भगवान परशुराम - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी Bhagwan Parashuram - Hindi book by - Kanhaiyalal Maniklal Munshi
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भगवान परशुराम

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
आईएसबीएन : 9788171788248 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :338 पुस्तक क्रमांक : 536

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यह उपन्यास एक युगपुरुष की ऐसी शौर्यगाथा है जो किसी भी युग में अन्याय और दमन के लिए सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती रहेगी।

Bhagwan Parashuram a hindi book by Kanhaiyalal Maniklal Munshi - भगवान परशुराम - कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त में युद्ध और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं जहाँ वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्डव आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएँ आर्यधर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं। लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यवर्त नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बल पर विजयी हुए। संक्षेप में कहे तो यह उपन्यास एक युगपुरुष की ऐसी शौर्यगाथा है जो किसी भी युग में अन्याय और दमन के लिए सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती रहेगी।


सन् 1921-22 में महाभारत और पुराणों से प्रेरणा प्राप्त करके मैंने पौराणिक विषयों पर नाटक लिखना प्रारम्भ किया। उस समय से मेरा संकल्प था कि मैं महाभारत के प्रसंगों की पूर्व-कथा-कृतियों की एक माला लिखूं। इसके लिए जो मैंने थोड़ा-बहुत अभ्यास किया है वह नीचे लेखों में प्रकट किया है :

1. प्रचीन भारतीय इतिहास के सीमा-चिह्न (समालोचक, 1922)।
2. Mahismati (Indian Antiquarry, 1923)
3. Early Aryans in Gujarata.
(Vassanji Madhavji, Lectures delivered in the University of Bombay, 1938)
4. The Legend of Parashurama.
(Address at the Bhandarkar Oriental Institute Poona. 1944)
5. The Aryans of the West Coast.
(Glory that was Gurjardesh, Vol.I)

पहले चार नाटकों का एक (इसको महाकाव्य भाग्य से ही कहा जा सकता है) महानाटक लिखने का संकल्प किया था, उसी के अनुसार 1922 में ‘पुरन्दर पराजय’, 1923 में ‘अविभाक्त आत्मा’, 1924 में, ‘तर्पण’ और 1929 में ‘पुत्र सोमावडी’ लिखा। 1932 में इस महानाटक में उपोद्घात के रूप में ‘विश्वरथ’ नाम से एक उपन्यास लिखा। इसके पश्चात ‘शम्बर कन्या’, ‘‘देवे दीधेली’ और ‘विश्वामित्र ऋषि’—ये तीन नाटक लिखे। ये चारों लोपा मुद्रा के चारों भागों में प्रकट हुए हैं।
फिर मुझे ज्ञात हुआ कि नाटक गुजराती पाठकों के लिए सुगम नहीं है, रुचिकर भी नहीं है। क्योंकि ‘देवे दीधेली’ जैसे नाटकों ने भाग्य से पाठकों का ध्यान आकृष्ठ किया। इसलिए इस महानाटक का उत्तरार्ध उपन्यास के रूप में मैंने लिखने का विचार किया। इसको मैंने दो भागों में भाँटा-‘लोमहर्षिणी’ और ‘भगवान परशुराम’।
यह महानाटक चार स्वाभाविक स्कन्धों में विभक्त हुआ है।

(प्रथम स्कन्ध)

