न जाने कहाँ कहाँ - आशापूर्णा देवी Na Jane Kahan Kahan - Hindi book by - Ashapurna Devi
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न जाने कहाँ कहाँ

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2012
आईएसबीएन : 9788126340842 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :138 पुस्तक क्रमांक : 405

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी जी का एक और उपन्यास

Na Jane Kahan Kahan - A Hindi Book by - Ashapurna Devi न जाने कहाँ कहाँ - आशापूर्णा देवी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित बांग्ला की सर्वाधिक चर्चित लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी की अधिकांश रचनाएं मध्य एवं निम्न वर्ग की पृष्ठभूमि में लिखी गयी हैं। प्रस्तुत उपन्यास के पाठकों का सम्बन्ध भी इन्हीं दो वर्गों से है। प्रवास जीवन, प्रवास जीवन की बहू चैताली, मौसेरी बहन कंकना दी, छोटा बेटा सौम्य, विधवा सुनीला, सुनीला की अध्यापिका बेटी व्रतती, गरीब अरुण और धनिक परिवार की लड़की मिन्टू- ये सभी पात्र अपने-अपने ढंग से जी रहे हैं। उदाहरण के लिए, प्रवास जीवन? विपत्निक हैं। घर के किसी मामले में अब उनसे पहले की तरह कोई राय नहीं लेता। उनसे बातचीत के लिए किसी के पास समय नहीं है। रिश्तेदार आते नहीं हैं, क्योंकि अपने ही घर में किसी को ठहराने का अधिकार तक उन्हें नहीं है। इन सब से दुःखी होकर भी वह विचलित नहीं होते। सोचते हैं कि हम ही हैं जो समस्या या असुविधा को बड़ी बनाकर देखते हैं, अन्यथा इस दुनिया में लाखों लोग हैं जो किन्हीं कारणों से हमसे भी अधिक दुःखी हैं। और? भी अनेक-अनेक प्रसंग है जो इस गाथा के प्रवाह में आ मिलते हैं। शायद यही है दुनिया अथवा दुनिया का यही नियम। जहाँ तहाँ, जगह-जगह यही तो हो रहा है!
उपन्यास का विशेष गुण है कथ्य की रोचकता। हर पाठक के साथ कहीं न कहीं कथ्य का रिश्ता जुड़ जाता है। जिन्होंने आशापूर्णा देवी के उपन्यासों को पढ़ा है वे इसे पढ़ने से रह जाये ऐसा हो ही नहीं सकता!

मैं अब देख रहा हूँ मैंने यह एक निरर्थक ज़िद की थी। दरअसल हमारी दृष्टि हर समय स्वच्छ नहीं रहती। अपने चारों ओर एक घेरा बनाकर हम अपने को उसी में कैद कर लेते हैं, और फिर अपना ही दुःख, अपनी वेदना, अपनी समस्या, अपनी असुविधा-इन्हें बहुत भारी, बहुत बड़ा समझने लग जाते हैं और सोचते हैं कि हमसे बुरा हाल और किसी का नहीं होगा, हमसे बड़ा दुःखी इन्सान दुनिया में नहीं। जब नज़र साफ़ कर आँखें उठाकर देखता हूँ तो पाता हूँ-दुनिया में कितनी तरह की समस्याएँ हैं ! शायद हर आदमी दुःखी है।

