लोगों की राय

बाल एवं युवा साहित्य >> हितोपदेश

हितोपदेश

अनिल कुमार

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :40
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3945
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

204 पाठक हैं

जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली अनूठी मनोरंजक कहानियां.....

Hitopdesh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मूर्ख बंदर

नर्मदा नदी के तट पर सेमल का बहुत बड़ा वृक्ष था।
बहुत से पक्षी उस वृक्ष पर घोंसला बनाकर सुख से रहते थे।
इस पेड़ के पास ही एक नदी बहती थी, जिसका जल पीकर ये पक्षी और राह चलते यात्री अपनी प्यास बुझाते या फिर झुलसती धूप की तपिश से बचने के लिए पेड़ की घनी छाया में विश्राम करते थे।
एक दिन अचानक ही बंदरों का एक झुंड वहां आ पहुंचा।
इससे पहले कि वे बंदर वहां से जाते, एकाएक ही मूसलाधार वर्षा होने लगी।
वर्षा से बचने के लिए उस वृक्ष पर रहने वाले सारे पक्षी अपने-अपने घोंसलों में जाकर दुबक गए।
बंदर भी वर्षा के कारण उसी वृक्ष पर दुबककर बैठ गए। ऐसी वर्षा में कहीं जाना तो संभव था ही नहीं। देखते ही देखते ठंड के कारण बंदर बुरी तरह ठिठुरने लगे।

जब पक्षियों के राजा ने उन बंदरों की यह हालत देखी तो उन्हें उन पर बड़ी दया आई, किंतु समर्थ बंदरों को देखकर उसे क्रोध भी आया कि ईश्वर ने इन बंदरों को अच्छे खासे दो हाथ दिए हैं, फिर भी यह मूर्ख इधर-उधर इठलाते फिरते हैं और उत्पात करते रहते हैं, क्यों नहीं यह अपने रहने के लिए घर बना लेते।
यही सब सोचकर वह उनसे बोला-‘‘हे वानर भाइयों आप लोग चतुर और होशियार हैं, मेरी समझ में अभी तक यह बात नहीं आई कि आप अभी तक अपना घर क्यों नहीं बना सके, आपके सामने तो हम कुछ भी नहीं हैं, परंतु फिर भी अपने-अपने घरों में बैठे हैं।’’

वास्तव में सत्य बहुत ही कड़वा होता है।
यही हाल उन बंदरों का था। उन्हें सच्ची बात बहुत बुरी लगी।
असल में उस पक्षीराज की बात सत्य ही थी। बंदरों की जाति बहुत होशियार और चुस्त मानी जाती है, यदि ऐसे लोग भी अपने लिए कोई घर न बनाएं, तो कितना दुख होता है, परंतु बंदर थे कि वे इस सत्य को सहन नहीं कर सके। पक्षीराज की इस बात पर उन बंदरों को क्रोध आ गया। उनके सरदार ने सोचा, इन पक्षियों को इस बात का बड़ा घमंड है कि वे अपने घोंसलों में रहते हैं, इसीलिए इन्होंने हमारा मजाक उड़ाया है। कोई बात नहीं, हम तुम्हारे इस घमंड का सिर नीचा करके ही जाएंगे। तुम लोगों ने अभी बंदर ही देखे हैं, बंदरों की बुद्धि और क्रोध को नहीं देखा।
बंदरों के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही थी। जैसे-तैसे वर्षा रुकी तो उसी के साथ ही सारे बंदर अपने सरदार के इशारे पर हरकत में आ गए और क्रोध से भरे बंदरों ने पक्षियों के घोंसलों को उजाड़ना शुरू कर दिया। पक्षियों के घोंसले पेड़ से नीचे गिरने लगे।

अब पक्षीराज को पश्चाताप हो रहा था कि उसने मूर्ख प्राणियों को उपदेश देने की भूल क्यों की। जो होना था, सो हो चुका था। अतः उपदेश देने से पहले पात्र की पहचान कर लेनी चाहिए।

वाणी दोष


हस्तिनापुर कस्बे में विलास नाम का धोबी रहता था। उसके पास एक गधा था। विलास उस बेचारे गधे को खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं देता था।
देता भी कहां से ! उसे तो खुद ही अपने व अपने परिवार के लिए दो समय का भरपेट भोजन जुटा पाना ही दूभर हो रहा था। परिणामस्वरूप गधा बेचारा दिन-प्रतिदिन सूखता जा रहा था। विलास ने सोचा यह तो दिन प्रतिदिन सूखता जा रहा है। अब यदि इसके पेट भरने का उचित प्रबंध न हुआ तो जल्दी ही मर जाएगा।’
तभी उसके दिमाग में एक नयी योजना आ गई।
दूसरे दिन धोबी एक शिकारी के पास जाकर शेर की खाल खरीद लाया। रात के समय गधे को वह खाल पहनाकर उसने उसे खेतों की ओर खदेड़ दिया।

और उस दिन से तो जैसे गधे के भाग जाग गए थे। वह बड़े मजे से रात को खेतों में जाता खूब पेट भरके खाता और मौज मारता। अब तो थोड़े दिनों में ही गधा खा-खाकर मोटा ताजा हो गया।
किसान उस गधे को जब खेतों में आते देखते तो डर के मारे भाग खड़े होते। वे लोग यही समझते कि शेर आ गया।
उस शेर ने इस क्षेत्र की सारी फसलों को नष्ट कर दिया।

एक गरीब किसान का जब सारा ही खेत नष्ट हो गया तो वह बेचारा बहुत दुखी हुआ और उसने सोचा कि इस शेर को मारे बिना उसका गुजारा नहीं होगा। यदि भूखे ही मरना है तो क्यों न इस शेर को भी साथ लेकर ही मरूं।
उस रात उसने अपने शरीर पर मटियाले रंग का एक कम्बल ओढ़ लिया। उसके अंदर अपना धनुष बाण छुपा लिया और अपने खेत में ही एक कोने में छुपकर बैठ गया।

जैसे ही शेर की खाल पहने गधा खेत के अंदर आया और उसने खेत के कोने में मटियाले रंग के इस पशु को बैठे देखा तो उसने समझा शायद यह भी कोई गधा है, अपने भाई को वहां देखकर वह यह भूल ही गया कि वह शेर बना हुआ है, बस लगा उसी समय गधे की भांति ढींचू ढींचू करने।
किसान ने जैसे ही शेर के मुंह से गधे की आवाज सुनी तो वह समझ गया कि यह तो धोखेबाज गधा है। अब तो मैं इसे किसी कीमत पर जीवित नहीं छोड़ूगा।
क्रोध से भरे किसान ने उसी समय तीर चलाकर गधे को मार डाला।

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book