1. देवों और दानवों में युद्ध। मानवों के राजा ययाति ने दानवों के गुरु शुक्रचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया। ययाति इन्द्रासन प्राप्त करके खो देता है। मानव और मानवों की कायरता से क्षुब्ध शुक्रचार्य उसको छोड़कर चले जाते हैं। अपुत्र पिता के लिए पुत्र के समान प्रिय देवयानी उसके साथ चली जाती है। इस प्रकार भृगुओं में आद्य शुक्राचार्यजी की कथा आरम्भ होती है। (पुत्र समोवडी)
2. सप्तर्षियों के साथ अरुन्धती ने किस प्रकार स्थान प्राप्त किया; आर्यों के सप्तसिन्धु में आने पर क्या-क्या कठिनाइयाँ हुईं; पति और पत्नी की तन्मयता का आदर्श संस्कृति के रूप में किस प्रकार फैला—इसका दर्शन। (अविभक्त आत्मा)
3. नर्मदा के तीर पर बसते हुए शर्याति की राजकन्या सुकन्या भृगुओं के श्रेष्ठ च्यवन ऋषि के साथ विवाह करती है। इन्द्र ने च्यवन को भगाया (पुरन्दर पराजय)
इस स्कन्ध की वस्तु ऋग्वेद काल में भी कथा-रूप में थी, इस प्रकार मानव-इतिहास के उषाकाल में आर्य-संस्कृति के दर्शन करने का प्रयत्न इस स्कन्ध में है।


(द्वितीय स्कन्ध)


इसमें ऋग्वेद काल का प्रारम्भिक दर्शन है जो वास्तविकता से ओत-प्रोत है। कुछ-कुछ कथाएँ तो ऋग्वेद के मन्त्रोंसे ली गयी हैं।
1. आर्यों और दस्युओं में युद्ध चला करता है। तृत्सुओं का राजा दिवोदास दस्युओं के राजा शम्बर को मारकर उसका दुर्ग छीन लेता है।
2. ऋषि लोमामुद्रा महर्षि अगस्त्य से प्रेम करती है और उनको वरण कर लेती है।
3. तृत्सुओं का पुरोहितपद, जो वसिष्ठ के पास था, वह विश्वामित्र को मिल जाता है।
4. ऋषि विश्वामित्र गायत्री मन्त्र का दर्शन करते हैं।
इसके साथ कुछ पुराणों की कथाओं का आधार भी ग्रहण किया गया है।
1. भार्गव ऋचीक नर्मदा तट पर वास करती हुई माहिष्मती की हैहय जाति का राजा महिष्मत को शाप देकर नर्मदा तट से सरस्वती तट पर आते हैं तथा गाधी राजा की कन्या को स्वीकार करते हैं। उससे जमदग्नि नाम का पुत्र उत्पन्न होता है। मामा और भाञ्जे का साथ-ही-साथ भरण-पोषण होता है।
2. विश्वामित्र और वशिष्ठ में वैर-भाव बढ़ता है।।
3. विश्वामित्र राजपद छोड़कर ऋषि बन जाते हैं और ऋषि विश्वामित्र नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं।
4. इन वस्तुओं के आधार पर ‘विश्वरथ’, ‘शम्बर कन्या’, ‘देवे दीधेली’, और ‘विश्वामित्र ऋषि की रचना हुई है।


(तृतीय स्कन्ध)


ऋग्वेद में आये हुए मुनि वसिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र के मन्त्र जिस समय प्रसिद्ध हुए थे, वही वास्तविक ऋग्वेद का काल है। ‘लोमहर्षिणी’ उसी समय की कथा है। इसकी रचना का आधार निम्नलिखित है :

1. तृत्सुओं के राजा सुदास का पुरोहितपद विश्वामित्र से वसिष्ठ ले लेते हैं।
2. वसिष्ठ की प्रेरणा से सुदास का विश्वामित्र से प्रेरित दशराज के साथ जो युद्ध प्रारम्भ होता है उसको दशराज्ञ कहा जाता है।
3. विश्वामित्र आर्य और दस्युओं के भेद का विवेचन कर रहे थे। उधर वसिष्ठ मुनि आर्यों की सनातन शुद्धि और विद्या के प्रतिनिधि थे।
4. अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप का नरमेध हो रहा था। उसमें विश्वामित्र ने अड़चन डाल दी। यह प्रसंग ऐतरेय ब्राह्मणों में भी मिलता है।
5. राजा सुदास की सहायता के लिए जो वीतहव्य थे वे पुराणों में निर्दिष्ट नर्मदा-तट के हैहय तालजंघ जाति के लोग ही थे। पुराणों में किसी भी स्थान पर परशुराम की कथा नहीं आयी।
आगामी स्कन्ध में परशुराम के बालकपन की वर्णन किया गया है।