न जाने कहाँ कहाँ

जाड़ा विदा हो चुका था।
हर कमरे में, डाइनिंग रूम में, टी.वी. वाले कमरे में हर समय फुलफोर्स में पंखे घूमते रहते। चैताली के अलावा, कमरे से उठकर जाते वक़्त कोई भी पंखा बन्द नहीं करता था।
प्रवासजीवन के कमरे में अभी भी पंखा चलना शुरू नहीं हुआ है। ये लोग कमरे में घुसते ही बोल उठते, ‘‘अरे बाप रे ! आप भी अजीब हैं। इस गरमी में...’’ और पंखे के स्विच ऑन कर देते।
काटुम या काटाम कमरे में घुसते ही ‘ही ही’ करके हँसने लगते, बाबाजी, आपने अपनी रजाई हटा दी है ? ओढ़ोगे नहीं ?’’
हालाँकि प्रवासजीवन ऐसी बातों का बुरा नहीं मानते हैं। उन्हें सचमुच उतनी गरमी लगती नहीं है। बल्कि सुबह तड़के और शाम को जैसे ही सूरज ढलता है उन्हें हल्की ठण्ड लगती है। तब वे पतला-सा एक शॉल खींचकर ओढ़ लेते हैं।
आज भी एक शॉल ओढ़े शाम की डाक में आये पत्रों को देख रहे थे। एक आध पत्र-पत्रिकाएँ आज भी आती हैं। अंग्रेजी जर्नल। उन्हीं जर्नलों के बीच में से एक उनके नाम का लिफाफा देखकर आश्चर्यचकित हुए। परिचित, महिला की लिखाई यद्यपि अब जो प्रायः विस्मिता थी।

पत्र को दो तीन बार पढ़ा और अपने अनजाने में शॉल हटाकर कुछ चचंल हो उठे। इन लोगों से यह बात कहेंगे कैसे ?
न जाने क्यों जब से ‘प्रनति’ चली गयी हैं, घर के अन्य लोगों को वे इकाई के रूप में देखते हैं ‘ये लोग’ ‘इनका’ ‘इन्हें’। अलग किसी की कोई सत्ता नहीं थी प्रवासजीवन के लिए।
जबकि ‘ये लोग’ हैं कौन बड़ा बेटा दिव्य उसकी पत्नी चैताली उनके दो बच्चे ‘काटुम’ ‘काटाम’। हालाँकि एक जन और भी है। छोटा बेटा सौम्य। पर वह इस घर में रहता ही कितना है ! और उसका सम्बन्ध है ही किसके साथ ! वह ‘इन लोगों’ का भी कोई नहीं प्रवासजीवन का भी कोई नहीं। घर के किसी विषय से वह जुड़ा नहीं है फिर भी, जब तक प्रनति थीं शायद पतली-सी एक डोर से बँधा था...अब तो ख़ैर वह डोर टूट ही चुकी है।
युनिवर्सिटी के रजिस्टर पर नाम ज़रूर चढ़ा हुआ है। समय से जाता है या नहीं, किसी को पता नहीं। कौन जाने, जाता हो ! लेकिन उसे पढ़ते-लिखते किसी ने देखा नहीं। तो क्या किसी राजनीतिज्ञ सीनियर भइया के चंगुल में फँसा है ? वैसा कुछ भी तो नहीं लगता है।

खैर, उसके बारे में कोई सोचता नहीं है। घर में दोनों वक़्त खाता है, रात को सोता है, इतना ही काफ़ी है।
जबकि प्रवासजीवन के मन की गहराइयों में एक अनबुझी प्यास है, इच्छाओं की प्यास। मन कहता है, सोचें सुमू मेरा है। जी चाहता है कि सुमू कभी-कभार आकर उनके कमरे में बैठे, उनसे बात करे। वह उनके चहरे की ओर देखें, उनके शरीर की महक को सूँघें।
सबसे छोटा ये बेटा, लम्बा भले ही बाप भाई सा हो गया है, चेहरा हू ब हू माँ जैसा है। चेहरे की बनावट ठोढ़ी और बात करते समय आँखों के कोनों का थोड़ा सिकुड़ना और हँसने पर गालों में गढ्ढे पड़ना बिल्कुल प्रनति जैसा। हँसते सुनो तो लगता है, प्रनति ही हँस रही है।
पर हँसने-देखने का मौका ही कब मिलता है प्रवासजीवन को ! सुनते हैं कभी-कभी हँसने की आवाज सुनाई पड़ जाती है। यूँ भी गम्भीर प्रकृति का तो है नहीं न ! लेकिन हँसना बोलना सब कुछ भतीजे भतीजी के साथ ही होता है। घर पर जितनी देर रहता है, बच्चों के साथ रहता है। बच्चे पुकारते हैं चाचाई।
हाँ, चाचा नहीं चाचाई।

