चाणक्य प्रपंच - के. वी. सुब्बन्ना Chanakya Prapanch - Hindi book by - K. V. Subbanna
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चाणक्य प्रपंच

के. वी. सुब्बन्ना

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4739
आईएसबीएन :81-8143-476-5

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के.वी. सुब्बन्ना के द्वारा चाणक्य के जीवन पर आधारित नाटक

Chadkya Prapanch

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पहला दृश्य

(चाणक्य विष्णु शर्मा का कुटीर। वह कथामुख का निरूपण करता है।)

चाणक्य : इस भारतवर्ष में ऐसा कौन है जिसने चाणक्य शपथ को कान खोलकर नहीं सुना ! अतिथि बनके आए हुए ब्राह्मण की मदांध नव नंदों ने उपेक्षा करके जिस क्षण अवमानना की, उसी क्षण अपनी बँधी हुई काल-सर्प-सी इस अग्निशिखा को खोलकर बिखरा दिया और—‘‘जब तक नंद वंश को निर्मूल नहीं कर दूँगा तब तक शिखाम् न बध्नामि’’ ऐसी प्रतिज्ञा की थी न—पाटलिपुत्र के नंद भवन में एक गड़गड़ाहट सी गूँज गई मेरी शपथ और सुदूर मगध के लोगों को अपने तूर्यनाद से हिलाकर रख दिया। इसके पश्चात् एक वर्ष के भीतर ही सम्पूर्ण नंद वंश का नाश करके अपनी प्रतिज्ञा को भी पूर्ण कर चुका। मौर्य चंद्रगुप्त को—नंद जैसे मात्र राजा नहीं महासम्राट के रूप में स्थापित कर चुका है। अब चूँकि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी है, इसीलिए हमें अपने आश्रय को—अपने अध्यात्म को लौट जाने का समय....।
लेकिन...

मेरी यह व्यक्तिगत प्रतिज्ञा पूर्ति एक बृहद् प्रपंच-क्रिया के उपक्रम के रूप में घटित हुई है—ऐसा मुझे धीरे-धीरे आभास होने लगा है। नंदों के वंश कलह जैसे अल्पबीज से आरंभ होकर अंत में मगध साम्राज्य के निर्माण में समाप्त हो रही है। आर्यावर्त की इस महत् अर्थ-प्रक्रिया में मुझे अयाचित मिले हुए पात्र को निर्वाह करना ही है। पितृ-परंपरा को भी, गुरु-परंपरा को भी निभाते हुए मैं अपने पात्र का तीव्र श्रद्धा और उतनी ही तीव्र निर्लिप्तता के साथ निर्वाह कर चुका हूँ। भारतवर्ष में आज मनुकुल का अपार वर्धन हो चुका है। जो गंगा-भूमि बीहड़ जंगलों से दुर्गम थी, वह आज कृषि से समृद्ध है। जहाँ-जहाँ हल ने छेदन किया, वहाँ धरती रोमांचित होकर हरी-भरी हो आई। भूगर्भों ने खंडों को खोलकर अपनी खनिज संपत्ति को उघाड़कर रख दिया है। एक और इस उपलब्ध संपत्ति के निर्वहरण हेतु और दूसरी ओर, अभी-अभी आरंभ हुए यवन साम्राज्य के भीषण आक्रमणों को रोकने के लिए—हमारी प्राचीन राज्य-व्यवस्थाओं से ज्यादा एक सुदृढ़ साम्राज्य व्यवस्था आर्यावर्त में सर्वप्रथम आकार ले रही है। पश्चिम में सिंधु के पर्वत असंख्य छोटे-छोटे राज्य अपने-आप मगध साम्राज्य में लीन हो रहे हैं—यह प्रपंचीकरण जब तक एक निश्चित स्थिति तक नहीं पहुँचता, तब तक मुझे छुटकारा कहाँ है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि—मगध-महा-साम्राज्य को आगे भी सुरक्षित रखने वाला एक ही धृतिमान पुरुष मेरी दृष्टि में है। नवनंदों का अमात्व होकर जो अमात्य राक्षस के नाम से प्रसिद्ध है, वह नंद वंश के निर्मूल हो जाने के पश्चात् अभी भी पुरानी स्वामिभक्ति पर ही दृढ़ है और चन्द्रगुप्त के साम्रज्य से वैर साधता रहता है। नंदों के विनाश के पश्चात् वह पाटलिपुत्र को छोड़कर कहीं दूर से अपनी कूटनीतियों का क्रियान्वयन कर रहा है। अब, उसके कूट तंत्रों के प्रतितंत्रों से निष्फल करके, अंत में उसको मगध के शक्ति केंद्र के लिए हथियाना है... साम्राज्य माने संग्रह ही है।
अस्तु।
यद्यपि मौर्य चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक हो चुका है लेकिन अभी तक उसका नंद भवन में प्रवेश नहीं हुआ। परंपरा से ही जो मगध के शक्ति केंद्र के रूप में जाना जाता है ऐसे नंद भवन में प्रवेश करके वहाँ के शक्ति सिंहासन पर उसे प्रतिष्ठित होना है। प्रवेशोत्सव के लिए आज ही शुभ अवसर है, यह निश्चय कर लिया गया है...(मुड़कर) हे वत्स वारुणि....

