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अकबर बीरबल के गुदगुदाते किस्से

अनिल कुमार

4.95

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-8133-366-7 पृष्ठ :40
आवरण : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 3967
 

अबूझ सवालों के हैरत अंगेज बेमिसाल जवाब....

Akbar Birbal Ke Gudgudatey Kissey a hindi book by Anil Kumar - अकबर बीरबल के गुदगुदाते किस्से - अनिल कुमार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बीरबल की खिचड़ी

सर्दियों की दोपहर थी, ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। ऐसे में अकबर व बीरबल धूप का आनन्द लेते हुए महल के सामने चहलकदमी कर रहे थे। तभी एक पंडित फटे-पुराने कपड़े लपेटे उनके निकट आया।

‘‘तुम क्या चाहते हो ?’’ अकबर ने पूछा।
‘‘हुजूर मेरी सहायता करें।’’ पंडित नमस्कार करने की मुद्रा में हाथों को एकाकार करता हुआ बोला, ‘‘मैं बहुत गरीब आदमी हूँ। काम करना चाहता हूँ, पर ढंग का काम मिलता ही नहीं। जो भी थोड़ा-बहुत कमाता हूं, वह भोजन को भी पूरा नहीं पड़ता। अब मुझे अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक हजार सोने के सिक्कों की जरूरत है। मैं अपनी इकलौती पुत्री को दहेज देना चाहता हूँ। आभूषण के अलावा कपड़े और बरतन आदि भी देने होंगे। घर पर लोगों को बुलाकर दावत भी देनी होगी। इसके लिए भी आटा, घी, तेल, मसालों व सब्जियों इत्यादि की जरूरत होगी।’’
‘‘भई, जब तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तो आभूषण देने की क्या जरूरत है ? जब तुम्हें खुद के खाने को लाले पड़े हैं, तो लोगों को बुलाकर दावत देने की क्यों सोच रहे हो ?’’ बादशाह ने पंडित से पूछा।

‘‘यह तो मेरे जीवन की एकमात्र इच्छा है, जहांपनाह।’’ पंडित बोला, ‘‘मैं बेशक एक गरीब पिता हूँ, पर मेरे भी अरमान हैं कि अपनी इकलौती पुत्री की शादी धूमधाम से करूँ। यदि आप मुझे धन कमाने का अवसर प्रदान करेंगे तो मैं आपका आभारी रहूंगा। इस समय मुझे अपनी लड़की के विवाह हेतु धन की बहुत आवश्यकता है।’’
अकबर बोले, ‘‘ठीक है, हम तुम्हें मौका देंगे कि तुम एक हजार सोने के सिक्के कमा सको। राजमहल की झील के पानी में तुम्हें रात भर खड़ा रहना होगा। सूर्योदय के बाद ही तुम पानी से बाहर निकलोगे।’’

बादशाह के शब्द सुनकर बीरबल चिंतित हो उठा। उसे लगा कि वे उस गरीब पंडित के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर हो रहे हैं। उसका मानना था कि घोर सर्दी की रात में रात भर ठंडे चिलचिलाते पानी में खड़ा रह पाना संभव ही नहीं है। बेचारा सर्दी से ठिठुरकर दम तोड़ देगा।
लेकिन पंडित प्रसन्न था। वह सैनिकों के साथ राजमहल की झील की ओऱ बढ़ गया। थोड़ी ही देर बाद वह पानी में खड़ा था।
‘‘यह पंडित तो ठंड के मारे मर जाएगा।’’एक सैनिक ने बीरबल से कहा।
‘’मुझे क्या मालूम।’’ बीरबल बोला, ‘‘हो सकता है कि उसमें बर्दाश्त करने की शक्ति हो, पर मुझे लगता नहीं कि वह ऐसा कर पाएगा।’’
लेकिन अगले दिन उन सभी की आशा के विपरीत वह पंडित हँसता-मुस्कुराता उनके सामने ठंडे पानी में खड़ा था। सूर्योदय हो चुका था। चेहरे पर विजय के भाव लिए वह पंडित झील के पानी से बाहर निकला।
‘‘तुमने एक असंभव काम को संभव कैसे कर दिखाया ?’’ बादशाह ने हैरानी से पूछा, ‘‘यह बेहद कठिन काम था। तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी होगी, हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि ऐसा भी हो सकता है। हमें बताओ कैसे किया तुमने यह सब ?’’
‘‘हुजूर ! इसमें रहस्य की कोई बात नहीं।’’ पंडित बोला, ‘‘मैंने सोच रखा था कि चाहे कुछ हो जाए, मुझे यह कर दिखाना है।’’