प्रनति थीं तब।
थीं हर जगह व्याप्त शरीर और आत्मा की तरह। इसीलिए जब पोती ने पहली बार अपने पिता को ‘बापी’ पुकारा वह बोल उठी थीं, ‘‘अरे बापी’ नहीं, बापी नहीं पुकारना है तो ‘बाबाई’ पुकार। यही सबसे अच्छा नाम है।’’
काटुम ने बाबाई पुकारना शुरू किया और छन्द मिलाकर चाचा को भी चाचाई पुकारने लगी।
प्रायः प्रवासजीवन सोचा करते, ये तीनों यहाँ, इस कमरे में भी तो आकर हल्ला मचा सकते हैं।
लेकिन ‘ये लोग’ ऐसा नहीं करते हैं।
वे अपनी ही परिधि में रहते हैं।

इधर इच्छा होने पर भी प्रवासजीवन अपने चिर अभ्यस्त दायरे से बाहर निकलकर, घर के किसी दूसरे कमरे में आ नहीं पाते हैं। वे चाहें तो जीवन का स्वाद बदलने के लिए इधर आ सकते हैं। परन्तु ऐसा कर कहाँ पाते हैं ! उस पर हार्ट पेशेण्ट हैं, यह मुहर भी उन पर लग चुकी है। इधर आजकल पाँव में बादी का दर्द रहने क्या लगा, कमरे में कैद होकर रह गये हैं।
घर का सबसे ज्यादा हवादार कमरा है उनका। जब कमरा बन रहा था प्रनति ने ही प्लान से अधिक खिड़कियाँ बढ़वा दी थीं। और जिस ओर बरामदा रहने की कोई बात नहीं थी उधर ‘ब्रैकेट बॉल्कनी’ बनवाकर मानी थीं।
उस समय प्रवासजीवन ने कहा था, अगर सारी दीवाल खिड़की दरवाजे ही खा लेंगे तो अलमारी किताबों की रैक कहाँ रखोगी ?’’

‘‘मेरे सिर पर।’’ कहकर हँसने लगी थीं।
कब की बात है ये ? तब शायद दीबू क्लास टेन में पढ़ता था और सुमू क्लास फोर में।
गृहिणी होकर भी गम्भीर नहीं हो सकी थीं। हँसने का रोग था उन्हें।
ओफ़ ! आज अगर प्रनति होतीं तो इस साधारण सी चिट्ठी के मसले को लेकर प्रवासजीवन को इतना सोचना पड़ता ?
शॉल कन्धे से झटककर उतार दिया था। खिड़की से ठण्डी हवा का झोंका आ रहा था लेकिन बुरा नहीं लगा। चिट्ठी का कोना मेज़ पर हल्के हाथ से ठोंकने लगे अनमने होकर। फट से ये बात कैसे बतायी जाये ?
चैताली कमरे में आयी।

पीछे भूषण। भूषण के हाथ में स्टेन्लेस स्टील की ट्रे उस पर प्रवासजीवन की चाय, थोड़ा छेना और दो क्रीम क्रैकर बिस्कुट।
ट्रे सामने रखकर भूषण चला गया। चैताली पास रखी बेंत की कुर्सी पर बैठी। बेहद ड्यूटी के प्रति सचेत लड़की है चैताली। जब से प्रवासजीवन को कमरे में चाय-नाश्ता करने के लिए डॉक्टर ने कहा है तब से सुबह-शाम वह भूषण के साथ आती है। खाना समाप्त होने तक वहीं बैठी रहती है।

वास्तव में कहना पड़ेगा कि चैताली ही प्रवासजीवन और इस गृहस्थी के मध्य सेतु का काम कर रही है।
इस समय चैताली से उनकी छिटपुट बातें होती हैं। उन्हीं बातों के माध्यम से घर की घटनाओं से अवगत हो लेते हैं।
परन्तु लंच और डिनर वे यहाँ बैठकर खाने को तैयार नहीं।
वैसे भी अब पहले की तरह डाइनिंग रूम निचली मंज़िल में है कहाँ ? प्रनति के जाने के कुछ दिनों बाद ही प्रनति का इतने अरमानों का ‘खाने का कमरा’ ख़ाली करके मेज़, कुर्सी, फ्रिज, साइड बोर्ड वगैरह लाकर ऊपरवाले हॉल को डाइनिंग रूम में बदल दिया गया। बल्कि बीच से एक हल्का पार्टीशन लगाकर एक तरफ ड्राइंगरूम भी बना लिया है। बार बार कौन ऊपर नीचे करेगा। बच्चे भी तो जाना नहीं चाहते हैं। कैसा ख़ाली-ख़ाली लगता है नीचे। आश्चर्य लगता है, अकेली प्रनति ही सारे घर में जान फूँके रहती थीं।

