इसी मिट्टी से - कुसुमाग्रज Isi Mitti Se - Hindi book by - kusumagraj
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इसी मिट्टी से

कुसुमाग्रज

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
आईएसबीएन : 81-263-0946-6 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :143 पुस्तक क्रमांक : 4591

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समसामयिक मराठी साहित्य-जगत में सर्वाधिक प्रतिष्ठित कुसुमाग्रज की स्वयं चुनी हुई कुछ कविताएँ

Isi Mitti Se

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वर्ष 1987 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित वि.वा. शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ समसामयिक मराठी साहित्य-जगत में सर्वाधिक प्रतिष्ठित हैं।
विभिन्न साहित्यिक विधाओं को महत्त्वपूर्ण योगदान करते हुए भी ‘कुसुमाग्रज’ मूलतः कवि और नाटककार हैं। 1933 में प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘जीवन लहरी’ से लेकर 1984 में प्रकाशित ‘मुक्तायन’ तक की उनकी काव्य-यात्रा अत्याधिक भव्य रही है। ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के वर्ष (1942) में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह ‘विशाखा’ को रातों-रात जो प्रसिद्धि मिली उससे पूरा मराठी-जगत आश्चर्यचकित हो उठा था।
प्रकृति और प्रेम के ऐन्द्रिक पक्षों के सूक्ष्म उद्घाटन के साथ-साथ कुसुमाग्रज की कविता में सामाजिक जीवन में अन्याय,विषमता और क्रूरता से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व के चित्रण में उनके चिन्तन की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है। वे ‘मानवता’ से अधिक ‘मनुष्यता’ के पक्षधर रहे। उनका काव्य एक प्रकार से प्रेम तथा ‘साधारण’ की ‘असाधारणता’ का जयघोष है।
प्रस्तुत काव्य-संकलन ‘इसी मिट्टी से’ के लिए कुसुमाग्रज ने कविताएँ स्वयं चुनी और हिन्दी पाठकों के लिए मराठी के उत्कृष्ट रचनाकारों और साहित्यमर्मज्ञों ने उन्हें रूपान्तरित किया।

अनुवादक का मनोगत


मराठी के वरेण्य कवि कुसुमाग्रज की कविता का इतनी प्रचुर मात्रा में अनुवाद करने में मुझे हाथ बंटाना होगा, ऐसा मैंने कभी सोचा नहीं था। अनुवाद सामान्यतः मैं अनिच्छा से और विवशता में ही करता हूं। लेकिन कुसुमाग्रज की कविता का अनुवाद करने में संकोच का कारण अनुवाद संबंधी मेरी अनिच्छा नहीं थी। कुसुमाग्रज की प्रभावपूर्ण और मराठी भाषा के ख़ास वैशिष्ट्यों से सम्पन्न और समृद्ध कविता का अनुवाद लगभग असंभव है ऐसा ही मन में हमेशा लगता रहा। कुसुमाग्रज की काव्य-भाषा के सूक्ष्म सौंदर्य और एक ख़ास तरह की पृथगात्मता से मैं एक सीमा तक अवगत था। उनकी कविता में छंद, लय अनुप्रास, प्रतीक, बिंब, शब्दों का सह संयोजन शब्दों की ध्वनियों से अर्थ की ध्वनियों को सूचित करने की क्षमता, ख़ास मराठी वातावरण के शब्दों का प्रयोग, बोली के शब्दों का काव्यात्मक उपयोजन इत्यादि का जो सौंदर्य भरा पड़ा है उसे देखते हुए इलियट की इस उक्ति कि कविता एक ही भाषा में लिखी जा सकती है’, का सत्य ठोस रूप में प्रमाणित होता है।

