अतिथि (अजिल्द) - शिवानी Atithi (paper back) - Hindi book by - Shivani
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अतिथि (अजिल्द)

शिवानी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
आईएसबीएन : 9788183610797 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :266 पुस्तक क्रमांक : 3744

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शहर की कुटिल राजनीति, सम्पन्न राजनैतिक घरानो के दुस्सह पारिवारिक दुष्चक्र और काकदृष्टि युक्त टिप्पणियों के ताने-बाने से बुना उपन्यास

Atithi a hindi book by Shivani - अतिथि - शिवानी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज तक उनके किस पूर्वज मुख्यमंत्री ने अपनी जाति को प्रश्रय नहीं दिया। कौन से मुख्य सचिव ने अपनी बिरादरी को महत्वपूर्ण पद नहीं सौंपे। कभी-कभी माधव बाबू का चित्त खिन्न हो उठता। क्या इसी स्वतंत्रता के स्वप्न उन्होंने देखे थे भ्रष्टाचार और जातिवाद से महमह महकती राजनीति में मुख्यमंत्री माधव बाबू अपने बिगड़ैल पुत्र कार्तिक को साधने के लिए पारम्परिक भारतीय ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं, उसकी गाँठ अपने निहित शिक्षक मित्र श्यामाचरण की बेटी जया से बाँधकर। लेकिन सरल, बुद्धिमती और स्वाभिमानी जया पति और मंत्रिपत्नी तथा उनके नशेड़ी बेटी की समवेत बेहूदगियों से क्षुब्ध आई.ए.एस.परीक्षा की तैयारी के दौरान एक बड़े उद्योगपति के पुत्र शेखर से उनकी भेंट के बाद उसके जीवन में नया मोड़ आने ही वाला था, कि नियति उसके अतीत के पन्ने फरफरा कर फिर उसके आगे खोल देती है।

शहर की कुटिल राजनीति, सम्पन्न राजनैतिक घरानों के दुस्सह पारिवारिक दुष्चक्र और पारम्परिक ग्रामीण समाज की कहीं सरल और कहीं काकदृष्टि युक्त टिप्पणियों के ताने-बाने से बुना यह उपन्यास अन्त तक पाठकों की जिज्ञासा का तार टूटने नहीं देता।

अतिथि

‘‘अम्मा’’ जया का तमतमाया चेहरा देखकर, माया सहसा सहम गई थी। शांत-सौम्य पुत्री का ऐसा उग्र रूप वह पहली बार देख रही थी।
‘‘मुझे कांता ने बताया, तुम लोग मेरा रिश्ता लेकर उसके घर गिड़गिड़ाने गई थीं। तुम जानती हो, वे लोग कितने ओछे हैं, कांता ने आज सबके सामने ही मुझे अपमानित किया।’’
माया सहम कर चुप हो गई। निश्चय ही बाप की यह मुँहलगी लड़की उनके आते ही उनसे भी कह देगी।
‘‘मेरी जया सचमुच जया है।’’ श्यामाचरण कहते थे।

‘‘सिंहस्कंधाधिरूढ़ा त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं’’ सदा सिंह के कंधे पर चढ़ी मेरी बेटी अपने तेज से तीनों लोकों को परिपूर्ण करती रहेगी। तुम क्यों इसके विवाह की चिंता करती हो। देख लेना, लोग इसे माँगकर सर-माथे पर बिठाएँगे।’’
‘‘मैंने कह दिया है अम्मा। मुझे शादी नहीं करनी है और न तुम मेरे रिश्ते की बात लेकर आज से इधर-उधर जाओगी।’’
निश्चय ही कांता ने कुछ ऐसी-वैसी बात कह दी होगी। सामान्य-सी बात से उत्तेजित होने वाली लड़की नहीं थी जया। करती भी क्या, जया के पिता को तो दिन पर दिन सयानी हो रही पुत्री की चिंता ही नहीं थी। इसी वर्ष उसकी पढ़ाई भी पूरी हो जाएगी। फिर एक बात और भी थी। अपनी ही रिश्तेदारी में दो-तीन लड़कियाँ विजातीय लड़कों से प्रेमविवाह कर चुकी थीं। उस पर जया का रूप ऐसा दिव्य न होता तो उसे चिंता नहीं थी।

