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राष्ट्र गौरव

एन.सी.गौतम, वी.बी.सिंह, एस.एन.मिश्र

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 00000 पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 4271

राष्ट्र गौरव....

Rashtra Gaurav

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


इस पुस्तक के माध्यम से यही अकिंचन प्रयास किया गया है कि राष्ट्रीय गौरव का बोध वर्तमान पीढ़ी को कराकर उन्हीं के माध्यम से विश्व गुरु भारत की गरिमा पुनः स्थापित की जा सके।

पाठ्यक्रम की संरचना से लेकर पाठ्य पुस्तक तैयार होने तक अनेक स्तरों से हमें सहयोग प्राप्त हुआ। जिन सुधीजनों ने इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग दिया उनके प्रति आभार व्यक्त करके उनके ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता; किन्तु ऐसे दिव्य चिन्तन का सम्मान करना समाज का पवित्र कर्तव्य है।

इस पुस्तक के माध्यम से यही अकिंचन प्रयास किया गया है कि राष्ट्रीय गौरव का बोध वर्तमान पीढ़ी को कराकर उन्हीं के माध्यम से विश्व गुरु भारत की गरिमा पुनः स्थापित की जा सके।

पाठ्यक्रम की संरचना से लेकर पाठ्य पुस्तक तैयार होने तक अनेक स्तरों से हमें सहयोग प्राप्त हुआ। जिन सुधीजनों ने इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग दिया उनके प्रति आभार व्यक्त करके उनके ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता; किन्तु ऐसे दिव्य चिन्तन का सम्मान करना समाज का पवित्र कर्तव्य है।

भारत एक महान् देश रहा है। आध्यात्मिक, नैतिक तथा भौतिक जीवन की सभी धाराओं में भारत के महान् मनीषियों ने अपने अद्भुत योगदान प्रस्तुत किए हैं। गढ़ी जा रही विश्व-संस्कृति एवं विश्व-व्यवस्था में उनकी अति महत्त्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है। ऐसी स्थिति में यह अनिवार्य हो गया है कि भारतवासी अपनी महान् विरासत को ठीक से समझें, जानें और उसे अपनाकर अपने चिन्तन-चरित्र का समुचित निर्माण करें।

श्री अरविन्द जी का कथन


क्रान्तिकारी से आध्यात्मिक शीर्ष पुरुषों की पंक्ति में पहुँचे योगी श्री अरविन्द ने भारत की सांस्कृतिक विरासत और विश्व के उन्नयन में उसकी भूमिका के संदर्भ में अपने विचार अनेक बार व्यक्त किए हैं। उनका सारांश कुछ इस प्रकार है-
‘‘विश्व वसुधा के निर्माण के साथ ही उसके कुछ भूभागों की भूमिका भी नियन्ता द्वारा निश्चित कर दी जाती है। वर्तमान चतुर्युग (प्रलय से प्रलय काल तक) की अवधि के लिए विश्व को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने की जिम्मेदारी सँभालने का दायित्व भारत को सौंपा गया है। यह क्षमता भारत में सनातन काल से रही है। बीच में भौतिक ज्ञान-विज्ञान को प्रगति का अवसर देने की दृष्टि से भारत की इस आध्यात्मिक क्षमता को सुप्त अवस्था (हाईबरनेशन) जैसी स्थिति में डाल दिया गया था। अब भौतिक ज्ञान-विज्ञान से पर्याप्त उन्नति कर ली है। उसका लाभ जन-जन को मिले तथा यह शक्ति भटकने न पाये, इसके लिये उसे समयानुकूल आध्यात्मिक अनुशासन में बाँधना पड़ेगा। ऐसे महत्वपूर्ण समय में भारत की आध्यात्मिक चेतना को फिर से उभर कर आगे आना है। विश्व को समयानुकूल आध्यात्मिक, सांस्कृतिक दिशा देने की जिम्मेदारी भारत को सँभालनी पड़ेगी।’’


आचार्य श्रीराम शर्मा का कथन


क्रान्तिकारी जीवन के बाद राष्ट्र के आध्यात्मिक गौरव को जगाने तथा नैतिक सांस्कृतिक जागरण का अभियान चलानेवाले, अध्यात्म की वैज्ञानिक व्याख्या के साथ, उसे जीवन जीने की कला का युगानुरूप स्वरूप देने वाले पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने विश्व के लिए उज्ज्वल भविष्य गढ़ने में भारत की भूमिका को लेकर अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किये हैं-