उन दिनों घर में हर समय लोग बोला करते थे। गृहिणी तो अकेली ही सौ के बराबर थी। हर कोई ज़ोर से बोलता था। दबी आवाज़ में बोलना तो कोई जानता ही नहीं था। अब सब बदल गया है।
तेज़ और ऊँची आवाज़ में कोई नहीं बोलता है।
धीरे बोलो, धीरे हँसो।
जो कुछ शोर मचता वह दूरदर्शन के पर्दे पर। वह भी गला फाड़कर गाता, उसी में शोर मचाकर नाचा जाता।
जहाँ हर कोई धीरे बोलते, धीरे चलते, दबी आवाज़ में बोलते वहाँ प्रवासजीवन अपने निजी स्टाइल में गला फाड़कर पुकार न पाते भूषण ! अथवा दे...बू !’

हाँ वे लोग हैं।
बालक देबू के होठों के ऊपर अब बारीक मूँछों की रेखा उभर आयी है और युवक भूषण थोड़ा और जवान हो गया है। अब तो वे लोग भी घर की धारा के मुताबिक बह रहे हैं। भूषण अब सोच ही नहीं सकता है कि खाना पकाते-पकाते एकाएक हिन्दी सिनेमा के गाने की एक लाइन गा सकता है।
चैताली बोली, ‘‘दोपहर में थोड़ा रेस्ट किया था न पिताजी ?’’
प्रवासजीवन हँस पड़े, ‘‘रेस्ट तो हर समय ही करता हूँ, बेटी।’’
‘‘वाह ! यह कैसे कह रहे हैं ? किसी-किसी दिन तो आप दोपहर भर किताब पढ़ा करते हैं।’’
प्रवासजीवन जानते हैं, बात करने के लिए ही यह सब कह रही है। इस लड़की में सौजन्यता का ज्ञान बहुत है।
वे भी उस वातावरण को बनाये रखकर मुस्करा देते हैं,‘‘वह तो कभी कोई किताब जब बहुत अच्छी लगती है तब।’’
इसके बाद ही प्लान मुताबिक झट से चिट्ठी उठाकर चैताली की ओर बढ़ाकर कौतुक पूर्ण स्वरों में बोल उठे, ‘‘तुम्हारी गृहस्थी में तो एक और मेम्बर बढ़ गया। देखो पढ़कर !’’

चैताली की भौंहें जरा सी सिकुड़ीं क्या ? शायद..। पत्र हाथ में लेते हुए बोली, ‘‘यह पत्र तो आपके नाम है।’’
‘‘अरे नाम तो मेरा ही होगा परन्तु भार तो तुम पर भी पड़ेगा।’’
तह खोलकर चैताली ने पत्र पढ़ा। उसके बाद चुपचाप फिर से तह करके छेने की प्लेट के पास मेज़ पर रख दिया। उसके हावभाव से किसी तरह का कुछ अनुमान लगा पाना सम्भव नहीं था।
प्रवासजीवन बड़े अप्रतिभ हुए। सोचा था कुछ ज़रूर कहेगी। नहीं तो एक आध सवाल पूछेगी। यह भी तो पूछ सकती थी, ‘‘यह लाबू कौन है ?’’
यूँ पहचान लेने की बात भी नहीं है। शादी के वक़्त देखा होगा। लेकिन उस समय देखा चेहरा कहाँ याद रहता है ! नयी बहू को तो न जाने कितने चेहरे देखने को मिलते हैं।