कांता उसके साथ पढ़ती थी। ऊँचा जाना-पहचाना खानदान था। उन्हीं का-सा मध्यमवर्गीय परिवार भी था। माया की यह दृढ़ धारणा थी कि विवाह संबंध अपने ही तबके में होना चाहिए। फिर अनिल था भी सुदर्शन-विनम्र लड़का। अगले साल इंजीनियर बन जाएगा। आज तक उस खानदान में हाईस्कूल से आगे कोई नहीं पढ़ पाया था। सबने दुकान के बही-खाते ही सम्हाले थे। इसी से अनिल की माँ का अहं अवश्य कभी-कभी फुफकार उठता है।

‘‘हमारा तो बस यही एक है जया की माँ’’ उन्होंने एक दिन बातों ही बातों में सुना दिया था। ‘‘थोड़ा-बहुत लेन-देन तो हम भी चाहेंगे। आखिर हमें भी दो बिटियाँ ब्याहनी हैं। फिर उनकी पढ़ाई में क्या कम खर्च हुआ है ?’’
ठीक है। लेन-देन भी निबट लेगी वह। कौन-सी लाख-डेढ़ लाख की माँग करेंगे ! अच्छी चीज लेनी होगी तो अच्छे दाम भी खरचने होंगे। उसे पक्का विश्वास था कि अनिल भी मन ही मन जया को चाहता है। छुट्टियों में घर आता तो नित्य कोई न कोई बहाना निकाल मिलने चला आता। यह ठीक था कि जया ने उसे कभी मुँह नहीं लगाया। पर बार-बार अनिल की आँखें किसे खोज रही हैं, यह भी न समझ पाए ऐसी मूर्ख नहीं थी माया।

आज उसका वही स्वप्न चूर-चूर हो गया। बेटी को उसने नौ माह गर्भ में धरा था। उसकी नस-नस पहचानती थी वह। एक बार जो उसने कह दिया, वह फिर ब्रह्मा का लेख था। वह जानती थी कि अब इस विषय में उससे कुछ कहना व्यर्थ था। श्यामाचरण से वह कई बार कह चुकी थी, ‘‘देखो, ऐसा लड़का हाथ से मत जाने दो। मैं जानता हूँ। जया उसे बहुत पसन्द है। एक बार जाकर कहते क्यों नहीं।’’

‘‘मैं क्या राधारमण को नहीं जानता माया ?’’ एक नंबर का लोभी है। उस पर लड़का अब इंजीनियर बनने वाला है। तुम तो जानती हो, हमारी बिरादरी में ऊँची बोली लगाने वालों की कमी नहीं है। मैं कुछ कहूँ और वह कुछ ओछी बात कह दे यह मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हें भी राय दूँगा, भूलकर भी अपनी बेटी के रिश्ते की बात लेकर वहाँ मत जाना।’’
पर वह अब तक अपने को रोक नहीं पायी थी : कहीं ऐसा न हो कि वह मुँह ही न खोल पाए और कोई दूसरा वांछनीय रिश्ते का गुस्सा अपने मुँह में भर ले।

एक लम्बी साँस खींचकर वह मशीन लेकर बैठ गई। नाना अभावों में जैसे उसका अपना जीवन बीत रहा था, क्या ऐसे ही अभावग्रस्त किसी परिवार में अंततः जया को भी जाना पड़ेगा ? इधर जया यूनिवर्सिटी में ही म्यूजिक कॉलेज चली जाती थी। वहाँ से लौटती तो अपने कमरे में किताबें लेकर बैठ जाती।
कभी जेठानी आती तो उसे और डरा जाती, ‘‘छोटी, देख, मेरा कहना माने तो मेरे साथ एक दिन उन्नाव चली चल। मेरी भाभी का वही भतीजा आजकल घर आया है, जिसकी मैंने बात की थी। बंबई की किसी कम्पनी में नौकरी करता है। देखने में थोड़ा साँवला जरूर है, पर भरा-पूरा परिवार है। अपना पुश्तैनी मकान है। दो-दो भैंसें हैं। वैसे तो उसके लिए कई रिश्ते आ रहे हैं। पर भाभी ने जया को किसी शादी में देखा और मुझसे कई बार कह चुकी हैं।’’

