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अमर चित्र कथा हिन्दी >> 563 राणा प्रताप

563 राणा प्रताप

अनन्त पई

2.45

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 81-7508-491-X पृष्ठ :32
आवरण : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 4797
 

इस पुस्तक में राणा प्रताप के शौर्य-गाथा का सचित्र वर्णन हुआ है......

Rana Pratap A Hindi Book by Anant Pai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

राणा प्रताप

सन् 1556 में जब अकबर मुगल-साम्राज्य की गद्दी पर बैठा, तब तक मुगल भारतीय जन-जीवन के अंग बन चुके थे। विजेता के रूप में अकबर एक अत्यन्त सफल सम्राट साबित हुआ। सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपनी विजय का पताका फहराते हुए उसने अपने साम्राज्य में गुजरात, बंगाल, उड़ीसा, कश्मीर तथा सिन्ध को भी शामिल कर लिया।

मध्य भारत और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त करने में भी वह सफल रहा। अपने साम्राज्य को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए उसने हिन्दुओं को काफी सुविधाएँ प्रदान कीं। उसने एक राजपूत कन्या से विवाह भी किया। उसके इन कार्य-कलापों से प्रभावित हो कर काफ़ी राजपूतों ने अकबर को अपनी सेवाएँ अर्पित करके उसके सम्मान की वृद्धि की। इस सबके बावजूद, अकबर एक विदेशी आक्रमणकारी का पौत्र था और अपने पिता के समान ही एक सफल विजेता भी।

जिस समय सम्पूर्ण उत्तर भारत अकबर के चरणों में नत हो चुका था उस समय राणा प्रताप ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे जो अकबर के सम्मुख सीना तानकर खड़े हुए। उन्होंने अकबर की सत्ता को स्वीकारने से साफ इन्कार कर दिया। अगर वे थोड़ा झुक जाते तो शायद वे भी अकबर के दरबार में सम्मान और ऐश-आराम का जीवन बिता सकते।

परन्तु उन्होंने अपने सुख और सुविधा से अधिक महत्त्व अपने सम्मान को दिया। उन्हें प्राणों से भी बढ़ कर स्वतंत्रता प्यारी थी। राणा की शक्ति अकबर की विशाल सैन्यवाहिनी की तुलना में बहुत ही कम थी। परन्तु वे जंगलों में रहे, कठिनाइयों से जूझते रहे जिससे उनके स्वतंत्रता संग्राम को और भी बल मिला।

संक्षेप में, भारत की ओजमयी देशभक्ति की उदास भावना के संदर्भ में राणा प्रताप का नाम सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किये जाने योग्य है। आगे के पृष्ठों में उन्हीं राणा प्रताप की शौर्य गाथा का वर्णन है।


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