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बाल एवं युवा साहित्य >> नाना नानी की कहानियां

नाना नानी की कहानियां

अनिल कुमार

3.95

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-8133-376-3 पृष्ठ :40
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 3970
 

सदाबहार, शिक्षाप्रद एवं मनोरंजक कहानियों का अनूठा संकलन....

Nana nani ki kahaniya Ku. Anil Kumar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

टर्राना और फुंसफुसाना

पानी का एक सांप जिस तालाब में रहता था, उसे अपनी जागीर जैसा समझता था। उसी तालाब के निकट एक अन्य विषैला सांप (वाइपर) भी रहता था, जो वहां पानी पीने आता था। और उस तालाब पर केवल अपना हक मानता था। एक दिन पानी के सांप ने विषैले सांप को चुनौती दी और मामले को हमेशा के लिए हल करने की सोची दोनों आपस में भिड़े गए।
तालाब के किनारे रहने वाले मेढक इस लड़ाई में वाइपर सांप के साथ थे, क्योंकि पानी का सांप उन्हें तनिक न भाता था। वे टर्रा-टर्रा कर वाइपर का उत्साह बढ़ाने लगे और अंत में जीत भी वाइपर की ही हुई। तब मेढकों ने वाइपर से जीत में अपने हिस्से की माँग करी। लेकिन जब जवाब में वाइपर फुसफुसाने लगा तो मेढकों ने आश्चर्य से पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है ? इस पर वाइपर बोला-‘‘जिस तरह टर्राकर तुमने मेरा साथ दिया, उसी तरह फुंफकारकर मैं उसका बदला चुका रहा हूं।

घोड़े की दुलत्ती


एक बार एक भेड़िये ने घोड़े को घास चरते देखा तो उसे अपना शिकार बनाने की ठानी। घोड़े ने भेड़िये को अपनी ओर आते देखा तो पैर में चोट लगने का नाटक करने लगा।
‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है ?’’ भेड़िये ने छलपूर्वक पूछा।
‘‘मेरे एक खुर में चोट लग गई है।’’ घोड़ा बोला-‘‘लगता है कांटो पर चलने के कारण ऐसा हुआ है।’’
‘‘ओह ! बहुत दर्द हो रहा होगा।’’ धूर्त भेड़िया बोला-‘‘ लाओ, जरा मैं देखूं तो तुम्हारी चोट।’’
‘‘हाँ-हां क्यों नहीं जरूर देखो।’’ घोड़ा बोला।
और जैसे ही भेड़िया उसके खुर को नजदीक से देखने के लिए नीचे झुका तो घोड़े ने अपने पिछले दोनों पैर उठाकर ऐसी दुलत्ती झाड़ी कि गीदड़ हवा में जा उछला। और जब जमीन पर गिरा तो उसके पैरों की हड्डियां टूट गईं। कुछ दिन तक वह चलने के काबिल भी न हो पाया। जब वह लंगड़ाकर चलने लायक हुआ तो धीरे-धीरे लंगड़ाता हुआ जंगल की ओर लौट चला। वह सोच रहा था वह भी कैसा मूर्ख है, जो घोड़े को आसान शिकार समझ रहा था कि यूं मारा और चट कर गया। लेकिन उसे तो लेने के देने पड़ गए थे।

ऊपर ही नहीं नाचे भी


एक ज्योतिषी की यह आदत थी कि वह रात चलते समय नीचे या सामने देखने के बजाए ऊपर आकाश में तारे देखते हुए चलता था। इसी तरह एक रात वह तारों को निहारता चला जा रहा था कि अचानक एक गड्डे में जा गिरा और लगा चिल्लाने।
उसकी चिल्लाने की आवाज सुन आस-पास के राहगीर वहां पहुंचे और उसे गड्ढे से बाहर निकाला। एक व्यक्ति बोला-‘‘अरे भाई ! जब तुम्हें यही नहीं पता कि तुम्हारी नाक के नीचे क्या है, तो ऊपर आकाश में क्या खाक ढूंढ पाओगे।’’
सुनकर ज्योतिषी को वास्तविकता का आभस हुआ। आज भी ऐसे अनेक लोग हैं, जो इस ज्योतिषी की तरह ही करते हैं और खतरा मोल लेते हैं- अपनी इच्छा, आकांक्षओं को जल्द पूरा करने के लिए।