जिस जेठानी ने जीवन-भर उसकी जड़ काटी वह क्या कभी जया के सुखद भविष्य का प्रस्ताव लेकर आ सकती थी ? फिर माया तो अपनी इस सुन्दर पुत्री के लिए कैसे-कैसे सपने सँजो रही थी ! उसे वह सब मिले, जिसके लिए वह जीवन-भर तरस रही थी। बैठने को कार, रहने को बड़ी-सी कोठी, नौकर, अर्दली, स्वच्छन्द-निरंकुश सम्राज्ञी बनेगी उसकी जया। उन्नाव में दो-दो भैंसों के बीच खड़ी जया की छवि उसे कल्पना में भी डंक दे उठी थी। बड़ी रुखाई से ही उसने जेठानी का प्रस्ताव फेर दिया था।
और फिर महीना बीतते न बीतते अचानक उसकी सब योजनाएँ धरी की धरी रह गई थीं। जया यूनिवर्सिटी के ही किसी जलसे में भाग ले रही थी। और उसी अनुष्ठान के मुख्य अतिथि थे मंत्री प्रवर माधव बाबू, श्यामाचरण के बाल्यकाल के सहपाठी। जान-बूझकर ही जया ने पिता से इस अनुष्ठान में आने का अनुरोध नहीं किया था। अम्मा तो वैसे भी कहीं आती-जाती नहीं थी। पिता से कहती तो शायद आ भी जाते किंतु उनके सामने स्टेज पर सरस्वती वंदना गाने में उसे संकोच होता। और फिर वह जानती थी कि माधव बाबू उसके पिता के सहपाठी रह चुके थे।

आज तक उन्होंने भूलकर भी कभी उसके बाबू जी को याद नहीं किया। फिर आज यहाँ समस्त प्रेक्षागृह के दर्शकों की आँख उस महामहिम व्यक्ति के चेहरे पर गड़ी रहेंगी, जिसके कंठ को न जाने कितने-कितने पुष्पहार की गरिमा आज सुशोभित करेगी, वहीं किसी बहुत पिछली पंक्ति में बैठे अपने निरीह बाबू जी की म्लान मुखछवि को वह सहन नहीं कर पाएगी। बाबू जी ने स्वयं उसे बताया था कि इसी माधव को मैंने ही एक प्रकार से हाथ पकड़कर हाईस्कूल की परीक्षा पास कराई थी। बराबर गणित में फेल होता। हिन्दी का सामान्य निबन्ध भी ठीक से नहीं लिख पाता था। रोज मेरे पास चला आता था और मेरी कापियों से रट्टा लगाता। वही देखो आज कहाँ से कहाँ पहुँच गया और अब कभी देख भी लेता है तो जैसे पहचानता ही नहीं।

किंतु नियति कभी-कभी कैसे मनुष्य को पीछे से आकर एक ही धक्के में धराशायी कर देती है। उसी दिन उसके कमनीय चेहरे को देखकर माधव बाबू मुग्ध हो गए थे। वंदना के पश्चात् स्वयं ही उन्होंने मंच पर अपने पास बुलाया और स्नेह से पीठ थपथपाकर अपने कंठ का पृथुल पुष्पहार उसके कंठ में डाल दिया।
ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया था। जब कभी किसी जलसे में जाते कंठ में पड़े पुष्पहार, गुलदस्ते उन्होंने कई बार पहले भी प्रशंसकों की भीड़ की ओर उछाले थे। यह भी उनके पेशे का एक झटका था। ‘जो मिले उसे जनता में बाँट दो’ की भावना का प्रतीक। किंतु आज तक उन्होंने किसी के कंठ में ऐसे पुष्पहार नहीं डाला था।

दूसरे ही क्षण अपनी अविवेकी हरकत पर वे कुछ खिसिया भी गये थे। कहीं कोई और कुछ न समझ बैठे। लड़की अत्यन्त रूपवती थी और मंत्रियों की जैसी दुष्कीर्ति के समाचार इधर कुछ चटखारे ले-लेकर छपने लगे थे, चरित्रहीनता की गदा किसी का भी मस्तक विदीर्ण कर सकती थी। यद्यपि उनकी ओर आज तक किसी का नारी को लेकर कुछ कहने या छापने का साहस न हुआ था, न हो ही सकता था। उनकी ईमानदारी की जैसी स्वच्छ छवि स्वयं जनता ने आँक कर मजबूत चौखट से बाँध अपनी हृदयभित्ती पर टाँग दी थी, उसके नीचे गिरकर टूटने का प्रश्न ही नहीं उठता था। फिर भी उन्हें, लगा सबके सामने उस सुंदरी को बुला उसका ऐसा अभिनंदन करना उचित नहीं था। उसके साथ दो और गायिकाएँ भी थीं।
‘‘क्या नाम है तुम्हारा बेटी ?’’ उन्होंने निष्पाप संबोधन की मींड इसी से जान-बूझकर लगे माइक में खींची थी।
‘‘जया !’’ कह वह लजाकर पीछे सिमट गयी थी।

