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नया जन्म

संतोष सिंह धीर

प्रकाशक : ए आर एस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :335
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4905
आईएसबीएन :81-8346-006-2

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एक मनोरोगी की कहानी....

Naya Janma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दिल्ली से कलकत्ता तक सड़क बनी हुई है। दिल्ली से पेशावर तक भी लम्बी सड़क बनी है—जी.टी. रोड, जरनैली सड़क। पर एक दिल से दूसरे दिल तक मुझे तो एक पगडंडी सी भी बनी हुई नज़र नहीं आती। यदि यह बनी हुई होती तो जो भावनाएँ मेरे दिल में उपज रही हैं, वह मेरी ‘दिल्ली’ या मेरी ‘शीरीं’ के दिल में क्यों नहीं उपज रही हैं ? आज पूरा देश ही निर्माण में लगा हुआ है। रोज़ ही नयी-नयी योजनाएँ बन रही हैं। सड़कें भी बन रही हैं और नयी रेल लाइनें भी। पर क्या एक छोटी-सी पगडंडी, किसी बड़े योजनाकार के भी सपने में क्यों नहीं आती जो एक दिल से दूसरे दिल तक पहुँच सकती हो ? हाय ! मेरे दिल का सच सौदाइयों की भाँति इधर-उधर झाँक रहा है। कैसे जाए एक दिल में आई बात दूसरे दिल तक ?

पहला भाग
पहला काण्ड
1

मेरा नाम सरोज है—सतवंत सिंह सरोज। पंजाबी में कविता और कहानियाँ आदि लिखता हूँ। थोड़ा बहुत स्थान भी है। सरोज मेरा तख़ल्लुस है।
वर्ष डेढ़ वर्ष से मैं बहुत परेशान था। इतना परेशान कि मुझे बचने की ही आशा नहीं थी। एक ऐसी घटना घटी कि यह दुनिया मेरे लिए एकदम ख़ाली हो गयी। दिल को भटकन लग गई। आठों पहर ऐसा मैं घबराया-घबराया रहता जैसे कुछ खो गया हो। क्या खो गया था ? समझ में नहीं आता था। पर मेरी आँखें हर समय ही दुनिया में से कुछ न कुछ तलाश करती रहतीं। अंत में हालत यह हो गयी कि खाट पर पड़ गया। शरीर मिट्टी हो गया। किसी से भी बात न करता। पूरी दुनिया बुरी लगती।
दिन भर मैं खाट पर पड़ा छत को निहारा करता। आहों के काले नाग मेरी चंदन सी देह पर लिपट-लिपट जाते और दिन में हज़ार बार मेरी देह को डसते रहते। मेरा रंग काला हो गया। चिंताओं के शोले मेरा कलेजा फूंक रहे थे।
दिन भर मैं खाट पर पड़ा कुढ़ता रहता। कई-कई बार दिन में मैं खाट पर पड़ा रोया करता। मुझे ऐसा आभास होता कि अब मैं मर रहा हूँ। मेरे परिवार का क्या होगा ? मेरे पाँच बच्चे हैं, जिनमें से चार बेटियाँ और सबसे छोटा पुत्र है। वह अभी मुश्किल से सात या आठ वर्ष का बालक है, रो कर रोटी माँगने वाला। मेरी पत्नी क्या करेगी ? और कहाँ जाएगी ? मैं यही सोचता रहता और सोच-सोच कर रोता रहता।
कई बार मैं स्वयं को मरा हुआ देखता। मैं खाट पर मुर्दे की भाँति लम्बा पड़ा हुआ हूँ। ऊपर सफ़ेद चादर है। मुँह और पैर ढके हुए। हमारा घर लोगों की भीड़ से भरा पड़ा है। दोस्त और दुश्मन सभी हमारे घर आ गये हैं। मेरी पत्नी रह-रह कर बेहोश हो रही है। मेरे बच्चे भयभीत हो कर रो रहे हैं। बारी-बारी से लोग उनके आँसू पोंछ रहे हैं, जो पुंछने में नहीं आ रहे हैं। मेरे सिवा कौन उनके आँसू पोंछ सकता है ?
मेरे भाई धाईं मार-मार कर रो रहे हैं। मेरा दादा पागल हो कर पैरों के बल बैठा है। मेरी माँ है नहीं। होती तो पीट-पीट कर छाती लाल कर लेती और फिर मुझे उम्र भर रो-रो कर अँधी हो जाती। मेरा पिता, जो मेरी माँ के मरने के तुरन्त बाद किसी अन्य औरत के साथ घर छोड़ कर चला गया और अपना पूरा छोटा परिवार मेरे हवाले कर गया, अब मेरी ख़बर सुन कर गली में सिर धुनता हुआ आता है। वह अपने को मिली बदनामी पर दहाड़ें मार रहा है, और मेरी नेकी उसका समूचा कलेजा खाये जा रही है जिसे मेरे जीते जी वह इतना नहीं स्वीकारता था, बल्कि नाराज़ रहता था कि मैं उसके इस संयोग को उचित क्यों नहीं मानता।

