काल का प्रहार - आशापूर्णा देवी Kaal Ka Prahar - Hindi book by - Ashapurna Devi
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काल का प्रहार

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :64 पुस्तक क्रमांक : 5202

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आशापूर्णा देवी का एक श्रेष्ठ उपन्यास

Kaal Ka Prahar - A Hindi Book by Ashapurna Devi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वृन्दावन का प्रसाद—पेढ़ा के अलावा और क्या हो सकता था, चने और साथ में जेवरात का पिटारा जो दलूमौसी की अपनी निजी सम्पत्ति थी—इन सबको दीवार के पास रख कर प्रसाद को माथे से लगाकर प्रणाम किया और बदन से रेशमी चादर को सोफे पर उछाल कर दलूमौसी का पहला वाक्य यही थी—छिः ! छिः ! वही कलकत्ता किस प्रकार से बदल चुका है ? तुम लोग अब तक इसे कलकत्ता कह कर बुलाते हो ? तुम्हें लाज, घृणा या दुख कुछ भी महसूस नहीं होता ?

दलूमौसी के चेहरे को देखकर मुझे भी ठीक इन्हीं उपरोक्त वाक्यों की दोहराने की प्रबल इच्छा हो रही थी। दलूमौसी इस प्रकार बदल चुकी हैं। जिनका चेहरा कभी यूनानी शैली का था और किसी जमाने के कृष्णकुंचित केश अब जैसे हजारों आलपिन की तरह उनके मुड़े सिर पर उग गये थे। मुझे भी यही कहने को मन कह रहा था—इतनी सुन्दर दलूमौसी का यह हाल ? हाय-हाय। पर मुझे अपने आपको रोकना पड़ा। क्योंकि आस-पास नाती-पोतिओं का मेला था—जो दलूमौसी के किसी जमाने वाले रूप सौष्ठव का जिक्र छिड़ने भर से मेरी खिल्ली उड़ाना शुरू कर देंगे।

दलूमौसी का छोटा भतीजा बुद्ध उनके इन तीखें आलोचनाओं का जवाब देता हुआ बोला—बूआ, आजकल लज्जा, घृणा सारे शब्द अभिधान से निकाल बाहर कर डाले हैं।
दलूमौसी ने जवाब में कहा—ऐसा ही तो लग रहा है। प्रसाद थोड़ा-थोड़ा बाँट लो। पेढ़ा पुराना है बास आ रही है और थोड़ा चना भी भुस-सा गया है। पर प्रसाद का असम्मान मत करना। कहाँ गृहिणियाँ कहाँ हैं, किस कोने में छिपी बैठी हो ? प्रसाद का विसर्जन करो।

इसके बाद मेरी तरफ देखकर बोली, तू कब आई ? कब और आज ही। तुम जो जाने वाली थीं। दलूमौसी प्रसन्नचित्त हो गईं—अच्छी बात है रहेगी तो आज ?
दलूमौसी मेरे किसी रिश्ते से मौसी लगती है। मेरे साथ उनका मेल है। किसी दैवी घटना के फलस्वरूप हमारा जन्म एक ही घड़ी में हुआ था। देवी या मानवी का एक आत्मा जो शरीर किसी शास्त्र या इतिहास में नहीं लिखा है। तभी तो हमारे लिए एकात्मा वाला विशेषण प्रयोग किया गया। मैं तो हरिहार आत्मा वाला पुरूषों का विशेषण प्रयोग कर सकती हूँ।

कोई चारा भी तो नहीं है। हमारे शब्द भण्डार में नारी समाज के लिए शब्दों का नितान्त अभाव है। पता नहीं नारी के प्रति शब्दों की कंजूसी का क्या कारण है ? और अधिक क्या कहें। जिन्होंने काफी कवितायें लिखकर नाम कमा लिया है उन्हें भी महिला कवि के अतिरिक्त भिन्न किसी परिचय से शोभित नहीं किया जाता। उनका अपना कोई अलग परिचय नहीं होता।
पर यह अभियोग मेरा नहीं (होगा क्योंकि ये तो काव्य नहीं रचती) और आज का भी नहीं। ऐसा प्रतिवाद साठ बरस पहले दलूमौसी ने किया था।

