ज्वाला और जल - हरिशंकर परसाई Jwala Aur Jal - Hindi book by - Harishankar Parsai
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ज्वाला और जल

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
आईएसबीएन : 81-263-0793-5 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :56 पुस्तक क्रमांक : 370

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‘ज्वाला और जल’ प्रख्यात व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई की एक ऐसी उपन्यासिका है जो घृणा पर प्रेम की विजय को बड़ी आत्मीयता और सहजता से रेखांकित करती है।

Jwala Aur Jal - A Hindi Book by - Harishankar Parsai ज्वाला और जल - हरिशंकर परसाई

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्वाला और जल हरिशंकर परसाई की आरम्भिक रचनाओं में से एक है जिसके केन्द्र में एक ऐसा युवक है जो समाज के निर्मम धपेड़ों से धीरे धीरे एक अमानवीय अस्तित्व के रूप में परिवर्तित हो जाता है। पर प्रेम और सहानुभूति के सानिध्य में वह एक बार फिर कोमल मानवीय सम्बन्धों की ओर लौटता है। उपन्यासिका में फ्लैश बैक का सटीक उपयोग हुआ है जिससे नायक विनोद के विषय में पाठकों की जिज्ञासा लगातार बनी रहती है। विनोद की कथा मानवीय स्थितियों से जूझते हुए एक अनाथ और अवारा बालक की हृदयस्पर्शी कथा है जिसे हरिशंकर परसाई की कालजयी कलम ने एक ऐसी ऊँचाई दी है जो उस समय के हिन्दी साहित्य में दुर्लभ थी।

 ज्वाला और जल से प्रतीत होता है कि अपने लेखन के प्रारम्भ से ही हरिशंकर परसाई कभी भी कोरे आशीर्वाद का महिमा गान के लिए लेखन को माध्यम नहीं बनाते, बल्कि समाज की वास्तविक परिस्थिति की परतों को उजागर करते हुए पाठकों के सोचने समझने के लिए एक बड़ी जमीन छोड़ देते हैं। उनकी अन्य रचनाओं की तरह यह उपन्यास भी इसका अपवाद नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू जो आज भी पाठकों को आकर्षित करता है वह यह है कि रचना के किसी मोड़ पर कोई भी पात्र जिस रूप में भी सामने आता है उसे अन्त तक पाठक घृणा नहीं कर सकते। प्रेमचन्द की विरासत लिए हरिशंकर परसाई प्रेमचन्द को दोहराते नहीं हैं बल्कि एक नई दिशा भी देते है जो न केवल समकालीन और सार्थक है, बल्कि परसाई के बोध को चिह्नित करते हैं।

प्रस्तुति

‘ज्वाला और जल’ प्रख्यात व्यंग्यकार स्व. हरिशंकर परसाई की एक ऐसी उपन्यासिका है जो घृणा पर प्रेम की विजय को बड़ी आत्मीयता और सहजता से रेखांकित करती है। यह उपन्यासिका ‘अमृत पत्रिका’ के दीपावली विशेषांक में कभी छपी थी। मुद्रित प्रति में कहीं भी प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है। परन्तु यह परसाई के युवाकाल की एक महत्त्वपूर्ण रचना प्रतीत होती है। जाने कैसे इसका प्रकाशन न तो किसी पुस्तक में हुआ और न परसाई की अन्य उपन्यासिका की तरह इसकी स्वतन्त्र पुस्तक ही छपी। यह उनकी ग्रन्थावली में भी नहीं है। ज्ञानपीठ को ‘ज्वाला और जल’ की प्रति जर्जर अवस्था में मिली थी, जिसका कुछ हिस्सा दीमक खा चुकी थी। पूरी उपन्यासिका में ऐसी आठ-दस पंक्तियाँ ही होंगी। अन्तराल को अनुमान से पढ़कर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है और इन पूर्तियों को इटालिक्स में दिया गया है।
भारतीय ज्ञानपीठ को परसाई की इस सुन्दर उपन्यासिका को पहली बार पुस्तकाकार प्रकाशित करते हुए प्रसन्नता है। हिन्दी संसार को भी एक शीर्षस्थानीय लेखक की खो गई सुन्दर कृति की पुनर्प्राप्ति का रोमांच होगा। यह कृति हमें श्री प्रकाश चन्द्र दुबे और श्री ज्ञानरंजन के सौजन्य से प्राप्त हुई है। हम उनके कृतज्ञ हैं।

