अभ्यंतर - इन्दिरा मिश्र Abhyantar - Hindi book by - Indira Mishra
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अभ्यंतर

इन्दिरा मिश्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
आईएसबीएन : 00000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :70 पुस्तक क्रमांक : 4542

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इन कविताओं की प्रेरणा भूमि मध्यप्रदेश है।

Abhyantar a hindi book by Indira Mishra - अभ्यंतर - इन्दिरा मिश्र

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इन कविताओं की प्रेरणा भूमि मध्यप्रदेश है। गाँवों के दृश्य में जब अधनंगे बच्चों की धूलसनी टोली को अपनी कौतुहलपूर्ण आंखों से ताकते पाती हूं तो सचमुच हृदय चाहता है न जाने मेरे हाथों को कितना लम्बा होना चाहिए था, उनमें से हर किसी के पास पहुँचने के लिए। इसी तरह मकान बनाने वाले राज मजदूरों के परिवार में पलती असहायता और गरीबों में तीखे प्रहार हैं जो दूसरों की सम्पन्नता को एक मज़ाक बना डालते हैं। धूप में कुनमुनाते मजदूरिन के दुधमुहें की संभाल कौन करता है, जब वह दूसरों के लिए शीतल बरामदों का निर्माण कर रही होती है ? जब आसमान से ओले टपकते हैं तब लंगड़े चोर की ही मृत्यु होती है। जो सशक्त हैं, वे दौड़कर छुप जाते हैं। राहत के मौसम में ओलों से कटे पौंधों के सिर अपने से सटाय स्त्रियाँ विलाप करती हैं जैसे उनका कोई सगा सम्बन्धी खत्म हो गया है।

प्रस्तुति


भारतीय ज्ञानपीठ नयी साहित्यिक प्रतिभा को पहचानने और उसे प्रतिष्ठित करने में सदा प्रयत्नशील रहा है। आज के अनेक वरिष्ठ लेखकों की प्रारम्भिक कृतियाँ ज्ञानपीठ से ही छपी थीं। अपनी इस परंपरा को सुदृढ़ करने के लिए हमने कुछ वर्ष पहले नयी पीढ़ी के लिए एक नया आयोजन आरम्भ किया था। यह आयोजन एक प्रतियोगिता-क्रम के रूप में है जिसमें प्रत्येक वर्ष किसी एक विधा को लेकर हम ऐसे लेखकों की पाण्डुलिपियाँ आमन्त्रित करते हैं जिनकी उस विधा की कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। इसमें सर्वप्रथम घोषित पाण्डुलिपि का प्रकाशन ज्ञानपीठ द्वारा होता है और युवा रचनाकार को लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों के समकक्ष ही रायल्टी दी जाती है। इस प्रकार की अब तक कहानी, कविता, हास्य-व्यंग्य नाटक तथा उपन्यास विधाओं में प्रतियोगिताएँ हो चुकी हैं। उपन्यास प्रतियोगिता का परिणाम अभी हाल में ही घोषित किया गया है। उसे छोड़कर अब तक अन्य चारों प्रतियोगिताओं में विजयी लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि इन कृतियों का अच्छा स्वागत हुआ है। प्रथम दो कृतियाँ-ऋता शुक्ल का ‘क्रौंचवध’ (कहानी-संग्रह) और विनोद दास का ‘ख़िलाफ़ हवा से गुज़रते हुए’ (कविता-संग्रह) के दूसरे संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय ज्ञानपीठ इन रचनाकारों के साहित्यिक विकास में भी सक्रिय सहयोग करता है।