कई बार मैंने अपनी अर्थी गली में से उठ कर जाते देखी। मेरी शव यात्रा कितनी लम्बी है। पूरे गाँव के स्त्री-पुरुष अपना-अपना काम छोड़ कर आ गये हैं। मुझे जाते हुए देखने के लिए मुंडेरों पर भीड़ जुटी है। सभी मेरे गुणों का बखान करते सिर झुका कर जा रहे हैं। जो मेरे कट्टर शत्रु थे, अब उन्हें भी मुझसे हमदर्दी हो गई है। वे सच्चे मन से मेरे बच्चों की सहायता करना चाहते हैं।
कई बार मैंने स्वयं को अपने गाँव के शमशान में लपटों में जलते देखा। दाग़ देने की देरी थी कि आग की सैकड़ों जीभें मेरे शरीर को चाटने लगीं। धुएँ का एक झोंका मेरी चिता में से भड़का और तेजी से ख़ाली हवा में हाथ फैलाता हुआ झूमने लगा। फिर वह झोंका तीव्रता से नीले से काला हो गया और फिर काले से भूरा सा। मेरे शरीर की चर्बी के पटाख़े बजने शुरू हो गये।
धुएँ का गुब्बार देखते ही, दूर, पीछे खड़ी स्त्रियाँ फफक कर रोने लगीं। मेरे प्रति यह संभवतः उनका अंतिम रुदन था।
मेरी पत्नी मेरी चिता की ओर भाग-भाग कर आ रही थी। वह मेरी छाती से चिपट कर मेरे साथ ही भस्म हो जाना चाहती थी। पर लोग उसे सख़्ती से दूर हटा रहे थे। मेरी उस पत्नी को जिसने स्वयं नरक झेल कर मेरा जीवन स्वर्ग बनाया। शायद वे सोच रहे थे कि यदि इस समय मेरी पत्नी मेरे निकट आएगी तो मैं कहीं स्वर्ग जाते-जाते नर्क में न चला जाऊँ।
मेरी बहनें यहाँ नहीं। अपने-अपने घर हैं। मेरे मरने की सूचना उनको गोली की तरह लगती है। वे गाँव की परिधि में आते ही ज़ोर-ज़ोर से विलाप कर रही हैं और गली में पहुँचते ही दोनों हाथों से छाती पीट रही हैं। ‘अरे भावज को छोड़ के मत जाना रे भइया ! अपने बच्चों की तरफ देखना रे भइया ! हाय रे हमारे सरवन भइया !’....
गली में सफ़ेद वस्त्रों वाली मातम-टोली रोती-पिटती आती है। यह मेरे ससुराल से आई है। आगे मेरी सास है। वह हाथ फैला-फैला कर मुझे पुकारती हुई छाती पीट रही है :‘अरे, मेरी बेटी को छोड़ के मत जाना रे बेटा ! अरे तेरे बिना धरती उसका बोझ न संभाल पायेगी बेटा !’
एकदम, मेरी माँ की तरह, वह दिल से रो रही है। बेटे का ग़म कम नहीं होता। उसका जवान बेटा मरा, वह उसे भी इतना नहीं रोई थी, जितना अब मुझे रो रही है। बेटा मरे तो इस धरती के दोनों सिरे डोलते हैं। जवाई मरे तो चारों पाए डोलने लग जाते हैं।
मुझे, मेरी सास, मेरे ससुराल की ड्योढ़ी में बैठी गुदड़ सी दिखती है, जिस पर उदासी की मक्खियाँ भिनक रही हैं। पूरा घर उदास है और भाँए-भाँए कर रहा है। दूसरे ही क्षण मातम-टोली से पूरा घर भर जाता है। चीख़ना-चिल्लाना और रोना शुरू हो जाता है। एक आवाज़ सुनती है : ‘बेटा तुझे कौन सी गोली लगी रे सतवंत सिंह !’ और एक दम से मेरे लिए ‘सिआप्पा’ शुरू हो जाता है।
ऐसे कई अवसरों पर मैं मरा हुआ भी रोने लग जाता।