माधव बाबू को उसी दिन पता चल गया था कि वह उनके बाल्यकाल के सहपाठी श्यामा की पुत्री है। स्मृति के गह्वर से अपने उस विनम्र सुदर्शन सहपाठी के विस्मृत चेहरे को ढूँढ़ने में कुछ समय लग गया था। कैसे मूर्ख थे वह। लड़की एकदम अपने बाप ही पर तो गई थी। वही लजीली हँसी, वैसी ही रेशमी पलकों की चिलमन।
स्कूल की रामलीला होती तो श्यामा ही बनता था सीता। कैशोर्य ने जहाँ उसके अधिकांश सहपाठियों के कंठ को मिठास में एक माँसल पुट घोल भारी बेसुरा कर दिया था, वहीं पर उसका कंठ था। एकदम बचकाना। स्वरभंग भी उसे विकृत नहीं कर पाया। उस पर गणित में विधाता का वरदान था लड़के को, परीक्षा देने आता तो सहपाठियों की एक चीटियों की-सी कतार उसके पीछे-पीछे चलती।

‘‘अरे श्यामा, यह प्रश्न बता देना जरा। यह कैसे होगा ?’’ उस पर उन दिनों का वह चलता-फिरता गैस पेपर था। जो प्रश्न बताता, उनमें से 6-7 तो आते ही आते। किसी अध्यापक का पुत्र या आत्मीय होते, तो लोग कहते, उसे पर्चा पता है। पर एक तो उन दिनों बोर्ड के पर्चे खुलने की बात भी किसी के दिमाग में नहीं आ सकती थी। न गुरुजनों की आज की भाँति नकल करने पर टोकने पर आते ही सरेबाजार बेखेरी जाती थी। कोई छात्र फेल होता तो सीधा भागता वहीं बावड़ी की ओर। और कभी-कभार कोई दुःसाहसी बेहया छात्र नकल करते पकड़ा भी जाता तो जीवन-भर वह अमिट कलंक की अदृश्य कालिख उसके चेहरे पर पुती रहती।

फिर श्यामा की सत्यवादिता का दबदबा पूरे कॉलेज में था। पूरे कॉलेज में वही एक मात्र छात्र था, जो कभी झूठ नहीं बोलता था। इसी से उसके मित्रों की संख्या बहुत कम थी। इसी से शायद माधव बाबू उसके अंतरंग मित्रों में से एक थे। कैसा आश्चर्य था कि एक ही शहर में रहकर भी श्यामा कभी उनसे मिलने नहीं आया।
ठीक ही तो था, ऐसी उम्मीद तो उससे की थी। वे आज मंत्री पद पर न हो, उसकी भाँति एक निरीह अध्यापक होते तो वह अवश्य उनसे मिलने आता। समृद्धि ही तो मैत्री की सौत बनती है। उन्होंने वहीं पर दृढ़ निश्चय कर लिया। जैसे ही चुनाव के बुखार की तपन से मुक्ति मिलेगी वे अपने भूले-बिसरे सहपाठी को बुला भेजेंगे। किन्तु क्या केवल मैत्री का ही आकर्षण उन्हें उस दिन उकसा गया था ?