मझले दादा यानि दलूमौसी के मझले ताया की अनुपस्थिति में उनके कमरे से ‘बांगला शब्दकल्पद्रुम’ लेकर, उसे पूरा निरख-परख कर दलूमौसी अपने सुन्दर होंठों को उल्टा करके धिक्कार पूर्ण कंठ से ऐसा अभियोग कर बैठी थीं। क्योंकि दलूमौसी तब भी महिला की श्रेणी में नहीं आ पाई थी और अनेकों पद्य भी रच डाले थे, और वे पद्य भी बड़े ही उत्कृष्ट कोटि के थे।

दलूमौसी अपने लिए किसी उचित विशेषण को ना खोज पाने पर बड़ी ही कुपित थीं।
फिर भी तो उस वक्त इस देश में महिला समाज में –जज मेजिस्ट्रेट, वकील, बैरिस्टर, मंत्री-संत्री का अता-पता न था। होता तो दलूमौसी से धिक्कृत होना पड़ जाता।

अब जब महिलाओं ने अपने पेशे की गरिमा से इन गौरवमय आसनों पर अपना अधिकार कर लिया है और बड़े ही गौरवमय ऐश्वर्य से विराजमान हैं तब भी ‘बेचारी’ की छाप ‘महिला’ के साथ लगा ही रहता है। जाने दें, इस अफसोस की फेरहिस्त बनाने लगे तो वह फेरहिस्त इतनी लम्बी हो जायेगी कि उसका खत्म होना असम्भव हो जायेगा।
दलूमौसी उस ‘शब्दकल्पद्रुम’ को फटाक से मझले दादा जी के कमरे में फेंक कर आई और बोली—सारी की सारी चाभियाँ तो इन पुरुषों के हाथ में है तभी तो हमारी इतनी दुर्दशा होती है।

हाँ यही कहा था दलू नाम की बाला ने वह भी साठ बरस पहले। साठ बरस पीछे चलें तो पता चलेगा दलू नाम जो सुनने में अटपटा-सा लगता है, यही सोचते होंगे कि शायद उनका नाम ‘दलनी बेगम’ या ‘दलमालदल’ रहा होगा। पर उनका नाम तो था शतदलबासिनी’ यानि मधुर, मनोहर, माधुर्यमण्डित तथा महिम्बाबित। नामकरण के समय ‘म’ विशेषण से जुड़ा नाम तो सोचा गया पर एक बीघे के नाम से तो बुलाया नहीं जा सकता। तभी उसे कैंची से काटकर ‘दलू’ बना दिया गया।
दलूमौसी अपने नाम की भाँति ही थीं। जैसा नाम वैसा रूप। उनकी ओर देख आँखें फेरना सम्भव नहीं था। गुणों के क्या कहने ? हाँ उस जमाने में उनके गुणों की कदर थी।

जिस कलकत्ते में आधी रात के वक्त भी चाहने पर जो चाहो मिलता था कहते हैं बाघ दूध भी मिलता था। हांलाकि यह उपमा के तौर पर ही प्रयोग किया जाता था। पर कहीं ना कहीं तो इसकी सच्चाई होगी ही। शून्य पर तो प्रसाद का निर्माण नहीं होता। उसकी नींव अवश्य  रहती हैं। हांलाकि इसके अनुरूप कौड़ी की भी जरूरत पड़ती है। उस वक्त के लोग अभी तक जिंदा हैं अगर उनसे पूछा जाये तो बात की सत्यता साबित हो सकती हैं।

पर सब करने की आवश्यकता ही क्या है ? शास्त्र में लिखा है—किसी भी अविश्वास्य घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखकर भी किसी से ना कहो नहीं तो हँसी का पात्र बनना पड़ जायेगा।
मैं उस जमाने में पली हूँ, शास्त्र में भी विश्वास रखती हूँ। तभी तो साक्षी के लिए किसी का सहारा नहीं लेती। जिस काल में पैसे की गंगा बहा कर भी गाय का दूध मिलना मुश्किल है वहाँ बाघ का दूध वाला प्रसंग उत्थापन न करने में ही समझदारी है। अगर कहें तो सब ही ही कर हँस देंगे। इसके अलावा उस कलकत्ते के साथ इस कलकत्ता यानि वर्तमान कलकत्ता की तुलनात्मक समालोचना करना मेरे बस के बाहर है।

ऐसे ही तो हमारी प्रिय पोतियाँ हमारे समय को अवज्ञा, निरादर या करुणा की नजर से देखती हैं। और हम पर भी करुणा दृष्टि रहती है।
यह सब हमसे छिपा भी नहीं है। हाँ जानकार भी अनजान का भाव जाहिर करते हैं। किसी प्रकार के तर्क में भी नहीं जाते। यह भी प्रकाश नहीं करते कि हमें तुम्हें और तुम्हारे जमाने को देखकर वही मनोभावना जागती है—यानि अवज्ञा, अनुकम्पा या करुणा की।

