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राजभाषा हिन्दी और उसका विकास

हीरालाल बाछोतिया

प्रकाशक : आर्य प्रकाशन मंडल प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :134
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4415
आईएसबीएन :81-88118-93-1

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राजभाषा हिन्दी का महत्व...

Raj bhasha hindi aur uska vikas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


हिन्दी भाषा की बात करते हुए आम तौर पर हिन्दी साहित्य का अर्थ लिया जाता है, किन्तु आज हिन्दी के क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है। उसके सरोकारों में भी विस्तार हुआ है। हिन्दी के निर्माण में साधु-संतों के साथ-साथ सूफी फकीरों का भी योगदान रहा है। खड़ी बोली, दकिनी किस प्रकार साहित्यिक हिन्दी बनी यह भी इसके विकास आयाम हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का गौरवपूर्ण स्थान मिला। हिन्दी-प्रचार राष्ट्रीय कार्यक्रम माना गया। उसकी विविध भूमिकाएँ राजभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित हुईं। संविधान में हिन्दी को राजभाषा की गरिमा प्रदान की गई।

संविधान में राजभाषा हिन्दी के प्रावधानों के संदर्भ में विस्तार में जाएँ तो कार्य करने की इच्छा, क्रियान्वयन के लिए हिन्दी में कार्य करने का ज्ञान अवश्यंभावी है।
इस दृष्टि से व्यावहारिक व्याकरण, वर्तनी, शब्द-प्रयोग और सबसे बढ़कर कार्यालयीन पत्र-व्यवहार आदि की सोदाहरण प्रस्तुति और भाषा सम्बन्धी जागरुकता निर्माण इस पुस्तक की अपनी विशेषता है।

पूर्व कथन


हिन्दी भाषा एक बहुआयामी भाषा है। यह बात इसके प्रयोग क्षेत्र के विस्तार की देखते हुए भी समझी जा सकती है। यह अलग बात है कि हिन्दी भाषा की बात करते समय हम सामान्यतः हिन्दी साहित्य की बात करने लगते हैं। इसमें संदेह नहीं कि साहित्यिक हिन्दी, हिन्दी के विभिन्न आयामों में से एक है, लेकिन यह केवल हिन्दी के एक बड़े मानचित्र का छोटा-सा हिस्सा है, शेष आयामों पर कम विचार हुआ है और व्यावहारिक हिन्दी की पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए तो और भी कम विमर्श हमारे सामने हैं।

इस दृष्टि से ‘राजभाषा हिन्दी और उसका विकास’ पुस्तक उल्लेखनीय है, जिसमें प्रारंभ में ही उन भ्रांतियों को तोड़ दिया गया है, जिनके कारण हम हिन्दी को सीमित परिप्रेक्ष्य में देख समझ पाते हैं। हिन्दी के नामकरण पर बहुत कम सामग्री मिलती है। यदि हिन्दी भाषा के आंतरिक इतिहास का उद्घाटन करना हो तो नामकरण ही उसका आधार बन सकता है। हिन्दी, हिन्दवी, हिन्दुई और दकिनी के विकासक्रम में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अलग- अलग समय में एक ही भाषा के भिन्न नाम प्रचलित रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि इनके निर्धारण में मुसलमान संतों, कवियों और विचारकों की बड़ी भूमिका है। इस पुस्तक में इन तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए खड़ी बोली के आंदोलन और खड़ी बोली के विकास पर प्रकाश डाला गया है।

इसी प्रकाश में राष्ट्रभाषा हिन्दी की भूमिका भी यहाँ रेखाकिंत की गई है और फिर राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी की विविध भूमिकाओं और इनके अंतर्गत निहित वैधानिता को भी संविधान में हिन्दी की व्याख्या करते हुए प्रस्तुत किया गया है।  यह पुस्तक प्रयोजनमूलक हिन्दी पर संवैधानिक चर्चा करते हुए राजभाषा हिन्दी, विशेष रूप से प्रशासन और कार्यालय में प्रयुक्त हिन्दी के व्यवहार और अभ्यास पक्ष पर बल देती है और यही पुस्तक की विशेषता है।

एक विशेषता इसकी यह भी है कि इसमें संक्षिप्त रूप में हिन्दी भाषा का व्यावहारिक व्याकरण भी सम्मिलित किया गया है। इस तरह की पुस्तकों में ऐसा प्रायः कम होता है। यह मानी हुई बात है कि यदि मानक हिन्दी को शुद्ध रूप में लिखना कोई शिक्षार्थी नहीं जानता तो वह हिन्दी के विभिन्न प्रयोजनमूलक क्षेत्रों में भी प्रयोगगत दक्षता प्राप्त नहीं कर सकता।
इस पुस्तक में हिन्दी की लिपि और वर्तनी-व्यवस्था की नियमावली बड़े सहज ढंग से दी गई है। इसी प्रकार भाषा-दक्षता को बढ़ाने की दृष्टि से शुद्ध-अशुद्ध हिन्दी वाक्यों के प्रयोग के प्रति शिक्षार्थी को सचेत बनाने का भी प्रयत्न यहाँ दिखाई देता है। शब्द प्रयोग को भी उसके सभी धरातलों पर इसमें ढेरों उदाहरण देकर समझाया गया है।