फिर भी अनुवाद का यह कार्य मैंने स्वीकार किया। एक तो मेरे साथ मेरे अभिन्न मित्र प्रो. शंकर वैद्य का सहयोग था। दूसरे मराठी के वैभव को हिन्दी में ले चलने में सहायक होने का विलक्षण हर्ष भी था। शंकर वैद्य मराठी के बहुत अच्छे कवि और समीक्षक हैं। ख़ास कर उनके कविता के सूक्ष्म अध्ययन एवं भाषा पर असाधारण अधिकार का मैं सदैव कायल रहा हूं। हम दोनों की लगभग पांच सात घंटों की तीस बैठकें हुईं और उसकी यह निष्पत्ति सामने है।
एक अद्भुत परिवर्तन मैंने अपने में अनुवाद किया। मैं कविता, के अनुवाद को मुश्किल से तैयार होता था। कविता अगर छंद में लिखी हो तो उसके आसपास भी मैं फटकता नहीं था। परंतु अनुवाद कार्य पूर्ण होते होते मैंने पाया कि एक विलक्षण आत्मविश्वास मुझ में पैदा हुआ है। यही नहीं, अनुवाद के पहले रूप के बाद उस पर काम करते हुए एक विलक्षण थ्रिल मैंने अनुभव किया। इसका सारा श्रेय प्रो. शंकर वैद्य को जाता है।

अन्य अनुवादकों के द्वारा किए गये अनुवादों पर हम दोनों ने बैठकर परस्पर विचार विनिमय से उनको संशोधित किया। मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि लगभग सभी कविताओं के अनुवाद अंतिम रूप तक आमूलचूल बदल गये हैं। प्रो. शंकर वैद्य ने मूल कविता के अर्थ की सूक्ष्म से सूक्ष्म छटा को भी पकड़ने का और उसे अनुवाद के रूप में यथावत रखने का आग्रह किया। छंद भी वही रखा। इससे हिन्दी के उच्चारण में जो थोड़ी बहुत छूट कहीं लेनी पड़ती है वह हमने स्वीकार की। कुसुमाग्रज की कविता में तुकों की अद्भुत निधि जो सहज, अनायास रूप में विद्यमान है, उसको हम हिन्दी में उस रूप में नहीं ले पाये। प्रो. शंकर वैद्य ने केवल इतनी ही छूट दी थी।
कुल मिलाकर अनुवाद प्रक्रिया में और अनुवाद कार्य समाप्त होते समय मुझे अद्भुत आनंद मिला है और मैं निस्संकोच भाव से कहूंगा कि मेरी योग्यता में भी कुछ वृद्धि हुई है।
कुसुमाग्रजजी के प्रति इस अनुवाद कार्य में अगर कहीं अन्याय हो गया हो तो अब केवल क्षमायाचना का ही अवलम्ब है।

-चंद्रकांत बांदिवडेकर

प्रस्तावना


मराठी काव्य की पिछले आठ सौ वर्षों की उज्जवल परंपरा है। आद्य कवि मुकुंद राज से प्रारंभ होकर, संत ज्ञानेश्वर, नामदेव के कृतित्व से उत्कर्ष पाकर विविध रीतियों एवं प्रकारों से विकसित होती हुई वह परंपरा आज बड़े गौरवमय रूप में प्रवहमान है। ज्ञानेश्वर, नामदेव से लेकर अनेक संत, पंडित, कवियों ने तथा शाहीरों ने अपने काव्य से इस परंपरा को समृद्ध किया और उसके बाद अंग्रेज़ी शासन के युग में कविश्रेष्ठ केशवसुत की कविता से उसका अलग प्रकार से विकास होना शुरू हुआ। पिछले सौ वर्षों में मराठी में अपनी ख़ास निजी पद्धति से लिखने वाले, मराठी, कविता को आशय एवं कला की दृष्टि से नानाविध दिशा देनेवाले एवं अपनी परंपरा और अपना युग निर्मित करने वाले जो कवि हुए उनमें कविश्रेष्ठ कुसुमाग्रज के नाम का बड़े गौरव के साथ उल्लेख किया जाता है।

