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अमर चित्र कथा हिन्दी >> 522 कृष्ण और नरकासुर

522 कृष्ण और नरकासुर

अनन्त पई

2.45

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-7508-487-1 पृष्ठ :31
आवरण : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 4790
 

धर्म गाथाओं और कविताओं पर आधारित पुस्तक

Krishna Aur Narkasur A Hindi Book by Anant Pai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कृष्ण और नरकासुर

भागवत पुराण में बताया गया है कि नरकासुर भूमि माता का पुत्र था। पशुओं से भी ज्यादा क्रूर और अधम था।
नरक की करतूतें ऐसी काली थीं कि उसका नाम ही अंधेरे का प्रतीक बन गय़ा। दीपावली के त्यौहार के साथ यह मान्यता भी जुड़ी है कि नरक की मृत्यु होने से उस दिन शुभ आत्माओं को मुक्ति मिली थी। दक्षिण भारत में नरक की कथा में नारी स्वतन्त्रता का भी पुट है उस कथा के अनुसार, कृष्ण ने लड़ते-लड़ते थक कर क्षण भर को अपनी आँखें बन्द कर ली तो सत्यभामा ने उस असुर से लोहा लिया। पुराण में इस बात का उल्लेख नहीं है।

धर्म-गाथाओं और कविताओं में कृष्ण को अनेक बार नरकारि (नरक का शत्रु) और मुरारि (नरक के साथी , मुर का शत्रु) कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि प्राग्जोतिषपुर का यह अत्याचारी शासक बहुत बदनाम था।


विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को सागर से निकाला था। इसके बाद भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पिता एक दैवीशक्ति और माता पुण्यात्मा होने पर भी पर अत्यंत क्रूर असुर निकला। उसका नाम नरका सुर पड़ा।
उसे तीनों लोकों को सताने में ही आनन्द मिलता
राजा, ऋषि, दैत्य, देव सभी उससे डरते थे।
नरकासुर फिर आ गया !
स्त्रियाँ बाहर न आने पायें उन पर पहरा रखना।

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