अप्रतिभ प्रवासजीवन ने छेने की प्लेट ज़रा आगे खींच, गला साफ़ कर बड़े ही सहज ढंग से कहा, ‘‘लाबू कौन है पहचान पायी ? मेरी बुआ की लड़की। तुम्हारी शादी के वक़्त आयी थी। तुम्हारी सास से तो उसकी बहुत दोस्ती थी। कम उम्र में विधवा हुई है। अगर कहा जाये कि यहीं पली-बड़ी है तो उसमें दोष नहीं होगा। दादी ज्यादातर बीमार रहती थीं इसीलिए बुआजी भी अक्सर यहीं रहती थीं।’’
चैताली ने केवल ‘हूँ’ कहा।
इकट्ठा इतनी सारी बातें करने के बाद प्रवासजीवन ने ‘हूँ’ सुना तो उनका साहस बढ़ गया। बोले, ‘‘बेवक़्त बेचारी के पति का देहान्त हो जाने से पढ़ा तो तुमने ? जान तो गयी हो सब !’’
हाँ पढ़कर जान तो गयी ही है।
एक ही नज़र में पढ़कर समझ लिया है।

लाबू के पत्र का सारांश ही था-भगवान की कृपा से (जीवन भर भगवान की निर्दयता देख-देखकर भी न जाने कैसे लोग भगवान की दया पर मोहित हो जाते हैं।) उसके बड़े लड़के को बी.ए. पास करते ही कलकत्ते में एक नौकरी मिली है। हालाँकि केवल बी.ए. ही पास किया है। ख़ैर उसे नौकरी तो मिली है। पर अब समस्या है हर रोज़ हुगली से डेली पैसेंजरी करना। आज के इस गड़बड़ माहौल में बड़ा ही मुश्किल है बल्कि असुविधाजनक भी। अक्सर ही तो ट्रेनें ठप्प होकर खड़ी रहती हैं। उस पर कलकत्ते के मेस में रहकर अपना ख़र्च चलाते हुए माँ को घर पर रुपया भेजना भी तो असम्भव है। फिर एक अच्छे-भले घर के लड़कों के रहने योग्य मेस में सीट मिलना भी तो कम कठिन नहीं। इसीलिए वह अपने बेटे को प्रवासदा के पास भेज रही है। उनके पास रहकर दफ्तर आना-जाना करेगा तो अनेकों समस्याओं का समाधान खुद ब खुद हो जायेगा।

प्रवासदा के घर में रहने की जगह का अभाव भी नहीं है। लाबू तो देख गयी है, कितने कमरे हैं। रही खर्च की बात ? वह लाबू अपने प्रवासदा को लिखकर शर्मिन्दा करना नहीं चाहती है। लड़का खुद समझदार है...कम खर्च में वह काम चला लेगा।
जवाब पाने का समय है नहीं अतएव वह अगले सोमवार को ही जा रहा है उसी दिन उसकी ज्वाइनिंग डेट है।
लाबू ने और लिखा है-‘‘बुद्धू लड़का अमीर मामा के यहाँ जाने से डर रहा है इसीलिए सस्ते मेस के लिए बार बार जिद कर रहा है। मैंने भरोसा दिलाया है-आदमी अमीर दूसरे अर्थ से होता है। तुम जाओगे तो खुद देख लोगे प्रवास मामा ऐसे नहीं हैं।’’
लाबू लिखती साफ और स्पष्ट अक्षरों में है। पढ़ने में दिक्कत नहीं होती है। पत्र की भाषा में जो दाँव-पेंच था उसे पढ़कर चैताली मन ही मन हँसी-कड़ुआहट पूर्ण तिरछी हँसी। लेकिन उसके चेहरे पर एक लकीर तक नहीं खिंची।
प्रवासजीवन के इतना कुछ कहने के बाद भी, चैताली ने, बिना किसी टिप्पणी के हमेशा की तरह पूछा, ‘‘आज रात को रोटी ही खाएँगे न पिताजी ?’’

हाँ, उस दिन के बाद से यह प्रश्न चैताली हमेशा करती है। न जाने कब की बात है, एक दिन प्रवासजीवन कह बैठे थे, ‘‘आज रोटी खाने की इच्छा नहीं हो रही है, दो टुकड़े टोस्ट खाने की बात सोच रहा हूँ।’’
उस दिन से।
प्रश्न की आकस्मिकता से हड़बड़ाकर बोले, ‘‘हाँ, हाँ।’’
चैताली चली गयी।
प्रवासजीवन सोचने लगे-ये लोग कितनी आसानी से मनुष्य की सत्ता को झुठला सकते हैं।
मनुष्य ! अब क्या ऐसा कहना ठीक होगा ?