कुसुमाग्रज के प्रथम काव्य-संग्रह ‘जीवन लहरी’ 1993 ने अपनी निजी विशिष्टता के कारण रसिकों का ध्यान आकर्षित किया। उसके बाद ‘विशाखा’ काव्य संग्रह ने मराठी कविता के क्षेत्र में एक नये इतिहास का अध्याय ही खोल दिया और कुसुमाग्रज का गौरवशाली स्थान मराठी में दृढ़ किया। ‘विशाखा’ कविता-संग्रह की दस से अधिक आवृत्तियां हो चुकी हैं, इसी से उसकी लोकप्रियता एवं उसका महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। अब तक कुसुमाग्रज के अनेक काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ‘जीवन लहरी’ (1993), ‘विशाखा’ (1942), ‘समिधा’ (1947), ‘किनारा’ (1952), ‘मराठी माती’ (1960), ‘स्वगत’ (1962), ‘हिमरेषा’ (1964), ‘वादलवेल’ (1969), ‘छंदोमयी’ (1982), तथा ‘मुक्तायन’ (1984)। उनकी चुनी हुई कविताओं का संग्रह ‘रसयात्रा’ (1969) में प्रकाशित हुआ है। इसके अलावा कालिदास के मेघदूत का कुसुमाग्रज का किया हुआ रुपांतर (1956) एवं बाल कविताओं का छोटा संग्रह ‘जाईचा कुंज’ (1936) भी प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त नाटक, कहानी, उपन्यास, ललित निबंध इत्यादि क्षेत्रों में उनका साहित्यिक कार्य महत्वपूर्ण है। वह कवि के रूप में जितने प्रख्यात हैं एवं रसिकों के प्रिय हैं उतने ही नाटककार के रूप में भी ख्याति प्राप्त हैं।

प्रस्तुत आलेख में मैं कुसुमाग्रजद के काव्य एवं व्यक्तित्व के वैशिष्ट्य को समझने का प्रयास करूंगा।

उनकी कविता ‘कांतीचा जयजयकार’ (गरजो जयजयकार कांति का) 1939 में प्रकाशित हुई। भारत की आज़ादी के लिए चल रहे आंदोलन के साथ कुसुमाग्रज के मन की समरसता से उत्फूर्तात में यह कविता प्रकट हुई है। यह कविता उस आंदोलन के समय के सामूहिक मन के एक अत्यंत तेजस्वी उद्गार है। दूसरा महायुद्ध पराकाष्ठा पर था। इसी समय (1942 में) भारत की आज़ादी के आंदोलन का निर्णायक पर्व प्रारंभ हो चुका था। नेताजी सुभाष चंद्र के सशस्त्र आंदोलन के परिणामस्वरूप उसमें एक लोमहर्षक नाट्य उत्पन्न हुआ था। भारत के सभी आंदोलनों को दबा देने का कार्य ब्रिटिश शासन कर रहा था। ऐसे वातावरण में ‘गरजो जयजयकार’ कविता के रूप में क्षण-क्षण नये सामर्थ्य से धारदार होने वाली अजेय और दिव्य शक्ति ही प्राप्त हुई है, ऐसा समाज मानव को लग रहा था। इस कविता ने जनता को धैर्य दिया, संकल्प-शक्ति दी, जिद् दी, उज्जवल भविष्य का आश्वासन दिया, बेडियों एवं काराग्रहों और उसके साथ आनेवाली मृत्यु का मजाक उड़ाने की क्षमता प्रदान की, अचल ध्येयनिष्ठा मन पर अंकित की और क्रांतिकारियों की व्यथाओं को प्रेम से संजोया भी। यह कविता पढ़ते समय एवं गाते समय मराठी कविता को नया तेज प्रदान करनेवाले एक प्रतिभा संपन्न कवि का उदय हुआ है, यह रसिकों को प्रतीत हुआ। कुसुमाग्रज का नाम उस समय सभी की आंखों पर इस प्रकार से झलका कि जैसे गहन अंधेरे पर बिजली के अक्षर रेखांकित हो गये हों, लेकिन कुसुमाग्रज ने केवल एक ‘कांतीचा जयजयकार’ कविता ही तो नहीं लिखी थी, ‘विशाखा’ में प्रकाशित उनकी सभी कविताओं का यही ठाठ था, जैसे नक्षत्र-मंडल ही नीचे आ गया हो। विशाखा की सामाजिक संवेदना तथा उत्कट प्रेमाभिव्यक्ति करनेवाली कविताओं ने पाठकों को इसी तरह चकित किया था।