‘‘हम पूछ रहे हैं कि सारी रात ठंडे पानी में रह कर कैसे बिताई ?’’ अकबर ने पूछा।
‘‘मैं रातभर महल में जलती मोमबत्तियों की रोशनी को देखता रहा था।’’ पंडित बोला।
‘‘अच्छा तो यह बात है।’’ अकबर बोले, ‘‘तुम रात भर महल की रोशनियों से गर्मी लेते रहे। इसलिए तुम्हें ठंड महसूस नहीं हुई और रात तुमने आराम से गुजार दी। यह तो ईमानदारी न हुई, तुम ईनाम के हकदार नहीं हो। तुम अपने घर जा सकते हो।’’
पंडित को विश्वास ही न हुआ कि वह जो सुन रहा है वह सच है।

यह सुनते ही पंडित को बेहद धक्का लगा। वह समझ नहीं पाया कि झील के ठंडे-ठिठुरा देने वाले पानी में रात भर खड़ा रहा और वहाँ से 100-125 गज दूर दिखने वाली रोशनी की गर्मी उस तक कैसे पहुँच गई। उसे लगा कि बादशाह बहानेबाजी कर रहे हैं। उनके लिए यह कतई शोभा नहीं देता कि पंडित को ईनाम देने से इनकार करें।
वहाँ मौजूद अन्य सभी लोग भी बादशाह के इस निर्णय से सहमत नहीं थे, लेकिन उनका विरोध करने की हिम्मत किसी में न थी।

इस बीच अकबर मुड़े और महल की ओर चल दिए। वहाँ मौजूद सैनिक असहाय खड़े एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए। वे उस पंडित के बारे में ही सोच रहे थे। अगले दिन बीरबल बादशाह के पास गया और बोला, ‘‘मैं खिचड़ी बनाना सीख रहा हूँ, जहांपनाह। कल आप मेरे घर पर तशरीफ लाएं, मैं आपके लिए विशेष रूप से खिचड़ी तैयार करूँगा।’’
अकबर बहुत खुश हुए कि चलो बीरबल ने उन्हें खाने पर बुलाया तो सही।
अगले दिन अकबर जा पहुँचे बीरबल के घर। उनके साथ अन्य दरबारी भी थे। बीरबल ने सभी को फूल भेंट करके उनका स्वागत किया और उसके नौकर उन पर इत्र छिड़क रहे थे। उन्हें एक बड़े कमरे में ले जाकर बैठा दिया गया, जहाँ नरम गद्दे व तकिये बिछे थे। बड़े-बड़े हाथ के पंखे नौकर झल रहे थे।