अंत तक वे धैर्य रख नहीं पाए। तीसरे ही दिन बिना किसी से कुछ पूछे उन्हें पत्र लेकर अपने विश्वासी पी.ए. सक्सेना को श्यामाचरण को बुलाने भेज दिया था ! उनका वह प्रिय पवनसुत आज तक कौन-सी संजीवनी बूटी लाने में असमर्थ रहा था। जान-बूझकर ही उन्होंने स्वजाति के किसी ब्राह्मण पी.ए. को नहीं रखा। आज तक उनके पूर्वज किस मुख्यमंत्री ने अपनी जाति को प्रश्रय नहीं दिया ! कौन-से मुख्य सचिव ने अपनी बिरादरी का महत्त्वपूर्ण पद नहीं सौंपा ! कभी-कभी माधव बाबू का चित्त खिन्न हो उठता। क्या इसी स्वतंत्रता के स्वप्न उन्होंने देखे थे ? कहीं ठाकुरवाद कहीं ब्राह्मणवाद, कहीं वैश्यों का प्राचुर्य और कहीं शूद्रों का, और फिर वर्णसंकरता जब दिन पर दिन प्रखर होती जा रही थी, किसे कह सकते थे वे विशुद्ध ब्राह्मण और ठाकुर !

वनपर्व में कहे गए युधिष्ठिर के शब्द आज और समर्थक बन गए थे। ठीक ही कहा था युधिष्ठिर ने कि वर्णों के अस्तव्यस्त मिश्रण के कारण किसी व्यक्ति की जाति का पता चलना कठिन हो गया है। सभी लोग सभी प्रकार की नारियों से सन्तान उत्पन्न करते हैं। अतः विज्ञ लोग चरित्र को ही प्रमुख एवं वांछित वस्तु मानते हैं। माधव बाबू सदा इसी आदर्श को गाँठ से बाँधकर चलते थे। इसी बात को ध्यान में रख उन्होंने अपने पी.ए. गुरुमौज सक्सेना की भी नियुक्ति की थी।
देखने में बौने कद का वह स्याह चेहरे वाला उनका अनुचर दिन में भी आकाश के तारे तोड़कर ला सकता था, कम्प्यूटर को भी मात देने वाला उसका कुटिल मस्तिष्क कस्बे के स्कूल में पौवा-ड्योढ़ा रटकर देसी उस्तरे की धार-सा तीखा था, आँकड़े उसके जिह्वाग्र पर रहते, किस फाइल की भृगुसंहिता के किस पृष्ठ पर किस मंत्री की, किस अफसर की तीन-तीन जन्मों की कुंडली अंकित है, माधव बाबू को मिनटों में बता सकता था। यद्यपि उनके पास प्रायः ही कर्णपिशाची सिद्ध आकर कानों में बुदबुदा जाते, आप नहीं जानते एक-एक तबादले में इसने जागीरें जोड़ ली हैं। आप तो सवर्णी सिफारिशें पढ़ने से पहले ही फाड़ दूर फेंक देते हैं, यह कायस्थों को कंधे पर बिठा रहा है।’’

बिठाने से उनका क्या बिगड़ता था। उनकी अंतरात्मा तो निर्दोष थी। फिर उनके प्रति उसकी स्वामिभक्ति में कई बार लुके-छिपे जाँच करने पर भी वे कभी कोई त्रुटि नहीं खोज पाए थे। ऐसे विलक्षण अनुचर को वे लोगों के कहने पर कभी नहीं गवाँ सकते थे यद्यपि बहुत पहले पढ़ी राजतरंगिणी की पंक्तियाँ उसे शंकित कर देतीं, जब किसी कायस्थ ने अपनी जननी से कहा था, ‘‘तू क्या सोचती है, मैं जब तेरे गर्भ में था मैंने तेरी आँते इसलिए नहीं खाईं कि तू मेरी माँ है ? मैंने इसलिए नहीं खाईं कि मेरे मुँह में दाँत नहीं थे !’’

उसी गुरुमौज को उन्होंने उस दिन वह काम सौंप दिया था। वे जानते थे वह बूटी ही नहीं पूरा पर्वत उखाड़ लाएगा। दूत भेजते ही उन्हें अपने दुःसाहस पर आश्चर्य भी हुआ था। अपने उस उद्दंड-अबाध्य पुत्र से पूछे बिना उन्होंने यह कदम उठाया कैसे ? शायद इसीलिए कि उन दिनों भूत की चुटिया उन्हीं के हाथ में थी। कुछ ही दिनों पूर्व शहर के जिस वन अरण्य से एक धर्षिता युवती की नुची लाश मिली थी, वही वनस्थली उनके आखेट प्रेमी पुत्र कार्तिक की प्रिय आखेटस्थली थी। एक जीर्ण मंदिर के भीतर कुछ टूटी चूड़ियों के साथ अपराधी की जेब से गिरा जो यूनिवर्सिटी का आइडेंटिटी कार्ड मिला था, वह था कार्तिक के अभिन्न मित्र अहमद तुफैल का।