दिन में कई-कई बार बहाने-बहाने से रोता। कभी अतीत को याद करके, कभी वर्तमान को देख कर, भविष्य तो कोई था ही नहीं। मैं अपनी पत्नी से अपने आँसू छिपाना चाहता। ये आँसू उसके दिल में गोली बनकर लगते थे। कई बार वह कमरे में आती तो मेरी आँखों में आँसू होते। मैं अपनी पूरी शक्ति से अपने आँसू पीना चाहता। पर वह मुझे पीने न देती और मेरी खाट की पाटी पर बैठ कर मेरे आँसू पोंछती। इस प्रकार वह मेरे आँसू स्वयं पीने का प्रयत्न करती। मुझे शर्म भी लगती। खाट पर पड़ा मर्द रोता अच्छा नहीं लगता। मर्द रोता भी खड़े हो कर ही अच्छा लग सकता है। मर्द है ही वही जो पैरों पर खड़ा है। राम सीता को रोये तो खड़े होकर रोये थे।
लिखने या कुछ करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। लिखना तो एक कोमल काम है, ऐसी स्थिति में तो कोई साधारण काम भी नहीं हो सकता। यह भी एक चिंता थी जो मुझे अन्दर-ही-अन्दर खा रही थी। मेरे मन में शून्य था जो मुझे कोई काम करने नहीं दे रहा था। मैं कोई भी काम करता नहीं था, इसलिए शून्यता बढ़ती जाती।
रोशनी मुझे काटने को आती। सूर्य मुझे दुश्मन लगता। सुबह का लाल चेहरा मेरे हृदय में शोले दहकाता। दिन मुझे खाने को दौड़ता। क्योंकि ये सब मिल कर मेरी तुच्छता को उघाड़ते, मेरा मज़ाक उड़ाते, और खाली दुनिया को देखने के लिए मुझे विवश करते। मैं इन सब की आँखों से छुप जाना चाहता। अंधेरा अच्छा लगता। रात हितु सी मालूम होती। रात भी अंधेरी। चाँदनी रात मेरे लिए दिन की बहन ही होती थी।
मैं मुँह छिपा कर सोता। तारों के साथ भी मैं आँख नहीं मिला पाता था। जैसे मैं इस दुनिया का चोर होऊँ। यद्यपि मैं कफ़न की भाँति चादर तान कर सोता था, पर रात का अंधेरा भी मुझे चैन नहीं देता था। नयी सुबह फिर मौत की भाँति मुँह बाए सामने आ खड़ी होती। किसी अंधेरी कब्र में, मौत की गहराई में, मैं चिर निद्रा में सोना चाहता। पर मैं इतना बदनसीब और कर्महीन व्यक्ति था कि यह भी नहीं कर सकता था। या यह भी करने की शक्ति नहीं थी। बेहद कमज़ोरी थी। इतना भी उत्साह नहीं था। स्वयं को मारना परले दर्जे की बुज़दिली है। पर, यह बुज़दिली करने के लिए भी एक क्षण के लिए बेहद बहादुरी की ज़रूरत है। मुझमें तो जान ही नहीं थी।
मेरा एक जिगरी दोस्त मेरे घर आया करता था। मैं उससे ठीक से बात भी नहीं कर सकता था। उसकी कई-कई चिट्ठियों के उत्तर नहीं देता था। मुस्करा कर मिल न सकता। पर उसमें मेरा कसूर नहीं था। एक प्रकार से मुझ पर पहाड़ गिरे हुये थे। एक मरा हुआ व्यक्ति मुस्करा नहीं सकता। किसी से मुस्करा कर मिलने के लिए मन में शक्ति की आवश्यकता होती है। झूठी मुस्कराहट किसी की बहुत बड़ी बेइज़्ज़ती है। मुझमें वह शक्ति नहीं थी।
जब वह मेरे घर आता था, तब मैं खाट पर पड़ा होता। उसे देख कर चुप ही रहता। वह मुझे बुलाता। मैं चादर से मुँह लपेट कर करवट बदल लेता। यह उसकी बेइज़्ज़ती नहीं थी, यह उसकी इज़्ज़त थी। मैं जैसे होता, दिखता। उसके लिए तकल्लुफ़ न दिखाता। यदि मैं दिखावटी मुस्कराता तो यह उसका अपमान होता। मैं, अपने जिगरी दोस्त का, घर आने पर, अपमान कर देता ?