इस दौरान अकबर मुस्कराते रहे। वे खुश थे कि बीरबल उनकी इतनी आवभगत कर रहा है।
बादशाह ने बीरबल के बारे में एक नौकर से पूछा तो जवाब मिला कि बाहर बगीचे में हैं।
जब उन्हें बैठे-बैठे दो घंटे बीत गए तो वे सभी परेशान हो उठे। बीरबल के घर से उनके लिए एक गिलास पानी तक न आया था।
अकबर को भूख के साथ प्यास भी सता रही थी।
‘‘बीरबल कहाँ हैं ?’’ बादशाह ने दोबारा पूछ ही लिया।
‘‘बाहर, बगीचे में हैं।’’ एक नौकर ने सादर कहा।
‘‘एक घंटा पहले जब मैंने पूछा था, तब भी तुमने यही जवाब दिया था।’’ अकबर बोले, ‘‘आखिर वह बगीचे में क्या कर रहा है ?’’
‘‘बेअदबी की माफी चाहता हूँ हुजूर !’’ नौकर बोला, ‘‘वे बगीचे में आपके लिए खिचड़ी बना रहे हैं।’’
सुनकर अकबर का पारा चढ़ गया, लगे नौकरों पर चीखने-चिल्लाने।
‘‘फिर से माफी चाहूंगा हुजूर !’’ नौकर बोला, ‘‘ मैंने आपको सब सच बताया है। वह बगीचे में खिचड़ी ही बना रहे हैं।’’
‘‘हमें उसके पास लेकर चलो।’’ बादशाह बोले।

नौकर बादशाह के साथ बगीचे की ओर बढ़ चला, अन्य दरबारी भी साथ थे।
वहाँ एक ऊंचे खजूर के नीचे आग जलाए बैठा था बीरबल। पास ही लकड़ियों का ढेर पड़ा था।
‘‘कहां है तुम्हारी खिचड़ी ?’’ अकबर ने पूछा।
बीरबल चुपचाप उठा और पेड़ के ऊँचे सिरे की ओर उंगली से इशारा कर दिया। वहाँ पेड़ पर एक बरतन लटका हुआ था।
अकबर व उनके साथ आए अन्य दरबारियों ने गर्दन उठा कर पेड़ की ओर ताका।
‘‘यह सब क्या है ? कहते हुए बादशाह का आसमान छूता गुस्सा साफ प्रतीत होता रहा था, ‘‘हम लोग यहाँ भूख से मरे जा रहे हैं और तुम पेड़ पर लटका यह बरतन हमें दिखा रहे हो।’’

‘‘गुस्ताखी माफ करें हुजूर !’’ बीरबल बोला, ‘‘आपको कुछ देर और इंतजार करना होगा। मैंने चावल, दाल, प्याज व लहसुन आदि सब इस बरतन में डाल दिया है। आप देख ही रहे हैं कि आग में भी मैं बराबर लकड़िया डालता जा रहा हूँ। लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि खिचड़ी बनने में इतना समय क्यों लग रहा है।’’
वहाँ मौजूद सभी को यह सुनकर ऐसा लगा जैसे बीरबल का दिमाग चल गया है।
‘‘तुम पगला तो नहीं गए हो बीरबल।’’ बादशाह बोले, ‘‘बरतन और आग के बीच 10-15 गज का फासला है। इतनी ऊँचाई पर टंगे बरतन तक आंच भला कैसे पहुँचेगी ?’’
‘‘मैं तो समझ रहा था कि नीचे जल रही आग की आंच बरतन तक पहुँच रही है।’’ बीरबल बोला।
‘‘बेसिर-पैर की बातें मत करो।’’
गुस्से में लगभग चिल्लाते हुए बोले अकबर।

‘‘खता माफ हो हुजूर !’’ बीरबल बोला, ‘‘ठंडे पानी में रात भर खड़े पंडित तक यदि 100-125 गज दूर स्थित रोशनी गर्मी पहुँचा सकती है तो मैंने तो पेड़ के 10-15 गज नीचे ही आग सुलगा रखी है। वह भला बरतन तक क्योंकर नहीं पहुँचेगी।’’
बादशाह समझ गए कि बीरबल ने कहाँ चोट की है।
‘‘अब मैं समझा तुम्हारी बात।’’ अकबर बोले, ‘‘हमारी कोई मंशा नहीं थी कि उस पंड़ित के साथ अन्याय करें, हमें अपने किये पर पछतावा है। हम तुम्हें वचन देते हैं कि उस पंडित को दो हजार सोने के सिक्के देंगे। उसे हमारे पास भेजो। हम तुम्हारे आभारी हैं कि तुमने हमारी आँखें समय रहते खोल दीं।’’
अब बीरबल प्रसन्न था कि पंडित को उसका ईनाम मिल जाएगा, वह भी दोगुना होकर—दो हजार सोने के सिक्के।
बीरबर बोला, ‘‘मेरे साथ घर के अंदर चलें हुजूर ! मैंने आपके खाने की पूरी व्यवस्था कर रखी है। अनेक लजीज पकवान आपका इंतजार कर रहे हैं। हाँ, खिचड़ी भी बनी है आपके लिए।’’
यह सुनकर सभी ठहाका लगा कर हंस दिए और बीरबल के घर में प्रवेश कर गए।