(चतुर्थ स्कन्ध)

1. इसमें परशुराम का जीवन आ जाता है। इसकी कथा हमने पुराणों से ली है। ऋग्वैदिककाल और ब्राह्मणों में निर्दिष्ट समय में जो व्यवधान पड़ जाता है उसी की यह कथा है।
2. इसके उपसंहार रूप में ‘तर्पण’ लिखा गया है इसमें और्व ऋषि परशुराम के पास से जमदगन्यास्त्र प्राप्त करते हैं। इसमें शुक्राचार्य से सगर राजा तक कथाओं का चार स्कन्धों में समावेश हुआ है। इन महानाटकों के लिए जो आधार प्राप्त हुए हैं उनमें से कुछ श्री दुर्गाशंकर शास्त्री से प्राप्त टिप्पणियों में और कुछ मेरे उपर्युक्त संशोधनात्मक लेखों से प्राप्त हो सकेंगे। यह पुराण-कथा एक अर्वाचीन उपन्यासकार के पिछले पच्चीस वर्षों के प्रयत्नों का फल है। महाभारत, रामायण और भागवत के रचयिताओं ने पुष्कल काल्पनिक सामग्री प्रस्तुत कर दी है। परन्तु अब पिछली शताब्दियों ने इस पर अपनी मोहर लगा दी है। मैंने जो सामग्री प्रस्तुत की है उसको कई लोग अक्षम्य मानेंगे। किन्तु मेरे सामने तो केवल एक ही प्रश्न था—वैदिक और पौराणिक समय का दिग्दर्शन कराना। इस स्वनिर्धारित कर्तव्य के लिए सामग्री की खोज में मैंने यथासाध्य ऋग्वेद और पुराण की सहायता ली है। इन महानाटकों की रचना मेरी स्वतंत्र कलाकृति है; मानव जीवन के मेरे आदर्श और सृजनशक्ति ने इसका निर्माण किया है। सन् 1922 से 1945 तक 23 वर्ष में यह महानाटक पूर्ण हो गये हैं। प्रचण्ड मानवों के प्रचण्ड प्रसंगों के मेरे स्वप्न इनमें समाविष्ट हैं।

वसिष्ठ अरुन्धती के उद्गार, शम्बर कन्या और विश्वरथ का प्रेम, लोपामुद्रा का प्रेम, परशुराम की बालचेष्टा, विश्वामित्र का अभय संशोधन और परशुराम के कितने ही जीवन-प्रसंग मेरे इन नाटकों में सफल हुए; अधिक चमत्कृत हुए हैं ऐसा मानता हूँ।
शुक्राचार्य से और्व तक अविच्छिन्न धारा इसमें बह रही है। इस प्रकार की गगनस्पर्शी मानवता आर्य संस्कृति का सहारा लिये बिना पूर्ण नहीं हो सकती। आर्यत्व और आर्यावर्त, इसके द्वारा मुझे दोनों के दर्शन हुए हैं।
मुझ पर यह आक्षेप किया जा सकता है कि इन महानाटकों में मैंने जो भृगुवंश के महापुरुषों का चित्रण किया है, वह इसलिए कि मैं स्वयं भडौंच का भार्गव ब्राह्मण हूँ। सम्भव है कि कुछ गुजराती लोग ऐसा समझें। किन्तु विवेचनशील लोग मानेंगे कि वैदिक काल में भृगुवंश एक महाप्रचण्ड शक्ति था। शुक्रचार्य, देवयानी, च्यवन, सुकन्या, सत्यव्रती और रेणुका, ऋचीक, जमदग्नि, शुनःशेप, परशुराम और कवि चायमान, और्व और मार्कण्डेय यह महाप्रतापी व्यक्ति थे। भार्गव लोगों का स्थान-स्थान पर उल्लेख है। महाभारत तो भार्गवों के वर्णन से भरा पड़ा है। डाक्टर सुखतनकर ने कहा है कि ऋषियों में यदि कोई ईश्वर का अवतार स्वीकृत हुआ है तो वह केवल भगवान परशुराम थे। हिमालय में निर्मित परशुराम-श्रृंग से लेकर त्रावनकोर तक के स्थान इनके पुण्य स्मरणों से अंकित हैं; सम्पूर्ण भारत इनके प्रताप से ज्वलन्त हो उठा है।
वर्षों बीते मैंने परशुराम पर एक लेख लिखा था, उसी को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। इसमें परशुराम के सम्बन्ध में नयी खोज है—