‘कोलबंस का गर्वगीत’, ‘जलियांवाला बाग’, ‘अहि-नकुल’ ‘जाओ ज़रा पूरब की ओर’, ‘रेलगाड़ी और ज़मीन’, ‘आह्वान’ आदि कुसुमाग्रज की कविताओं ने महाराष्ट्र के सामाजिक एवं राजनीतिक क्रांति के वातावरण को प्रज्जवलित रखने में अलग-अलग प्रकार की सहायता की थी। ‘अहि नकुल’ नामक प्रतीकात्मक कविता ने सूचित किया कि तिनकों को रौंदने वाली एवं बेलों को कंपाने वाले सम्राट को मात देने वाली शक्ति उस वन में ही खड़ी रहती है। और उस सम्राट का नाश होकर उसी के रक्त में वे तिनके आनंदपूर्वक नहाते हैं। ‘रेलगाड़ी और ज़मीन’ कविता में प्रभावपूर्ण ढंग से व्यंजित किया गया कि जमीन को रौंदती जानेवाली रेलगाड़ी के टुकड़े उस पददलित जमीन के क्षोभ से ही होते हैं। ‘जलियांवाला बाग़’ के हत्याकांड का वर्णन करते हुए कुसुमाग्रज ने दृढ़तापूर्वक लिखा है-‘यह घटना शैतान की प्रभु पर मात है।’ और ‘एक और यह वार नया है यीशू तव सीने पर’ पंक्ति ने शासनकर्ताओं के अनगिनत अपराधों को उपरोध की भाषा में सूचित किया है; उसके साथ अपने दुखी मन की व्याकुलता भी उत्कट रूप में व्यक्त की है। ‘कुसुमाग्रज के कोलंबस, ने अपने सहयोगियों को धीरज प्रदान कर अपने कर्तव्य का भान कराया है और क्षुद्र जीवन का धिक्कार करते हुए उनकी अस्मिता को जागृत किया है। ‘अनंत ध्येयासक्ति हमारी अनंत है आशा। किनारा हो तुम पामरको’ कहते हुए कोलंबस ने सागर की मर्यादाओं का कठोर उपहास किया और उसी के साथ अनंत, अजेय ध्येयनिष्ठा को गर्जना के स्वरों में प्रकट किया।

यह सब करते समय कुसुमाग्रज की आंखों के सामने जो क्षितिज था उसकी व्याप्ति भारत तक सीमित नहीं थी। वह अखिल मानवता का क्षितिज था। उनका कोलंबस सात नभों के नीचे यात्रा करने वाला था। मानवता का निशान फहरे महान सागर में। जीत ले खंड-खंड सारा’, इस प्रकार की उनकी व्यापक ध्येय दृष्टि थी। दुनिया के किसी भी अत्याचार से कुसुमाग्रज दुखी होते थे इसी लिए चीन और जापान के युद्ध के अत्याचारों से वह व्यथित हुए और मन के भावनात्मक उन्मेष को उपरोध से जोड़कर उन्होंने कविता लिखी-‘जाओ जरा पूरब की ओर’।