(वारुणि नाम का शिष्य प्रवेश करके नमस्कार करता है।)

वत्स, हम अभी अनुष्ठान के लिए चल रहे हैं। प्रवेशोत्सव में कुछ विलम्ब से भाग लेंगे—ऐसी सम्राट् से अभ्यर्थना कर देना।
वारुणि : आज्ञां वितोस्मि। (बाहर चला जाता है।)

(चाणक्य पात्रधारी निम्नलिखित का वाचन करता है वा गाता है।)

दूसरा दृश्य


(नंद भवन का मुख्य द्वार। मंगल वाद्य, वेद-घोष और तुरही नाद के साथ जुलूस का आगमन। चंद्रदेव मौर्य जय-जय, सम्राट चंद्रगुप्त जय-जय आदि के जयघोष। राजा चंद्रगुप्त के वेश व अलंकार से शोभित वैरोचक जुलूस के सामने है। जुलूस के आगे चलने पर वैरोचक के मुख्य द्वार के सामने पहुँचते ही मुख्य द्वार ढह जाता है। जुलूस तितर-बितर हो जाता है। लोग भागने लगते हैं। कोलाहल।
‘अरे’ ‘हाय’ ‘अनाहूत’ ‘शत्रुपक्ष-शत्रुपक्ष’ ‘सेनाध्यक्ष कहाँ हैं’ ‘दंडाधिकारी कहाँ हैं’—आदि-आदि का शोर।

...धीरे-धीरे मंच के पीछे का हिस्सा धुँधला हो जाता है और मंचाग्र के एक हिस्से पर रोशनी पड़ती है। दो अधिकारी रौब-दाब से आते हैं।)
एक : सीधे महाप्रभु के ऊपर ही द्वार ढह गया। उनके शरीर को चूर-चूर होते मैंने स्वयं देखा था। उसी क्षण महल के भट्ट लोग भागे-भागे आए। जाने क्या हुआ पता नहीं।
दूसरा : आखिरकार अमात्य राक्षस ने अपनी शत्रुता को साध ही लिया।
एक : मुझे पक्का संदेह है कि...वहाँ कई बटुकों को मैंने भीड़ में ताक-झाँक करके देखा, इसका मतलब—मतलब हमारे अमात्य चाणक्य ही कुछ (इधर-उधर देखकर बात को निगल जाता है। एक-दूसरे को आपस में देखकर प्रस्थान करते हैं।)

(अनंतर एक और हिस्से पर रोशनी पड़ती है। वहाँ सेनाधिकारी रहस्यसंभाषण कर रहे हैं।)

एक : अमात्य राक्षस अमात्य चाणक्य दोनों भले ही शत्रु हैं लेकिन मूलतः दोनों एक ही हैं। दोनों ब्राह्मण हैं।
दूसरा : ब्राह्मण के हाथ में राज्य आने से क्या होता है—दोनों ही इस बात का प्रमाण दे चुके हैं।
तीसरा : अगर मंत्र-तंत्र से ही राज्य की रक्षा हो सकती तो सैन्य बल की आवश्यकता ही नहीं थी।
एक : सुनिए, अब हमारे सामने एक अवसर है, ब्राह्मण कुतंत्रों को कुचलकर भारतवर्ष में फिर एक बार क्षत्रिय तेज को स्थापित करने का।

(इस टोली के बात करते-करते प्रस्थान के साथ एक दूसरे हिस्से पर रोशनी पड़ती है। वहाँ व्यापारियों की भीड़ जमा है।)
पहला : नष्ट होने वाले हम ही वणिक लोग। ब्राह्मणों, कृषकों, कर्मचारियों—इन सब लोगों को राज्य के उलटफेर होने से भी कुछ नहीं होता, जैसे हैं, वैसे ही रहते। अधिकारियों को शायद ज्यादा-से-ज्यादा अवसर हैं। बदनाम होने वाले हम, वितरण से हम लोगों को जीवित रखते हैं, यह उसी का प्रतिफलन है।
दूसरा : अमात्य राक्षस हमारे शत्रु तो नहीं हैं। हम सब लोगों को एकत्रित होकर उनका समर्थन करके ही जीवित रहना चाहिए।