प्रभाकर श्रोत्रिय
निदेशक

ज्वाला और जल


अब्दुल...नहीं नहीं..विनोद-
लेकिन विनोद भी कैसे ? न अब्दुल, न विनोद-उसे न अब्दुल नाम से याद कर सकता हूँ न विनोद से। हाँ, यह है कि वह अब्दुल था, पर उतना ही सही यह भी है कि वह विनोद भी था। लेकिन न वह केवल अब्दुल था, न विनोद। ब्रह्मा के तीन मुख और शंकर के पाँच मुखों की कल्पना इसलिए की गयी मालूम होती है कि एक ही व्यक्ति में एक से अधिक व्यक्तित्व समाए रहते हैं। वह कभी उनमें से एक होता है, कभी दूसरा। जिस आदमी की कहानी कह रहा हूँ, उसकी प्रतिमा अगर बने तो उसके दो मुख हों-अब्दुल और विनोद। गर्दन ऐंठ कर चलनेवाला, बात की बात में तमाचा जड़ देनेवाला, उद्धत, झगड़ैल गुण्डा-अब्दुल। और सन्ताप से त्रस्त पीड़ा से क्षत-विक्षत ग्लानि से गलित टूटा हुआ, भू-नत-विनोद।
उसकी कल्पना ही विरोधों की कल्पना है।

बहुत योग किये जिन्दगी की राह पर। कई साथ चले; कई हाथ में हाथ डाल साथ चल रहे हैं। कई ऐसे भी, जो अचानक किसी पगडण्डी से आ मिले और फिर न जाने कब किसी पगडण्डी से चुपचाप चल दिये। मैं पुकारूँ तब तक वे किसी झुरमुट में विलीन ! हम थोड़ी देर आवाज लगाकर, आसपास निगाह डाल चल देते हैं-हमें तो खो जाना नहीं है, हमें तो राजमार्ग छोड़ना नहीं है। पर कुछ ऐसे होते हैं, राजमार्ग की चिकनाहट जिनके पाँवों को पसन्द नहीं होती। वे ऊबड़-खाबड़ में भटकते हैं, घायल होते हैं, गिरते हैं, लहूलुहान होते हैं और राह पर रक्त के अंक उछालते चलते हैं।

वह इसी तरह एकाएक किसी पगडण्डी से आकर मिल गया था। कुछ दूर साथ चला और फिर खिसक गया। मैं तो उसी असंख्य पैरों से कुचले, घिसे-पिटे चिकने राजमार्ग पर चल रहा हूँ। वकालत पहले करता था, अब भी करता हूँ। पहले तीन बच्चे थे, अब पाँच हैं। हर साल दीवाली पर घर की पुताई कराता था, अब भी कराता हूँ। हर साल पितरों का श्राद्ध करता था, अब भी करता हूँ। वही मकान, वही मुहल्ला, वही शहर; वे ही रास्ते। घर, कचहरी, क्लब ! चोरी, जालसाजी, मारपीट लेन-देन बेदखली कुर्की वही मुकदमे।
वह साथ था, तो जिन्दगी में एक अजब तनाव था; अब सब ओर शैथिल्य। उसे मित्र ही कहा जा सकता है, यद्यपि पहले उससे मुझे घृणा ही हुई थी; फिर उससे भय भी लगा; फिर वह मेरा छोटा भाई हो गया और अन्त में एक शिशु की तरह उसने अपने जीवन को मेरे सुपुर्द कर दिया।