‘विशाखा’ में प्रकट हुआ कवि का कवि-स्वभाव एवं उनकी जीवन-दृष्टि, बाद की कविताओं में अलग-अलग ढंग से सतत प्रकट होती रही। भारतीय स्वाधीनता एवं भारतीय भूमि पर होनेवाले आक्रमणों के विरोध में उनकी कविता अखंड रूप में जागृत रही। वैश्विक स्तर पर होनेवाले मानव के भयावह संसार का दुख उसने व्यक्त किया और अपने समाज जीवन की विषमता सामाजिक अन्याय, मूल्यों का विनाश करनेवाली परिस्थिति इत्यादि को कविता के माध्यम से उन्होंने प्रकट किया। दलितों के तथा सामान्य जनों के दुख से पीड़ित होनेवाले कुसुमाग्रज का मन ‘छंदोमयी’ तथा ‘मुक्तायन’ की प्रकाशित कविता में अधिक व्यापक रूप एवं तीव्रता में प्रकट हुआ है।

पहले काव्य संग्रह ‘जीवन लहरी’ की एक प्रसिद्ध रुबाई में उन्होंने लिखा था कि-रोटी के टुकड़े से समूचा स्वप्न भग्न होता है, और उस समय से लेकर आज तक गरीबों की रोटी की समस्या कुसुमाग्रज कभी नहीं भूल सके। पेट के लिए पत्थर कूटने वाली माता का रूप (‘अनुप्रास अकाल का’), पोखरे के पानी में डूब कर मरे हुए बच्चे को दूर हटा कर कूड़े पर फेंके गये अनाज के लिए दौड़ने वाली मां की भूख (‘मेरा राजहंस’), कुसुमाग्रज के मन को कुरेदती रही। इस स्थिति में फ़्रिज में सुरक्षित सेब वाले मूल्यों का उद्घोष करनेवाले समाज घटकों का उपहास करते हुए वह कहते हैं-‘जो रास्ते पर घूमता है, घूरे पर चलता है, वही मूल्य मेरे मन में सार्वभौम मेघ की तरह अटा पड़ा है।’ (मूल्य-छंदोमयी’) इस प्रकार के दृश्य जब तक समाज में हैं तब तक बंबई, दिल्ली बनारस, कलकत्ता जैसे शहर कुसुमाग्रज की दृष्टि में निरर्थक एवं घृणास्पद हैं।

 (घृणास्पद’-मुक्तायन’) दुख फिर वह किसी का भी हो कुसुमाग्रज के मन को खींच लेता है। स्त्री के दुख को एवं उसके गरिमामय कर्तृत्व को व्यक्त करते हुए वह लिखते हैं कि तुझ पर अत्याचार होने पर भी ‘केवल नभ में मेरे मन के/स्त्रीत्व रहा नभगत ज्वाला सा प्रखर तुम्हारा’ (केवल)। सूर्यपुत्र’ कविता में कर्ण की व्यथा को संदर्भ देते हुए कर्ण के मुख पर कहलवाया है-ऐसे ही कानूनों को मैं मानता हूं जिनका जन्म मानव में या/मानव-समूहों में नहीं/बल्कि रवि के प्रकाश में और पृथ्वी की ममता में हुआ है।’ इस तरह जन्मगत श्रेष्ठता के कानून को धिक्कारने वाला विचार उन्होंने कर्ण-मुख से व्यक्त किया है। इस तरह के चित्र खींचते समय टिनोपॉल संस्कृति की सुरक्षा करनेवाले सफेदपोश समाज की मनोवृत्ति का कुसुमाग्रज तीव्र उपहास करते हैं। इस समाज में ऐसे भी लोग हैं जो सोचते हैं कि देवता कुष्ठ रोगियों की बस्ती में अगर जाय तो उसे देवालय में लिया जाय अथवा नहीं (‘गर्भगृह’) कुसुमाग्रज इस प्रकार की बातों पर चिढ़ व्यक्त करते हैं। हम सब अपनी संस्कृति के उच्च एवं उदात्त होने के गीत गाते रहते हैं।

