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भारत की लोक कथा निधि - भाग 1

शंकर

प्रकाशक : सी.बी.टी. प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1998
आईएसबीएन : 81-7011-053-x पृष्ठ :105
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 465

ज्ञानवर्धक और रोचक कहानियों का संग्रह

Bharat Ki Lok Katha Nidhi Part-1 - A hindi Book by - Shankar भारत की लोक कथा निधि भाग-1 - शंकर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तावना

हमारी मातृभूमि, जिसे हम भारत माता भी कहते हैं, एक दादी की तरह हैं। बहुत बूढ़ी और उतनी ही समझदार। उन्हें सैकड़ों कहानियां आती हैं। हमारी दादी कहती हैं कि बड़ी-बड़ी पोथियां सबके काम की नहीं होतीं। लेकिन उन पोथियों में जो अक्लमंदी की बातें हैं वे कहानियों की मदद से जल्दी समझ में आ जाती हैं।
ऐसी कहानियों को लोककथा कहते हैं। ये इतनी पुरानी कथाएं हैं कि कोई भी नहीं बता सकता कि उन्हें पहले-पहल किसने कहा होगा। लोक कथाएं एक कान से दूसरे कान में, एक देश से दूसरे देश में जाती रहती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने पर इन कथाओं का रूपरंग भी बदलता जाता है। एक ही कहानी अलग-अलग जगहों में अलग-अलग ढंग से कही-सुनी जाती है। इस तरह लोक कथाएं हमेशा नई बनी रहती हैं।

भारत में दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा लोक कथाएं हैं। इनमें से बहुत सी कथाएं एक मोटी पोथी में जमा की गई हैं। उस पोथी का नाम है, कथा-सरित्सागर। ‘कथाओं की नदियों से बना हुआ सागर’!
अच्छी कथाएं मूल्यवान वस्तुओं की तरह होती हैं और मूल्यवान वस्तुओं को सुरक्षित जगह पर ही रखा जाता है। ऐसी सुरक्षित जगह "निधि" कहलाती है। इसलिए अच्छी-अच्छी कथाओं की पुस्तक भी एक प्रकार की निधि है। प्रस्तुत पुस्तक ‘भारत की लोक कथा निधि’ का पहला भाग है।


हिमशुक


बहुत समय पहले अवध में एक राजा राज्य करता था। उसके तीन लड़के थे। तीनों बहुत पढ़े-लिखे, बुद्धिमान और गुणी थे।
एक दिन राजा ने अपने तीनों राजकुमारों को परीक्षा लेने के लिए बुलाया। वह यह जानना चाहता था कि किसी दोषी को सजा देने के मामले में उन तीनों के क्या विचार हैं।
‘‘मान लो,’’ उसने कहा, ‘‘अगर मैं अपने जीवन और सम्मान की रक्षा की जिम्मेदारी किसी को सौंप दूँ और वह विश्वासघाती निकले तो उसे क्या सजा दी जानी चाहिए ?’’
सबसे बड़े लड़के ने कहा, ‘‘ऐसे आदमी की गर्दन फौरन धड़ से अलग कर देनी चाहिए।’’
दूसरे लड़के ने कहा, ‘‘मेरा भी यही विचार है। ऐसे आदमी को मृत्युदंड ही मिलना चाहिए। उसके साथ किसी किसी तरह की दया-माया नहीं दिखायी जानी चाहिए।’’

तीसरा लड़का चुप बैठा रहा।
‘‘क्या बात है, मेरे बेटे ?’’ राजा ने उससे पूछा, ‘‘तुम कुछ नहीं बोले, तुम्हारा क्या विचार है ?’’
‘‘महाराज,’’ छोटे राजकुमार ने कहा, ‘‘यह सच है कि ऐसे कुसूर की सजा मौत के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन सजा देने से पहले ये बात साफ-साफ और पूरी तरह से साबित हो जानी चाहिए कि वह सचमुच ही दोषी है।’’
‘‘यानी, तुम्हारे विचार से ऐसा न किया गया तो निर्दोष आदमी भी मारा जा सकता है।’’ राजा ने पूछा।
‘‘हां,’’ राजकुमार ने जवाब दिया, ‘‘ऐसा हो सकता है। उदाहरण के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं।’’
ऐसा कहकर राजकुमार ने यह कहानी सुनायी।
विदर्भ देश के राजा के पास एक अनोखा तोता था। उस तोते का नाम हिमशुक था। वह महल में पालतू पक्षी की तरह रहता था। हिमशुक बड़ा चतुर था। वह कई भाषाओं में बात कर सकता था। बुद्धिमान इतना था कि अक्सर राजा भी महत्वपूर्ण मामलों में उसकी राय लिया करता था।