निश्चित रूप से यह केवल कार्यालयीन हिन्दी केंद्रित पुस्तक नहीं है। इसमें हिन्दी भाषा के इतिहास, प्रयोजनमूलक हिन्दी के रूपों तथा हिन्दी व्याकरण संबंधी त्रुटियों को भी महत्त्व दिया गया है। यह अत्यंत संतोष की बात है कि इस पुस्तक में भाषा के दक्षता-विस्तार को दृष्टि में रखा गया है और इस विस्तार के लिए ही लेखक ने भाषा के सही और समर्थ प्रयोक्ता के लिए अनिवार्य घटक हैं।
इस पुस्तक की संपूर्णता और सघनता को देखते हुए मैं लेखक की भाषा संबंधी जागरूकता की सराहना करता हूँ और आशा करता हूँ कि हिन्दी भाषा के व्यावहारिक प्रयोग से संबंधित हिन्दी विभागों तथा राजभाषा हिन्दी के कार्यान्वयन से संबंधित सरकारी संगठनों और उपक्रमों में इस पुस्तक का भरपूर स्वागत होगा और यह पुस्तक उन सबके लिए परम उपयोगी सिद्ध होगी।

दिलीप सिंह
कुल सचिव उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा
चैन्नई


हिन्दी : नामकरण की पृष्ठभूमि



‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग फारस और अरब से माना जाता है। वास्तव में संस्कृत शब्द ‘सिंधु’ से ‘हिन्दी’ शब्द उद्भूत हुआ है। यह सिंध नदी के आसपास की भूमि का नाम है। ईरानी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है, इसलिए ‘सिंधु’ का रूप ‘हिंदू’ हो गया तथा ‘हिंद’ शब्द पूरे भारत के लिए प्रयुक्त होने लगा और प्रकारांतर से ‘हिन्दी’ शब्द अस्तित्व में आया।
‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग अमीर खुसरो ने भी किया। अमीर खुशरो तुर्क थे, लेकिन वे भारत में पैदा हुए थे। 1317 ई. के आसपास पैदा हुए अमीर खुसरो का कहना था-‘‘चूँकि मैं भारत में पैदा हुआ हूँ अतः मैं यहाँ की भाषा के संबंध में कुछ कहना चाहता हूँ। इस समय, यहाँ प्रत्येक प्रदेश में, ऐसी विचित्र एवं स्वतंत्र भाषाएँ प्रचलित हैं जिनका एक-दूसरे से संबंध नहीं है। ये हैं-हिन्दी (सिंधी), लाहौरी (पंजाबी), कश्मीरी- डूगरों (जम्मू के डूगरों) की भाषा, धूर समुंदर (मैसूर की कन्नड़ भाषा), तिलंग (तेलुगु), गुजरात, मलाबार (कारो मंडल तट की तमिल), गौड़ (उत्तरी बँगला), बंगाल, अवध (पूर्वी हिन्दी), दिल्ली तथा उसके आसपास की भाषा (पश्चिमी हिन्दी)। ये सभी हिन्दी की भाषाएँ हैं, जो प्राचीन काल से ही जीवन के सामान्य कार्यों के लिए, हर प्रकार से, व्यवह्वत होती आ रही हैं।’’

एक अन्य स्थान पर हिन्दी की चर्चा करते हुए अमीर खुसरो लिखते हैं-‘‘यह हिन्दी की भाषा है।’’ ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ वास्तव में खुसरो का संस्कृति से तात्पर्य है, न कि उस भाषा से जिसे आज हम इस नाम से अभिहित करते हैं। आगे इसी संबंध में वे लिखते हैं:

‘‘यदि तथ्य को ध्यान में रखकर गंभीरता से विचार किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दी पारसी (फारसी) से निम्नकोटि की नहीं है। यह अरबी की अपेक्षा जिसका सभी भाषाओं में प्रमुख स्थान है, निम्नकोटि की है, भाषा के रूप में अरबी का एक पृथक स्थान और कोई भी अन्य भाषा इसके साथ सम्मिलित नहीं की जा सकती। शब्द भंडार की दृष्टि से पारसी अपूर्ण भाषा है और बिना अरबी के छौंक के यह रुचिकर प्रतीत नहीं हो सकती। चूँकि अरबी विशुद्ध तथा पारसी मिश्रित भाषा है, अतः यह कहा जा सकता है कि एक आत्मा है तो दूसरी शरीर। अरबी में कुछ भी सम्मिलित नहीं किया जा सकता, किंतु फारसी में सब प्रकार का सम्मिश्रण संभव है।’’