और अनेक विशेषणों से उसका वर्णन भी करते रहते हैं परंतु उस प्रत्येक विशेषण के नीचे एक एक प्रेतागार है, यह अग्निधर्मी भाषा में कुसुमाग्रज लिखते हैं (‘विशेषण’)। उच्च संस्कृति को बनाये रखने के लिए गंदी झोंपड़पट्टी को जला देना चाहिए, ऐसा कहने वालों को कुसुमाग्रज का उत्तर है-‘ये लोग कैसे जी रहे हैं इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि वे जी रहे हैं’ (‘बरयापैकी’-‘मुक्तायन’)। आज के युग में मूल्य भ्रष्टता की प्रक्रिया में भ्रष्ट राजनीति में भी अपनी ओर से योगदान किया है। महान व्यक्तियों के पुतले खड़े कर ये लोग मानो उनके संबंध में अपने कर्तव्य से मुक्त हो गये हैं। महान लोगों की महत्ता को भूलकर हमने उन्हें विशिष्ट जातियों का नेता बना दिया है। शिवाजी महाराज को हम आमदार होने के लिए टिकट देना चाहते हैं (‘शिवराया’-‘मुक्तायन’)। इसी संदर्भ में ‘आख़िरी कमाई’ के पांच पुतलों का दुख कविता के मूल में पढ़कर ही जाना जा सकता है।

इस समस्त परिस्थिति में कुसुमाग्रज के लिए सामान्य मनुष्य ही विश्राम का आधार है। भीड़ में वह कोई न भी हो तो भी उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है (‘भीड़’)। वी.टी. स्टेशन पर भीड़ में वह भले ही नगण्य हो तो भी एक परिवार का वह सूर्यनारायण है-(‘कलोजस’)। संस्कृति के व्यवहार में एक दिलासा यह भी है कि सामान्य मनुष्य को कितना ही मारा जाय, वह मरता नहीं है। वह उन्मत्त ऐश्वर्य का एवं राजमहलों का नाश कर सकता है।
तब तक इन सामान्य लोगों में ही कोई एक जवान खड़ा रहता है और घर के सारे रिश्तों को भूलकर कर्तव्य के लिए प्राणार्पण भी करता है। इन जवानों के लिए कुसुमाग्रज का मन कृतज्ञता से भर आता है। वह है इसलिए हमारा सुख सुरक्षित है। इसलिए संस्कृति का नीला चाँदवा विद्यमान है। ‘याचक’ कविता में याचक के कटोरे में अपना वैभव डाल दिया लेकिन फिर भी वह भरा नहीं। लेकिन एक भिखारिन ने अपनी छाती पीनेवाले नन्हें बच्चे को दूर रखकर अपने स्तन के दूध की दो बूंदे उसमें डाल दीं तब वह कटोरा फौरन ही भर गया। कुसुमाग्रज लिखते हैं-‘इस आधार पर ही मनुष्य की जाति आज भी जीवंत है।’ ऐसे सामान्य जनों के प्रेम के लिए बाबा आमटे अपना जीवन समाज के लिए समर्पित करते हैं इसीलिए कुसुमाग्रज उनके स्त्तोत्र गाते हैं।