न जाने कैसी-कैसी चेष्टाओं से माधव बाबू पुत्र की उस आखेट पार्टी के बदनाम पद चिह्नों को मिटा पाए थे। अच्छा था कि उन्हीं के मंत्रीमण्डल के एक ऐसे सहयोगी पुत्र भी जघन्य हत्याकांड में शामिल था, जिसका भृकुटि विलास ही पल-भर में पूरे प्रदेश का विलय कर सकता था। माधव बाबू को भी संदेह नहीं था कि उनका कपूत भी किसी न किसी रूप में उस जघन्य हत्याकांड से जुड़ा है। सक्सेना की ही कुटिल सूझ ने रातों रात कार्तिक को नेपाल भेज यह सिद्ध कर दिया था कि हत्याकांड के दिन कार्तिक शहर में था ही नहीं।

लौटने पर कार्तिक ने स्वेच्छा से ही घर में नजरबंद रहना स्वीकार कर लिया था। गजब का दुःसाहसी होने पर भी वह बुरी तरह सहम गया था। उसके इसी दुर्बल क्षण का लाभ उठा माधव बाबू ने सक्सेना के सुझाव का बिना कुछ सोचे-समझे समर्थन कर दिया था। ‘‘मेरी बात मानें सर’’ वह उनके कान के पास हाथ धर फुसफुया था ‘‘आप भैया की किसी सुंदर लड़की से शादी कर दीजिए।’’
माधव बाबू को उसका उनके कान के पास आकर फुसफुसाना बुरा लगता था। कई बार उसे टोक भी चुके थे। ‘‘देखो सक्सेना, जो कुछ कहना हो जोर से कहा करो। फुसफुसाने का मतलब ही होता है कि कोई ऐसी बात कह रहे हो जो और न सुने। तुम जानते हो, मेरे कान मेरी ही कान नहीं, पूरी जनता के कान हैं।’’

पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आता था। पत्र में उन्होंने अपने बाल्यकाल के विस्मृत सहपाठी मित्र श्यामा को अत्यन्त सहज स्नेह से आमंत्रित किया था कि वे परिवार सहित अवश्य पधारें। उन्हें तो यह पता ही नहीं था कि वे इसी शहर में हैं। उनकी गुणी पुत्री का गाना न सुनते तो शायद जान भी न पाते। अपनी उस पुत्री को भी वे अवश्य साथ लाएँ जिसे देखते ही उन्होंने पहचान लिया था कि वह किसकी बेटी है।
यदि निमंत्रण स्वीकार कर लिया, करेगा कैसे नहीं, पद का अहं अनजाने ही उनकी मूँछें सतर कर गया। आखिर प्रदेश के मुख्यमंत्री का आदेश भी तो कुछ अहमियत रखता है। यदि उनकी योजना सफल हो गई तो उनका आधा सरदर्द दूर हो जाएगा। अभी उनके आने में तीन दिन बाकी थे। इस बीच वे अपने विचित्र परिवार को भी समझ लेंगे यद्यपि उन्हें न पत्नी से ही सहयोग की आशा थी, न पुत्री लीना से, न पुत्र से।

उसी रात को खाने की मेज पर उन्होंने अपना प्रस्ताव पत्नी और पुत्री के सम्मुख रख दिया था। कार्तिक बहुत कम ही परिवार के सहभोज में सम्मिलित होता था। उस दिन भी वह अपना कमरा बंद कर उच्च स्वर में बज रहा विदेशी संगीत सुन रहा था।
चन्द्रा, हाथ का गस्सा थाली पर पटक खड़ी हो गई थी, ‘‘आपका दिमाग फिर गया है क्या ? कहाँ किसी दो कौड़ी के मास्टर की लड़की का गाना सुन चटपट उसे यहाँ न्यौत आए और कहते हैं, उसे बहू बनाएँगे। आप जानते हैं कि सुधा से हम मुन्ना का रिश्ता मन ही मन पक्का कर चुके हैं।’’
‘‘और यू क्रेजी डैडी।’’ लीना ने भी माँ की ही पसंद का समर्थन कर उन्हें चीरकर रख दिया। ‘‘अच्छा है आज मुन्ना यहाँ नहीं है, अब प्लीज, आप अपना ये रिडीकुलस प्रस्ताव उसे मत सुनाइये। आप शायद नहीं जानते कि सुधा उसे बेहद पसंद है, हमें भी।’’
माधव बाबू ने हँसकर कहा, ‘‘हाँ, मैं यह भी जानता हूँ बेटी, कि कार्तिक को सुधा ही नहीं संसार की हर सुन्दर लड़की पसंद है। मैं और कुछ नहीं सुनना चाहता। मैं कार्तिक को अभी जाकर कहता हूँ, परसों मैंने श्यामा को सपरिवार चाय पर बुलाया है। उसे अभी कुछ पता नहीं है। पर बात बन गई तो मैं जाने से पहले ही यह रिश्ता पक्का कर देना चाहता हूँ। अगले महीने डेलीगेशन के साथ जर्मनी जाना है।’’