दिन में मैं कई-कई बार रूआंसा सा हो उठता। दिन में मैं अपने हाथों को कई-कई बार देखता। मुझे लगता, मेरे हाथ बूढ़े हो रहे हैं। आइना नहीं देखता था, दाढ़ी के कुछ सफेद बाल दिल में सुइयाँ चुभोते थे। नित्य रोज़, मुझे लगता कि ये सफ़ेद बाल सफ़ेद घोड़े की भाँति सरपट आ रहे हैं। इस घोड़े की टापों के नीचे मेरी जान कुचली जाती। धूल में लिथड़ा, कितनी-कितनी देर के बाद मैं अपनी गर्दन ऊपर उठाता। पर मेरी गर्दन पुनः गिर पड़ती।
खाट पर गिरी हुई मेरी गर्दन देख कर, कई-कई बार दिन में मेरी पत्नी मेरे कमरे में डबडबाई आँखों से आती। मैं उसकी ओर पीठ घुमा लेता। उसे लगता, उसका स्वामी उसके पूरे संसार की ओर पीठ मोड़ता जा रहा है। वह सोचती, इस रोग का हम क्या इलाज करेंगे ? हम तो किसी छोटी-मोटी बीमारी झेलने योग्य भी नहीं हैं। पर वह अपनी पूरी जान मेरे ऊपर दिन में हज़ारों बार निछावर कर रही थी। फटी-फटी आँखों से वह मेरा मुँह देखती और ठंडी आहें भरती हुई कमरे में से निकल जाती।
मेरी उँगली में सोने की एक हल्की सी अंगूठी थी। एक दिन मैं उसे उतार कर अपनी पत्नी को देने लगा। मेरा मन अब उसे अपनी उँगली में पहनने को नहीं कर रहा था। वह बैठते दिल से बोली, ‘उँगली में पहने रहो, हाथ अच्छा लगता है। यह कौन सा कुछ खाने को माँगती है। पहने रहो उँगली में।’
गर्दन गिराए ही मैंने भृकुटी तान कर कहा, ‘नहीं, इसे तुम ले ही लो। यह सब चीज़ें पहनने का अब मेरा हक नहीं है।’
उसके अंतरमन से एक काली ठण्डी आह निकली और वह भरी-फटी आँखों से मेरा मुँह निहारने लगी।
मुझे अपने तन पर पड़े कपड़े भी व्यर्थ लगते। मैं सोचता, जो वस्त्र मेरे शरीर को ढँकते हैं, वे व्यर्थ जा रहे हैं। जो भोजन मैं करता हूँ, वह व्यर्थ जाता है। मुझे कुछ भी खाने या पहनने का हक नहीं है। मैं धरती पर बोझ हूँ। मुझे अब इस धरती पर नहीं रहना चाहिए।
कई बार वह पूछती, ‘कौन सी बीमारी है तुम्हें ? किसी ने कुछ कह दिया है क्या ?’