मन में एक चमक छोड़ कर वह चला गया। अनेक की भीड़ में वह एक मुझे अभी याद है।
बहुत पहले की बात है। एक दिन शाम को मैं, माँ और पत्नी को लेकर सिनेमा गया था। याद नहीं कौन-सी ‘फिल्म’ थी। ‘सपरिवार देखने योग्य’-का मार्का लगाये कोई फिल्म रही होगी, तभी माँ और पत्नी दोनों गयी थीं। मैं मजबूरी में गया था। ‘सपरिवार देखने योग्य’ फिल्म के रूप में जिसका प्रचार किया जाए उस फिल्म को, और ‘सपरिवार के पढ़ने योग्य’ लेबिल कवर पर धारण कर रही पत्रिका को, मैं कभी पसन्द नहीं करता। उस फिल्म में वही होगा-सुन्दरी की मोटर से नायक का घायल होना और फिर प्रेम हो जाना। यह सफेद झूठ। पन्द्रह-बीस सालों से तो मैं खुद भीड़ भरी सड़कों पर सुन्दरियों की सभी सवारियों को कुचलने का आमन्त्रण देता काफी बदहवास हो चुका हूँ। पर मोटर तो क्या, किसी रिक्शे से भी यह अकिंचन नहीं टकराया। और पारिवारिक पत्रिका में ‘प्याज का हवुला’ बनाने की विधि लिखी होगी, जो मेरी पत्नी को सम्पादक और लेखिका से कहीं अधिक अच्छी आती है।

खैर फिल्म कोई भी रही हो, मुसीबत वही थी-टिकिट मिलने की अड़चन। नया चित्र और पहला शो। अपार भीड़। टिकिट घरों की खिड़कियाँ तक तो दिखती नहीं थीं; टिकिट कहाँ से लेता। थर्ड क्लास बन्द था, सेकिण्ड क्लास का पता नहीं था; फर्स्ट और स्पशेल के सामने भी धक्का-मुक्की हो रही थी। बालकनी के लायक पैसे मेरे पास नहीं थे। मैं फर्स्ट या स्पेशल क्लास का इन्तजाम करके चला था।
सिनेमा की टिकिट खरीदना एक अलग किस्म का शौर्य है। सिकन्दर ने भले ही दिग्विजय की हो, मगर हमारे किसी टाकीज में वह टिकिट नहीं खरीद सकता।

मैं दूर खड़ा था। तैरना न जानने वाला जिस तरह किनारे पर खड़े-खड़े तरंगों की अठखेलियाँ देखता रहता है। मेरे जैसे कई लोग वहाँ खड़े थे-हम लोगों में से कई उसी तरह तरंगों को देखते जिन्दगी गुजार देते हैं। कूद पड़ने की हिम्मत नहीं, इसलिए कूद पड़ने को हम गँवारी और हल्कापन कहकर मुँह बिचकाते रहते हैं।
संसार का सबसे कठिन काम उस समय मुझे टिकिट खरीदना लग रहा था। अगर जनक सीता का स्वयंवर इस जमाने में करते तो शिव के धनुष को उठाने के बदले वे यही घोषणा करते कि जो पहले शो की पाँच टिकिट खरीदकर ले आएगा, उससे विवाह कर देंगे।

कुछ लड़के उस भीड़ में घुसकर इकट्ठे टिकिट खरीद लाते और हम जैसों को दुगनी कीमत पर बेचते। लोग उसी दाम पर खरीदकर जा भी रहे थे।
मैंने पत्नी से कहा, ‘‘चलो, लौट चलें। फिर कभी देखेंगे। अभी तो महीनों चलेगा।’’
पत्नी ने बड़े अनमने भाव से गर्दन हिलायी। माँ तो कुछ बोली ही नहीं।
उन लोगों का निराश होना स्वाभाविक था। बड़ी दूर रहने के कारण हम लोग बहुत कम आ पाते थे। ताँगा किराया ही तीन रुपये लग जाता था। आज माँ और पत्नी बड़ी हविस से आयी थीं। दोपहर से ही खाना बनने लगा था, शाम तक सब काम निबट गया था। अड़ोस-पड़ोस में खबर फैल गयी थी या फैला दी गयी थी कि आज वर्मा जी का सारा परिवार सिनेमा जा रहा है। अब लौटतीं तो मुहल्ले की स्त्रियाँ क्या कहतीं ? कल किसी ने पूछ ही लिया कि कैसी फिल्म थी, तो क्या जवाब देंगी ?
मैंने लौटने की बात दुहराई तो माँ ने कहा, ‘‘अरे बेटा, अब न जाने कब आना होता है। कोई तेरी पहिचान का यहाँ नहीं है ?’’