तीसरा : देखिए, चाणक्य ने राज्य में व्यापारी वर्ग को सर्वोच्च स्थान दिया है। उनसे हमारा बड़ा उपकार हुआ है। हमें कृतघ्न नहीं होना चाहिए।
चौथा : राज्यतंत्र में उन्होंने हमें ऊपर उठाकर हमारा इस्तेमाल कर लिया, बस इतना ही है। ये सब विश्वास के कारण नहीं है। फिर भी अब हमें किसी तरह भी जीवित रहना है।
पहला : चलिए, व्यापारी-सभा को बुलाकर निश्चय कर लेते हैं।
(व्यापारी लोगों की भीड़ का प्रस्थान। शोर के बीच में ही मंच के पिछले हिस्से में मुख्य द्वार को खड़ा कर दिया जाता है। उसी क्षण मंगल वाद्य और वेद-घोष सुनाई पड़ते हैं। राजा चंद्रगुप्त सपरिवार जुलूस में आ रहे हैं।)
वैतालिकों की घोषणा

‘‘जय-जय महाप्रभु राजाधिराज’’
‘‘राजेन्द्र श्रीमन् महाराजः विजयी भवः...
श्रीमन् महासन्निधान् सुमंगली मुरादेवी
रत्नगर्भ संजातः सावधान...
सुधांशु श्री चंद्रानवय कुरु वंशावधि
चंद्र राजेंद्र सावधान....
नूतन वर वीर महामौर्य वंश संस्थापक
सावधान :
नंदकुल निविड़वन दावानल सावधान...
श्रीमन् मगधमहासाम्राज्य निरूपक निरुयापक
निर्वाहक राजब्रह्म सावधान...
श्रीमन् महाराजाधिराज राजेंद्र श्रीमत्
चंद्रदेव महाप्रभु विजयी भव...विजयी भव...आदि...आदि...

(जुलूस में आए चंद्रगुप्त पुनर्निर्मित द्वार से प्रवेश करके खड़े होते हैं। वाद्य, उद्घोषणा, जयकार। ठीक उसी समय पर चाणक्य प्रवेश करता है और वेदोक्त राजा आशीर्वादपूर्वक चंद्रगुप्त के ऊपर अक्षत फेंकता है।)
चाणक्य : ध्रुव ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः
ध्रुव ते इंद्राश्चग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवं।

(विप्रो का वेद घोष, मंगलवाद्य, जयकार दुंदभि नाद। अंधकार।)

तीसरा दृश्य


(चाणक्य का कुटीर। अंतरंग कक्ष।)


चाणक्य : जो हुआ, बस उतना ही—।
यहाँ से पूर्व दिशा में पर्वतक नामक एक विधर्मी राजा था। नंद-दमन काल में उसने हमारी सहायता की थी। इसके लिए हम उस मगध का आधा राज्य देंगे, ऐसा हमने वचन दिया था। नंद विनाश के पश्चात् उसे यहाँ बुलाकर हमने उसका सम्मान किया था। उसी समय चंद्रगुप्त को संहार करने के लिए रहस्यतंत्र बुन रहा था अमात्य राक्षस—राजा के पास उपहार स्वरूप एक सुन्दर कन्या को भेज दिया। ऐसे आए उपहार को हमारे आदरणीय अतिथि पर्वतक को सौंप देना शिष्टाचार होगा, ऐसा हमने सूचित कर दिया। चंद्र गुप्त ने हमारे सुझाव को मानकर वैसा ही किया। आश्चर्य ! उस कन्या के संसर्ग मात्र से स्त्री-लंपट पर्वतक की मृत्यु हो गई अर्थात् वह कन्या, चंद्रगुप्त के संहार के लिए अमात्य राक्षस द्वारा भेजी गई विष कन्या थी। पर्वतक तो चला गया लेकिन हमारा दिया गया वचन तो रहना चाहिए न...उसके पुत्र मलयकेतु को आमंत्रण भेज दिया हमने। वह भय से मुँह छिपाए बैठा है कहीं। और कोई चारा नहीं था, इसलिए पर्वतक के सहोदर वैरोचक को यहाँ बुलवाया।