हमारा काल—यानि युग-समय जिसके साथ दलूमौसी बड़ी ही गहरे पन से पैढी है।
मेरी एक पोती जो मेरी भक्त है (शायद अपने कर्मफल से भक्ति अर्जन की क्षमता प्राप्त कर ली है।) वह एक बार बड़े ही अफसोस से बोली, ‘‘तुम्हारे समय के बारे में सोचने से तरस आता है—पूरी तौर से नजरबन्द पिटारे में कैद-साधारण या मामूली-सा प्यार या किसी प्रिय व्यक्ति को देखने तक का भी हुक्म नहीं था। आहा बिचारी।

‘प्रेम, तो उनके लिए एक मामूली घटना है। वे तो उसे जीवन मरण का विषय नहीं समझतीं। जब वह किसी प्रेम प्रसंग का वर्णन करती है तो उसका चेहरा खुशी से झिलमिला जाता है। सुन्दर चेहरा लावण्यमय, खिला-खिला-सा हो जाता है। जब वह प्रेम असफल होता है तो थोड़ी-सी निराशा, चेहरा विषादमय, और मुँह से पूरी तरह पुरुष जाति के प्रति घृणा धिक्कार, अभिशाप का प्रबल आक्रोश वर्णन होता है।

इसके बाद फिर से खुशी की चकाचौंध यह तो जैसे ऋतुओं का आवागमन होता है—एक के बाद एक ऋतु अपने चक्र से आते और चले जाते हैं।
‘मैं बेचारी’ बैठी-बैठी देखती रहती हूँ। दलूमौसी की तरह सीधे वाक्य वाणों से उसे जर्जरित नहीं करती।
दलूमौसी की हिम्मत इस कारण भी कायम थी—क्योंकि वह पचास सालों बाद कलकत्ता आई थीं। तभी वर्तमान हालातों से नावाफिक थीं।

अब इस कलकत्ते में नहीं रहना।–कहकर उन्होंने जो कलकत्ता त्यागा, तब से वह वृन्दावन में ही थी। आज अचानक—
ओह ! उस दिन उनकी इस घोषणा से किसका क्या हुआ पता नहीं पर मेरे तो दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उस काल की रूपसी, गुणवती दलूमौसी जिसके अनेकों भक्त थे उनमें से सर्वोच्च स्थान मेरा ही था।
दलूमौसी का काव्यप्रेम देखकर ही तो मन में कहानी लिखने की भावना का उद्रेक हुआ था। कहानी के अलावा और क्या कर सकती थी—काव्य रचना करना तो आसान काम नहीं था।

जब दलूमौसी अनायास ही शब्दों को मिला-मिला कर कर पद्य रचती तब, मेरे अन्दर दुःख, सुख दोनों प्रकार के भावों का चकराव उत्पन्न होता है। जिससे हृदय में कंपन पैदा हो जाया करता था। पर अपनी कविता की पद्य कहानी सुनकर दलूमौसी क्रोधित हो जाती थीं। कहतीं-पद्य क्यों कहते हो ? कविता कहो। पद्य और कविता अलग-अलग है। आकाश-पाताल का भेद है। हम समझने का भान तो करते रहे पर आकाश-पाताल सोचकर भी किनारा ना ढूढ़ पाते। तब समझने की बेकार कोशिश ना कर, अपनी छुपाई कहानियों को गोपनीय स्थान से निकाल आगे लिखने बैठ जाया करती थी।

(जो क्रम अब तक जारी है)। बड़े ही संगोपन से लिखती जिससे किसी की नजर ना पड़े। पर दलूमौसी से छिपाना सम्भव न था। अगर वह ना देख लेतीं तो मेरी लिखने की चेष्टा ही विफल थी।
दलूमौसी भी मुझे अपनी कविता की पहली पाठिका का सम्मान देती थीं। बाकी जो हम उम्र थे उनको भी दिखाती, जिससे वे नाराज ना हों। दलूमौसी उनके पीछे कहती समझते तो खाक हैं, दिखाने के लिए तंग करते हैं। अगर ना दिखाती तो या तो मान मनोबल करते समझते उनका अपमान हो रहा है। या  क्रोधवश पर्दा उठा देते। तब—