‘‘हम अपनी बात विश्व में प्रसारित करने के लिए आतुर इसलिए नहीं हैं कि हमें अपनी कोई बात विश्व-मानस पर थोपनी है। वस्तुत: इन दिनों विश्व-मनीषा विश्व-कल्याण के जिन सूत्रों को अधीर होकर खोज रही है, वे सूत्र हमारे पास विरासत में सुरक्षित हैं। यदि हम उन्हें न समझें, न अपनायें, विश्व समाज तक न पहुँचाएँ, तो इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा। यदि कुछ लठैत लुटेरे गाँव को लूट लें और गाँव में लाइसेंसशुदा बन्दूकधारी सोते ही रहें, तो लुटेरों से पहले उन बन्दूकधारियों को पकड़कर उन पर कार्यवाही की जायेगी। इसी प्रकार समयानुकूल सांस्कृतिक सूत्रों के अभाव में ज्ञान-विज्ञान की तमाम शक्तियों से सम्पन्न मनुष्य भटक कर कलह और विनाश के रास्ते पर चलता रहे और हम चुप रहें, तो हम भी दंड के भागीदार बनेंगे। यह युग की माँग है कि भारत के प्राणवान् लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत का समुचित लाभ विश्व को देने के लिए तनकर खड़े हों।’’

भूमिका


‘निज आन-मान मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे’
जिस देवभूमि में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जाएँ।।

यही हार्दिक कामना होती है किसी देश के स्वाभिमानी नागरिक की; और ऐसे सद्भावों से भरे हृदय के नागरिक ही गौरवमय राष्ट्र की आधारशिला होते हैं। हमारा दुर्भाग्य ! विश्व गुरु के गौरव से गौरवान्वित राष्ट्र के नागरिक आज खान-पान और पहनावे से लेकर विशेषज्ञ स्तर के ज्ञान-विज्ञान के लिए विदेशोन्मुखी हो जाते हैं। पाश्चात्य भौतिकता की चमक उनके मानस पर ऐसी प्रभावी हो रही है कि उसके अन्ध आकर्षण में वे अपनी संस्कृति, संस्कार और माटी की गन्ध तक को भूलते चले जा रहे हैं। किसी भी देश के लिए यह अत्यन्त शोचनीय विषय है; क्योंकि समाज के अविच्छिन्न सदस्य के रूप में मनुष्य ज्ञान, आस्था, कला, नैतिकता, नीति-नियम, सामर्थ्य एवं आदतों का समुच्चय है और संस्कृति मनुष्य के व्यवहार में निहित मूल्यों, विश्वासों एवं बोध का समूह है। पर्याप्त विचार मन्थन के उपरान्त हमारे मनीषियों ने यह पाया कि युवा वर्ग में व्यास यह सांस्कृतिक अचेतना केवल आत्म-गौरव बोध के अभाव का परिणाम है।

वह भारतीय संस्कृति जिसके विषय में सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान मैक्समूलर ने कहा है- ‘यदि मुझसे पूछा जाए कि इस नीले आकाश के नीचे वह कौन सी जगह है, जहाँ मानव मस्तिष्क का पूर्ण विकास हुआ है और जहाँ के लोगों ने बहुत कुछ ईश्वरीय देन को उपलब्ध करा लिया है तथा जीवन की बड़ी से बड़ी समस्याओं पर गम्भीर विचार करके उनमें से बहुतों के ऐसे हाल निकाल लिए हैं, जिन पर प्लेटो-काण्ट जैसे अध्ययन करने वालों को भी ध्यान देना आवश्यक है, तो मैं सीधा भरत की ओर संकेत करूँगा।’

भारतीय संस्कृति का मुख्य आधार आध्यात्मिकता है; परन्तु उसमें लौकिक (भौतिक) उन्नति की उपेक्षा या अवहेलना नहीं की गयी है। जीवन को भौतिक दृष्टि से समुन्नत और परिष्कृत बनाने की विधाएँ और कलाएँ उसमें समग्र रूप से विकसित हुईं, परन्तु इस भौतिक अभ्युत्थान का भी अन्तिम चरण अध्यात्म से ही जा जुड़ता है।
आज के युवा वर्ग में व्याप्त असंतोष, आक्रोश, कुण्ठा और हिंसा के साथ-साथ आस्था और विश्वास की कमी से समग्र मानव जाति पीड़ा, पतन और पराभव के अनन्तगर्त में गिरती जा रही है। ऐसी विषम वेला में प्रबुद्ध मनीषियों का यह दायित्व बन जाता है कि वे सम्पूर्ण परिदृश्य पर गहनता से विचार करें और समस्या-समाधान के लिए अपने गौरवमय अतीत से बीज संचित करें।

आज समस्त विश्व को जिस ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकता है, जिसके लिए मानवता व्याकुल है, वह सांसारिक वैभव और आध्यात्मिक सुख-शान्ति हमारी विरासत में है। यदि समय रहते हमने वर्तमान पीढ़ी को उनकी विरासत का बोध कराकर उनके जीवन का मार्ग प्रशस्त न किया, तो इतिहास हमें ही कलंकित करेगा।