उसका भाव होता कि अत्यधिक भावुक होने के कारण सम्भवतः मेरे दिल को किसी की बात लग गई है।
‘‘मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा। मुझे किसी ने क्या कहना है। मुझे मेरा अंतरमन ही भीतर ही भीतर कुछ कह रहा है।’ मैं फिर गर्दन झुका लेता और आँखों में आँसू आ जाते।
वह मेरे मुख की ओर ताकती और अपने आँसू पोंछते हुए कहती, ‘तुम कहीं चले जाओ। घूम फिर आओ कहीं। मन में कुछ बदलाव आ जाएगा।’
‘कहाँ चला जाऊँ ?’ मैं आह भरता हुआ उत्तर देता, ‘मेरे लिए कहीं कोई ठिकाना नहीं है।’
‘अपने किसी दोस्त के पास चले जाओ।..इतने दोस्त हैं तुम्हारे !’
मैं लम्बी साँस लेकर कहता, ‘मुझे कोई झेल नहीं सकेगा। मैंने किसी का कुछ नहीं किया। मैं किसी के काम का नहीं।’
‘तुम जाओ तो सही किसी के पास। कोई तुम्हें धक्के तो नहीं मार देगा। अपना ख़र्च स्वयं उठा लेना। तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा। चण्डीगढ़ चले जाओ। पटियाला, लुधियाना, जलंधर का चक्कर लगा आओ।’
‘किसी को मेरी ज़रूरत नहीं। क्या जाऊँ मैं किसी के पास !’
उसकी आँखें भीग जातीं।
‘किसी पहाड़ पर चले जाओ...‘वह मेरी भीगी आँखें देखती। मैं आँखें चुराकर उसकी बात काटते हुए उत्तर देता, ‘पहाड़...’ मेरा कहने का मतलब होता कि कहाँ मैं और कहाँ मेरा पहाड़ों पर जा कर रहना।
वह अपने लाखों आँसू पी कर विनती करती हुई कहती, ‘मेरे पास एक अँगूठी है, उसे बेचकर चले जाओ। तुमसे क्या प्रिय है ?’
मैं इसका कोई उत्तर न देता। आँखों में आँसू आ जाते जिन्हें छिपाने के लिए मैं करवट बदल कर उसकी ओर पीठ कर लेता।
कई बार मैं लम्बी साँस ले कर उससे कहता, ‘मैंने तुम्हारे साथ धोखा किया।’
‘कौन सा ?...’ उसका मुँह लाल हो जाता और नसें फूल जातीं।
‘‘मैंने तुम्हारे साथ बहुत छल किया है...’
‘‘कैसा छल ?...’वह पूरी शक्ति लगाकर पूछने का यत्न करती और अपने आँसू रोक न पाती।
‘बहुत बुरा हुआ...यूहीं लगी तू मेरे पल्ले...।’
‘‘लो, पगले, कैसी बातें करते हो...’ उसकी आँखें सावन-भादों हो जाती थीं। उसकी नाक लाल हो जाती।
‘क्या किया मैंने उम्र भर...कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए...’
‘तुमने क्या नहीं किया पगले...’ वह उखड़ी साँसों से कहने लगती। अपनी जान की सम्पूर्ण धड़कन मुझमें रचा देती। धीरे-धीरे, भरी नदी में पांव उखड़ जाने से, मैं सारा उससे चिपट जाता और डूबते को तिनके का नहीं, पूरे चंदन के तने का सहारा प्राप्त हो जाता।
इसी सहारे को बाहों में लिए मैं भरे दरिया में खड़ा था।

2

1961 की जुलाई के प्रारम्भ के दिन थे।
हर ओर से एकदम निराश हुआ बैठा था कि मुझे मेरे एक मित्र की मनाली से एक चिट्ठी आई। बहुत अच्छी चिट्ठी। वह भी पंजाबी का लेखक था। उसका नाम अमृत था। चिट्ठी में उसने लिखा था कि यदि मेरी इच्छा हो तो मैं बीस एक दिन के लिए उसके पास मनाली आ जाऊँ। बहुत सुन्दर स्थान है। हसीन-हसीन नज़ारे। चीड़ और देवदार के काले-काले जंगल हैं। नीचे ब्यास का कल-कल करता झिलमिलाता हुआ पानी है। दूर, पहाड़ की बर्फ़ से श्रृंगारित चोटीयां हैं।
अमृत दिल्ली में रहता था। पर अब कुछ एक दिनों के लिए मनाली आया हुआ था। मनाली में वह अपनी किसी किताब का पुनर्लेखन कर रहा था। उसी सिलसिले में उसे मेरी आवश्यकता थी। वह बीस जून से वहाँ था, और चौदह-पंद्रह दिनों के बाद उसने मुझे चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में उसने यह भी लिखा था कि वहाँ रहने का पूरा ख़र्च—अण्डे, ख़ाना, चाय, शराब और आने-जाने के किराये के साथ ही सौ रुपये पारिश्रमिक वह मुझे अलग से देगा। सो, यदि मुझे स्वीकार हो तो तुरन्त उसे उत्तर दूँ। चाहे तो तार से सूचित कर दूँ। एक रुपया लगेगा। हाँ करूँ या न, बस। ताकि यदि मुझे आना हो तो वह किराये के लिए पचास रुपये तुरन्त भिजवा सके।
अमृत की इस चिट्ठी से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। अंधेरी रात में मुझे यह चिट्ठी किरण का एक टुकड़ा लगी। मैंने तुरन्त उत्तर दिया कि मुझे सब स्वीकार है। क्योंकि मैं तो एक प्रकार से ख़त्म ही हुआ पड़ा था। इस दशा में वह मुझे सौ रुपये भी न देता, केवल किराया ही दे देता, तो भी मैं स्वीकार कर लेता। क्योंकि मेरा विचार था कि सम्भवतः मनाली जाने से ही मेरी तबीयत ठीक हो जाए। कहते हैं कि कई बार पहाड़ों पर जाने से ही दुःख दूर हो जाते हैं। पर इसके लिए मेरा मन हुंकार नहीं भर रहा था कुछ। क्योंकि मुझे पता था कि मेरा रोग ऐसा नहीं।
कई बार मैं सोचता कि यदि मुझे कुल्लू या कश्मीर में भी रखा जाए, फ़िक्र-फ़ाका कुछ न हो, कम से कम हज़ार रुपये महीना मेरी आय हो और काम कोई भी करना न पड़े, तब भी, शायद, मेरे दिल पर से यह उदासी जा न सके। यह उदासी कभी भी मेरी जान नहीं छोड़ेगी। छोड़ेगी तो आख़िर को मेरी जान लेकर छोड़ेगी। पर तब भी मैं सोचता कि क्या पता है, किस समय कोई चमत्कार हो जाए। क्या पता है, कब कोई घटना मेरे मन को छेड़ जगाए। जीवन आख़िर हादसों-घटनाओं का ही नाम तो है। जीवन के बारे में यह भी है कि सदा यह एक सा रहता नहीं। रंग बदलता रहता है। कभी कुछ, कभी कुछ। सो मैं यह भी सोचता कि शायद मनाली जाने से ही मुझमें कुछ परिवर्तन आ जाए।
पर, मनाली जाने से भी मुझमें कोई अंतर नहीं पड़ा। अपितु और भी उदास हो गया। मुझे लगता, पूरी दुनिया आगे निकल गई है, मैं सबसे पीछे खड़ा हूँ। समय उड़ान भर गया। क्षण-क्षण वह मुझसे दूर होता जा रहा है। परन्तु मैं उसी जगह खड़ा हूँ।