हाँ दलूमौसी फांसी की आसामी की तरह हमेशा पकड़े जाने के भय से भयभीत रहती। उनकी रचना आतंक के माहौल में ही पोषित हो रही थी। (मन में पद्य ही कहती) मन में पद्य को कविता कहने की ऐसी क्या जरूरत है। चावल तो चावल है अन्न कहकर पुकारने से क्या उसका स्वाद बदल जायेगा ? मेरी गद्य रचना निर्भीक, निडर भाव से आगे बढ़ती चली जा रही थी।

गद्य को किंचित नीची नजर से देखने के बावजूद दलूमौसी मुझे ननी दी, मटरुदी, कचिमासी की श्रेणी में डाल कर नीची निगाह से नहीं देखती थीं। और यह भी मानती थीं कि मैं ही उनकी कविता की थोड़ी बहुत कद्रदान थी। वह मुझे अपनी रचनायें पढ़ने को देकर यह भी टिप्पणी करतीं कि—वाह ! यह तो एक कहानी ही लग रही है। आखिर में तू भी अनुरूपा देवी जैसी सचमुच की लेखिका बन जायेगी क्या ?

हांलाकि यह दोनों ओर से ही मजाक के रूप में कही गई बात थी। फिर भी मेरे लिए उस मजाक को हजम करना असम्भव हो जाता। मैं भी दलूमौसी को कहती—हट—‘असभ्य’ ‘‘फिर कभी तुझे कुछ नहीं दिखाऊँगी’’—कुछ पल के लिए मिजाज दिखा कर मुँह बनाती।
दलूमौसी भी इसके जवाब में कहतीं, ठीक है, मैं भी नहीं दिखाऊँगी।

बाद में प्यार मनुहार—सब कुछ सुलह में ही खत्म होता। पर यह सब अन्दर ही अन्दर होता था।
जिस परिवार में दलूमौसी एवं मेरा पालन हो रहा था उसमें सदस्य संख्या (बच्चों को घटाके) तीस से कम ना थी।
हमारी आज कल की पोतियाँ यह गणना सुन मुर्झा जाती हैं। उस जमाने में ऐसी संख्या कुछ भी नहीं गिनी जाती थी। ग्रामों में क्या था पता नहीं पर साठ-सत्तर बरस वाले कलकत्ता में ऐसे आयतन का परिवार ही देखा जाता था। होगा भी क्यों नहीं ? एक ही महिला तो दस-पन्द्रह संतान प्रसव का अधिकार अपने ऊपर ले लेती थी। कोई इसे अनुचित कार्य भी नहीं मानता था। वे ही तो इसी चक्रानुसार सूद की वृद्धि करतीं।

मालिक, मालकिन तो उदार, आनन्द के साथ सही घोषणा करते रुपये से रुपया का सूद अधिक प्यारा होता है।
उत्तर कलकत्ता के एक पुरातन प्रसिद्ध रास्ते पर दलूमौसी का वृहतआयतन वाला परिवार बसता था जिसके ऊपर-नीचे-सात-सात, चौदह कमरे थे। मंजिलें दो थीं। उसमें कम से कम ढ़ाई दर्जन सदस्य—उनमें से छोटे बच्चों की गिनती नहीं की जाती।

उस जमाने की रीति के अनुसार परिवार के सदस्य स्तरों में विभक्त थे। जैसे दफ्तरों में विभाग और कर्मचारी विभक्त किये जाते हैं। ऊपरी स्तर वाले, निचली स्तर वाले।
यह काफी सम्पन्न परिवार हुआ करता था।
इस स्तर विभाजन में सर्वोच्च स्तर पर होते थे कर्मजीवन से अवसर प्राप्त कर्ता। कभी जो प्रबल शक्ति से सरकारी दफ्तर के बड़े बाबू या रेल ऑफिस में गोदामबाबू होते थे। फिर घर बनाया, हर साल बेटियों का ब्याह किया, ऊपरी पैसा न्याय प्राप्ति मान, खुले हाथ से खर्च करते। दफ्तर में स्वजनों को लेना गार्हित ना मान, बेकार भतीजों, भानजों को काम पर लगाकर संसार रूपी राज्य में राजा की भूमिका ग्रहण कर राज्य पर शासन करते रहे हैं।

इनके रौबदाब से सभी काँपते थे। इनके लिए मान्य था—महीन चावल, शाकाहारी, मांसाहारी दोनों ही रसोई का व्यंजन, शुद्ध घी, खीर, ताजी दही, मछली का उत्तम अंश, बढ़िया आसन, महीन कपड़ों से ढका पानी भरा गिलास, खाते समय ताड़ के पंखे की मधुर मंद हवा।