शेर ने ली जब सांस


एक बार एक शेर का पेट गड़बडा गया और उसका हाजमा खराब हो गया। उसने जंगल के सभी डॉक्टरों को बुलवा भेजा।
डॉक्टर जेब्रा बड़े पेशेवराना अंदाज में बोला-‘‘महाराज लगता है आपको गैस की बीमारी है, आपके पेट में गंदी हवा भर गई लगती है।’’
‘‘मूर्ख प्राणी ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसी घटिया बात कहने की।’’ शेर ने गुस्से से कहा और उस जेब्रा का काम तमाम कर दिया।
तभी वहां मौजूद लकड़बग्घा बोल उठा-‘‘महाराज ! मुझे तो सुगंधित हवा लगती है।’’ जेब्रा का हश्र देख उसने जोखिम लेना मुनासिब न समझा।
‘‘चुप चापलूस !’’ शेर दहाड़ा और एक ही झटके में लकड़बग्घे का काम तमाम कर दिया। अब शेर मुखातिब हुआ लोमड़ी से और बोला- ‘‘तुम्हारा क्या विचार है सयानी लोमड़ी ? ’’
‘‘क्षमा चाहती हूँ महाराज !’’ लोमड़ी चतुराईपूर्वक बोली-‘‘मुझे तगड़ा जुखाम हो गया है और मैं कुछ भी सूंघ पाने के लायक नहीं हूं।’’
लोमड़ी की इस चतुराई को शेर भाप गया और उसने लोमड़ी की जान बख्श दी।

लोमड़ी की उदारता


हंसों के झुण्ड में एक लोमडी़ जा पहुंची। उसे देख हंसों के प्राण सूख गए कि अब जान बचाना मुश्किल है। लोमड़ी ने उन्हें अत्यधिक भयभीत पाया तो उनकी आखिरी इच्छा पूछी-‘‘तुम लोगों की कोई अंतिम इच्छा हो तो कहो।’’ उदारता दिखाते हुए लोमड़ी बोली।
‘‘मरने से पहले हम ईश्वर को याद करना चाहते हैं।’’ सभी हंसों ने एक मत होकर कहा। ‘‘चलो शुरू हो जाओ।’’ लोम़ड़ी उदारतापूर्वक बोली।
पहले एक हंस ने जोर से बोलना शुरु किया। उसके बाद दूसरा, फिर तीसरा और इस प्रकार सभी हंस एक साथ जोर-जोर से बोलने लगे।
उनका इस प्रकार का तेज कर्कश स्वर सुनकर लोमड़ी के सिर में दर्द हो आया और वह बिना हंसो का शिकार किए ही घर लौट गई।

कौन उड़ा ऊंचा ?


एक बार दो कौओं में यह होड़ लग गई कि कौन अपने पंजों में एक जैसे आकार का थैला दबाए सबसे ऊंचा उड़ सकता है।
पहला कौआ अपने पंजों में रुई से भरा थैला लेकर उड़ा तो मुस्करा दिया, क्योंकि दूसरा कौआ अपने पंजों में वैसे ही थैले में नमक भरकर उड़ रहा था। अब नमक तो रुई से भारी होना ही था। अभी दोनों को उडे़ कुछ ही देर हुई थी कि अचानक वर्षा होने लगी और जैसा होना था वैसा हुआ। दूसरे कौए के थैले का नमक पानी पड़ने से घुलने लगा और पहले कौए के थैले में भरी रुई पानी पड़ने से भारी हो गई। जो पहले भारी था अब हल्का हो गया और जो हल्का था वो भारी।
थोड़ी ही देर बाद जो कौआ खुशी-खुशी अपने पंजों में दबाए रुई का थैला लिए उड़ा जा रहा था, अब हांफने लगा। वह नमक का थैला लिए उड़ रहे कौए से होड़ न कर पाया और हार मान ली।

जब शेर ने किया प्रेम


जंगल के राजा शेर ने एक दिन यूं ही घूमते-टहलते एक सुंदर किसान कन्या को देखा, जो खेतों में काम कर रही थी। पहली ही नजर में शेर उस लड़की पर रीझ गया। फिर एक दिन शेर जा पहुंचा उस लड़की के पिता के पास और विवाह के लिए आग्रह करने लगा। लड़की का पिता शेर को इस कारण अपने पास आया देख आश्चर्यचकित रह गया। लेकिन उसने सीधे-सीधे शेर को इनकार करना ठीक नहीं समझा और बोला-‘‘मेरी लड़की को तुम्हारे दांत व तीखे नाखूंन पंसद नहीं। जाओ, पहले इन्हें निकलवा कर आओ, तब सोचेंगे शादी की बात।’’ प्रेम का मारा शेर भले-बुरे की न सोच तुरंत गया और अपने नाखून व दांत उखड़वाकर वापस आ गया।
अब भला नख-दंत विहीन शेर की ताकत ही क्या रह गई थी। जैसे ही उसने शादी की बात छेड़ी लड़की के परिवार वालों ने उसे बेतरह मारना शुरू कर दिया और वहां से भगा दिया।