मनाली में ब्यास दरिया बहुत तेज़ बहता है। गरजता, फुफकारता और आक्रमिक हुआ आता है। पूरी वादी इस दरिया का शोर सुनती रहती है। लहरों वाला, बिफरता, या झाग उगलता ब्यास वहाँ ऐसे शोर मचाता है जैसे कोई डरा हुआ घोड़ा युद्ध के मैदान में हिनहिनाता हुआ भागता है।
मुझे यह दरिया भी रोज़ पीछे छोड़ता जाता था। कई बार मैंने इस दरिया को समय की भाँति ही जाना या समय को इस दरिया की भाँति, जो पागलों की तरह ऊधम मचाता हुआ ऐसे बहा जाता था कि कोई भी उसे पकड़ न सके। इस समय की, इस घोड़े की, कौन लगाम पकड़ सकता है ?
वे भाग्यशाली होते हैं, जो समय की लगाम पकड़ते या उसके साथ कदम मिलाते, या उससे आगे निकलते हैं। मैं भाग्यशाली नहीं था, कर्महीन अभागा था। इतना बदनसीब कि दरिया के किनारे पर, पत्थर बना बैठा, उसको बहते हुए को देखता रहता। मुझ पर उसकी तेज़ रवानी का कोई भी प्रभाव न होता।
कई बार दरिया की छाती में से भँवरें उठने लगतीं। चक्कर लगाती हुई लहरें बहुत ऊँचे उठ जातीं और मेरी ओर भी लपकने लगतीं। पर, मेरी ख़ामोश छाती में से कोई लहर न जागती। मेरा मन स्थिर रहता। कभी कोई झनझनाहट न छिड़ती। मेरे सोते हुए सीने में से कोई भी वेग हुंकार न भरता।
लाखों रंग बदल-बदल कर इस दरिया की लहरें आतीं। लाखों रंगों की लहरें होतीं। परन्तु मैं एकदम बेरंग होता। मेरा मन प्रेरित न होता। वरन् जितने रंगों वाली इस दरिया की लहरें होतीं, उतनी ही अधिक मुर्दानी सी मेरे चेहरे पर छाई होती। जितना ही वह तेज़ भागता, उतना ही मैं सुस्त हो जाता। मैं सोचता, अब मैं कब इसके साथ मिल पाऊँगा ?
मैं सोचता, पूरी दुनिया कुछ न कुछ कर रही है। मैं ही नहीं कर रहा कुछ। पूरी प्रकृति अपने-अपने कामों में व्यस्त है। चाँद, सूरज, हवा, पानी, सभी कुछ न कुछ करते हैं। मैं ही नहीं करता कुछ। सभी के कुछ अर्थ हैं, मेरा ही कोई अर्थ नहीं है। सभी की ज़रूरत है, मेरी ही कोई ज़रूरत नहीं। धरती है, आकाश है, चाँद, सूरज, तारे हैं, सभी ही व्यस्त हैं। मुझे ही कोई काम नहीं। मैं ही किसी काम का नहीं। एक नाचीज़ ज़र्रा भी कुछ क्रिया कर रहा है। एक ज़रा से ज़र्रे की भी इस दुनिया को ज़रूरत है। मेरी ही कोई ज़रूरत नहीं। रोड़े, पत्थर, मिट्टी, कंकड़, सभी किसी न किसी काम के हैं। एक बेकार सूखा तिनका भी लाखों काम आता है। मैं ही किसी काम का नहीं। तिनके की कोई ज़रूरत है, मेरी ज़रूरत नहीं है।
कई बार मैं एक तुच्छ से तिनके को ही देखता रहता। कई बार मैं रोड़ों को या कंकड़ों को देखने लगता। कई बार मैं एक अदना से ज़र्रे को भी महत्व देता। उसकी ओर ही देखता रहता। मुझे लगता, जैसे वह ज़र्रा मुझसे कहीं अच्छा है। कई बार मैं उन जैसा होने के लिए ही तरसने लगता।