घर में महिलाओं की कमी नहीं थी। और निरामिष भोज्य का प्रसाद इधर जाता। फिर रसोई में दो-दो चूल्हे राक्षस की तरह जलते। उसके लिए एक महाराज ठाकुर रखा गया था। जो गंजाम जिले का वासी था।
क्योंकि सभी बहुएँ तो छोटे बच्चों की जननियाँ हुआ करतीं थी। और महाराज रखना एक इज्जत की भी निशानी थी। तीन-चार और ऐसे नौकर रखना साधारण-सी बात थी।

गृहस्थ घर में भी होते। महाराज का नाम नहीं लिया जाता—वह सिर्फ ठाकुर था। यही ठाकुर कर्ताओं से स्वयं भयभीत और गृहिणियों को भयभीत रखता था।
नौकर बलराम कर्ताओं के यौवनकाल से था। वह बाबूओं का सम्मान तो करता पर आगामी नस्ल पर पूरी खबरदारी चलाता। बूआजी के अलावा किसी दूसरी गृहणी को नहीं मानता।
हांलाकि मेहनत सभी के लिए करता था। सभी की सेवा भी करता था।

कोई विपत्नीक रहता तो उसकी परिचर्चा तरीके से करता।
इनके अगले पर्याय में आते हैं। कर्ताओं के व्यस्क पुत्र, भानजे, भतीजे। भानजे तो दो-एक होते थे। इस युग में ये व्यस्क की श्रेणी में नहीं आते। शायद इस युग में, इस उम्र में कोई मधुचन्द्र पालन कर लौटा। कोई नववधु के साथ सिनेमा में, कोई केटिंग में व्यस्त है। पर तब वे वयस्क ही माने जाते थे।

वे दस-पांच या कोर्ट-कचहरी की चाकरी में फंसे रहते। परिवार की जनसंख्या वृद्धि में योगदान देते, बड़ों के सामने भीगीबिल्ली और छोटों के सामने यमराज की भूमिका में अवतीर्ण होते।

इनके लिए होता था—एक बीच की स्थिति वाला चावल, घना दाल, मछली का बड़ा टुकड़ा, टिफिन में घी से तर पराठा और सफेद पारदर्शी आलू की सब्जी। चावल के साथ दही दूध का प्राचुर्य ना होता पर कई तरह के तले भोग्य पदार्थ रहते। इनके लिए दरीवाला आसन गिलास में पानी बिना ढके, ऑफिस आजाकालीन डिब्बे में पानों की बहार।
जो बहुएँ लगा देतीं और जिसे भानजी, भतिजियाँ या छोटी बहनें वितरित करतीं। यही जीवन यात्रा का उत्कर्ष शिष्टाचार था। बीवी अपनी पति को पान दे ? छिः !

इसके आगामी सीढ़ी पर उस उम्र के लड़के-लड़कियाँ खड़े थे। जिनके लिए आज का युग ‘टिन स्पार’ जैसा विशेष-विशेषण प्रयोग करता है। जो इस जमाने के भाग्यवान टीनएजर हैं। वे अगर सात खून भी कर डालें तो माफ। अपने आप को जो ना जाने क्या समझते हैं—पर उस जमाने में बिलकुल उलट था। उन हतभागे टीनएजरों के लिए था हर पल फांसी का परवाना चाहे उन्होंने खून किया हो या नहीं।

ये ही सारे दोषों की जड़ होते थे, यही उम्र होती थी इन्हें ठीक करने की, यह बात ऊपरी स्तर के प्राणियों के मन में कूट-कूट कर भरी थी। (आहा ! ये कितने दूरदर्शी और परिणाम ज्ञाता लोग हुआ करते थे)।
हम इसी श्रेणी में थे। इस टीनएजर की श्रेणी में गिने जाते थे। मैं, दलूमौसी, चिनुमौसी, कचिमौसी, ननीदी, मटरुदी—उधर भजन, साधन—घेटूँमामा, पिन्टूमामा।

इस स्तर पर सभी की कड़ी नजर और शासन रहता था। जिसमें कर्ता, गृहणियाँ, दादाबाबू से लेकर बलराम दक्ष की माता भी शामिल रहते। ये सब अपना कर्तव्य दिलोजान से करते। तभी हमारी हालत—
रहने दे वह प्रसंग।