पत्नी और पुत्री की ओर बिना दृष्टिपात किए ही वे सीधे कार्तिक के कमरे में चले गए थे। इसके पहले की चन्द्रा और लीना उसे भरें वे स्वयं अपना प्रस्ताव उसे सुना आएँगे। मुन्ना को वे जानते थे। जहाँ वह एक बार जया को देख लेगा तो ना नहीं कह पाएगा, भले ही थोड़े दिनों में पिता के दिए उस सुन्दर खिलौने से ऊब उसे दूर पटक दे।
वे कार्तिक के कमरे में कभी नहीं जाते थे। उन्हें इतना समय ही कब मिलता था, जो परिवार के किसी सदस्य के कमरे में जाते। जब आधी रात के बाद फाइलों का स्तूप निबटाकर स्वयं अपने कमरे में पहुँचते तो चन्द्रा गहरी नींद में डूबी मिलती। कभी बहुत देर होती तो वे अपने स्टडी रूम में ही सो जाते। राजनीति ने बहुत पहले की किसी रक्षिता के निर्लज्ज अधिकार से उन्हें पत्नी के सुखद साहचर्य से विलग कर दिया था।

कमरे में पहुँचे तो स्तब्ध होकर देहरी पर खड़े रह गए। क्या इसकी माँ इसका कमरा कभी नहीं देखती होगी। पूरी दीवार पर नग्न विदेशी सुगन्धित चित्र, पूरे कमरे में बिखरे सिगरेट के अवशेष, एक किनारे पत्रिकाओं के फड़फड़ाते पृष्ठ, औंधे पड़े खाली गिलास, भीमकटि चौकोर हरी बोतल, एक विचित्र दुर्गन्ध का भभका उन्हें दुःसाहस से पीछे धकेल गया। तब क्या लड़का चरस गाँजा भी पीने लगा था।
कुर्सी पर तीन-चार कमीजें टँगी थीं। लगता था बदल-बदल कर उन्हें नित्य कुर्सी पर लटका देता है।

उथल-पुथल बिस्तर पर उनका कुल दीपक नंगे बदन एक रेशमी लुंगी लपेटे सो रहा था पर कैसी अस्वाभाविक निद्रा लग रही थी उसकी। मुँह खुला था। शुभ्र ललाट पर पंखे की हवा में उड़ते केशगुच्छ कभी स्वयं उड़कर बिखर रहे थे, कभी पूरा चेहरा ढाँपे जा रहे थे। एक हाथ नीचे लटका था। दो अँगुलियों के बीच जलती क्रमशः छोटी होती जा रही सिगरेट किसी भी क्षण अवश्य अँगुलियों को दग्ध कर कालीन पर गिर पूरा घर जला सकती थी। लड़के को होश ही नहीं था। लपककर उन्होंने सिगरेट का टुकड़ा अँगुलियों से निकाल बड़ी वितृष्णा से बाहर फेंक पैरों से कुचला, जैसे बेटे का सारा गुस्सा अधबुझी सिगरेट पर ही निकाल रहे हों।
‘‘मुन्ना !’’ उनका स्वर क्रोध से काँप रहा था।
पर मुन्ना तो न जाने किस आनन्दलोक की डुबकियाँ लगा रहा था। उन्हें लगा, किसी मीठे सपने का प्रसंग अचानक निद्रालस बेटे को गुदगुदा रहा है। सचमुच ही नींद में डूबा कार्तिक सहसा निर्दोष बालक की भाँति मुस्कुरा रहा था।

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