कभी-कभी मैं सोचता कि वृक्ष होना अच्छा है, वृक्षों को कोई ग़म नहीं। रास्ता होना अच्छा है, रास्तों को कोई चिंता नहीं। स्थान होना अच्छा है, स्थानों को कोई शोक नहीं। कुछ भी होना अच्छा है, मनुष्य होना अच्छा नहीं। कम से कम मेरे जैसा मनुष्य होना अच्छा नहीं।
पशु और पक्षी भी मैं होना चाहता कभी-कभी। पर, फिर मैं सोचता कि पशु और पक्षी भी ग़मग़ीन होते होंगे। उनमें भी कोई मेरी तरह का बदनसीब हो सकता है। इसलिए मैं सोचता कि वही होना अच्छा है जिसमें दिल और जान न हो। चिंता और ग़म केवल दिल और जान के दुश्मन हैं।
मनाली में दो वृक्ष थे। एकदम सूखे और ठूँठ। बाज़ार के चौरस्ते पर वह एक ओर को खड़े थे। समूची हरी वादी में केवल ये ही वृक्ष थे जो एकदम सूखे खड़े थे। कभी-कभी मेरे मन में यह विचार आता कि मैं एकदम इन्हीं जैसा हूँ। नहीं, मैं फिर सोचता, मैं इनके जैसा नहीं हूँ। यह मुझसे अच्छे हैं। इन पर कभी न कभी फिर बहार आ सकती है, मुझ पर अब कभी भी बहार नहीं आएगी।
मनाली में हज़ारों रंग थे। सौ-सौ रंगों का दिन होता और सौ-सौ रंगों की रात होती। सौ-सौ रंग पहाड़ बदलते और सौ-सौ रंग के बादल होते। पर मुझ अभागे कर्महीन पर केवल एक ही रंग होता। ग़म और चुप्पी का काला रंग ! ग़म का काला पत्थर मेरी छाती में जमा हुआ था। काली ब्रज़ चुप्पी मेरी गर्दन दबोचे बैठी थी। यदि कभी, भूले से, मेरे मन में ख़ुशी की कोई लहर सी आ जाती भी तो वह काले रंग की होती।
मैं हंस नहीं था सकता। न बोल ही सकता अच्छी तरह। यदि मैं कभी मुस्कराता तो मुझे लगता, जैसे मैं झूठ बोल रहा हूँ। कागज़ के फूलों जैसी मेरी मुस्कराहट होती।
कभी-कभी मैं सोचता कि लोग हंसते कैसे हैं ? क्या मैं कभी हंस सकूँगा ? मेरे अन्तःकरण में भी इस प्रश्न का उत्तर होता। परन्तु उस उत्तर को जानने की क्षमता मुझमें नहीं थी। क्योंकि उत्तर ‘न’ में था जिसे मैं सुन नहीं सकता था। मेरे शरीर में पत्थर जैसे सच्च को सह सकने की योग्यता नहीं थी। क्योंकि मुझे आशा ही नहीं थी।