‘विशाखा’ के बाद की कुसुमाग्रज की कविता में मानवता शब्द से ‘मनुष्यता’ पर बल अधिक है। ‘हम सब मानव हैं’ इस वाक्य में जो आह्वान है वह इस विचार को है कि हम सब समान है। लेकिन मनुष्यता में जो आह्वान है वह आंतरिक आर्द्रता को, समझदारी को, अंतड़ी के लगाव को ही है। इसी भावना की एक किनार प्रेम की है। उसी को कुसुमाग्रज ‘प्रेमयोग’ कहते हैं। प्रेम मनुष्य की संस्कृति का सारांश है, इतिहास का निष्कर्ष है और भविष्य के अभ्युदय की एकमात्र आशा है।’ ‘प्रेमयोग’ एक जीवनदृष्टि है। जब कुसुमाग्रज लिखते हैं-‘जिसको बचाना है उसको प्यार किया ही जाय, लेकिन जिसको मारना है उसको भी प्यार किया जाय’ तब वह यह कहना चाहते हैं कि मानवीय व्यवहार की नींव सहानुभूति और आत्मीयता होनी चाहिए। मनुष्यता की कुछ निराली छटा और संस्कृति की परिपक्व अवस्था इस ‘प्रेमयोग’ के आधार से स्पष्ट होती है। मानवता शब्द से निकलकर उसके पेट में घुसते हुए उसके अर्थ की एक एक छटा पहचानते हुए मनुष्य-मनुष्यता प्रेम-प्रेमयोग, इस व्यापक भूमिका तक कुसुमाग्रज के मानव-प्रेम का विकास होता दिखता है।

दो अलग-अलग जगहों से निकलकर दो यात्री एकत्र हो जाएं, उस तरह कुसुमाग्रज की सामाजिक प्रेम की कविता मानवता मनुष्यता प्रेम तक पहुंची है और उनकी आत्मपरक प्रेम कविता भी ‘प्रेमयोग’ के विकसित विचार तक पहुँची है। दो व्यक्तियों को मन से एकत्र बांधने वाला सूत्र और समाज घटकों को एकत्र बांधने वाला सूत्र अनेक अर्थ-छटाओं से समृद्ध ‘आत्मीयता का भाव’ ही है जिस कृष्ण ने कर्मयोग एवं भक्तियोग बताया उसी के मुंह से कुसुमाग्रज ने ‘प्रेमयोग’ की यह कल्पना कहलवायी है। अतः उसे उच्च जीवनदृष्टि का अधिष्ठान प्राप्त हुआ है।

जिस तरह कुसुमाग्रज अपनी राजनैतिक एवं सामाजिक कविता के कारण ख्याति प्राप्त कर गए उसी प्रकार उनकी प्रेम और प्रकृति संबंधी कविता भी बहुत चर्चित रही है। इस प्रकार की उनकी कविता विशाखा में सीमित ही हैं। लेकिन उन कविताओं का सम्मोहक प्रभाव रसिक मन पर गहराई से अंकित हुआ। विशाखा की इस तरह की लोकप्रिय कविताओं में प्रमुख कविता है स्वप्न का समापन जिसमें प्रेमी और प्रेयसी के विरह की भावना व्यक्त की गई है। उसी तरह ‘पृथ्वी का प्रेम गीत’। पृथ्वी को मालूम है कि सूर्य के साथ उसका मिलन असंभव है लेकिन वह अन्यों का प्रेम तुच्छ मानकर सूर्य की कक्षा में ही भ्रमण करना स्वीकार करती है। शहर के विलासमय वातावरण में रहते हुए गांव के अतीत के प्रेम की स्मृतियों से व्याकुल करनेवाली कविता स्मृति। उसी तरह शाम को किनारे पर भेंट होने के बावजूद जीवन के सुखदुखमय स्वरूप के कारण मन में कचोट उत्पन्न करनेवाली कविता है ‘किनारे पर’। इन कविताओं की मधुरिमा उत्कट और टिकाऊ है। बाद के संग्रह में संख्या में सीमित लेकिन मन को बेंधनेवाली सुंदर प्रेम-कविताएं आयी हैं। ‘नहीं’, ‘स्मरण’, ‘मिट्टी का गान’, ये कविताएं ऐसी हैं जिनमें मराठी मिट्टी की महक है। ‘स्वगत’ संकलन में ‘पूनो’ कविता, ‘छंदोमयी’ संकलन में ‘हे नभ’, ‘यौवन’ ये कविताएं तथा ‘छंदोमयी’ और ‘मुक्तायन’ में प्रकाशित प्रिय व्यक्ति के देहांत संबंधी कविताएं इत्यादि का उल्लेख करना चाहिए। इनमें से कुछ कविताएं प्रस्तुत संकलन में समाविष्ट हैं।