मैंने कहा, ‘‘भीतर अगर जाता तो पहिचानवाले बहुत मिल जाते। पर भीड़ इतनी है कि पहिचानवाले भी इसी मुसीबत में होंगे।’
इसी समय एक बीस-बाईस साल का अच्छा तगड़ा लड़का वहाँ से चिल्लाता हुआ निकला, ‘‘सिर्फ तीन बची हैं-स्पेशल क्लास ! सवा रुपये की दो रुपये में !’’
मैंने उससे कहा, ‘‘ए भाई, दो रुपया तो बहुत होता है। डेढ़-डेढ़ लेना हो तो तीनों दे जाओ।’’
वह बोला, ‘‘बाबूजी, जान हथेली पर रखकर जाना पड़ता है। चपेट में आ गये, कि मरे ! डेढ़ में तो सुबह तक नहीं मिलेगी। थोड़ी देर बाद ढाई होंगे।’’

माँ को इतनी दूर आकर लौटना ज्यादा अखर रहा था। पर उन्हें मेरे जेब का कोई अन्दाज भी नहीं था। वे बोल उठीं, ‘‘बेटा, तू तो ले ले। इतनी दूर से आये हैं। अब लौटना अच्छा नहीं।’’
मैंने स्पष्ट बात कह दी, ‘‘पैसे लाया हूँ हिसाब के। फिर ताँगे में कम पड़ेंगे।’’
माँ ने कहा, ‘‘अरे, तो धीरे-धीरे घूमते हुए पैदल ही निकल चलेंगे। ठण्डी तो रात है। है ही कितनी दूर।’’

वह लड़का माँ की बात बड़े ध्यान से सुन रहा था। माँ की अन्तिम लाचारी की बात सुनकर वह बोला, ‘‘अच्छा, माँ देख लो। जो देना हो, दे देना ! काहे को लौटती हो !’’
मैंने हिसाब लगाकर कहा, ‘‘भाई, डेढ़ से ज्यादा न देंगे।’’
वह बोला, ‘‘अरे मुझे नहीं चाहिए डेढ़-वेढ़ तीन टिकटों में नहीं कमाया तो क्या हुआ। लाओ तीन टिकटों के पौने चार। हाँ, हटाओ; एक धन्धा बिना मुनाफे का ही सही।’’
टिकट खरीदे। माँ ने प्रसन्नता से उसे आशीर्वाद भी दे दिया-‘‘बेटा, तेरी बड़ी उमर हो।’’
इण्टर-वेल में वह चाय बेचता हम लोगों की तरफ आया। हमारे पास आकर बोला, ‘‘बाबूजी, कुछ चाय-वाय ?’’ सिनेमा की रद्दी चाय पीने की किसी की इच्छा नहीं थी। मैंने मना कर दिया और सहज ही पूछा, ‘‘तुम यहाँ चाय भी बेचते हो ?’’
वह बोला, ‘‘नहीं जी, मेरा एक दोस्त बचेता है। आज वह बीमार है, तो मैं उसका काम कर देता हूँ। दोस्त के काम न आये, तो दोस्ती कैसी ?’’

वह आगे बढ़ गया।
पत्नी ने कहा, ‘‘इस लड़के को कुछ दे दो।’’
मैंने हाथ में एक रुपया लिया और उसे पुकारा।
वह पास आकर बोला, ‘‘कितने कप बाबू ?’’
मैंने कहा, ‘‘नहीं, चाय नहीं चाहिए; रक्खो।’’ मैंने रुपया उसकी ओर बढ़ाया।
‘‘क्यों ?’’ उसने पूछा।
‘‘यों ही।’’ मैंने कहा।
वह बड़ी बेरुखी से बोला, ‘‘वाह खैरात बाँटते हो क्या, बाबू साहब ? मैं कोई भिखमंगा हूँ क्या ? ऐसे रईस मैंने बहुत देखे हैं। अपना रुपया रख लो। मैंने उन माँ जी की परेशानी देखकर टिकटें दी थीं। आप मेरे ऊपर एकदम अहसान ही करने लगे।’’
आहत-सम्मान मैं सहमकर रह गया। बड़ी बदतमीजी से बात की उसने। पर परिवार-विशेषकर स्त्रियों के साथ बैठा आदमी हर एक की सुन लेगा।
पत्नी ने कहा, ‘‘जाने दो। बड़ा गँवार है।’’
लड़का घूमता हुआ बढ़ रहा था। एकाएक वह मुड़ा और पास आकर बड़ी नरमी से बोला, ‘‘बाबूजी, माफ करना। मेरी आदत जरा साफ बात करने की है। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। थोड़ी खिदमत मैंने ही माँ की कर दी, तो क्या हुआ। जैसी आपकी माँ, वैसी मेरी माँ।’’