प्रवासजीवन ने अपने पिछले जीवन के एल्बम को खोलकर देखने का प्रयास किया। घर के प्रधान तो थे ही।
हालाँकि बात बात पर प्रनति कहती थी, ‘तुम चुप तो रहो जी। हर बात में नाक डालने की कोशिश मत करो।’ परन्तु इससे क्या उनके प्रधान होने में कोई बाधा पहुँचती थी ? अपनी इच्छापूर्ति के लिए उन्हें क्या किसी के आगे अर्जी पेश करनी पड़ती थी ? या कि अपने को अनधिकारी अनधिकारी सा लगता था ?
अब तो हर कदम पर, हर मामले में अपने को अधिकार रहित सा पाते हैं। पता नहीं क्यों साहस खो बैठे हैं !
प्रनति ही क्या उनके भरोसे की खूँटी थी ?

उनकी निगाहें एल्बम के पुराने-पुराने पृष्ठों पर बार बार ठहरने लगीं।
उनके अपनी तरफ़ के जो भी रिश्तेदार थे उनके बारे में प्रवासजीवन ने क्या कभी सोचा था ? वरन् प्रनति की त्रुटिहीन व्यवस्था पर मोहित ही होते थे। बल्कि कभी-कभी तो वे शिकायत ही कर बैठते थे, ‘तुम हर बात में अति करती हो। पिंटू की लड़की की शादी में इतनी महँगी साड़ी देने की क्या जरूरत थी ?’’
प्रनति तुरन्त कहतीं, ‘‘वाह पिंटू तुम्हारा रिश्ते का चचेरा भाई है। रद्दी साड़ी देना क्या ठीक लगता ?’’ और इसी लाबू के मामले में....

अच्छा लाबू का यह लड़का, जो नौकरी करने आ रहा है, क्या उम्र होगी उसकी ? लगता है उस दिन की तो बात है जब इसके अन्नप्राशन की दावत खाने वे और प्रनति उनके हुगली वाले घर में गये थे। तब लाबू के सास-ससुर भी जीवित थे।
उस समय प्रनति अपने साथ कितना सामान ले गयी थीं। बच्चे के लिए सिल्क की चेली, चाँदी की कटोरी सिल्क का नन्हा सा कुर्ता उसमें इतने छोटे-छोटे सोने के बटन इसके अलावा मिठाई फल तो था ही।
प्रवासजीवन को देखकर खुशी ही हुई थी फिर भी बोले थे ‘‘क्या इतना दिया जाता है ?’’
प्रनति झिड़ककर बोली थीं ‘वाह ! नहीं दोगे क्या ? तुम मामा हो कि नहीं ? मामा के यहाँ से ही खीर-चटाई का सामान जाता है।’’

उसके बाद सोचा था, अच्छा हुआ प्रनति ने सब कुछ मन से कर दिया था। दोबारा तो लाबू बेचारी के बच्चा हुआ नहीं। असमय में विधवा हो गयी। इसीलिए प्रनति भी उससे सहानभूति रखती थी। अपने बड़े बेटे की शादी के वक़्त लाबू को जबरदस्ती ले आयी थी प्रनति।
एकाएक लगा आज अगर प्रनति जिन्दा होती ! सुनकर जरूर कह बैठती, ‘‘ओ माँ ! देखो ज़रा। एक लड़का ही तो है यहाँ रहेगा इसमें असुविधा का प्रश्न ही कहाँ उठता है ? लाबू ननदजी ने इतना हिचकते हुए क्यों लिखा है बाबा ? गाँव के लड़के कलकत्ते में रहनेवाले रिश्तेदारों के यहाँ रहकर पढ़ते हैं, कामकाज करते हैं। अरे दूर से रिश्तेदार आकर रह जाते हैं, उसका तो यह मामा का घर है।’’