हिमशुक पिंजड़े में नहीं रहता था। वह अपनी इच्छा के अनुसार आजादी से घूमता रहता था। एक दिन सवेरे वह महल से उड़कर जंगल की ओर निकल गया। वहां संयोग से उसकी भेंट अपने पिता से हो गयी।
‘‘तुमसे मिलकर मैं कितना प्रसन्न हुआ हूं,’’ उसके पिता ने कहा, ‘‘तुम्हारी मां भी तुमसे मिलकर इतनी ही प्रसन्न होगी। क्या तुम दो-चार दिन के लिए घर नहीं आ सकते ?’’
‘‘घर आने की तो मुझे भी बड़ी इच्छा थी,’’ हिमशुक ने कहा, ‘‘मगर इसके लिए मुझे राजा से अनुमति लेनी पड़ेगी।’’
महल वापस आकर हिमशुक ने राजा से घर जाने की आज्ञा मांगी। शुरू में तो राजा उसे जाने देने के लिए राजी नहीं हुआ। वह हिमशुक को बहुत मानता था और अपने से अलग नहीं करना चाहता था। पर अन्त में वह मान गया। उसने हिमशुक को घर जाने की अनुमति दे ही दी।
‘‘तुम घर जाकर अपने मां-बाप के साथ कुछ दिन बिता सकते हो,’’ राजा ने हिमशुक से कहा, ‘‘लेकिन जितनी जल्दी हो सके लौट आना।’’

‘‘बहुत अच्छा महाराज,’’ हिमशुक ने खुश होकर कहा, ‘‘मैं पन्द्रह दिन बाद वापस आ जाऊंगा।’’
इसके बाद हिमशुक अपने पिता के पास गया और वे दोनों, साथ-साथ उड़ते हुए, घर की ओर रवाना हुए। इतने वर्षों बाद अपने प्यारे बेटे हिमशुक को देखकर उसकी मां बहुत खुश हुई।
एक पखवाड़े तक अपने मां-बाप के साथ रहने के बाद हिमशुक ने उनसे कहा, ‘‘मेरे ये दिन अपने प्रियजनों के साथ बड़े ही सुख से बीते हैं, मगर अब मुझे जाना होगा। राजा मेरी राह देख रहे होंगे।’’
हिमशुक के मां-बाप उसके इतनी जल्दी जाने की बात सुनकर उदास हो गये। परन्तु वे उसे रोक नहीं सके। हिमशुक ने राजा से वादा किया था कि वह पन्द्रह दिन के बाद लौट आयेगा।
‘‘हम राजा के लिए कोई उपहार भिजवाना चाहते हैं,’’ हिमशुक के पिता ने कहा, ‘‘लेकिन समझ में नहीं आता कि कौन सी चीज भिजवायें।’’

हिमशुक के माता और पिता दोनों ही इस बात पर विचार करने लगे कि राजा को देने लायक उपहार क्या हो सकता है ? कुछ देर सोचने के बाद हिमशुक के पिता ने कहा, ‘‘अहा, मैं समझ गया कि राजा के लिए सबसे अच्छा उपहार क्या हो सकता है। यहां से दूर एक पहाड़ी पर अमरफल का पेड़ है। जो कोई उसका फल खा लेता है वह कभी नहीं मरता और हमेशा जवान रहता है। मैं वहां जाकर वह तोड़ लाता हूं। तुम वह फल राजा को दे देना।’’
इतना कहकर हिमशुक का पिता उड़ा और कुछ समय बाद जादुई अमरफल लेकर लौट आया। उसने वह फल हिमशुक को दे दिया।

फल लेकर जब हिमशुक राजा के महल की ओर रवाना हुआ तो शाम हो चली थी। थोड़ी ही देर में सूरज डूब गया और चारों ओर रात का घना अन्धकार छा गया। हिमशुक ने किसी पेड़ की डाल पर बैठकर रात काटने का इरादा किया। मगर इससे पहले वह उस कीमती फल को किसी सुरक्षित स्थान में रखना चाहता था।

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