैं, वैसे ही सारे अन्य शब्द और उन शब्दों पर आधारित कोमल-कठोर काव्य-दर्शन-चिन्तन या गाली-गलौज-प्रेमालाप, इसी ‘बम-बम-महादेव’ के या संक्षेप में इसी ‘बम’ के विस्तार हैं, ऐसा दावा मैं कर सकता हूँ। जब मैं यह सोचता हूँ तो अपने नाम की काव्यहीनता की शर्म और ग्लानि कटती हुई ज्ञात होती है और मैं पश्चाताप-मुक्त हो जाता हूँ।

नदी, तुम बीजाक्षरा !


महाकवि के ‘मेघदूत’ में यक्ष कहता है : मित्र मेघ, तृतीय पाण्डव अर्जुन की महिमा से मण्डित कुरुक्षेत्र से आगे, जहाँ उस गाण्डीवधन्वा ने शत्रुओं पर धारासार बाण-वर्षा की थी, तुम उत्तराखण्ड की ओर बढ़ चलना जहाँ हिमालय के प्लक्षवनों से होकर सरस्वती नदी प्रवाहित होती है, जिसके जल का सेवन बन्धु-स्नेह के कारण समर-विमुख होकर अन्तेवासी बलरामने अपनी प्रिया रेवती के नयन-बिम्बों से अंकित परम प्रिया हाला का भी परित्याग करके, किया था। प्रिय, मित्र तुम भी उस सारास्वत जल का पान करना। इससे तुम्हारा अभ्यन्तर धौत-शुभ्र हो जाएगा। भले ही बाहरी रूप श्यामवर्ण  ही रह जाय।

‘‘हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनांकां,
बन्धुस्नेहात् समरविमुखो लांगली या सिषेवे।
कृत्वा तासामधिगममपां सौम्यसार स्वतीना-
मन्तःशुद्धस्त्वमसि  भविता वर्णमात्रेण कृष्णः।।पूर्वमेघ, 51

बलराम को कृष्ण द्वारा आहुत महाभारत का बन्धु-मेघ यज्ञ रुचा नहीं और इस क्रूर कृत्य से अपने को दृष्टि अन्यत्र रखने के लिए वे सरस्वती के वैराग्यमय तट पर जाकर तीर्थवासी बन गये। सरस्वती का वैराग्यमय जल उस हाला से भी नशीला रहा होगा, जिसमें रेवती के लोचनों का प्रतिबिम्ब झलक उठता था। फक्कड़ स्वभाववाले बलराम हर जगह पत्नी को साथ लेकर घूमते थे ! नाम से ही नहीं स्वभाव से भी वे शुद्ध लांगली या हलायुध थे। सुरा उन्हें अत्यन्त प्रिय थी । सुरा का एक नाम ही है ‘हलिप्रिया’। ‘सुरा हलिप्रिया, हाला’ (अमरकोश’।

प्रिया रेवती पास हो न हो, पर नशे में उनकी धुत लाल रतनार आँखों को लगता था कि सुरापात्र में प्रिया का सुन्दर मुख झलक रहा है। ऐसे फक्कड़ बेपरवाह बलराम के मन में भी सगे-सम्बन्धियों के आगत संहार की कल्पना से ही दारुण व्यथा उठी, और कंचन की पुरी द्वारका, प्रियतमा रेवती और सुरापान-उन्माद सब कुछ को छोड़कर, वे हताश मन इस ज्ञान और वैराग्य की प्रतीक पवित्र नदी के तट पर चले आये और मन की दारुण वेदना को इस नदी के शान्त, ज्ञान-दीप्त, आलोक-भाश्वर प्रवाह में समर्पित कर दिये। ‘मेघदूत’ उपर्युक्त श्लोक मेरे मन में एक प्रकाशमान चित्र उपस्थित करता है। महाभारत में लिखा हुआ है : ‘प्लक्षजाता सरस्वती’ अर्थात् सरस्वती नदी हिमालय की तलहटी के प्लक्षवनों से निःसृत होकर मैदान में उतरती थी। मुझे लगता है कि एक झरित पत्र पाकड़-तरुओं का वन है। एक पाकड़ की नग्न शाखा के नीचे बलराम सिंह-मुद्रा में लेटे हैं। सिंह और संन्यासी दायीं करवट लेटते हैं और गृहस्थ बायीं करवट, क्योंकि गृहस्थ के वाम भाग में किसी और के लेटने की अपेक्षा की जाती है। इस समय बलराम भी संन्यासी ‘मूड’ में ही हैं, ‘कौपीनवन्तं खलु भाग्यवन्तम्’ की मौज में अपनी दारुण व्यथा को भूलने के फेर में हैं।