पानवाले लड़के को उसने पुकारा, ‘‘ए लच्छू इधर आ बे ! तीन पान दे इधर। पैसे मुझसे बाहर ले लेना।’’

पान हमने ले लिये और वह चाय की आवाज लगाता चला गया।
बीस-बाईस साल का तगड़ा तरुण था वह। अच्छा कद्दावर और पुष्ट-सुगठित। नाक-नक्शा अच्छा सुडौल। जबान और चाल दोनों में ऐंठ। चेहरे पर बड़ी बेपरवाही और ढीठपन। बड़े मद से चलता था। बातचीत में बड़ी हेकड़ी मालूम होती थी।
कभी-कभी वह मुझे सड़क पर मिल जाता, तो सलाम करके पूछता, ‘‘बाबू साहब मजे में हैं ? और अम्मा ?...’’
अजब वेश-भूषा में अजब स्थानों में वह मिल जाता। कभी साफ कुरता-पायजामा पहने मिल जाता; कभी पतलून-कोट; कभी मैली बनयाइन पहने ही घूमता दिखता और कभी मलमल के महीन कुरते के नीचे काली बनियाइन पहिने और तेल से तर बालों पर हरा या पीला रूमाल बाँधे-बिलकुल शोहदा ! मुझे देखते ही दुआ-सलाम जरूत करता और वे जो सवाल पूछता। कभी-कभी मैं सहम भी जाता।
शरीफ दोस्तों से बातें कर रहा हूँ और इतने में वह हरा रूमाल लपेटे आ गया। बड़ी आत्मीयता से हालचाल पूछने लगा। उसके चले जाने पर दोस्त पूछते, ‘‘इसे कब से जानते हो ?’’ उनका मतलब यह होता कि इसे जानना मेरे लिए कलंक की बात है।

हमने यह तय कर रखा है कि हम किसे जानें और किसे नहीं जानें। मुझे मित्रों का इस तरह पूछना भी अच्छा नहीं लगता था। घूस के धन से बेटे का नाम ले दुकान खोलकर एक दो साल जेल काट आनेवाले सफेदपोश के पास खड़ा होता, तो कोई नहीं पूछता कि इसे कब से जानते हो। मगर मलमल के कुरते के भीतर से झाँकती काली बनियाइन ! और इन तर बालों पर यह हरा रूमाल ! इससे जान-पहचान रखने में भी बदनामी है।
पतलून के भीतर नंगे हम सब, किसी का पायजामा जरा खिसका देख किस कदर हँसते हैं।