लेकिन वर्ष में एक प्रतियोगिता के आधार पर एक पुस्तक का प्रकाशन नयी पीढ़ी के लेखकों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इसी को ध्यान में रखकर हम प्रतियोगिता के अतिरिक्त नये उदीयमान लेखकों की कृतियों को हिन्दी पाठकों को समय-समय पर अर्पित करते रहते हैं। नये लेखकों को प्रकाशन में कितनी कठनाई आ रही हैं इसकी विस्तृत चर्चा करना आवश्यक नहीं है। केवल इतना कहना चहूँगा कि यदि नयी पीढ़ी को प्रोत्साहन देना है तो उनकी रचनाओं के प्रकाशन पर विशेष ध्यान देना होगा। इस सम्बन्ध में इतनी कठिनाइयाँ काफी दुखद है। यदि इनमें हम कुछ भी कमीं ला सकें तो हमारे लिए प्रसन्नता की बात होगी। हमने हाल ही में विभिन्न भारतीय भाषाओं के नये लेखकों की कृतियों का हिन्दी रूपान्तर प्रकाशित करना आरम्भ किया है। इस पृष्ठभूमि में यह और भी युक्ति संगत लगता है कि हिन्दी के ऐसे लेखकों का परिचय भी पाठकों को करायें। इसको सुव्यवस्थित ढंग से करने के लिए ‘नये हस्ताक्षर’ श्रृंखला का प्रकाशन आरम्भ किया जा रहा है जिसमें पहली तीन पुस्तकें-इन्दिरा मिश्र, अजय कुमार सिंह और महेन्द्र प्रताप सिंह के कविता-संग्रह हैं।
मुझे आशा है कि हिन्दी में नये लेखकों की साहित्यिक सृजनात्मकता का उचित स्वागत होगा।
नयी दिल्ली
15 फरवरी, 1991

बिशन टंडन
निदेशक

भूमिका


रोज़-रोज़ के जीवन को जीने का अभ्यस्त यद्यपि व्यक्ति तो वही होता है, फिर भी कुछ चीज़ें उसकी सम्वेदनशीलता जो जगाती है, उसे झकझोरती हैं पीड़ा पहुँचाती हैं। ‘अभ्यन्तर’ की कविताओं ने मेरे मानस के उस धरातल पर जन्म लिया है जहाँ उसे मानव के किसी विवशता का आभास हुआ है। और वह विवशता भी ऐसी कि उसे बस मुस्कुराकर झेलने के अलावा कोई गति नहीं है।
कवितायें तीन तरह की हैं पहली-व्यक्तिगत दूसरी-मेरे आस-पास के जनसमुदाय से जुड़ी, जिसमें दफ्तर के सहयोगी, कर्मयोगियों से लगाकर, अखबार में डूबा अभिन्न मित्र अथवा एक जन समुदाय को भी कुछ न समझता हुआ ‘महत्वपूर्ण प्रश्नों’ में डूबा हुआ सफलता की चोटी पर पहुँचा आदमी, अथवा दूसरे की पहुँच से बहुत दूर, निर्विकार बन, शीशे के भवन में बैठा, मित्र बनाया जा सकने वाला व्यक्ति सभी हैं। तीसरी श्रेणी में फिर एक-दूसरे रूप में व्यक्तिगत कवितायें हैं। ये हिमालय पेड़ और प्रकृति को विभिन्न सन्दर्भों की पृष्ठभूमि में देखने पर खुद मुंह से निकल पड़ी हैं। कुछ कवितायें बिल्कुल गडमड हैं ही।

कविता का उद्भव मातृत्व प्राप्त होने के साथ मुझमें हुआ है। बच्चे के साथ एक कोमल बिन्दु और जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण निर्मित होता है, जीवन दुबारा से जीने का सुनहला मौका जैसे मिल जाता है। जब बच्ची चिड़ियां के घोंसले के तिनके को उठा लेने से हुए खालीपन के बारे में कहती हैं कि माँ जब चिड़िया यहाँ आयेगी, उसे कुछ नहीं मिलेगा। मैं अपनी क्रूरता को एक अबोध के मुँह से सुनकर अवाक् हो जाती हूँ। कितनी ही निर्ममतायें हम यों रोज कर डालते होंगे और यह अनुभव भी न कर पाते होंगे कि ये वस्तुत: निर्ममतायें हैं।

इन कविताओं की प्रेरणा भूमि मध्यप्रदेश है। गाँवों के दृश्य में जब अधनंगे बच्चों की धूलसनी टोली को अपनी कौतूहलपूर्ण आँखों से ताकते पाती हूँ तो सचमुच हृदय चाहता है न जाने मेरे हाथों को कितना लम्बा होना चाहिए था, उनमें से हर किसी के पास पहुंचने के लिए। इसी तरह मकान बनाने वाले राज मजदूरों के परिवार में पलती असहायता और गरीबी में तीखे प्रहार हैं जो दूसरों की सम्पन्नता को एक मज़ाक़ बना डालते हैं। धूप में कुनमुनाते मजदूरिन के दूधमुँहे की सम्भाल कौन करता है, जब वह दूसरों के लिए शीतल बरामदों का निर्माण कर रही होती हैं ? जब आसमान से ओले टपकते हैं तब लंगडे चोर की ही मृत्यु होती है। जो सशक्त हैं, वे दौड़कर छुप जाते हैं। राहत के मौसम में ओलो से कटे पौधों के सिर अपने से सटाये स्त्रियाँ विलाप करती हैं जैसे उनका कोई सगा सम्बन्धी खत्म हो गया है।