अतः वे भी दायीं करवट लेटे हैं। आदिगन्त नीचे झरित पत्र पाकड़-वन और नग्न शिलाखण्डों का धूसर विस्तार और ऊपर प्रभामय आकाश की ठण्डी शान्त निर्बन्ध नीलिमा। इस सादे नील-धीसर वातावरण में सरस्वती का निर्मल, शान्त प्रवाह वैदिकोत्तर अनुष्टुप छन्द की तरह सधी हुई है, मध्य गति से चल रहा है। ऐसे परिवेश में एक मात्र यही अनुभव हो सकता है कि यह उदास धूसर शैल-तटी अपनी ही देह है; झरते पत्तों की तरह इसका भी करुण पात एक दिन होना ही है; पर इस देह के मध्य प्रवाहित भास्वर जल-सी कोई सत्ता है, एवं इस देह को ऊपर से आवृत किये कोई भास्वर आकाश-सी सत्ता है; ये दोनों चरम रूप में अवशिष्ट रह जाती हैं, और जो अवशिष्ट रह जाता है, जो चरम उच्छिष्ट है, जो सनातन शेष है वही तो मैं हूँ....इसी से तो लोग मुझे शेष और अनन्त कहते हैं। वह मैं ही तो हूँ जो जन-जन में शेष रह जाता है, जो कभी मरता नहीं....। यह रोधवती नदी ही हमारे अस्तित्व-प्रवाह का प्रतीक है। इसके किनारे को सगुण और सीमित प्लक्षवन अवरोध दे रहा है, पर इसका आदि है परमपद नील से झरता तुषार और अन्त है मुक्त विरक्त महासमुद्र। नदी का आदि और अवसान, इसके दोनों छोर विरक्त, मुक्त, अपार, निराकार और निर्गुण हैं, पर उसके तट या किनारे हैं, सीमाबद्ध। देशकालबद्ध और सगुण। क्या ही अद्भुत् विशिष्टाद्वैत है ! हमारी आत्मसत्ता का प्रतीक यह नदी सगुण और निर्गुण दोनों है। बलराम के ‘आवृत चक्षु’, अर्धनिमीलित नयन इसी विराट् बोध या महा अनुभव के नशे में मूँदे जा रहे हैं। उन्हें अपार मौज आ रही है, अद्भुत आनन्द मिल रहा है; यही कारण है कि बलराम इस सरस्वती के तट पर वैराग्य जल के नसे का पान करते हुए उस, बन्धु-मेघ के महासंहार की दारुण वेदना को भूलने के लिये चले आये हैं।

कालिदास का यह श्लोक मन में एक प्रश्न जगाता है : यह सरस्वती, यह अपूर्व नदी है कहाँ, या कम-से-कम, थी कहाँ ? अपने पापों को समर्पित करने के लिए तो घर से दो मील, डेढ़ मील दूरी पर प्रवाहित ‘शिवजलां भागीरथी’ को पा जाता हूँ पर अपनी वेदना समर्पित करने के लिए शोकहरा-तापहरा सरस्वती को कहाँ पाऊँ ? यों सरस्वती वैदिक युग की नदी है और मेरी तो धारणा है कि यह वैदिक युग के पूर्व के स्मृति-प्रवाह को भी अपनी संज्ञा द्वारा वहन कर रही है। वर्तमान भारत ही नहीं, अखण्ड भारत क्या, उससे बढ़कर वृहत्तर भारत की ऐतिहासिक स्मृतियाँ इसके नाम के साथ जुड़ी हैं। प्रोफेसर बर्नाफ़ ने ईरान की हरक्वती नदी से इस सरस्वती के नाम-सम्बन्ध की कल्पना की है। मुझे लगता है कि ईरान की हरक्वती नदी से इस सरस्वती के नाम-सम्बन्ध की कल्पना की है। मुझे लगता है कि ईरान ‘हरक्वती’ और भारतीय ‘सरस्वती’ दोनों किसी प्राचीनतर नदी की स्मृतिवाहक संज्ञाएँ हैं, जिससे भारतीय ईरानी दोनों आर्य कबीले परिचित थे। भारतीय ‘स’ का ईरानी ‘ह’ में रूपान्तर तो कई शब्दों में देखा जाता है :