इन प्रेम कविताओं में उनका अपना खास वैशिष्ट्य है। इनकी भावना-विरह मिलन, स्मृतियों से बिद्ध होनेवाली अथवा समर्पण की या किसी प्रकार की हो, वह उत्कटता पूर्वक व्यक्त होती है। इन कविताओं में उत्कटता है और तनाव को खत्म न करते हुए उसे व्यक्त किया जाता है। इसका कारण अनुभव के नाट्य को ढंग से पकड़कर कविता में उसे अचूक रूप देकर कुसुमाग्रज व्यक्त करते हैं। अनुभव एवं भावना की हर एक छटा को व्यक्त करते हुए विलक्षण सुंदर और समुचित बिम्बों के माध्यम से उस अनुभव की बुनावट होती रहती है। कविता में आनेवाला प्रकृति का वातावरण या संकेत कविता के साथ ऐसे एकमेक हो जाते हैं कि एक ओर प्रकृति-सौंदर्य के दर्शन होते हैं और उस भावना की सशक्त अभिव्यक्ति होती रहती। ‘स्वप्न का समापन’ एवं ‘पृथ्वी का प्रेम गीत’ ये बहुचर्चित कविताएं इसको उदाहृत करती हैं। स्वप्न के समापन में दोनों के मिलन के स्वप्न की समाप्ति बताने वाला दुखद अनुभव है। रात समाप्त होते-होते भोर के समय दोनों को एक-दूसरे से विदा होना है। इस रात की चांदनी की मधुरिमा पीकर और आनेवाले भोर से दहशत खाकर कुसुमाग्रज ने पंक्तियां लिखी हैं-‘उठा सखी, कंठ घेरे, चांदनी की अपनी बांहें क्षितिज पार दिवस दूत देखो आकर खड़े रहे।’

 आकर्षण और भय के बीच का तनाव कायम रखते हुए आगे की पंक्तियों में उस समूची घटना को रंग और रूप प्राप्त करा दिया गया है, और सौंदर्य भी। प्रकृति का वातावरण सुंदर है परंतु वह विरह की भावना को अलग-अलग ढंग से तीव्र करता रहा है। स्नेहहीन ज्योति की तरह मंद पड़ने वाला शुक्र तारा, स्वप्न की तरह तिरोहित होनेवाला एक एक सितारा हर सिंगार के पैरों तले बिखरे हुए फूल और वायु पर फैलने वाली उनकी सांसें-इस प्रकार हर तरह के वर्णन में भावोत्कटता उत्पन्न हुई है और कविता के सौंदर्य में चार चांद लग गए हैं। कुसुमाग्रज की कविता शक्ति से निर्मित इस कविता के बिम्ब इतने नये और सटीक हैं कि उनसे पाठकों को उनकी प्रेम-भावना की नयी प्रतीति मिलती है। इस भावना के उत्कर्ष के बिंद पर उठा सखी कंठ घेरे चाँदनी की अपनी बाहें, इत्यादि पंक्तियां ऐसे मोड़ पर आती हैं कि विरह की कल्पना का एक भयावह धक्का सा मन में पुनः-पुनः लग जाता है। अंतिम छंद में इस पंक्ति की पुनरावृत्ति को निकालकर एक अलग सा धक्का कुसुमाग्रज पाठकों को देते हैं। यह पंक्ति पुनः नहीं आती, इसका ध्वन्यार्थ यह है कि उसने गले से हाथ निकाल दिए हैं और उन दोनों ने एक-दूसरे से विदा ली है। कलात्मक संयम और संकेत से भावोत्कटता को बढ़ाने का कौशल, इन दोनों की प्रतीति यहां होती है।

   

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