वे भी जो पाजामें के पहुंचे बाँध साइकिल लिये, रोज़ ‘सिरमिट’ का जुगाड़ करने दफ्तर से कहीं जाते हैं।
मेरे मन में ग्रान्ट चाहने वालों की कहानी भी रिरियाती-घुमड़ती हैं, जो गाँव की मिट्टी से बदरंग मोटे चश्में के भीतर से अपनी वह गौरवपूर्ण आपबीती सुनाते हैं जिस पर ध्यान देना उनके सरकारी श्रोताओं की आदत बन गयी है। वे अपने शब्दों के अवमूल्यन पर झुँझलाते हैं और ढूढ़ना चाहते हैं एक नयी भाषा, जो उनकी वाणी में सत्यता को प्रखर कर सके परन्तु वह भाषा कहाँ से लाएँ ? उनके वश में तो हैं केवल उनकी डबडबाई आँखें।
कहते हैं आदमी वही दे सकता है, जो वह पा सका है। मध्यप्रदेश की मिट्टी ने, हिमालय झरनों और समुद्र ने तथा बच्चों के अबोधपन ने मुझे बहुत दिया है। थोड़ा-सा इसी में से लौटाना चाहते हुए।

इन्दिरा मिश्र
30, नवम्बर 1990

चाहती तो हूँ



कमल के पत्ते पर
ओस की बूँद है तू,
सुबह की नींद से तल्लीन
मुझे बुलाती हुई।

दिल पर एक चाबुक-सा पड़ता है,
जब तुझे छोड़कर जाती हूँ।

तेरे घाव पर
रुई का फाहा बन जाना
चाहती हूँ मैं,
कि एक और जहान तुझे
कहीं से ला दूँ।
काश, हड़बड़ी न होती
दफ्तर न होते, होते हम कोई और,
कमल ताल में
पत्तों में छिपकर आँख मिचौनी खेलते।।
मैं ढूँढती तुझे पाती
तू ढ़ूँढ़ती, मुझे,
पहाड़ों के ऊपर से,
नीलाँचल में बसा
वो गाँव दिखाती
जहाँ से, प्यार आता है।


यह होम-वर्क तू क्या ले बैठती है हर समय,
हमें समय रहते कहीं भाग चलना है
साँची के स्तूप पर
या सागर किनारे की दोपहर में
जहाँ लहरें गाती हैं अनवरत संगीत।।

तू क्या करती है ये सवाल-जवाब ? चलो वहाँ
जहाँ सारे जवाब सामने होते हैं, हमें महज़
ताड़पात्रों में अटके प्रश्न उतार लेने होंगे।


लड़का



लड़के के लिए जरूरी हैं सड़कें, मोटरें
स्पीड और स्पीड ब्रेकर्स
या फिर हवाई जहाज,
वह और कुछ नहीं सोचता
यहाँ से वहाँ उड़ना चाहता है
पाँच वर्ष का यह लड़का
बन्दूक लेकर
कब्ज़ा जमा लेना चाहता है

सभी पर
अभी से।


मैंने भी क्या कर डाला



हमने ओट देता चित्र हटाया
चितकबरे अण्डे सब
फेंक दिये और वे तिनके
जिन्हें चिड़िया
यहाँ रोज़ फैलाती थी।

स्वच्छता का अभियान
अभी पूरा भी न हुआ था
कि नन्हीं बोली थी
‘‘माँ जब चिड़िया
यहाँ आयेगी
तब उसे कुछ नहीं मिलेगा।’’