फिर खुली खिड़की से आयी तेज़ हवा से सारा शरीर सिहर उठा। उतरा शॉल उठाकर फिर ओढ़ लिया।
थोड़ी देर बाद दीबू कमरे में आया। बड़ा बेटा दिव्यजीवन। यही तो प्रवासजीवन की आकांक्षा है। लड़के आयें, उनके कमरे में आकर बैठें। परन्तु आज उसके आते ही समझ गये कि उसका यह आना बाप के पास बैठने के लिए नहीं हुआ है। बात सच ही निकली।
दिव्य बिना किसी भूमिका के बोल उठा,‘‘सुना लाबू बुआ का लड़का यहाँ रहना चाहता है ?’’
प्रवास जीवन कुछ हिलडुलकर बैठे, जरा सा हँसे, बोले, ‘‘लड़का नहीं चाहता है। लड़के की माँ चाहती है। ये लो न चिठ्ठी पढ़कर देखो।’’
‘‘देखने की जरूरत नहीं है। लेकिन मेरे विचार से यह उनकी माँग अन्यायपूर्ण है।’’
‘‘अन्यायपूर्ण माँग ?’’

‘‘अवश्य ! आजकल के जमाने में एक बाहरी लड़के को घर में रखना बहुत रिस्की है।’’
प्रवासजीवन आहत स्वरों में बोले, ‘‘लाबू का लड़का बाहरी है ?’’
‘‘मैं तो ऐसा ही समझता हूँ। तुम्हारी फुफेरी बहन का लड़का।’’
प्रवासजीवन को समझने में कुछ समय लग गया। ओह ! लड़का प्रवासजीवन का भांजा नहीं-उनकी फुफेरी बहन का लड़का है-इन लोगों के बाप की फुफेरी बहन का लड़का।

सहसा गुस्सा आ गया। इस तरह से कहने का अर्थ क्या हुआ घर क्या इनका है ?
प्रवासजीवन की जीवनभर की कमाई से तैयार नहीं हुआ है यह घर, यह गृहस्थी यह सारी साजसज्जा, फर्नीचर ? यहाँ तक कि एक-एक कील, तक उनकी ही कमाई के पैसे से आया था। प्रनति के अथक प्रयास, जतन स्वप्न इस मकान की हर ईंट के जोडों में नहीं समाये हुए हैं। क्या यहाँ प्रवासजीवन अपने एक स्नेही आत्मीय को जरा सी जगह नहीं दे सकते हैं ?
सभ्यता सौजन्यता कर्तव्य किसी चीज़ का ज्ञान नहीं ? क्या सेण्टीमेण्ट नाम की चीज़ भी इन लोगों में नहीं है ? मैं पूछता हूँ मेरे पेन्शन के रुपयों से घर का एक बड़ा खर्च नहीं पूरा होता है ? हमेशा की तरह भूषण और देबू की तनख्वाह से आज भी अपने हाथ से देते हैं। हो सकता है इसीलिए आज तक वे टिके हुए हैं वरना फालतू कहकर उन्हें भी कब का निकाल चुकी होती घर की वर्तमान गृहिणी।

वे जानते हैं उन दोनों पर खूब सख्ती बरती जाती है।
कभी कभार एकान्त में दो बातें करने का अवसर पा जाते हैं तो दबी जुबान में धीरे से कह ही डालते हैं, ‘‘जब तक आप हैं हम लोग तभी तक यहाँ रहेंगे, बाबूजी। उसके बाद एक दिन भी नहीं।’’
प्रवासजीवन कहते, ‘‘अच्छा बाबा अच्छा-अब चुप हो जाओ।’’
आँखों के सामने तो देख रहे थे प्रवासजीवन कि इस युग के न्याय-अन्याय के मापदण्ड और उनके समय के मापदण्ड में बहुत फ़र्क है। फिर भी साहस जुटाकर न्याय के पक्ष में कुछ बोल नहीं पाते हैं।
अन्याय तो हो ही रहा है।
इस युग में ‘नौकर’ नहीं कहा जाता है। ऐसा कहना अमानवीय है। इसीलिए कहा जाता है ‘काम करने वाला-इसलिए उन्हें काम करने का यन्त्र समझा जाता है। उनके पास हृदय है, सुख-दुःख का बोध उनमें भी है, मान-अभिमान वे भी कर सकते हैं।