अपनी जान से प्यारा कुछ नहीं

हमेशा की तरह उस दिन भी अकबर व बीरबल बातचीत करने में मशगूल थे। अचानक बादशाह ने पूछा, ‘‘बीरबल ! किसी भी इन्सान को सबसे प्यारा क्या होता है ?’’
बीरबल ने तुरन्त उत्तर दिया, ‘‘हुजूर ! हर प्राणी को अपनी जान से प्यारा और कुछ नहीं होता।’’
‘‘क्या तुम इसे सिद्ध कर सकते हो ?’’ बादशाह ने पूछा।
‘‘हाँ, क्यों नहीं।’’ बीरबल का जवाब था।
कुछ दिन बाद बीरबल एक बन्दर का बच्चा लेकर आया, बच्चे की माँ भी साथ थी।

महल में बगीचे के ठीक बीचोबीच एक तालाब बना था। बीरबल ने नौकरों से कहा कि तालाब खाली कर दें। उसने यह भी कहा कि खाली तालाब के बीच में एक लंबा बाँस गाड़ दें। इसके बाद बीरबल ने उस बन्दर के बच्चे और उसकी माँ को खाली तालाब में छुड़वा दिया और नौकरों को आदेश दिया कि तालाब को फिर से पानी से धीरे-धीरे भर दें।
बादशाह यह सबकुछ बेहद ध्यानपूर्वक देख रहे थे।
जैसे-जैसे पानी का स्तर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे बंदरिया अपने बच्चे को सीने से चिपकाए तालाब के बीच गड़े बांस पर ऊपर चढ़ती जा रही थी।

अब पानी का स्तर इतना बढ़ चुका था कि बंदरिया की कमर तक आ पहुंचा था। बंदरिया ने अपने बच्चे को अपने हाथों में पकड़ा और बांस के सबसे ऊपरी सिरे पर जा बैठी।
यह देखकर बादशाह बोले, ‘‘देखा बीरबल ! बंदरिया अपने बच्चे की जान बचाने के लिए कितनी मेहनत कर रही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बच्चे की जान इसे अपनी जान से कहीं ज्यादा प्यारी है।’’
इस बीच पानी का स्तर बढ़कर बंदरिया की गर्दन तक आ पहुँचा था। यहां तक कि उसके नाक-कान में भी पानी भरने लगा था। लगता था कि कुछ ही देर में वह पानी में डूब जाएगी।
कुछ देर बंदरिया ने इधर-उधर ताका और उसके बाद बच्चे पर पैर रखकर खड़ी हो गई। अब वह अपने बच्चे के ऊपर खड़ी पानी से बाहर आने की चेष्टा कर रही थी।

‘‘अब देखिए जहांपनाह।’’ बीरबल बोला, ‘‘यह बंदरिया अपनी जान बचाने के लिए अपने बच्चे तक की परवाह नहीं कर रही। बच्चे को अपने पैरों तले डालकर अपनी जान बचाने की कोशिश में है। क्या यह सब सिद्ध नहीं करता कि अपनी जान सबसे ज्यादा प्यारी होती है।’’
बादशाह से कोई जवाब देते न बन पड़ा।
वह बोले, ‘‘बीरबल ! तुम ठीक ही कहते थे, जीवन सभी को प्यारा होता है।
बीरबल मुस्कराया और नौकरों को निर्देश दिया कि पानी का स्तर कम कर दें ताकि बंदरिया और उसके बच्चे को बाहर निकाला जा सके।

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