भोलेपन के शब्द
पागलों से फड़फड़ाते रहे
मेरे जहन में कितनी देर।


इतने बड़े



बच्चों, तुम क्या
तीन कदम में
पूरी सृष्टि नाप लोगे ?
तुम इतने बड़े हो जाओगे,
कि हम तुम्हें कुछ भी
दिला न सकें ?
देखो मुझे भी इस झूले की
पुरानी रस्सी से शिकायत है
जल्दी ही मैं इसे अपनी किसी आदत की तरह
बदल दूँगी,
मैं तुम्हें आइसक्रीम, चॉकलेट
दूँगी, चाहे जितनी, बहुत जल्द,
पहाड़ों पर
ले जाऊँगी जहाँ तुम
बादलों में
छुपम-छुपाई खेलोगे।
मैं समुद्र किनारे की रेत में
तुम्हें सीपियाँ ढूँढ़ दूँगी
हम साँड़ की डालों से
रेत के महल में वृक्ष रोपेंगे
हम जंगल में भी रात काटेंगे
जहाँ तुम कच्चे आम की
मदमाती गन्ध पा सकोगे।


दिशाओं



दिशाओं
मैंने कितना प्यार दिया तुम्हें
फिर भी तुमने
अपने हाथ
मुझ तक नहीं बढ़ाये
नहीं बताया
यहीं मिलोगी कल क्या ?

मेघ शावक
पर्वत शिखरों से उतर-उतर
जा रहे हैं
और चीटियाँ
समाधिस्थ ऋषि की गोद में
घर बना रही हैं
जैसे कल जरूर होगा।


योगी मुस्कुराया



मजदूरिन ने बच्चे को
सुबह से
धोती में छुपाकर
पेड़ से झुलाया
और खुद चट्टान को तोड़ने बैठी।

तोड़, फोड़, जोड़,
उसने बनाया
एक ठण्डा बरामदा
और पड़ी ठण्डक
यह सोच, उसके कलेजे को
कि यहाँ
कल कोई सुस्तायेगा
जब पेड़
फूल बिखरायेगा।

तभी धूप में तड़पता
मुन्ना कसमसाया
और बन्द आँखों से
यह सब देख
एक योगी
रोते हुए मुस्कुराया।


‘इसलिए’



नींद से मुझे
वक्त पर
झकझोर देना उसका
और बुलाना
पेड़ की ठण्डी छाया तले
वन भोज लिये।

यही है वह जिसने
गुफाओं से निकलकर
लम्बे झूमते पेड़ उगाये,
आकाश तक पहुँचने के लिए
पक्षी से तेज
मुझे पंख दिये, अलंघ्य
पर्वत को पार करने के
रास्ते बना दिये सर्पिल,
सागर की छाती चीरकार वह
सर्व-सुन्दर मुक्ता ले आया

मैं बीमार हुई
वह प्रयोगशाला में ढूँढ़ता रहा
मेरा इलाज बरसों,
देखता रहा बिना हिले
आदमी की परछाई की तरह
रसायनों का व्यवहार।

ऊँची कँटीली शाखों को
कैसे पार किया होगा वही जाने, उसने
रस पाने से पहले
शत डंको की पीड़ा से कैसे जूझा होगा वह
मधु मिलने से पहले ?
जंगल में उसके जलाये दियों के लिये
मैं अहसानमन्द हूँ,
और पुल से बँधी
इन नदियों के
टूटे घमंड के लिये,
लुभावनी कहानियों में
गुंथे गीतों को लिए :

हर तरह से नाचकर, गाकर
वह मुझे रिझाता है
करता है मेरे लिए एक दिन-रात,

इसीलिए मैं उससे
प्यार करती हूँ
इसीलिए मैं
मरने से डरती हूँ


जहाँ तक



जहाँ तक आँखें जाती हैं
कभी हाथ पहुंच पाते।

ताल तट पर
फूटे घट के टुकड़े बीन लाते
टूटी झोंपड़ियों के खपरों में
नया रंग बिछाते
गर्म जोशी की तो
नर्मसब्ज़ बेल से
बुनते अपनी चादर
नन्हीं को धूल भरी सड़कों से उठाकर
पलकों पर बिठाते
जहाँ तक मेरे हाथ जाते।


अपलक



हर रात
यहाँ
भयानक, अकेली
सन्नाटों, छाया में
अन्धकारों से घिरी
और हर सुबह चिन्ताओं को फेंक, उठती हुई
उतनी ही निर्मल
निश्चिन्त निर्विकार,

कल वैसी सुबह का
कोई वादा करले आज
तो जीवन में
प्रथम बार
चैन से सो लूँ।
किसी रात मैं....।



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