झोलों में हुई जब गड़बड़


यूनान में एक पौराणिक कथा प्रचलित है कि मनुष्य का निर्माण हो रहा था तो ग्रीक देवता ज्यूस (इन्हें देवताओं का भगवान् और हेरा का पति माना जाता है) प्रत्येक मानव को दो झोले देना चाहते थे। इनमें से एक झोला मनुष्य के खुद अपने दोषों से भरा था और दूसरा अन्य लोगों के दोषों से भरा हुआ था। देवता ज्यूस ने एक डंडे के सिरों पर उन्हें बांधकर कंधे पर लटका रखा था। लेकिन जब इन्हें बांटने की बारी आई तो एक भयंकर भूल हो गई। दूसरे के दोषों से भरा झोला डंडे के सामने की ओर आ गया और व्यक्ति के अपने खुद के दोषों से भरा झोला पीछे की ओर रह गया।
इसलिए यह तो किसी से छिपा नहीं है कि दूसरों के दोष ढूंढने जैसा सरल काम दूसरा नहीं और अपने दोष-वह तो विरले ही मनुष्य देख पाते हैं।

काश ! ऊंट बीमार न पड़ता


एक ऊंट नखलिस्तान या मरुधान (रेगिस्तान के बीच ऐसी जगह जहां पानी होता है और कुछ हरियाली भी पाई जाती है) के किनारे रहता था एक बार वह बीमार पड़ा तो उसके मित्र व रिश्तेदार उसकी मिजाजपुर्सी (हाल-चाल जानना) करने आए।
चूंकि सभी लम्बी रेगिस्तानी यात्रा करके आए थे, सो सभी कुछ दिन वहां रुके। घास-पत्तियां खाईं और अपना रास्ता लिया।
जब ऊंट की तबीयत कुछ सुधरी तो उसने घास-पात खाने के लिए इधर-उधर ताका, मगर हरियाली कहीं नजर न आई। उसे देखने आए मित्र व रिश्तेदार सबकुछ चट कर गये थे। अब ऊंट बेचारा स्वयं को बेहद असहाय महसूस कर रहा था। मुसीबत तो उसी की बुलाई थी। मरता क्या न करता-नए नखलिस्तान की तलाश में बेचारा रेगिस्तान में भटकने लगा।

मूर्ख कैथरीन


एक सुबह छोटी किन्तु मूर्ख कैथरीन पहाड़ों पर टहलने के लिए निकली। कुछ ही देर बाद उसे थकान महसूस हुई और वह सो गईं, फिर सांझ ढलने तक वह सोती रही। जब आंख खुली तो अंधेरा हो चुका था। बड़ी मुश्किल से वह किसी तरह घर पहुंची।
घर के बाहर से उसने आवाज लगाई-‘‘क्या कैथरीन घर पर है ?’’
‘‘वह अपने कमरे में है।’’ उसकी माँ ने उत्तर दिया। अब उस छोटी मूर्ख लड़की ने सोचा-‘यदि कैथरीन अपने घर में है, तो मैं कैथरीन कैसे हो सकती हूँ ?’
वह वहां से चली गई और फिर कभी लौटकर न आई।

तू डाल-डाल मैं पात-पात


उम्र अधिक हो जाने पर एक वृद्ध महिला को जब दिखाई देना बंद हो गया तो वह आंखों के डॉक्टर के पास पहुंची। उसने उसकी आंखें चेक करने के बाद कहा कि यदि वह फीस में उसे मोटी रकम दे सके तो वह फिर से देख सकती है। वह वृद्धा तय फीस देने पर सहमत हो गई। डॉक्टर ने उसे सलाह दी कि वह अपनी आँखें बंद ही रखा करे और दिन की तीखी रोशनी उन पर कदापि न पड़ने दे। वृद्ध महिला ने डॉक्टर की सलाह पर अमल किया, दिन के समय वह अपनी आँखों को यथासंभव बंद ही रखती।
परंतु आंखों का वह डॉक्टर कतई ईमानदार न था। उसने मौके का फायदा उठाया और धीरे-धीरे वृद्धा के घर से सभी कीमती चीजें साफ कर दीं। जब वृद्धा की आंखों का इलाज पूरा हो गया तो डॉक्टर ने अपनी फीस मांगी, लेकिन वृद्धा ने देने से इनकार कर दिया। मामला बढ़ा और कचहरी तक जा पहुँचा।
‘‘कौन कहता है कि इस डॉक्टर ने मेरी आँखें ठीक कर दी हैं।’’ वृद्धा ने जज के सामने कहा-‘‘इसके इलाज से मुश्किल से सही, घर में सभी चीजे मुझे दिखाई तो देती थीं, लेकिन अब तो मुझे घर में कुछ भी दिखाई नहीं देता। फिर किस बात की फीस ?’’

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