उसी समय चंद्रगुप्त के नंद भवन प्रवेश का निश्चय भी हुआ था, नंद भवन में ही वैरोचक को आधा राज्य देकर उसका पट्टाभिषेक देने का निश्चय भी हमने कर लिया था। ऐसा कुछ निर्धारण करने के अंतिम क्षणों में ही निश्चय हमारे मस्तिष्क में कौंधा था, इसलिए किसी को कुछ पता नहीं चला। उस दिन, चंद्रगुप्त से पहले ही वैरोचक को राजजुलूस के साथ नंदभवन में लाया गया था। दुर्भाग्य, उसके प्रवेश-द्वार में पैर रखते ही पूरा द्वार ढह गया। वह बलि हो गया। पूछताछ करने पर पता चला कि दारूवर्म नामक महल को शिल्पी ने अमात्य राक्षस के प्रलोभन में फँसकर चंद्रगुप्त के संहार के लिए इस कपट द्वार का निर्माण किया था। वैरोचक का जुलूस अनपेक्षित था और वह स्वयं चंद्रगुप्त के दिए हुए राजवस्त्राभूषणों से अलंकृत था—इस कारण दारूवर्म को उसी में चंद्रगुप्त का भ्रम हो गया। अकारण ही वैरोचक का हनन हुआ। तात्पर्य यह कि दिन-प्रतिदिन पश्चिमोभिमुख विस्तार पा रहा है जो हमारा मगध साम्राज्य, पूर्व में टुकड़े-टुकड़े होने से बच गया।...
वत्स...
वारुणि : (प्रवेश करके खड़ा होता है।)
चाणक्य : क्या हो रहा है बाहर ?
वारुणि : दंडाधिकारियों ने समाचार भेजा है कि...वैरोचक की षड़्यंत्र से हत्या के अपराध के लिए शिल्पी दारूवर्म को सूली पर चढ़ाया गया।
चाणक्य : ठीक है, जाओ।

(वारुणि चला जाता है)

विषकन्या प्रसंग के पश्चात् पाटलिपुत्र से अमात्य राक्षस ने पलायन करके, मलयकेतु का ही आश्रय लेकर मगध से वैर साध रहा है। अस्तु।
(कुटीर का बहिरंग कक्ष। शिष्य के अंतरंग कक्ष से बाहर आने पर, छद्मवेश में निपुणक यम का चित्र लिए गाना गाते हुए आता है।)
निपुणक : (गाना)
नहीं है भगवन् नहीं है भगवन् नहीं भगवन्
एक मात्र यम ही स्वामी है सारे लोक का जान ।।
ओह, इस घर के भीतर प्रवेश करता हूँ।
वारुणि : भइया, यहाँ प्रवेश नहीं हो सकता।
निपुणक : क्यों ? यह किसका घर है ?
वारुणि : यह महोपाध्याय चाणक्य का कुटीर है।
निपुणक : अच्छा हुआ। भीतर जाकर धर्मोपदेश करूँगा—यमधर्मोपदेश।
वारुणि : मूर्ख, हमारे आचार्यपाद सर्वज्ञ हैं, उन्हें तुम क्या उपदेश करोगे ?
निपुणक : सर्वज्ञ क्या ? उन्हें क्या-क्या पता है ?
वारुणि : सबकुछ पता है। चतुर्वेद, चतुर्विंशति उपनिषद, अष्टादश पुराण—सब जानते हैं। समस्त शास्त्र उनके लिए करतलामलक हैं।
निपुणक : ठीक है, उन्हें अष्टादश पुराण पता हैं, ऐसा बताया न। मेरे पास चांद्र पुराण नाम का उन्नीसवाँ पुराण है। उसका ही उपदेश करूँगा। भीतर जाकर बताओ।

(अंतरंग कक्ष।)

चाणक्य : (कान देकर) वत्स....
(शिष्य अंदर आता है।) इस पुराणिक का आना अच्छा ही हुआ। उसे भीतर आने दो। राजकार्यों में मन व्यग्र हुआ है। थोड़ी देर उसके साथ धर्म जिज्ञासा करता हूँ। तुम बाहर रहो। किसी को भी भीतर मत आने देना।
(शिष्य सिर झुकाकर बाहर चला जाता है। अनंतर छद्मवेश वाला निपुणक भीतर प्रवेश करता है।)
निपुणक : अभिवादन करता हूँ।
चाणक्य : निपुणक, जो कुछ भी एकत्र किया है, वह वत्तांत सुनाओ।
निपुणक : राज्य में आम तौर पर हर जगह प्रभु चंद्रदेव के शासन में विश्वास और गौरव पैदा हो रहा है। असंतोष तो कहीं भी नहीं दिख रहा।
चाणक्य : ठीक।
निपुणक : विशेष यह है कि इस पाटलिपुत्र नगर में ही शत्रु पक्ष के तीन लोग दीख पड़े जो अभी भी वहीं हैं।
चाणक्य : बताओ।