3

आख़िर बीस एक दिनों के बाद, जैसा मैं गया था, लगभग वैसे का वैसा ही, मनाली से वापस आ गया। हाँ, एक कविता लिखी। वह भी बहुत मुश्किल से अमृत के ही कहने पर। उसमें मैंने ब्यास दरिया को समय के सफेद घोड़े से उपमा देते हुए कहा था कि समय का यह सफेद घोड़ा उड़ा जा रहा है, पर मैं एकदम चुप हूँ। समय की सुनहरी डोरें मेरे पास से छलांगे लगाती आगे निकल गयी हैं, पर मैं एकदम पत्थर हूँ। मेरे सपने बज्र हैं। मेरे सीने में काली चुप सिर झुकाए बैठी है।
कई बार मैं सोचता, मैं एकदम अर्जुन की तरह हूँ जो महान योद्धा होते हुए भी, किसी कारण, लड़ते-लड़ते बलहीन हो गया था। वही उसका धनुष था, वही उसके वाण थे, वही उसके हाथ थे, पर मन में शक्ति नहीं थी। कहते हैं कि अर्जुन को कृष्ण ने उपदेश दिया, सोए मन को जागृत किया और उसके दिल को शक्ति दी। मैं सोचता, मेरे मन को भी आज जागृत करने की आवश्यकता है। श्रीकृष्ण की भाँति ही, यदि कोई मेरे सोये हुए मन को आज जगाए तो संभवतः मैं पुनः जाग सकूँ। और फिर से जीवन में जूझ सकूँ। पर मैं सोचता, वह कौन है जो मेरा कृष्ण हो सकता है ?
कृष्ण जी के जिस उपदेश ने अर्जुन को जागृत किया था, उसका नाम ‘गीता’ है। गीता कविता में है, संस्कृत की उत्तम कविता। मैं सोचता, क्यों न मैं ही स्वयं अपना कृष्ण बनूँ ? ऐसी कविता लिखूँ जो मुझे शक्ति प्रदान कर दे। अक्सर मैं स्वयं को संबोधित करके कहने लगता : ‘जाग रे मन ! जाग मेरे...जाग रे मन ! जाग मेरे !’ बार-बार मैं इसी तुक को अपने मन में गुनगुनाता। परन्तु मन जागता ही नहीं था। कई बार मैं सोचता कि शायद वाणी पढ़ने की तरह, इस तुक को रटने से ही मेरा मन कुछ जाग सके। पर यह निरी भूल थी जिसे समझते हुए भी मैं मानने को मजबूर था।
मैंने बहुत यत्न किया कि इस कविता को पूरी कर लूं। मेरा विचार यह था कि यदि यह कविता लिख हो गई तो समझ लो, मन जाग गया। बांध ही टूटने की देर है, बाढ़ स्वयं ही आ जाएगी। पता नहीं क्या कारण था कि इस तुक के आगे की तुक एकदम नहीं बन पा रही थी। कितनी ही बार मैं काग़ज़-पेंसिल ले कर इसे लिखने बैठा। कितनी ही बार मैं इस तुक को अपने मुँह में गुनगुनाता कि अगली तुक इसी प्रकार, सूत के गोले की तरह, स्वयं ही उधड़ जाएगी। पर ऐसा हो ही नहीं सका। ‘जाग मेरे’ से मिलते-जुलते काफ़िए भी लिख कर देखे—राग मेरे, भाग मेरे, लाग मेरे, झाग मेरे। पर मैं कुछ भी लिख न सका। आख़िर मुझे अपना आप बहुत ही घटिया प्रतीत होने लगा।

कई बार अमृत मेरी, गिरे हुए व्यक्ति को उठाने की तरह जैसे, मदद करने लगता। काग़ज़-पेंसिल ले कर वह मेरे पास आ बैठता और मेरा मुँह ताकने लगता। उसका मतलब होता कि कुछ न कुछ कहूँ मैं, ताकि उसे लिखे वह। ऊल-जलूल, ग़लत-सलत, कुछ न कुछ बोलूँ सही। कविता अपने आप बनेगी। आख़िर को मैं एक कवि हूँ। ऐसी भी क्या बात है कि कुछ भी लिख ही सकूँ ना। पर मैं कुछ भी लिख न पाता। ऊल-जलूल, ग़लत-सलत, मुझसे कुछ भी बोला न जाता। ऊल-जलूल भी क्या बोलता जब कोई बात ही सूझती ना। ऊल-जलूल का अर्थ केवल ऊल-जलूल ही नहीं था, उसका मतलब यह था कि जो कुछ भी मैं बोलूँगा, ऊल-जलूल ही समझ कर, उसमें से भी शायद कोई उत्तम कविता निकल आए। कई बार, वह समझता कि कवि जो भी कहता है, वह एक कविता होती है। टैगोर के विषय में वह कहता था कि जो भी वह बोलते, कविता होती। वादी को संबोधित करते, उच्च कोटि की कविता होती। बादलों से कुछ कहना होता तो उच्च कोटि की कविता में। यद्यपि वह केवल बातें करते।

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