आर्य-जीवन का प्रातःकाल था। आर्यों की मुख्य जातियाँ पंजाब में निवास कर रही थीं। कितनी ही जातियों ने आगे बढ़कर गंगा और यमुना के किनारे राज्य स्थापित कर लिये थे। दूसरी जातियों ने मथुरा के प्रदेश को छोड़कर नर्मदा के तीर पर अपने आवास बना लिये थे। धीरे-धीरे इस देश के असल निवासी नाग, दस्यु, दैत्य पीछे हटते जा रहे थे। सरस्वती और हषद्वती का प्रदेश तो आजकल सरहिन्द जिले के आसपास है, आर्य-जीवन का केन्द्र स्थान था। यही वास्तविक आर्यावर्त था। आर्यों की पवित्र भूमि में जहाँ यदु और पुरु, भरत और तृत्सु, तुर्वसु, अनु और द्रुह्यू जह्न और भृगु जातियाँ निवास कर रही थीं, वहीं आर्य-संस्कार और धर्म के संस्थापक महर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र, जमदग्नि और अंगिरा, गौतम और कण्व के आश्रमों से निकलती दिव्य ऋचाओं की ध्वनि आर्यों की उत्कृष्ट आत्मा को शब्दों में व्यक्त कर रही थी।
इस भूमि में जो राजा लोग सत्ता भोगते थे वे चक्रवर्ती, जो तप करते थे वे ऋषि और जिन्होंने ऋचाओं का उच्चारण किया था वे मन्त्रद्रष्टा, प्रचलित प्रथाओं का स्तर ऊंचा करते थे। जो संस्कार प्रकट हुए वे सब धर्म-कर्म के मूल थे। और उधर वाराणसी के गंगा तट से नर्मदा के तट तक फैली हुई दूसरी जातियाँ युद्ध करतीं, राज्य-स्थापना करती हुई आगे बढ़ रही थीं। फिर प्रेरणा के लिए, उत्तेजना और शान्ति के लिए आर्यावर्त की ओर लौटती थीं।

इस आर्यावर्त में रहने वाले ऋषियों में श्रेष्ठ और सुसंस्कृत भरत जाति के विश्वामित्र थे। वे ऋग्वेद की मुख्य ऋचाओं के कर्ता भी थे तथा पुरु और तृत्सु जाति के युद्ध में एक-दूसरे के सामने कभी-कभी भाग लेते थे। संस्कार और पवित्रता में जो हेर-फेर कर सकते थे ऐसे तो केवल मात्र वसिष्ठ मुनि ही थे।
विश्वामित्र के पिता गाधिन(गाधी) जह्न कुल के थे। एक बार उनके घर भृगु जाति और काव्य कुल के और्व ऋचीक आये। ऋचीक ने हजार श्याम वर्ण के घोड़े गाधी को देकर प्रसन्न किया और उनकी पुत्री सरस्वती के साथ विवाह किया। जिन भृगुओं के नेता ऋचीक थे वे अग्नि-पूजक भी थे। वे मन्त्र-यन्त्र विद्या में कुशल माने जाते थे। अथर्ववेद पर उनका अधिकार था और उनमें से अग्नि ने अग्नि उत्पन्न की, ऐसा उनका दावा था।


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