हाँ इस टीनएजर ग्रुप का भी भेदाभेद था। लड़कों के लिए अच्छा खाद्यान्न। लड़कियों के लिए जैसे तैसे—उन्हें पराये घर जाना है। किस जगह जायें, किस घर में पढ़े, उसका ठिकाना है ? अगर आदत बिगड़ जाये तो परेशानी होगी। बारह बरस की उम्र से ही साड़ी पहनना आवश्यक हो जाता था। संसार का काम भी कर्तव्य में था। खाना नहीं बनाने दिया जाता था। थाली भर-भर कर पान बनाना, कटोरी भरकर सुपारी काटना, कमरों को साफ करना, बड़ों के खाने के समय पंखा झलना और माँ, चाची के गोद के बच्चों को संभालना। इनके लिए दिया जाता—काठ की पीढ़ी, चुमकीं छोटा लोटा (मुकेश का कामदार), बड़ा गिलास।

इस टीनएजर के पश्चात बालवाहिनी का नम्बर आता था। असल में यही सर्वनाश का मूल थे। यह बात ऊपरी स्तर वालों को भेजे में नहीं आती। यह जिसे भली प्रकार समझते थे।

यह बालखिल्य दल बड़ों के सामने भोले-भोले बन कर रहते जैसे अभी-अभी बाबा भोलेनाथ का स्वर्ग से आगमन हुआ हो। पर हमारे साथ ? एक-एक थे, एक नम्बर के शैतान। परिवार का अनिष्ट करने में इन्हीं की मुख्य भूमिका रहती थी।
बड़े ही सरल तरीके से इस कमरे की बात उस कमरे तक, उसकी स्वउक्तियाँ उसके कान में करते रहते। किसी के बच्चे को चिऊँगी कर के जगा कर, दूसरे कमरे में हँस-हँस कर कहते छोटी चाची का बेटा ऐसा पाजी है रोता ही रहता है। तभी तो चाची कुछ भी काम नहीं कर पाती।

हमारी समस्त गतिविधियों पर नजर रखना फिर रिपोर्टर का कार्य निवाहना। ये ही अबोध सज कर बड़ों के कर्णगोचर कर देते। और छोले, कुल्फी झालचना में हिस्सा प्राप्त कर लेते।
इन्हीं में से एक दलूमौसी—वह प्रसंग तो बाद में आयेगा।

उत्तर कलकत्ता वाले दलूमौसी के उस परिवार की तस्वीर में रंग इनसे काफी भर जाया करता था। इनके लिए रहता—गला भात, जीयन मछली, गरम दूध, मिसरी, गुड़, लैमनजूस। ये पाँच, छः धोती या इजर पहनते थे।
एक और स्तर था जो सिर्फ कथरी पर सोने वालों का था। इनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। भगवान को पता है वह क्या खाते या पहना करते थे। हांलाकि हर समय जन्मदिन वाले पोशाक में ही देखे जाते थे। इनको देखने का भार हमारी उम्र वाली लड़कियों का था, जिन्हें पराये घर जाने का प्रशिक्षण मिल रहा था।

इस स्तर पर विन्यास के बाद भी ऊपरी स्तर के सदस्यों के ऊपर अप्रत्यक्ष रूप से दो प्रकार के सदस्यों की उपस्थिति हुआ करती थी। भूत एवं भगवान। इनमें से एक को भी कभी भी देख तो नहीं पाते थे पर उपस्थिति का अहसास—बूआदादी जो हमेशा अपने ‘लड्डूगोपाल’ की निर्देशना, आदेश, मनुहार, इजहार सुन पातीं थीं।
और द्वितीय-सब ना देख सकें पर कोई-कोई कभी देख लेता। मझले दादू का पालित भूत जो उनसे बातचीत करता—बीच-बीच में मझले दादा उन्हें किसी प्रकार नीचे उतारते।

प्रत्यक्ष रह कर भी यह दो पार्टियाँ हमें काफी मुसीबत में डाल दिया करती थी।
हाँ इस प्रकार के परिवार में और भी इधर-उधर होता था। आर्थिक अवस्था का भेद भी नजर आता। जैसे इस परिवार वर्ग की महिलाओं, ठाकुर, बलराम और दक्ष की माँ के लिए रहता मोटे दाने वाला चावल, साधारण तरकारी, पतली दाल, इमली की चटनी और छोटे-छोटे झींगा मछली और ऊपरी प्राप्ति में था—भेट की मछली का काँटा, गंगा का हिस्सा का सिर-पूँछ वाला हिस्सा, पोना मछली का सबसे निकृष्ट भाग।

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