निपुणक : पहला, जीवसिद्धि नाम का क्षपणक। अमात्य राक्षस के आदेश को ग्रहण करके विषकन्या को लानेवाला और पर्वतक की मृत्यु का कारण बनने वाला वही था।
चाणक्य : ऐसा ? तो भी विषकन्या को भेजकर पर्वतक राजा की हत्या करने वाले हम ही हैं, ऐसा लोगों से कहते सुना है ?
निपुणक : मेरे सामने ऐसी कोई बात नहीं आई।
चाणक्य : अच्छा है। दूसरा ?
निपुणक : दूसरा राक्षस का एक और स्नेही कायस्थ शकटदास।
चाणक्य : वह वर्णिक ?
निपुणक : जी हाँ। उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है फिर भी शत्रु पक्ष का होने के कारण महत्त्वपूर्ण मानना पड़ेगा।
चाणक्य : तीसरा ?
निपुणक : अमात्य राक्षस जिसे अपना द्वितीयं से हृदयं दूसरा कहते हैं। जो उनके इतना निकट है, वह नगर में रत्नों का जौहरी चंदनदास। अमात्य इस नगर को छोड़ने के समय अपनी पत्नी व पुत्र को उसी के पास छोड़कर गए हैं। मैं स्वयं देखकर तय कर चुका हूँ कि यह सच है। इसके अलावा और एक काम करके आया हूँ।
चाणक्य : बताओ।

निपुणक : अमात्य राक्षस की मुद्रा अँगूठी को हथियाने के विषय में आचार्यपाद पहले ही सूचित कर चुके थे। वह अँगूठी अमात्य की पत्नी की उँगली में है, इस बात का मैंने पता चलाया। उसके बाद, अच्छा-सा अवसर ढूँढ़कर, एक मनिहारिन को वहाँ भेज के, चूड़ियाँ पहनाने के प्रसंग में उँगली से उसको पता चले बिना अँगूठी को खिसका के मँगवा लिया...(अँगूठी बाहर निकालकर) ये लीजिए, वह मुद्रा अँगूठी।
चाणक्य : जैसे काम किया, वह प्रशंसनीय है। तुम्हें पारितोषिक दिलवाता हूँ...अब तुम जा सकते हो।
निपुणक : जो आज्ञा। (बाहर जाता है।)
चाणक्य : हमारे मित्र इंदुशर्म के चातुर्य के क्या कहने। वह अब सचमुच में जीवसिद्धि क्षपणक ही बन चुका है। यह बात निपुणक को पता थी या नहीं मुझे इस विषय में संदेह था। अब उसका परिहार हो गया है। वह हमारा व्यक्ति है, यह बात हमारे लोगों को भी पता नहीं चलनी चाहिए।
(मुद्रा अँगूठी को देखकर, उँगली में डालते-डालते) निपुणक से महत् साधन हुआ। अब अमात्य रक्षस मेरी उँगली में फँस गया। (अपने लिखे हुए को देखते-देखते) अब मलयकेतु को बाँध कर गिराने के लिए यह शब्दों की सर्पिणी शायद समर्थ होनी चाहिए।

(वारुणि प्रवेश करता है।)

वारुणि : सिद्धार्थक !
चाणक्य : भेजो। और जौहरी चंदनदास को शीघ्र आकर मिलने के आदेश जारी कर दो।
(वारुणि जाता है। सिद्धार्थक आता है।)
सिद्धार्थक : पूज्य का अभिवादन करता है।
चाणक्य : (लिखे हुए पत्र को उसे थमाते हुए) सिद्धार्थक, यह पत्र ले लो। देखो क्षोत्रीय की हस्तलिपि है, पढ़ी भी नहीं जा रही है। इसलिए इस पत्र को कायस्थ शकटदास के पास ले जाओ और इसकी प्रति करवा ले आओ। उसका सुलेख स्पष्ट होता है। ‘‘एक व्यक्ति जो विद्वान नहीं है, उसे यह पत्र भेजा जाना है। इसलिए स्पष्ट अक्षरों में इसकी प्रति होनी चाहिए।’’ ऐसे शकटदास से कहना। लिखवाकर सीधे यहीं आ जाओ। इसमें कहीं भी चाणक्य का नाम नहीं आना चाहिए—यह चेतावनी है।
सिद्धार्थक : जो आज्ञा। (जाता है।)




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