इन बातों का ख्याल कोई नहीं करता है।
उनके अभिमान को उनका दुस्साहस समझा जाता है। बदमाशी कही जाती है।
रह-रहकर उत्तेजित दिव्य आकर प्रवासजीवन को उनके लाड़लों की शिकायत सुना जाता है। वह उन्हें परोक्ष रूप से समझा जाता है कि ये काम करने वाले उन्हीं के सिर चढ़ाने के कारण इतना बिगड़ गये हैं।
हाँ, दिव्य ही आकर ये सब सुना जाता है। चैताली के मुँह से तो आवाज़ तक नहीं निकलती है।
ख़ैर प्रवासजीवन तो दृढ़तापूर्वक इस समय न्याय का पक्ष नहीं ले सके ? इन लोगों के विरुद्ध ? बाप रे ! डर के मारे जान निकली रहती है।
बोल उठते, ‘‘ओह ! जितने पुराने हो रहे हैं उतने ही सिर पर चढ़ते जा रहे हैं। छुड़ा दो..पता चल जायेगा कि कितने सुख की नौकरी कर रहे थे।’’

यह कहते न बना-‘‘यह तो तुम लोगों के जबरदस्ती है...’’
यह भी न कह सके-मैं तो थक चुका हूँ तुम लोगों की शिकायत सुनते-सुनते निकाल दो न....न रखना चाहो, निकाल दो।’
हिम्मत नहीं होती है।
जानते हैं इससे आग भड़क उठेगी।
आज के ज़माने में काम का आदमी पाना तो भगवान पाने के समान है। ये दोनों चले गये तो चैताली को बड़ी तकलीफ होगी। तब शायद प्रवासजीवन को ही सुनना पड़ेगा-उन्होंने जानबूझ कर ही नौकरों को निकाल दिया है जिससे चैताली को असुविधा का सामना करना पड़े।
डर ! न जाने क्यों सर्वदा ऐसे भय के बीच उन्हें रहना पड़ता है यह वह स्वयं नहीं जानते हैं।
अच्छा प्रनति के समय में प्रवासजीवन क्या इसी तरह भयभीत रहा करते थे ?
 
अब क्यों इतना डरते हैं ? क्यों अधिकारहीनता प्रकट करते हैं ? क्यों न्याय का पक्ष नहीं ले पाते हैं ?
इसीलिए वे कह न सके, ‘‘लाबू ने शायद इस दृष्टिकोण से सोचा ही नहीं था, दिव्य। सोचा होगा, मकान उसके प्रवास भाई का है। कमरों की भी कमी नहीं है।’’
ऐसा न कह सके।
केवल बोले, ‘‘वैसे घर में, माने निचली मंज़िल में दो दो कमरे तो ख़ाली ही पड़े हैं। वहीं रखा जा सकता है।’’
होंठ दबाते हुए दिव्य बोला, ‘‘जानता हूँ। दो कमरे ख़ाली और बेकार पड़े हैं और यह भी जानता हूँ कि इससे बड़ी बेवकूफ़ी और क्या हो सकती है। टेनेण्ट रखा होता तो मोटी रक़म घर आती।’’
‘‘होता लेकिन हुआ नहीं।

खाने की मेज़ अलमारियां वगैरह ऊपर ले जाने के बाद बड़े बेटे ने कहा था दो कमरों को किराये पर उठाने के लिए।
लेकिन यहीं प्रवासजीवन समर्थन न कर सके। शायद पहले वाली शक्ति के बल पर। बोल उठे थे, ‘‘मेरे जीते जी ऐसा नहीं होगा बेटा !’’ तुम्हारी माँ कहती थीं, अभाव हुआ तो एक वक़्त खाना खाएँगे पर इस घर में किरायेदार कभी न घुसाना।
लड़के बहू के विचार से यह एक युक्तिहीन सेण्टीमेण्ट है। न जाने लोग क्या क्या कहते हैं ? क्या उन सभी बातों को मान लेना चाहिए ?

 
 

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