व्यक्तित्व ढालने का सबसे उपयुक्त समय किशोरावस्था का अध्ययन काल ही होता है, उभरती आयु में जोश रहता है एवं शरीर में सामर्थ्य एवं मस्तिष्क में धारण करने की शक्ति प्रबल होती है और भी अन्यान्य प्रकृति प्रदत्त क्षमताएँ विकसित होती रहती हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व को इस अवधि में मनचाहे ढंग से ढाला जा सकता है। इसलिए इसी काल में आवश्यक हैं कि उन्हें अपने सांस्कृतिक परिवेश व उस विरासत में परिचित कराएँ, जिसकी आज संसार को सबसे अधिक आवश्यकता है।

इस पुस्तक के माध्यम से ही यही अकिंचन प्रयास किया गया है कि राष्ट्रीय गौरव का बोध वर्तमान पीढ़ी को कराकर उन्हीं के माध्यमों से विश्व गुरु भरत की गरिमा पुन: स्थापित की जा सके।

पाठ्यक्रम की संरचना से लेकर पाठ्य पुस्तक तैयार होने तक अनेक स्तरों से हमें सहयोग प्राप्त हुआ। जिन सुधीजनों ने इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग दिया उनके प्रति आभार व्यक्त करके उनके ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता; किन्तु ऐसे दिव्य चिन्तन का सम्मान करना समाज का पवित्र कर्त्तव्य है।

प्रथमत: आभार उन विद्वजनों को जिन्होंने देश के कोने-कोने से आकर यहाँ आयोजित कार्यशालाओं में भाग लिया तथा एतदर्थ अपने बहुमूल्य विचार प्रस्तुत किए। सम्पूर्ण कार्य-योजना में शान्तिकुंज, हरिद्वार का योगदान विस्मरणीय है। कार्य को अन्तिम स्वरूप प्रदान करने में हमारे विद्वान सहयोगी डॉ. राधेश्याम सिंह एवं डॉ. बी.बी. सिंह, पूर्व प्राचार्य, तिलकधारी महाविद्यालय, जौनपुर तथा प्रो. श्याम नारायण मिश्र, प्राचार्य कुटीर, पी.जी. कॉलेज, जौनपुर का कठिन श्रम रहा, इनका आभार व्यक्त करता हूँ। अन्त में इस कार्य को मूर्त रूप प्रदान करने वाली संस्था गायत्री परिवार के विद्वज्ज्नों का आभार व्यक्त करता हूँ, जिनमें विशेष रूप से पण्डित वीरेश्वर उपाध्याय जी, पं. चन्द्रभूषण मिश्र, डॉ. आर.पी. कर्मयोगी जी एवं डॉ. पूनम सिंह का आभारी हूँ, जिन्होंने पुस्तक के लिए कम समय में कठिन परिश्रम करके लेखों को एकत्र करके उसे सुदर्शन स्वरूप प्रदान किया।

अन्त में मैं भारत माता से प्रार्थना करता हूँ कि मानव मात्र आत्म गौरव से सम्पन्न बने, प्राणिमात्र के अस्तित्व में उसकी आस्था हो और सबमें सद्भाव और सद्बुद्धि का सहज विकास हो।

प्रो. नरेश चन्द्र गौतम
कुलपति
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर

दो शब्द


एक राष्ट्र के रूप में भारत के अस्तित्व एवं उसकी अस्मिता की पहचान उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परम्पराओं, उपलब्धियों एवं मूल्यों में निहित है। विज्ञान, कला और धर्म आदि क्षेत्रों में भारत ने विश्व को ऐसे अनेकों अदस्र अनुदान दिये, जिनके बल पर इसे जगद्गुरु कहा गया तथा चक्रवर्तित्व के मान से सम्मानित किया गया। हमने राजनीतिक आधार पर भारत की सीमाओं को पार करके सैन्य-अभियानों, हिंसा तथा रक्तपात से किसी भी अन्य देश पर अपने स्वत्व की स्थापना की चेष्टाए नहीं की। हमने तो विश्वमानवता को मूल्यपरक जीवन जीने हेतु ऐसे तत्व प्रदान किए, जिससे वह मानवीयता की दिशा में अग्रसर हो सके। हमारा चक्रवर्तित्व हमारी इसी उपलब्धि में निहित है और इसी कारण हमारी इस सांस्कृतिक विरासत को ‘विश्व-संस्कृति’ कहकर अभिहित किया गया। भारत की धरती के कण-कण में संस्कार भरे हुए हैं, फलत: इसे देवभूमि भी कहा जाता है। यह भूमि सदा से सम्वेदना सिक्त रही है और इसने सदैव समर्पण त्याग और बलिदान की शिक्षा दी है। इसने हमें सदैव इन संस्कारों को विश्व में प्रसारित करने और उन्हें स्थापित करने की प्रेरणा दी है।

यह इतिहास का सच है कि अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर के बल पर ही हम यश, समृद्धि एवं वैभव के शिखर पर पहुँचे थे। हमारी यह आभा समस्त विश्व को आलोकित तथा आकृष्ट करती थी तथा मानवता सदैव हमसे कुछ नया और वैशिष्ट पाने की अपेक्षा करती थी। आज स्थितियाँ इससे भिन्न हैं।

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