मैंने उससे जान-बूझकर पहचान नहीं बढ़ाई। परिवार वाला आदमी था। हमें एक निश्चित दायरे में घूमना पड़ता है। पर उस लड़के की निर्भयता और अलमस्ती मेरी ‘रोमांटिक’ कल्पना को बड़ी भाती थी। मैंने भी कुछ समय इसी स्वच्छन्दता से गुजारा था। बचपन से अखाड़े जाने लगा था। कुश्ती का बड़ा शौक था। शक्ति के साथ शक्ति की आजमाइश की भावना भी आयी थी और मैं झगड़ा-फसाद, मारपीट में अक्सर शामिल रहता। लॉ कालेज से एक बार मार-पीट के कारण निकाला भी गया था। फिर गृहस्थी हो गयी। इस शहर में वकालत आरम्भ कर दी। वकालत के पेशे में भी मैंने अपने डील-डौल का समुचित उपयोग किया था। गवाह के कटघरे पर बाँद रखकर, मैं आँखें निकालकर कर्कश स्वर में, गवाह के सिर पर से दहाड़ता तो वह बेचारा घबड़ा जाता। फौजदारी मुकदमों के लिए मैं अच्छा वकील माना जाता था। पर अब धीरे-धीरे स्वभाव समतल होता जाता था। अब मुझे देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने कभी गुण्डागिरी भी की होगी। फिर भी ऐसे किसी युवक को देखता, तो मेरा मन छटपटा उठता था।
एक दिन लगभग आधी रात को किसी ने मेरे द्वार की साँकल खटखटायी दरवाजा खोला, तो सामने उसी युवक को खड़ा पाया। उसके चेहरे पर बड़ी कठोरता थी। कपाल की नसें उभरी हुई थीं और मुट्ठियाँ कसी हुईं। बड़ी बदहवास स्थिति में था वह। मैं देखकर जरा सहम गया।

इस तरह सहमना भी हमारा एक गहरा संस्कार है। हम लोग आशंका से घिरे रहते हैं। कोई हमारे घर की ओर देखता है तो हम समझते हैं कि इसका इरादा चोरी करने का है। कोई अनायास हमसे पहचान निकाल ले तो हम समझते हैं कि कुछ माँगना चाहता है। हमारे बच्चे को कोई प्यार से पुचकारे तो हम डरते हैं कि कहीं जादू-टोना न कर दे। आसपास आशंका और सन्देह के कँटीले तारों की बाड़ी लगाकर, हम उसमें बाल-बच्चों को लेकर दुबके बैठे रहते हैं। आधी रात को कोई द्वार खटखटाये तो हम उसके इरादे पर शक करने लगते हैं। मुझे आशंका हुई कि यह तंग करके कुछ लेने आया है। मेरी निगाह उसके कुरते के छोर पर पड़ी। वहाँ ताजा खून के धब्बे थे। मेरा कानून-भीरु मन चिन्तित हुआ।
मैंने पूछा, ‘‘क्यों ? क्या बात है ?’’
उसने कहा, ‘‘मुझे दस रुपये चाहिए।’’

कुछ इस अधिकार से बोला, जैसे कोई सेठ अपने मुनीम से तिजोड़ी से रुपये निकालकर देने को कहता हो।
मैंने कहा, ‘‘इतनी रात को रुपयों की क्या जरूरत है ?’’
वह बोला, ‘‘जरूरत है, तभी तो आया। पुलिसवाले को देना है।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘इसलिए कि मैंने एक आदमी का सिर फोड़ दिया। उसे दस रुपये नहीं सुँघाऊँगा, वह साला मुझे कोतवाली ले जाएगा। चोट तो मामूली है, पर मेरे कुरते पर दाग तो पड़ गये हैं।’’
‘‘तुमने उसे क्यों मारा ?’’

मेरी बातचीत के सिलसिले से वह ताड़ गया होगा कि मैं रुपये दे दूँगा। इसलिए धीरज से बतलाने लगा-‘‘वह मेरा दोस्त ही है। मिल में काम करता है। साले को शराब पीने की लत लग गयी है। खैर भाई पी-तेरा पैसा है। तू चाहे जहर पी। पर कम्बख्त रात को आकर औरत को पीटता है। उस बेचारी ने क्या बिगाड़ा है ? इस हरामखोर को सबेरे धुँधलके में खाना पकाकर देती है, रात को खाना बनाकर बैठी रहती है। और यह बदमाश पी कर आता है और बेचारी को पीटता है। मैंने बहुत समझाया, पर वह नहीं माना तो आज मैंने इसे मारा। अब बेटा, कभी नहीं गड़बड़ करेगा। इतने में एक पुलिसवाला आ गया और मुझे कोतवाली ले जाने लगा। मैं समझ गया कि कुत्ते को रोटी चाहिए। मैं जानता हूँ इन्हें। एक टुकड़ा फेंक दो, तो दुम हिलाने लगते हैं। मैं उसे बैठने को कह आया हूँ। जल्दी रुपया दीजिए।’’
 




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