सिन्धु  हिन्धु  हिन्दु; मास  माह; अस्मद्  अस्म  अहम्  हम; सप्ताह  हप्ताह  हफ्ता। ये शब्द सम्भवतः रुपान्तर नहीं, समानान्तर रूप हैं। इसी प्रकार ‘सरस्वती’ का प्रतिरूप ‘हरस्वती’ और बाद में ‘हरक्वती’ हो जाना असम्भव नहीं। ‘स’ का ‘ह’ में रूपान्तर तो अपने देश में भी कई प्रदेशों के उच्चारण में हो जाता है। अपने देश में पण्डितों में एक प्रचलित उक्ति है, जो मूलतः भाषा-शास्त्र का एक सूक्त है, ‘सरितो हरितो भवति सरस्वत्यः हरस्वत्यः‘‘ और अपने देश में एक प्रचलित मजाक है : ‘अरे भाई कामरूपी पण्डित को नमस्कार कैसे करूँ ! उसके मुख में तो ‘शतायु’ ‘हतायु’ बनकर उच्चारित होगा’। सम्भवतः इस उच्चारण के फेर से ही तान्त्रिकों ने ‘श्री’ और ‘ह्रीं’ दोनों को एक ही बीज मन्त्र का रूपान्तर माना है। और तो और ऋग्वेद में ही दोनों रूप प्राप्त होते हैं। ‘सरस्वती’ तो कई बार आया है पर ‘तंममर्तुदुच्छना हरस्वती’ (ऋ. 2236) में दूसरा रूप भी मौजूद है। अतः हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारतीय ‘सरस्वती’ और ईरान ‘हरक्वती’-दोनों एक ही प्राचीन आर्य सरिता की स्मृति का संरक्षण-संवाहन करती हैं। उक्ति सरिता का लोप हो गया, पर उसकी महाभास्वर स्मृति इन दोनों नामों में प्रवाहित हैं।

‘सरस्वती’ और ‘सरयू’ दोनों शुद्ध आर्य शब्द हैं। पारसी ग्रन्थ ‘वेंदीदाद’ में ‘हरयो’ नाम की नदी का जिक्र है। यही ‘हरयो’ भारत में ‘सरयो’ ‘सरयू’ बनकर सुरक्षित है। यह नदी भी ‘सरस्वती’ की ही तरह किसी नदी की अत्यन्त प्राचीन स्मृति का संकेत करती है। इक्ष्वाकुओं की ‘सरयू’ भारतीय सरयू ही हो सकती है, पर आर्य जाति का इतिहास तो इक्ष्वाकुवंशीय भारत से अधिक प्राचीन है। नदी का पुराना नाम रहा होगा ‘घर्घरा’ (‘घाघरा’ आज भी चलता है)। आर्य कबीलों ने जब ब्रह्मावर्त से आगे बढ़ने पर इस प्रदेश को दखल कर लिया तो नदी का नाम पुरानी नदी की स्मृति में ‘सरयू’ रख दिया होगा। ये नाम-प्रवाह हमारे ऐतिहासिक विस्तार के साथ-साथ अपना विस्तार करते गये। इसी से मैं तो मानता हूँ कि ‘सरस्वती’ मात्र नदी नहीं, हमारे इतिहास की सुषुम्ना नाड़ी है। यह कार्ल युंग की भाषा में हमारे ‘सामूहिक मन’ या ‘जातीय मानस’ की सदानीरा नदी है। तभी तो ऋग्वेद में इसे जल-देवता के साथ-साथ वाक्-देवता का भी प्रतीक माना गया है और कालांतर में भारतीय वाग्-देवता की संज्ञा ही हो गयी ‘सरस्वती’। नदी क्या है, मानो साक्षात् ऋतम्भरा है, साक्षात् प्रज्ञा-प्रवाह है, सनातन संस्कार-प्रवाह है। न केवल फक्कड़-प्रमत्त बलराम ही इसके प्रज्ञाजल को पीकर अपनी वेदना भूल गये, बल्कि नामी-गिरामी भृगु-वत्स-च्यवन-आप्नवान-यमदग्नि आदि से लेकर मेरे जैसे अनाम धीवर तक इस भावसत्तामयी अरूप नदी से प्रार्थना करते आ रहे हैं : ‘‘ओ माँ, बड़ी तृषा है ! चुल्लू भर करुणा दे। ‘‘ओ माँ, बड़ा अन्धकार है, पाप गरज रहा है, चुल्लू भर विद्या दे।’’


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