‘‘हिन्द की भाषा अरबी के समान है, क्योंकि इसमें किसी प्रकार का मिश्रण नहीं किया जा सकता। यदि अरबी में व्याकरण तथा वाक्य-विन्यास है तो हिन्दी में भी उससे एक अक्षर कम नहीं है। यदि यह प्रश्न करें कि हिन्दी में भी क्या अलंकार शास्त्र तथा विचार-प्रकाशन के अन्य विज्ञान हैं तो इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस संबंध में भी वह किसी तरह से न्यून नहीं है। जिस किसी व्यक्ति ने इन तीनों भाषाओं को अधिकृत कर लिया है, वह यह कह सकता है कि मैं इस संबंध में कुछ भी गलत तथा अतिशयोक्तिपूर्ण बात नहीं कर रहा हूँ।’’

1886 ई. में वियना की ओरियंटल कांग्रेस ने तत्कालीन भारत सरकार से यह अनुरोध किया था कि वह विधिवत् भारत की भाषाओं का सर्वेक्षण कराए। उसी के अतर्गत बाद के दिनों में जॉर्ज ग्रियर्सन ने भारत का विस्तृत भाषा-सर्वेक्षण किया अथवा करवाया, जो हमारे लिए इस विषय से संबंधित एक बड़ी देन है। ग्रियर्सन ने इस संबंध में स्पष्ट किया है-‘‘विभिन्न स्थानीय सरकारों से परामर्श के पश्चात् मद्रास तथा बर्मा प्रदेशों एवं हैदराबाद एवं मैसूर राज्यों को इस सर्वेक्षण की सीमा से पृथक रखने का निर्णय लिया गया, ताकि इसके अंतर्गत हमारे भारतीय साम्राज्य की कुल 29 करोड़ 40 लाख जनसंख्या में से 22 करोड़ 40 लाख वाली आबादी का भाग जिसमें पश्चिम से पूर्व तक बलोचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमांत, कश्मीर, पंजाब, बंबई प्रेसीडेंसी, राजपूताना एवं मध्य भारत, मध्य प्रदेश तथा बरार, संयुक्त प्रदेश आगरा व अवध बिहार एवं उड़ीसा, बंगाल तथा असम प्रदेश सम्मिलित हैं, आ सके।’’

1929 ई. की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 31 करोड 60 लाख थी। इनमें 29 करोड़ लोगों की भाषा का सर्वेक्षण करते हुए जॉर्ज ग्रियर्सन ने पाया कि भारत में विभिन्न भाषाओं और बोलियों की संख्या 875 है। हालाँकि उनमें 179 भाषाओं और 524 बोलियों के नाम ग्रियर्सन ने दिए हैं।

हिन्दी का निर्माण-काल



अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है। हिन्दी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। 1000 ई. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक संदर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुईं। अपभ्रंश का जो भी कथ्य रुप था-वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ।

अपभ्रंश के संबंध में ‘देशी’ शब्द की भी बहुधा चर्चा की जाती है। वास्तव में ‘देशी’ से देशी शब्द एवं देशी भाषा दोनों का बोध होता है। प्रश्न यह कि देशीय शब्द किस भाषा के थे ? भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में उन शब्दों को ‘देशी’ कहा है ‘जो संस्कृत के तत्सम एवं सद्भव रूपों से भिन्न हैं।’ ये ‘देशी’ शब्द जनभाषा के प्रचलित शब्द थे, जो स्वभावतया अप्रभंश में भी चले आए थे। जनभाषा व्याकरण के नियमों का अनुसरण नहीं करती, परंतु व्याकरण को जनभाषा की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना पड़ता है, प्राकृत-व्याकरणों ने संस्कृत के ढाँचे पर व्याकरण लिखे और संस्कृत को ही प्राकृत आदि की प्रकृति माना। अतः जो शब्द उनके नियमों की पकड़ में न आ सके, उनको देशी संज्ञा दी गई।

प्राचीन काल से बोलचाल की भाषा को देशी भाषा अथवा ‘भाषा’ कहा जाता रहा। पाणिनि के समय में संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। अतः पाणिनी ने इसको ‘भाषा’ कहा है। पतंजलि के समय तक संस्कृत केवल शिष्ट समाज के व्यवहार की भाषा रह गई थी और प्राकृत ने बोलचाल की भाषा का स्थान ले लिया था।

 

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